नीरज सिंह की कहानी 'क्यों'


नीरज सिंह 


भारत की समूची सामाजिक संरचना में जाति व्यवस्था की भूमिका अहम रही है। इसने राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिदृश्य को तो प्रभावित किया ही, साहित्य को भी गहरे तौर पर प्रभावित किया। लेकिन अर्थव्यवस्था की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। आर्थिक मजबूती समूचे परिदृश्य को बदल कर रख देती है। जातीय संरचना चाहें जितनी मजबूत हो, आर्थिक कारक उस व्यक्ति विशेष को खुद उसके सामाजिक परिवेश से अलग कर देता है। कहा जा सकता है कि पूंजी अपने अंदाज़ में वर्ग का निर्धारण करती है और जातिगत चरित्र को भी बदल देती है। नीरज सिंह की यह कहानी उत्तर भारत की जातीय संरचना को समझने के साथ साथ वर्गीय परिस्थिति का भी विश्लेषण करती है। नीरज सिंह एक समर्थ कहानीकार रहे हैं। सत्तर अस्सी के दशक में इनकी कहानियां खासी चर्चित रही हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीरज सिंह की कहानी 'क्यों'।


'क्यों'


नीरज सिंह


बात तो वैसे कुछ भी नहीं थीं। लेकिन लोगों को तो उसका बतंगड़ बनाना था, बना दिया। हुआ यह कि गंगा मोची का बेटा किरपा अपनी उमर के अन्य लड़कों के साथ गांव के बाहर वाले अखाड़े के पास कंचे खेल रहा था। जैसा कि खेल में हुआ करता है, उस दिन किरपा ही जीत भी रहा था। और किरपा का जीतना अंततः उसके साथ खेलने वालों के लिए ईर्ष्या का कारण बन गया। इसी डाह और आंतरिक द्वेष के वातावरण में जब किरपा ने जोगिन्दर पंडित के आखिरी कंचे को भी निशाना बना दिया तो पंडित ने उसे उसका जीता हुआ कंचा देने से साफ इन्कार कर दिया। लाख समझाने पर भी जब जोगिन्दर कंचा देने के लिए तैयार नहीं हुआ तो किरपा को लगा कि पंडित उसकी जीत के प्रभाव को एकदम गलत ढंग से समाप्त करने की कोशिश कर रहा है। बस, उसे गुस्सा आ गया और उसने जोगिन्दर पंडित की बांह मरोड़ कर उससे जबरन कंचा छीन लिया।


अब यहां अगर ऐसी स्थिति में पंडित की बांह मरोड़ कर कंचा छीन लेना किरपा का अपराध था तो उससे भी बड़ा अपराध यह था कि वह मोची का लड़का हो कर ब्राह्मणों के साथ खेलने चला आया था। नहीं तो क्या उसकी जात वाले भी, केवल बांह मरोड़ कर कंचा छीन लेने के लिए एकदम गोल बांध कर उसे पीटने लगते? लेकिन अब तो उससे गलती हो चुकी। इसलिए पिटना ही था। बेरहमी से पीटा गया। प्रतिरोध की हल्की-सी कोशिश भी की थी, लेकिन जब जोगिन्दर ने अखाड़े में पड़ी एक ईंट उठा कर उसके सिर में दे मारी तो वह चुपचाप पिटता रहने के लिए बिल्कुल विवश हो गया था। सिर फूट जाने के बावजूद उसे तब तक पीटा जाता रहा था जब तक शहर से कमा कर लौटता किरपा का बापू गंगा वहां नहीं पहुंच गया। गंगा का पहुंचना भी अप्रत्याशित ही था। रोज तो सीधी राह से घर ही चला जाता था। आज न जाने कैसे जी में आया कि अखाड़े के पास वाले पीपल से बकरी के लिए पत्ते तोड़ता चले, और वह इस तरफ चला आया था।


किरपा को खून से लथपथ देख गंगा रोमांचित हो उठा। जब उसे पता चला कि जोगिन्दर पंडित ने किरपा का सिर फोड़ा है तो उसकी आंखों में खून उतर आया, उसने क्रोध से कांपती आवाज में जोगिन्दर से कहा-तुमने तो इसका सिर फोड़ दिया पंडित, इसलिए कि तुम लोग गिनती में अधिक थे, लेकिन अब अगर मैं तुम्हारा सिर फोड़ दूं तो?


गंगा की बातों से ब्राह्मणों के सभी लड़के सहम गये थे और एक-एक कर के वहां से खिसक गये थे। और जब तक गंगा अपने घायल बेटे को पीठ पर लाद कर घर तक पहुंच पाता, सारे के सारे लड़के अपने घरों में घुस चुके थे।


किरपा की हालत देख कर पास-पड़ौस वाले बहुत मोह खा रहे थे। लेकिन गंगा मोह खाने की अपेक्षा अपने आक्रोश को उन सभी लड़कों के घर वालों के आगे जता आना अधिक अच्छा समझता था, जिनके कारण किरपा की यह हालत हुई थी। वह अभी उलाहना दे आने की बात सोच ही रहा था कि हाथ में एक मोटा-सा लट्ठ लिए कामेश्वर पंडित दरवाजे पर आ धमके और लगे गंगा का नाम ले-ले कर उसकी मां-बहन को गालियां देने।


कामेश्वर पंडित जोगिन्दर के बाप थे। जब जोगिन्दर ने उन्हें यह बताया कि गंगा ने उसे और अन्य लड़कों को सिर फोड़ने की धमकी दी है तो वे आपे से बाहर हो गये और पूरी बात सुनने से पहले ही लट्ठ ले कर गंगा के घर के लिए निकल पड़े। अब कामेश्वर पंडित गालियाँ दे रहे थे और गंगा बेटे के सिर से वह रहे खून को देखने के बावजूद चकित भाव से उनकी गालियां सुनता जा रहा था।


आखिर गंगा को मुंह खोलना ही पड़ा- आप बेकार ही मुझे गालियां दे रहे हैं पंडित जी। पहले पूरी बात समझ लेते। एक तो आपके सपूत ने किरपा का सिर फोड़ दिया और ऊपर से आप झगड़ा करने पर तुल रहे हैं।


गंगा की बात सुन कर कामेश्वर पंडित के दिमाग का पारा और चढ़ गया। भभक कर बोले-साले चमार! कहता है झगड़ा करने आया है? तू वहां लड़कों को सिर फोड़ की धमकी दे रहा था सो कुछ नहीं? क्यों? जान ले लूंगा साले, कहे देता हूँ।


गंगा को आश्चर्य हुआ। क्या कह रहे हैं पंडित जी? सिर फोड़ने की धमकी दे रहा था, लड़कों को? नहीं, बिल्कूल झूठी बात है। उसने तो पूछा भर था कि इसमें धमकी कहां है? और अगर गंगा ऐसी धमकी देता भी। धमकी क्या मार भी देता, तो क्या गलत करता? जब सिर्फ धमकी का नाम सुन कर ही पंडित उसके दरवाजे पर लग भांज रहे हैं तो अपने बेटे का सिर फोड़ने वालों को वह मार क्यों नहीं सकते थे? उसने पंडित की बात काटने की कोशिश की- नहीं-नहीं पंडित जी, आप गलत कह रहे हैं। मैंने धमकी नहीं दी थी, मैंने तो बस यही कहा था कि ..


अरे जाने भी दे। जो हुआ सो हुआ। बूढ़ा जस्सू मोची बात को ज्यादा बढ़ते देख, साधने का प्रयत्न करते हुए बोला - पंडित जी से कोई झगड़ा किया जाता है? ये तो हमारे मालिक हैं। गलती हुई सो हुई। चल, अब माफी मांग ले।


और गंगा ने माफी मांग ली।


और गंगा के माफी मांग लेने के बाद भी कामेश्वर पंडित उसे ऐसी नजरों से देखते हुए गए मानो कह रहे हों कि सामने आना बच्चू, कच्चा नहीं चबा गया तो मैं भी पंडित नहीं ।


संतुष्ट तो गंगा भी नहीं था, झगड़े के इस समाधान पर। यह क्या बात हुई कि जो मार खाये वही माफी भी मांगे। उसे जस्सू पर गुस्सा आ रहा था -मालिक से माफी मांग लो। ऊंह। बड़े आये मालिक। जैसे उन और उसके परिवार को वही खिलाते हो। नहीं, गंगा का कोई मालिक नहीं है। कोई उसे अपने घर से नहीं खिलाता। कोई नहीं, कोई भी नहीं! वह तो मेहनत-मजदूरी कर के अपना पेट पालता है। और जब कोई उसे खिलाता नहीं तो फिर वह उसका मालिक कैसे हुआ?


फिर भी, झगड़े के सुलझाव से क्षुब्ध होते हुए भी गंगा ने मान लिया था कि बात अब सुलझ गयी है। लेकिन बात सुलझी नहीं थी। उसका तो बतंगड़ बनना था, बनी। लेकिन इस बार गंगा का तनिक भी दोष नहीं था। फिर दोष किसका था?



जिस दिन यह घटना घटी, उसके दूसरे दिन शाम को गंगा शहर से घर लौट रहा था। गांव के बाहर एक चौड़ा बरसाती नाला है और उसके ऊपर है एक लम्बा-सा पुल। गंगा जब पुल के पास पहुंचा, उसे वहां कुछ आदमी मिले। चेहरे पर किसी साजिश का भाव लिए और अबूझ नजरों से उसे घूरते; फिर न जाने किस बात पर उनकी गंगा से तू-तू मैं-मैं हो गयी। बात बढ़ते भी देर नहीं लगी, जैसे उसे बढ़ाया ही जाना था। और फिर उन आदमियों ने गंगा को बुरी तरह धुन डाला। इधर रात गये तक गंगा घर नहीं लौटा तो घर वालों को फिकर हुई। कुछ बिरादरी वाले लालटेनें ले-ले कर ढूंढ़ने निकले और अंततः उसे पुल के पास वाले बगीचे से बेहोश हालत में उठा कर लाया गया।


दस घंटे की लंबी बेहोशी के बाद, दूसरी सुबह जब गंगा की आंख खुली थी, तब पता चला कि दोष किसका था। गंगा ने बताया कि कामेश्वर पंडित के आदमियों ने उसे उसी बात के लिए पीटा था, जिसके लिए उसने माफी मांग ली थी।


माफी मांग लेने के बाद भी बदले की कार्रवाई! मोचियों का पूरा टोला पंडितों की इस कमीनगी से आंदोलित हो उठा। बगल का दुसाध टोला भी उनके साथ हो गया। स्कूलों में पढ़ने वाले लड़कों का तो विचार हुआ कि अभी तुरंत ही कामेश्वर पंडित को पकड़ कर ठोंक दिया जाये। एक आदमी को निहत्था देख कर वार करना? वह भी मिल कर? थू!


लेकिन बिरादरी के बूढ़ों का खयाल बदला लेने के मामले में कुछ दूसरी तरह का था। उनके विचार से, मामले को अपने हाथों में लेने की बजाय पुलिस के हवाले कर देना ज्यादा अच्छा था, क्योंकि अगर अब फिर मारपीट हो जाती है, और पंडित लोग पहले पहुंच जाते हैं तो फिर बड़ी मुश्किल हो जायेगी, सारे मोची बेकसूर फंस जायेंगे। पूरी बिरादरी को जेल में चक्की पीसनी पड़ेगी। चोरी का मामला बनाते या कोई भी मामला बनाते कितनी देर लगती है। कोर्ट-कचहरी के चक्करों का अलग झगड़ा और घरों की यह हालत कि पीछे से कोई दो जून का आसरा कराने वाला भी नहीं। नहीं बाबा, इससे तो अच्छा है हम लोग ही पहले पुलिस में रपट लिखा दें।


नौजवानों को बूढ़ों की यह योजना अच्छी नहीं लगी। उनके खयाल से पैसों से बिकी पुलिस से न्याय मांगने की बजाय बदला ले कर जेल जाना ज्यादा असरदार, ठोस और सम्मानजनक बात थी।


अंत में बूढ़ों की बात ही मानी गयी। पंडितों के पास पैसों का जोर है तो हम भी बिल्कुल मुरदार नहीं। अगर पैसों से ही उन बदमाशों को जेल भिजवाया जा सकता है तो करो पैसा इकट्ठा, चंदा करो। जो जितना दे सकता हो दे। मामला सिर्फ गंगा का ही नहीं है। आज दब गये तो कल फिर किसी और के साथ यही जुलुम होगा। नहीं! उन लोगों को सजा मिलनी ही चाहिए ।


चंदा होने लगा।


लेकिन बात फिर बिगड़ गयी। इस बार झड़प आपस में ही हुई ।


शौखिन मोची, मोचियों में सबसे ज्यादा धनी है। मोचियों में ही क्यों, पूरे गांव में केशो सिंह के बाद उसी का नम्बर है पैसे वालों में। कलकत्ते में जूतों की एक बहुत बड़ी दुकान है उसकी। शौखिन खुद पहले अस्पताल में कम्पाउडरी में था। कम्पाउंडरी में उसने जायज-नाजायज सब तरह से खूब पैसा बनाया। अब उसके बेटे दुकान के जरिये कमा रहे हैं। और अगर सच कहा जाए तो जितना घमंड अपने धन का खुद शौखिन को नहीं उससे कहीं ज्यादा उसकी बिरादरी वालों को है। और आज, ऐसे समय में तो, जबकि पूरी बिरादरी की इज्जत का सवाल है, उसका घमंड आसमान को छूने लगा था। अगर उस तरफ के अधिकांश लोग धनी थे तो इस तरफ कौन था उनकी टक्कर का? जाहिर है शौखिन।


लेकिन जब बिरादरी वाले चंदा मांगने शौखिन के आंगन में पहुंचे, तो उसने चंदा देने के लिए साफ इन्कार कर दिया, बोला- "मैं नहीं समझता कि महज इतनी-सी बात के लिए आप लोगों को पुलिस के पास दौड़ जाना चाहिए। ऐसी बातें तो आये दिन हुआ करती हैं। और फिर गंगा कोई राजा-नवाब तो है नहीं कि जरा-सा पिट गया तो आप लोगों की इज्जत चली गयी।


शनीचरा मोची को शौखिन का लहजा बहुत बुरा लगा। नाराजगी के से स्वर में बोला- आप तो हमें यूं सलाह दे रहे हैं दादा, जैसे आप हमारी जात के नहीं, कोई दूसरी जात के हों। एक वो लोग हैं कि सभी ब्राह्मण-ठाकुर एक हो गये और एक आप हैं कि हमीं लोगों को गलत ठहरा रहे हैं।


इतना सुनना था कि शौखिन आग-बबूला हो गया। अपनी भूतपूर्व नीचाई का अहसास उसकी आज तक की सारी मेहनत-मशक्कत, बनाव-चढ़ाव को एक साथ गलत साबित किये दे रहा था। क्या खाक बड़ा आदमी समझता रहा वह अपने को? यह हरामी तो उसे अब भी वही शौखिन समझते हैं- ब्राह्मणों की जूठी पत्तल उठा कर चाट जाने वाला। भभक कर बोला - तो क्या सोचते हो कि मैं भी तुम्हीं लुच्चों की जात का हूं? भगो-भगो! तुम भिखमंगों के साथ कौन रहेगा। चलो, भागो यहां से। बड़े आये जात वाले। बदमाश कहीं के!


और फिर सब लोग मन-ही-मन दांत पीसते, शौखिन की बात पर हैरान होते, शौखिन को कोसते, उसके पिछले जीवन की टुच्चई को याद करते-कराते लौट आये। बात लग गयी थी। अभी तक पंडितों-ठाकुरों ने ही नीचा समझा। अब अपनी जात वाले भी दुत्कार रहे हैं। युवकों ने फिर कहा कि चंदा मांगने वाली बात ही साली गलत है। हम तो पहले ही कहते थे। किसी ने सुनी नहीं। अब भी क्या बिगड़ा है। जान का और जेल जाने का डर मन से निकाल दो और लगा दो ठिकाने कामेश्वर पंडित के बच्चे को। और उससे भी पहले इस शौखिन को। क्या होगा? हद-से-हद फांसी ही तो होगी? मर ही तो जायेंगे? अब भी क्या जिंदा हैं?


लेकिन बूढ़ों ने अपनी समझ से फिर बात संभाल ली। पैसे इकट्ठ कर लिए गये और फिर सब लोग थाने गये। रो-कलप कर थानेदार को सारी बात सुनायी और हाथ जोड़ कर कहा कि हुजूर! किसी तरह एक बार उस कामेश्वर पंडित को अंदर करवा दिया जाये। बस!


थानेदार ने मोचियों की पूरी बात ध्यान से सुनी। लेकिन बात खत्म होते ही उठायी अपनी बेंत और उन लोगों को फटकारते हुए गरजा-साले चले हैं मुकदमा करने। ठाकुरों-ब्राह्मणों को बंधवाने चले हैं। थानेदार को बेवकूफ समझ रखा है। क्यों? आज तुम लोगों के कहने से कामेश्वर पंडित को गिरफ्तार कर लूं और कल को सस्पेंड हो जाऊं? क्यों? वे लोग तो सोर्सफुल आदमी हैं। मेरी नौकरी भी जा सकती है। पर तब तुम लोग मेरे बीवी-बच्चों को खिलाओगे क्या? हरामजादे! साले! मुकदमा लड़ेंगे।


और सब लोग वहां से भाग कर गांव लौट आये थे। बूढ़ों की योजना ठप्प हो गयी थी, इसलिए वे चुप हो गये थे। अब जो भी करना था वह युवकों को करना था और युवक इस बात के लिए कटिबद्ध थे कि मार का बदला मार से लिया जाये।


और तभी से पूरे गांव में तनाव का वातावरण बना हुआ है। झगड़ा भी गंगा मोची और कामेश्वर पंडित के बीच का न रह कर नीची और ऊंची जात वालों के बीच का हो गया है। अब जहां मोचियों, दुसाधों और अन्य छोटी जात वालों में इस बात को लेकर खलबली मची हुई है कि अब मोची-दुसाध भी ऊंची जात वालों पर हाथ उठायेंगे और ऊंची जात वाले चुपचाप सहन कर लेंगे। ये लोग मौका ढूंढ़ रहे हैं और वे लोग आड़।


छोटी जात वालों का दिमाग किस तरह ठंडा किया जाये, यही विचार करने के लिए इस समय गनेश सिंह के दालान में ऊंची जात वालों की सभा बैठी। गांव के सभी ऊंची जात वाले इकट्ठा हुए हैं।



बात गनेश सिंह शुरू करते हैं। बिल्कुल रंगमंचीय गंभीरता से - भाइयों, आप तो जानते ही हैं कि यहां के छोटी जात वालों का दिमाग कितना चढ़ गया है। गांव में अभी कुछ दिनों से घटती आ रही सारी घटनाएं आप लोगों को मालूम हैं। मैं उनके बारे में कुछ भी नहीं कहूंगा। कहना तो यही है कि हमारे होते हुए छोटी जात वाले सांप की तरह सिर उठाये घूम रहे हैं। अब आवश्यकता है इनके उठे सिरों को कुचल देने की। क्यों, क्या विचार है आप लोगों का?


सभी लोग सहमत हैं गनेश सिंह की बात से। गनेश सिंह यहां तक सहमति प्राप्त करने के बाद आगे कहते हैं, 'इसलिए मेरा विचार है कि अब हम लोग एकजुट हो कर उनके विरुद्ध लड़ें। हमें विचार करना चाहिए कि शूद्रों को क्या सजा दी जाये जो अपनी औकात, अपना धर्म भूल गये हैं, उनके साथ क्या व्यवहार किया जाये?'


गनेश सिंह की बात पर सभी सोचने लगे हैं। पूरी तरह विचार-मग्न हो कर सभी लोग कोई ऐसी बात सोचना चाह रहे हैं जिससे छोटी जात वालों की हिम्मत सदा के लिए टूट जाये। इसी बीच दालान के पश्चिमोत्तर कोने से किसी की आवाज उभरती है- उन लोगों के घरों में आग लगा देनी चाहिए ।


वाह-वाह! कितना सुन्दर विचार है! सब साले जल कर राख हो जायेंगे। कौन है यह बात सुझाने वाला? सभी मुग्ध भाव से उस कोने की ओर देखते हैं और देख कर सबकी आंखें आश्चर्य से फैल जाती हैं। अरे! यह तो शौखिन मोची है। यहां कैसे आ गया?


दूसरे लोगों की सोच से कुछ अलग किस्म की सोच है सुमे सिंह की। वह प्रत्येक बात पर गहराई से सोचता है। ऊंची जात वालों की इस सभा में शौखिन मोची क्यों आया? वह अपनी जगह पर खड़ा हो कर पूछता है- शौखिन मोची यहां क्यों आया है?


सुमेर का प्रश्न सबकी आंखों में तैरने लगा है। क्यों आया है शौखिन मोची ऊंची जात वालों की इस सभा में? पूछता है कटु स्वर में केदार पंडित - क्यों? किसने बुलाया शौखिन मोची को?


बलदेव सिंह हैरान हैं। बिसेसर पांडे को कुछ समझ में नहीं आ रहा। आखिर सुमेर और केदार को ही शौखिन का यहां आना क्यों खटक रहा है? हम लोग धनी हैं। इन लोगों में श्रेष्ठ हैं, हमें तो कुछ बुरा ही नहीं लग रहा और इन भिखमंगों को रट लग गयी है कि शौखिन यहां क्यों आया? शौखिन के यहां कर्ज लेने जाते हैं तब उसका मोची होना नहीं खटकता। लेकिन कौन समझाये सालों को! जड़बुद्धि!


आखिर गनेश सिंह बात संभालने का प्रयत्न करते हैं छोड़ो, इस बात से लेना-देना क्या है। शौखिन यहां क्यों आया, इसको भूल कर उसके सुझाव पर ध्यान दो। यह सोचो कि आग कब और कैसे लगायी जाये। बेमतलब की बातों में क्यों उलझते हो?


लेकिन सुमेर और केदार को अपने प्रश्न का उत्तर चाहिए- नहीं, आग लगाने की बात पीछे होगी। पहले हमें यह बताया जाय कि शौखिन यहां क्यों आया?


और हार कर गनेश सिंह अपने मन की बात उगल देते हैं 'देखो भाई, छोटी या बड़ी जात में जन्म लेने भर से कोई आदमी छोटा या बड़ा थोड़े होता है। बड़ा कहलाने के लिए आदमी को कुछ चीजों की आवश्यकता होती है जैसे पैसा, रहन-सहन, बात-व्यवहार, बुद्धि-विचार। और सबको पता है कि शौखिन इन सब बातों में हमारी ही तरह है बल्कि हमसे बढ़ कर है। फिर यह छोटी जात का कैसे हुआ?'


झटका-सा महसूस करता है सुमेर सिंह। तो आदमी की जात अब पैसे से छोटी या बड़ी होने लगी? वह बौखला कर कहता है अगर ऊंचा होने के लिए ये सब गुण आवश्यक है, तब मैं आपकी जात का कैसे हुआ? मेरे पास तो पैसा नहीं है। मैं तो आपके खेतों में मजदूरी कर के अपना पेट पालता हूँ। मेरे विचार भी आप लोगों जैसे नहीं हैं और न ही मेरा रहन-सहन आप लोगों जैसा है। शादी-व्याह में मैं आप लोगों के साथ बैठ कर खा नहीं सकता। इसलिए कि मेरे कपड़े आप लोगों की तरह साफ-सुथरे नहीं होते। फिर मैं कैसे हुआ आपकी जात का आदमी?


दालान में सन्नाटा छा गया। किसी को नहीं सूझ रहा था कि कैसे समझाया जाये सुमेर और केदार को? और अब तो सुमेर और केदार ही नहीं, उनकी तरह के बहुत से लोग यही सवाल पूछ रहे हैं- बताओ, हम बड़ी जात के कैसे हुए?


बड़ी उलझनपूर्ण स्थिति हो गयी है गनेश सिंह के लिए। क्या कहें? लेकिन चुप रहना भी ठीक नहीं। कहते हैं- तुम लोग तो हमारे भाई हो!


तड़प कर कहता है केदार - 'भाई! हम तुम्हारे भाई हैं! दस रुपये भी बिना हैण्ड-नोट लिखवाये दिये हैं कभी? जिस तरह छोटी जात वालों से सूद लेते हो, उसी तरह हम से भी लेते हो। फिर हम तुम्हारे भाई कैसे हुए? जब पैसे वाला होने के कारण शौखिन मोची बड़ा आदमी है तो फिर मुझमें और गंगा मोची में फर्क कहां है? मैं भी गरीब हूं, वह भी गरीब है। मैं समझ गया। सुमेर रे! चल यहां से। यह जात की लड़ाई नहीं है, यह पैसे वालों और गरीबों की लड़ाई है!


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


सम्पर्क 


मोबाइल : 9431685639


टिप्पणियाँ

  1. सिद्घनाथ सागर1 जून 2026 को 10:36 am बजे

    बदलते जातिगत समीकरण की रोचक गाथा।लेकिन यह जाति व्यवस्था बिहार के जन में भीतर तक पैठ बनाए हुए है।खासकर गाँवों इसका क्रूर चेहरा सरेआम नजर आता है।बिहार में बढ़ते पूँजी के प्रभाव ने अभी भी उस तरह नहीं तोड़ पाया है जिसकी उम्मीद प्रगतिशील ताकतों ने की थी।इसे लेकर अनेक आंदोलन हुए।नतीजा वैसा नहीं आया जिसकी उम्मीद की गई थी।वाम धारा की यह इस मान्यता को बिहार की जनता ने सिरे से खारिज कर दिया कि पूँजी की पैठ सामंती अवशेष को ध्वस्त कर देगी।इसके विपरीत बिहार में हुआ और हो रहा है।पूँजी की बढ़त के साथ जाति की जकड़न और मजबूत हुई है।यह कहने कि आवश्यकता नहीं कि इसका जीता-जागता सबूत मतदान में होने वाले जातिगत ध्रुवीकरण है।यह जातिगत जकड़न का सबसे वीभत्स दृश्य है।बहरहाल यह कहानी आर्थिक अंतर्विरोधों को सामने लाती है।जातिगत जकड़न में फाँक पैदा करती है।कहानी की भाषा जिस समाज को केंद्र में रखकर लिखी गई है,उनकी समझ से परे नहीं है।कहानी अंत तक बाँधे रखती है अपनी गतिशीलता और अंदरूनी लयात्मकता के साथ। भाई नीरज जी को अच्छी कहानी के लिए साधुवाद।

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