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रविशंकर उपाध्याय के लिए श्रद्धांजलिस्वरूप अच्युतानन्द मिश्र की दो कविताएँ

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युवा कवि साथी रविशंकर हमारे बीच नहीं हैं, (हमारे लिए सबसे पहले हमारे अनुज.) ये मानने को आज भी मन नहीं कर रहा. ऐसा लग रहा है कि हमेशा की तरह रविशंकर की विनम्र आवाज मेरे मोबाईल पर सुनाई पड़ेगी. वह आवाज जो आज लगातार दुर्लभ होती जा रही है. लेकिन मानने-न मानने का नियति से कोई सम्बन्ध नहीं. हकीकत तो यही है कि हमारा यह अनुज जिसने अपनी मौत से दो दिन पहले अपना शोध-प्रबंध जमा किया था और एक दिन पहले मुझे आश्वस्त किया था 'पहली बार' के लिए कविताएँ भेजने के लिए, हमसे बहुत दूर चला गया है. उस दूरी पर जिसे हम पार नहीं कर सकते. आज भी मन बोझिल है. हम यहाँ श्रद्धांजलिस्वरुप भाई अच्युतानन्द मिश्र की हालिया लिखित कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ जो रविशंकर उपाध्याय को ही समर्पित हैं.       अच्युतानन्द मिश्र यह दिल्लगी का वक्त नहीं (रविशंकर की स्मृति के लिए) तुम्हारी चुप्पी मेरे भीतर के पत्थर को पिघला रही है ऐसी भी क्या निराशा कि चुप्पी के भीतर की चुप्पी अख्तियार कर ली जाये  अभी तो दिल्ली का मौसम बदलना है अभी तो ख...

विमल चन्द्र पाण्डेय के उपन्यास 'भले दिनों की बात थी' पर सरिता शर्मा की समीक्षा

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विमल चन्द्र पाण्डेय हमारे समय के कुछ उन चुनिन्दा रचनाकारों में से एक हैं जिन्होंने कहानी, कविता, संस्मरण जैसी विधाओं में अपना लोहा मनवाया है. अब आधार प्रकाशन से हाल ही में  उनका एक उपन्यास 'आवारा सपनों के दिन' प्रकाशित हुआ है. सरिता शर्मा ने इस उपन्यास पर पहली बार के लिए एक समीक्षा लिखी है. आईए पढ़ते हैं यह समीक्षा      आवारा सपनों के दिन सरिता शर्मा     कवि और कहानीकार विमल चंद्र पाण्डेय को उनके कहानी संग्रह ‘डर’ के लिए ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार मिल चुका है. उनका संस्मरण ‘ई इलाहबाद है भैय्या’ बहुचर्चित हुआ. उनके  पहले उपन्यास ‘भले दिनों की बात थी’ की शुरुआत फ़राज़ के शेर से होती है जो नोस्टाल्जिक माहौल बना देता है. ’भले दिनों की बात थी भली सी एक शक्ल थी ना ये कि हुस्ने ताम हो ना देखने में आम सी  ना ये कि वो चले तो कहकशां सी रहगुजर लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे...........’  युवा वर्ग के सपने और बेरोजगारी के दौरान समय काटने के बोहेमियन उपाय कुछ हद तक सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास ‘वे दिन’ जैसे हैं. शुक्ला जी की जवान होती ...

‘प्लाजमा’ कविता पर अमीरचंद वैश्य का आलेख

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   विजेन्द्र जी की लोक के प्रति प्रतिबद्धता से हम सब वाकिफ हैं. इसी क्रम में उन्होंने कई लम्बी कविताएँ भी लिखी हैं जिनमें प्लाजमा उल्लेखनीय है. इस लम्बी कविता की पड़ताल की है अमीर चन्द्र वैश्य ने. तो आईये पढ़ते हैं अमीर जी का यह आलेख 'समर जारी है बदस्तूर'   समर जारी है बदस्तूर अमीर चन्द वैश्य ‘ प्लाजमा’   उल्लेखनीय लम्बी कविता है। वरिष्ठ कवि विजेन्द्र की। ‘ संवेद’ पत्रिका के अंक (जंनवरी , 2011) में इसका प्रकाशन पहली बार हुआ था। इसका रचना-काल है जनवरी , 2011 । इस मास की 15 वी तारीख को यह पूरी हुई थी। अतएव कह सकते हैं कि इस कविता की अन्तर्वस्तु विजेन्द्र के मानस में आकार ग्रहण करती रही होगी। पूर्णता से पूर्व। प्रत्येक कृति पहले मानसिक स्तर पर अमूर्त आकार निर्मित करती है। फिर वह सायास अनायास प्रत्यक्ष रूप में सामने आती है। पहले नक्शा बनता है। फिर आलीशान इमारत। ‘ ताजमहल’   की भव्य निर्मिति इसका प्रमाण है। गोस्वामी जी ने लिखा है कि ‘ रामचरितमानस’   की रचना सर्वप्रथम शंकर जी ने की थी। उसे अपने मानस में धारण कर लिया था। इसीलिए राम-क...