आरती तिवारी की कविताएँ



आरती तिवारी
सृष्टि का अहम् हिस्सा होते हुए भी औरत इस पितृसत्तात्मक समाज में प्रायः उपेक्षा की शिकार रही है। एक जमाने से उसके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता रहा है इसीलिए औरत को शूद्रों में भी शूद्र कहा जाता है कि चाहें जो भी समाज हो वह औरतों के साथ जुल्म और अन्याय के साथ-साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करता रहा है। लेकिन धीरे-धीरे ही सही परिदृश्य बदलने की शुरुआत हो रही है. आज के समय में अनेक महिला रचनाकार हैं जिन्होंने स्त्री समाज की दिक्कतों, उपेक्षाओं और दुखों को अपनी रचनाओं में ज्यों का त्यों उभारने की कोशिश की है। इसी क्रम में आज प्रस्तुत है मंदसौर जैसे दूरदराज क्षेत्र की आरती तिवारी की कविताएँ     

आरती रविन्द्र तिवारी की कविताएँ  


औरत


(1)

बेबसी की चादरें हटाए औरत
बेवजह आँसू न बहाए औरत।।

खुद पे यकीं रख भिड़ जाए जमाने से तो, 
आँसू पी के न कसमसाए औरत।।

हिम्मत से लबरेज हैं, टटोले खुद को,
किसी कदम पे, कभी भी न डगमगाए औरत।।

क्यूं जल जाती हैं, चुपचाप जुल्म सहते हुए,
खुद को पहचाने, तूफानो से टकराए औरत।।

जहालत, कहालत, गुरबत के मैल, धो डाले,
अपने औरत होने के जादू को जगाए औरत।।

सुबह भी होगी, बहारे भी आएंगी बेशक
धूल सदियों की झटक, बेड़ियाँ हटाए औरत।।

जब पड़े वक्त, खड़ी हो साथ औरत के
गुजारिश 'अंजलि' करे औरत को न सताए औरत।।


                                                                                  
(2)

बहती हुई नदिया की रवानी औरत
सदियों से खामोश सी कहानी औरत

सूरज टांगे चला, मौसमों के गट्ठर
पीछे-पीछे चुपचाप सी दीवानी औरत

हर-गली, मोड़ पे खपते-खपते
पता नहीं कब हुई, सयानी औरत

जीती हर जंग, पर जाहिर न किया
कितनी गहरी पैठ गई, सुहानी औरत

घर में, बाजार में, सियासत में
मर्द से इक्कीस ही रही, मर्दानी औरत

हरे शजर में, झील की लहर में, कभी
दिन के पहर में, पावन सी निशानी औरत

कभी राधा, कभी सीता, पांचाली सी कभी
कौल की पक्की हैं ‘‘ अंजलि‘‘ की जुबानी औरत

(3)

हर-एक रंग में ढली औरत।
कितनी मासूम थी भली औरत।।

कभी शिकवे न गिले, रंज नहीं दोष नहीं,
आपके मान से चली औरत।।

कब सहर शाम में तब्दील हुई,
जान पाई न ये, भली औरत।।

हर कदम पे घातें थीं, बिसातें थीं,
लम्हा-लम्हा गई छली औरत।।

कितने नाजों से, पल के आई थी
छोड़ के बाबुल की गली औरत।।

छाछं भी फूंक-फूंक पीती रही,
दूध की कितनी थी जली औरत।।

आपकी दुनिया में, ये हश्र हुआ,
हर घड़ी, आँख में खली औरत।।

अश्क पी कर भी, मुस्कुराती रही,
‘‘ अंजलि‘‘ कितनी थी भली औरत।।



(4)

आम्रकुंज की गौरैया सी, बाबुल के गाँव में
पनघट पे, नदिया पे, पीपल की छाँव में।।

कहाँ नहीं है, औरत, मंदिर में, घर में या
बाजारों की चाल बदलते, खेले जाते दाँव में।।

वेदों की ऋचाओं सी, प्रार्थनाओं सी गीतो सी,
रची, बसी, गुथी हैं, औरत, हर-इक घर हर गाँव में।।

मंगल-यान से उतर रही हैं, जो थी पायल की झंकार,
घर को स्वर्ग बना देगी, फिर आके पी के ठाँव में

रूतबों से यूं गुजर रही हैं, सपनों की जागीर लिए,
गूँज रहीं शौर्य-गाथाएँ चारों ओर हवाओं में।।

महाकाव्य सी, क्षणिका सी भी, अन्तद्वन्द समेटे वो,
बांटे खुशियाँ मुक्त-हस्त से रस छलकाती दुआओं में।।

कभी बहन, कभी बेटी बन के, हर पल, साथ रही हैं वो
कभी माँ तो कभी बनी प्रिया वो ‘‘ अंजलि‘‘ की सदाओ में।।


सम्पर्क-


आरती रविन्द्र तिवारी (अंजलि)

डीडी-5, चम्बल कॉलोनी,

मन्दसौर (म.प्र.) पिन-458001

मोबाईल- 9407451763


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं)

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