विमल चन्द्र पाण्डेय का आलेख 'मुठ्ठी में तक़दीर और आँखों में उम्मीदों की दिवाली'








ऐसा नहीं है कि हर भारतीय फिल्म को फालतू और खराब ही कह दिया जाए बूट-पालिशएक ऐसी फिल्म है जो एक उत्कृष्ट और यादगार फिल्म है यह फिल्म इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह उस निराशाजनक माहौल (जो आजादी के बाद चारों तरफ दिखने लगा था) में भी उस आशा की बात की करती है जिससे जीने की एक उम्मीद बची हुई है।‘ कवि-कहानीकार मित्र विमल चन्द्र पाण्डेय ने एक पारखी नजर इस फिल्म पर डाली है और यह आलेख पहली बार के पाठकों के लिए तैयार किया है तो आइए पढ़ते हैं यह आलेख
        

मुठ्ठी में तक़दीर और आँखों में उम्मीदों की दिवाली

विमल चन्द्र पाण्डेय 

देश के १९४७ में आज़ाद होने से पहले माहौल कुछ इस तरह का बन गया था कि आज़ादी मिलते ही देश का कायाकल्प हो जायेगा। भुखमरी, सूखा, बाढ़ और बेरोज़गारी हर समस्या का एक ही इलाज़ नज़र आता था आजादी से उम्मीदें बहुत बढ़ गयी थीं और उनमें से ज़्यादातर झूठी थीं। बेसब्री से आजादी का इंतज़ार करते लोग जब तक ये समझ पाते कि सत्ता गोरे अंग्रेज़ों के हाथ से निकल कर काले अंग्रेज़ों के हाथ में चली गयी है। बहुत देर हो चुकी थी। नेहरु और अन्य सियासतदानों ने आज़ादी के बाद के जो लक्ष्य निर्धारित किये थे, उनकी कलई खुल चुकी थी और सारे वादे और सपने झूठे साबित हुए थे। मगर १९५४ में प्रदर्शित हुई बूट पॉलिशइस निराशाजनक माहौल में भी उस आशा की बात करती है जिससे जीने की एक वजह बची हुई है। दो बच्चों के ज़रिये कही गई इस कहानी में वैसे तो मुंबईया फिल्मों के कई तय संयोगों का प्रभाव ज़रूर है मगर फिर भी कहानी जो आशा और उम्मीद देती है, उसकी वजह से प्रासंगिक हो जाती है।
 
            फिल्म के नायक नायिका दो बच्चे हैं भोला और बेलू जो अपने माता पिता की मौत के बाद एक ऐसी रिश्तेदार के पास भेज दिए जाते हैं जो कर्कशा है। उन्हें बात-बात पर मारती है और भीख मांगने के लिए दबाव डालती है। बच्चों का पड़ोसी जॉन चाचा उन्हें भीख मांगने से मना करता है और कहता है की मर जाओ लेकिन भीख मत मांगो। ये दो हाथ दुनिया का हर काम कर सकते हैं। वह झुग्गी के सभी बच्चों से पूछता है नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या हैतो बच्चे जवाब देते हैं, ‘मुठ्ठी में है तकदीर हमारीमुट्ठी में अपनी तकदीर और आँखों में उम्मीदों की दिवाली लिए ये बच्चे फिर भी भीख मांगने को मजबूर हैं क्योंकि उन्हें उनके बड़ों द्वारा कुछ और नहीं सिखाया जाता। यह कहानी सिर्फ भोला की जिजीविषा की कहानी है जो जॉन चाचा की इस बात को गांठ बांध चुका है कि वह मर जायेगा लेकिन भीख नहीं मांगेगा।
 
भोला का सपना है कि वह भीख मांगना छोड़ कर बूट पॉलिश करे और इसके लिए वह अपनी बहन के साथ भीख मांग कर पैसे जुटाता है ताकि एक लाल पॉलिश, एक काली पॉलिश और ब्रश खरीद सके। एक भींगती शाम भोला एक ज्योतिषी के चंगुल में फंसता है जो दो पैसे में उसका भविष्य बताने को कहता है। दो पैसे का भविष्य बताते हुए ज्योतिषी कहता है कि बच्चा तू आगे बिलकुल नहीं पढ़ेगा। इस पर भोला सवालिया निगाहों से कहता है कि बाबा मैंने तो पीछे भी कुछ नहीं पढ़ा। वह ज्योतिषी से अपने काम के बारे में पूछना चाहता है जिस पर ज्योतिषी झल्ला कर कहता है जा तू जिंदगी भर जूतियाँ रगड़ेगा। भोला की आंखे चमक जाती हैं, जूतियाँ रगड़ना तो उसका सपना है। वह चहक कर ज्योतिषी से पूछता है क्या सचमुच बाबा जी, क्या मैं सचमुच जिंदगी भर जूतियाँ घिसूंगा? ये सपना बूट पॉलिश की जगह किसी भी और सपने से स्थानापन्न किया जा सकता है और भोला उस सपने के लिए हर संभव जतन करता है। कई बार टूट भी जाता है लेकिन हार नहीं मानता। आखिरकार वो अपनी बहन बेलू के साथ जा कर बूट पॉलिश और ब्रश खरीद कर ले आता है। अपनों के नाम पर उनके पास जॉन चाचा हैं और जॉन चाचा के पास वे दोनों बच्चे। वे जॉन चाचा को यह खुशखबरी सुनाने के लिए आते हैं और उसकी आंखे बंद करवाते हैं। जॉन जब आंखे खोलता है तो वह देखता है कि दोनों बच्चों ने अपना सपना पूरा कर लिया है और ईसा मसीह की फोटो के सामने आले पर जूते की पॉलिश और ब्रश रखे हुए हैं। खुद दारू का धंधा करने वाला जॉन मेहनत की कीमत समझता है, उसकी जिंदगी बर्बाद हो चुकी है लेकिन वह चाहता है की देश का भविष्य भीख न मांगे बल्कि मेहनत से पेट भरे। वह ईसा मसीह की तस्वीर को प्रणाम करता है और बच्चों को बूट पॉलिश खरीदने के लिए बधाई ही नहीं देता, भोला को बूट पॉलिश करने का तरीका भी बताता है ताकि वह ग्राहकों के जूते खराब किये बिना पैसे कमा सके।

            बच्चे अपनी तथाकथित चाची से मार खाकर जॉन चाचा के ही पास आते हैं। भूख लगने पर जब जॉन रोती हुई बेलू से पूछता है कि बेटा तुझे भूख लगी है क्या तो बेलू रोती हुई एक दिल दहला देने वाला जवाब देती है, ‘हाँ, चाचा मुझे रोज-रोज भूख लग जाती है। जॉन कहता है की भूख हमारे वतन की सबसे बड़ी बीमारी है। जॉन ये भी कहता है कि इन झुग्गियों में रहने वाले लोग आज जैसी काली रात से भी काली जिंदगी गुजारते हैं। लेकिन उसे उम्मीद है की एक दिन सुबह ज़रूर होगी और बच्चे पढ़ लिख कर एक अच्छा भविष्य पाएंगे। पूरी फिल्म का सार इस सपने में ही है। भले ही फिल्म कोई समाधान नहीं बताती और एक अयथार्थवादी और खुशनुमा अंत के साथ कई सवाल अनसुलझे छोड़ जाती है, फिर भी भोला के सच और मेहनत की कमाई के लिए जद्दोजहद देखने योग्य है। देश की उम्मीदें जब टूट रही हों, ऐसे में यह उम्मीद ही बहुत है एक न एक दिन वह सुबह ज़रूर आयेगी जिसमे सबको खाना मिलेगा और देश के भविष्य को किसी के सामने हाथ फ़ैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। भोला के रूप में रत्तन कुमार का सहज अभिनय देखने लायक है जिसने दो बीघा ज़मीनमें बलराज साहनी यानि शम्भू महतो के बेटे कन्हैया की भूमिका में जान डाल दी थी। बेलू की भूमिका में बेबी नाज और जॉन चाचा की भूमिका में डेविड भी सहजता से अपने अपने किरदारों को जीते हैं। फिल्म इटली के नियो-रिअलिज्म आन्दोलन से प्रभावित थी और कांस फिल्म समारोह में भारत की और से अधिकारिक इंट्री के तौर पर भेजी गयी थी। इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था और इसे राज कपूर की बेहतरीन फिल्मों में गिना जाता है हालाँकि फिल्म के कुछ दृश्य और बच्चों के मुंह से बुलवाए गए कई संवाद नकली से लगते हैं। खासतौर पर राज कपूर को श्री ४२०के गेटअप में, जिसकी उस समय शूटिंग हो रही थी, एक दृश्य में फिल्म में डालना फिल्म के यथार्थवादी माहौल में नाटकीयता उत्पन्न करता है। इसी तरह मंदिर में उसी औरत से और बेर बेचते समय उस आदमी से भोला का मिलना बहुत नकली और फ़िल्मी संयोग लगते हैं जो बेलू को पाल रहे हैं। फिल्म खत्म होने से पहले अपने सुखद और नाटकीय अंत का आभास पहले ही दे देती है और बिना किसी समाधान की ओर इशारा किये मुम्बईया फिल्मों की तरह फील गुड करते हुए खत्म हो जाती है लेकिन इससे जॉन चाचा के उस सपने को कोई फर्क नहीं पड़ता जिसमे वो कहता है कि नयी दुनिया आयेगी नहीं बल्कि ये बच्चे नयी दुनिया बनायेंगे। फिल्म में एक दृश्य में महान गीतकार शैलेन्द्र को देखना एक सुखद अनुभव है। हसरत जयपुरीए शैलेन्द्र और दीपक के लिखे गीत फिल्म में चार चाँद लगाते हैं। खासतौर पर नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या हैऔर रात गयी फिर दिन आता है’, सदाबहार हैं। चली कौन से देश गुजरिया तू सज धज के’, ‘लपक झपक तू आ रे बदरवा’ ‘ठहर ज़रा जानेवालेऔर मैं बहारों की नटखट रानीभी अच्छे गीत हैं। तारा दत्त का छायांकन बहुत अच्छा है और शंकर जयकिशन का संगीत फिल्म की जान है।
 
फिल्म के निर्देशक प्रकाश अरोड़ा की यह एकमात्र फिल्म है। कहते हैं जब राज कपूर के सहायक रहे अरोड़ा ने राज कपूर को फिल्म के रश प्रिंट्स दिखाए तो उन्हें फिल्म पसंद नहीं आयी और उन्होंने इसे री-शूट किया। प्रकाश अरोड़ा की तरह फिल्म के लेखक भानु प्रताप की भी यह एकमात्र फिल्म है।


विमल चन्द्र पाण्डेय

 



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टिप्पणियाँ

  1. अच्छी समीक्षा पढने को मिली। फ़िल्म उधार के खाते में थी। अब देखूंगी।

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