शिवानन्द मिश्र की कहानी




जिम्मेदारी महसूस करने की चीज होती है। जो इसे उठाता है वही इसके महत्व को जान-समझ सकता है। चाहें वो जिम्मेदारी घर-परिवार की हो या समाज की। शिवानन्द मिश्र एक नवोदित कहानीकार हैं और 'लौट आओ भइया!' इनकी पहली कहानी है। अपनी पहली ही कहानी में शिवानन्द ने यह परिचय दे दिया है कि  उनमें भविष्य का एक बेहतर कहानीकार छुपा हुआ है और वे इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। तो आईये पढ़ते हैं शिवानन्द की यह पहली कहानी 

लौट आओ भइया!
   
    सूरज को निकले कुछ ही देर हुआ था। सुबह और दोपहर के बीच का वक्त रहा होगा। सूरज की चमक तेज थी मगर दोपहर की चिलचिलाहट नहीं थी उसमें। दूर तक फैले, खुदखुदी दाढ़ी जैसे दिखते अरहर के खेतों में कटाई हुए अभी कुछ ही रोज़ हुए होंगे । ऐसे में अरहर के कटे-फटे नुकीले ठूँठ अपनी दुर्दशा कम और भभकी देते अधिक नजर आ रहे थे, कि पगडंडी छोड़ पाँव खेतों में गये नहीं, कि छिले नहीं। इन सब बातों से बेखबर दो बच्चियाँ जिनकी उमर पाँच-साल रही होगी, हवा में उड़ते सेमल के बीज के पीछे सर उठाए भाग रही थीं। रूई के फाहे सजाए बीज हवा में तैरता हुआ धीरे-धीरे नीचे उतरता। बच्चियाँ उसे फूँक कर ऊपर उठा देतीं। जब बीज तेजी से ऊपर जाता, बच्चियों के चेहरे की मुस्कान गहरी हो जाती। जब बीज धीरे-धीरे नीचे उतरता तो उनकी एकाग्रता देखते बनती। ऐसे ही जब एक बार बीज नीचे आया तो दोनों से चूक हुई। फाहा नीचे जमीन पर गिरने ही वाला था कि छोटी वाली ने उसे लपक कर मुठ्ठी में पकड़ लिया। बड़ी ने डांटते हुए कहा, ’’ का रे? पकड़ काहे लिया तूने ? अब ई उड़ीगा कैसे ?’’ छोटी ने मुठ्ठी खोली। फाहे के रेशे उसकी हथेली में चिपक गये थे। सहमी छोटी ने धीरे से सर उठाया। नन्हीं, बहन सी आँखों में फाहे के अब न उड़ पाने का दुःख तो था ही, एक अनजाना डर भी था कि बड़ी अब क्या करेगी?’’ सब चौपट कर दीस। चल हट्ट। अब न खेलब तोर संग।’’ बड़ी ने छोटी को धक्का दिया। छोटी खेतों के मेड़ से नीचे लड़खड़ाई। अरहर के ठूंठ से लग कर उसका पैर छिल गया। खून की कुछ बूंदें चुहचुहा आई। अब डरने की बारी बड़ी की थी। छोटी ने दहाड़े मार कर रोना शुरू कर दिया। बड़ी ने डर कर बस्ती की तरफ देखा। पास में ही सात-आठ फूस की मड़इयों और बिना पलस्तर वाले, इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत बने अधबने ईंट के मकानों की एक बस्ती है। बस्ती से ही लगी एक सड़क जाती है जो आगे जा कर गंगा पर पुल में तब्दील हो जाती है। बस्ती और घने गाँव के बीच एक प्राइमरी पाठशाला है जो इस बस्ती को गाँव से अलग होते हुए भी जोड़े हुए है। ये बच्चियाँ उसी बस्ती की थीं जो खेलते हुए खेतों तक निकल आई थीं। बड़ी ने छोटी को पुचकारते हुए कहा, ’’अरे हम जान-बूझकर थोड़े न धक्का दिये रहे। इ तो हाथ लग गवा रहा हमार। चल चुप हो जा। हम आपन हिस्सा का दाल तोका देइब ...................... अउर आपन गुडि़या से भी खेले देब।’’

    ’’हटो, तुम्हार गुडि़या भी कउनो गुडि़या है। एक तो माटी की है, ऊपर से नाक भी टूटी है ओहका। हम न खेलब तोहार गुडि़या से।’’ छोटी ने हाथ झटकते हुए प्रस्ताव को अस्विकार कर दिया। इस बीच छोटी अपने छिले हुए पैर का दर्द भूल चुकी थी। बहरहाल, बड़ी ने दाल के हिस्से पर सौदा पटा लिया था। बड़ी को अपने हिस्से में से कुछ दाल छोटी को देने थे। बदले में छोटी किसी को यह नहीं बताएगी कि उसका पैर बड़ी के धक्का देने से छिला है।

    अब दोनों बच्चियाँ पूरी तन्मयता से अरहर कटे खेतों में बिखरे अरहर के दाने बीनने लगीं। दोनों ने अपने फ्रॉक ऊपर की ओर मोड़ कर कच्छे में खंस, थैली जैसा बना लिया था और अरहर के दाने अपनी नन्ही उंगलियों से उठा कर उस अस्थाई धोकरी में डालने लगीं। सूरज की तपिस तेज होने लगी थी। दोनों के चेहरे पसीने से नहाए हुए थे। धूल सने उलझे बालों में चुनचुनाहट होने लगी थी, जिसे जब-तब, दोनों अपने हाथ की दसों उगलियों से, खुजला लिया करती थीं। कुछ देर बाद जब दोनों की थैलियों में मुठ्ठी भर अरहर के दाने हो गये, तो दोनों पास के सूखे पीपल की छाँव में आ गईं। कभी ये पीपल काफी घना हुआ करता था। बहुत सारी शाखाओं से भरा-पूरा ये पीपल, हल्की सी हवा चलने पर भी ऐसे झूमता, जैसे कोई संगीत बज रहा हो और इसकी छाँव में बैठे, मानुष-जावर सबका मन हल्का हो उठता। कुछ सालों में इसके आस-पास के पेड़ कटते चले गये और ये पीपल भी मानो उनका विछोह सह न सका हो। अब तो बस इसका मोटा सा तना और दो-एक शाखाएं ही बची हैं जिसकी ओट में दोनों, बच्चियों ने अपनी फ्रॉक से पसीने पोंछे। कुछ देर सुस्ताईं। बड़ी ने छोटी के जुंए बीने। तब तक दोपहरी घनी हो गई थी। चारों तरफ एक डरावना, भांय-भांय करता सन्नाटा पसरा था। दोनो लड़कियाँ गाँव की तरफ मुड़ीं। गाँव शुरू होने से पहले ही हरिकिशुन बनिये की दुकान पड़ती थी। हरिकिशुन बनिया अपने छोटे से किराने की दुकान के बीच में टाट पर नंग-धड़ंग, एक गमछा लपेटे हुए लेटा हुआ था। बूढ़ा शरीर, हड्डियों का ढांचा, पोपले मुंह में जहाँ-तहाँ बचे इक्का-दुक्का दाँत, अनवरत चलता मुंह, जैसे बुढ़ऊ ने मुंह में लेमनचूस ले रखा हो। ये है हरिकिशुन बनिये का व्यक्तित्व। जब दोनों बच्चियाँ दुकान पर पहुंची, हरिकिशुन दुकान के बीचोबीच बिछे टाट पर लेटा हुआ था। पोपला मुंह ऐसे खुला था जैसे बुढ्ढा मर गया हो और मक्खियाँ बिना रोक-टोक के नाक और मुंह पर अपना आधिपत्य जमाये हुए थीं। दोनों बच्चियों ने कुछ देर ये मंज़र देखा, फिर आपस में आँखों-2 में कुछ सवाल-जवाब किया। बड़ी ने गला साफ करते हुए कहा, ’’हरकुसुन बाबा!’’.................. कोई प्रतिक्रिया नहीं। उन दोनों को लगा जैसे पूरी कायनात में वही दोनो जाग रही हैं या फिर ये मक्खियाँ, जो पूरी तन्मयता से अपने कार्य में जुटी हैं। बड़ी ने अबकी जरा जोर से आवाज़ लगाई, ’’हरकुशुन बाबा, रहर लोगे? ’’हरिकिशुन कनमनाया। मुंह पर हाथ से हवा की। मक्खियों ने मैदान छोड़ा। हरिकिशुन ने बिट्ठा बना कर, तकिये की जगह रखे अंगौछे से मुंह के एक किनारे बह चले लार को पोंछा, फिर एक डंडी पर अटके गोल सीसे वाले गांधी चश्में को ठीक करते हुए, आँखें सिकोड़, उन्हें घूर कर देखा। नींद उचट जाने की खिन्नता चेहरे पर थी। नाक चढ़ाए, खीझ कर पूछा, ’’का है?’’ बड़ी ने फ्रॅाक में पोटलीनुमा बटोर कर रखे अरहर के दानों की तरफ इशारा करते हुए कहा, ’’रहर!’’
    ’’रहर?...............तो?’’
    ’’ले लो।’’
    ’’ले लो,.................काहे ले लो? ई मुठ्ठी भर रहर का हम करबे का? पता ना इस भरी दुपहरिया में कहाँ छिछियाय रही हैं? कवने क् बिटिया हो जी तुम सब? मां-बाप मर गये का तुम्हारे? कउनो देखे वाला है कि ना?’’ बड़ी ने दाँत भींचे। छोटी ने भकुआ कर बड़ी को देखा। लड़कियों को मालूम था, बुड्ढा पहले ऐसे ही भगाता है फिर अरहर ले लेता है। और फिर फोंफी-टाफी के साथ कुछ सिक्के भी देता है। बड़ी चुप रही। दोनो वैसे ही खड़ी रहीं। तब तक हरिकिशुन लेमनचूस, मसाले, हल्दी आदि के मर्तबानों को खोलता बंद करता रहा। मर्तबानों को हल्का उछाल कर उसमें रखी चीजों को जैसे ताजा़ कर रहा हो।

    थोड़ी देर की व्यस्तता के बाद बोला ’’आज ले लेइत है। कल से मत आना। चवन्नी भर का अरहर अउर बदले में चाही कुबेर का खजाना। हुंह..................... लाओ।’’ लड़कियों के चेहरे पर चमक जागी। दोनों ने अपने फ्रॅाक में रखे अरहर के दाने बुढ़उ की तराजू में उड़ेल दिये।

    कुछ देर बाद जब दोनों उस दुकान से बाहर आईं तो दोनों के हाथ में चटपटी चूरन, फोंफी और मुठ्ठी में कुछ सिक्के थे। सूरज की तपिश ने अब भठ्ठी का रूप ले लिया था। बच्चियाँ जब बस्ती की ओर लौट चलीं, रास्ते के किनारे उगी घांस पर उचकते-पैर रखते। रास्ते में पड़ने वाले स्कूल की खिड़की से झाँक कर दोनों ने बारी-बारी एक-दूसरे का नाम पुकारा। गर्मियों की छुटिटयाँ थी। स्कूल बाहर से बंद था। खाली क्लास रूम में आवाज़ टकरा कर दुबारा सुनाई दे रही थी। इस खेल का मजा ले कर दोनों घर चलीं।

    उन दोनों के लिए दिन की शुरूआत जितनी अच्छी थी, शायद अब उसमें पसंद न आने वाला मोड़ पूर्व निर्धारित था। जब वो घर के दरवाजे पर पहुंचीं, उन्हें अपनी माँ की तेज़-चिड़चिड़ी आवाज़ सुनाई पड़ी, जो किसी बात को ले कर इन दोनों से बड़ी लगभग 12-13 साल की एक लड़की पर बरस रही थी, ’’एतने शान रहा, तो कउनो रजवाड़ा के घर पैदा होती, छिनाल! कुम्हार के घर पैदा हो कर बाम्हन-ठाकुर से मुकबिला?’’ जूठन बो तमतमाए मुंह से दाँत पीसे अपनी बड़ी लड़की पर बरस रही थी। बीच-बीच में कटोरी से पानी ले कर सिलबट्टे पर रखे मसालों में डालती, फिर हड़बड़-हड़बड़, झल्लाते हुए दो-चार बार उसे बट्टे से पीसती। दुबली-पतली, कृषकाय, हड्डियों का ढांचा, जिसे जिंदगी ने जिम्मेदारियों के सिलबट्टे पर आँसुओं संग पीस दिया हो और अब जैसे उसकी सिठ्ठी बची हो, जूठन बो दिखती है।


    यूँ तो गिनने को घर में कई मुंडियाँ हैं लेकिन अर्थोपार्जन में जूठन बो और बड़ी लड़की का ही योगदान रहता है। जूठन के बाबूजी कभी राजमिस्त्री का काम करते थे, अब झेलंगा बंसखट पर लेटे, खांसते रहते हैं और मूक दर्शक बने घर के कलह के पाषाण-साक्षी बन रहते हैं। 60-70 साल की आयु शय्यासीन हो, अंत समय की प्रतीक्षा की नहीं होती। ये तो जगरदेव के जन्म के साथ ही हर चीज़ में कटौती एक अपरिहार्यता सी बन गयी हो जैसे, बचपन में माँ के असमय गुज़र जाने से लड़कपन में कटौती, बाप के साथ काम पर गया तो मजूरी में कटौती, दिन रात बिना आराम खटते-खटते अब उमर में कटौती। जगरदेव की बीमारी का पता नहीं। पता भी तब चलता जब किसी डाक्टर वैद्य के पास जाते। जब कभी ऐसी बात आती कि जगरदेव को किसी डाक्टर को दिखाया जाए, तो जूठन हर बार यही कहते, ’’हम तो कब से कह रहे हैं बाबू से कि चलो सदर हास्पिटल तुमका दिखाय लाइत है, दवा दिला देइत है, लेकिन बाबू हैं कि चलने का नामै नहीं लेते। अब इनसे इस उमर में ज़ोर जबरदस्ती तो किहा नै जा सकत न?’ जगरदेव चुप्प, छप्पर निहारते रहते। जगरदेव कभी इतने चुप नहीं रहे। पहले जब काम पर होते तो हाथ के साथ-साथ जबान भी सारा दिन चलती रहती। एक-एक ईंट, करनी-बंसुली के सहारे चुनते जाते और साथ के हेल्फर-मजूर इनकी बातों का रस लेते जाते। जगरदेव मकान गढ़ने में ही नहीं, बात गढ़ने में भी उतने ही माहिर थे। अपने अनुभव के गारे मसाले से वे जाने कितनी गूढ़ बातें कह जाते। इन्हीं सब बातों की वज़ह से कभी जगरदेव को मजूरों की कमी नहीं महसूस हुई। कटिया-दंवरी के समय भी इनकी बात पर मजूर-जन सब छोड़-छाड़ कर इनके साथ हमेशा खड़े रहते थे। थोड़ा बहुत खेत जगरदेव के पुरखे भी छोड़ गये थे, लेकिन उतना नहीं जिससे कि घर के सारे प्राणियों का साल भर का खर्चा चल सके। सो, खेत हमेशा अधिया-बटइया ही रहा जिसमें तुरहे सब्जियाँ उगाया करते थे। खैर, जब कभी जगरदेव काम पर नहीं जा पाते, मजूर-जन शाम को इनसे आ कर कहते जरूर, ’’मजा नै आवा तुम्हरे बिन चाचा। कसम से, काम में मने नहीं लगा रचिको।’’ वक्त की मार! जगरदेव ने अथक परिश्रम किया, लेकिन अपने बेटे जूठन को कभी काम पर ले जाने के पक्षधर नहीं रहे। ये उनकी हार्दिक इच्छा थी कि बेटा पढ़-लिख कर काबिल बने, उनकी तरह ईंट-गारे में जिनगी न बरबाद करे। लेकिन जूठन को नहीं पढ़ना था, नहीं पढ़े। घर से जाते पढ़ने, खेल-कूद कर चले आते। जब ये बात जगरदेव को पता चली तो बेमन से उन्होंने जूठन की पढ़ाई छुड़वा दी। उजियार गाँव के उपधिया जी जगरदेव को बहुत मानते थे। उनसे हथजोरी-बिनती कर के उन्होंने जूठन को उनके स्टीमर घाठ पर लगवा दिया। लेकिन जिसे हरामखोरी की लत लग जाए, उससे सृष्टि के रचइता ब्रह़मा भी काम नहीं ले सकते। जूठन वहाँ से भी भाग खड़े हुए। ये सोचकर कि, जिम्मेदारियों से भागते जूठन के पाँव में अब बेडि़याँ डाल दी जाय, जगरदेव ने जूठन की शादी करा दी। इसके महीने दो महीने बाद ही, जगरदेव बो भी नाती-पोता खेलाने की आस लिए चल बसीं। तभी से जगरदेव चुप से रहने लगे थे। इस बीच अच्छा ये रहा कि जूठन की भागदौड़ बन्द हो गई और वो अपने पिता के साथ अनियमित रूप से राजमिस्त्री का काम करने लगे। इधर काम की निरंतरता ने जगरदेव को तोड़ कर रख दिया। अक्सर बीमार रहते हुए आखिरकार उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। जूठन का भी काम पर जाना बन्द हो गया। ऐसे में जूठन बो ने घर संभालने के लिए घर से बाहर कदम रखा। आस-पास के बड़े घरों में चौका-बासन का काम शुरू किया। अब जूठन के निठल्लेपन को और उन्मुक्तता मिल चुकी थी। इस घटनाक्रम ने दो बातों को अप्रत्यक्ष रूप से जन्म दिया, एक तो जूठन बो का चिड़चिड़ापन और दूसरा, खाट पर पड़े जगरदेव की चुप्पी। अब कुछ बातों ने इस घर में नियमित दिनचर्या का रूप ले लिया था। जूठन बो का मुंह अंधेरे घर से काम पर जाना, वापस आ कर बच्चों पर बड़बड़ाते-झल्लाते अपनी भड़ास निकालना, जगरदेव का खाट पर पड़े-पड़े खांसना, जूठन का दबे पाँव चोरों की तरह घर आना, खीसें निपोर, झेंपी हंसी हंसते हुए बीबी की पटकी हुई थाली से जैसे-तैसे कुछ उदरस्थ करना और उसी तरह दबे पाँव चोरों की तरह वापस लौट जाना।

    आज भी जूठन बो का चिल्लाना और जगरदेव का खाट पर पड़े-पड़े खांसना उसी दिनचर्या का हिस्सा था। हुआ ये था कि कल पड़ोस के पाण्डेय जी के यहाँ उनकी बिटिया का जन्मदिन था और उसने जूठन बो की बड़ी बेटी बबली से भी शाम को आने के लिए बोला, लेकिन बबली ने हाँ या ना कुछ भी नहीं कहा और घर चली गई। बात तो तिल बराबर की थी कि एक ने बुलाया और दूसरा नहीं गया मगर जहाँ अहम् को ठेस पहुंचे, वहाँ तिल का ताड़ बनते कब देर लगती है। पाण्डे जी की बिटिया को बात लग गई। जरा सी नौकरानी और बुलाने पर न आए। चलो आए-न-आए, वज़ह तो बताए। कोई बहाना ही बना दे तो चलेगा। यहाँ तो उसने उस बुलावे पर, जो आग्रह या आदेश जो भी रहा हो, कान ही नहीं धरे।

    सारी तैयारियाँ हो गई, मेहमान भी आ गये। पाण्डे जी की बिटिया ने अपने कमरे से बाहर निकलने से इन्कार कर दिया। वज़ह? जब तक बबली आ कर मेरे तिरस्कार के लिए माफी नहीं मांग लेती, मैं अपने कमरे से बाहर नहीं निकलुंगी।’ जूठन बो को दौड़ कर अपने घर अपने घर जाना पड़ा।, और बड़ी देर बाद जब जूठन बो पसीने में तर-ब-तर वापस लौटी, उनके साथ नतमस्तक बबली थी जो दरवाजे पर खड़ी जमीन ताक रही थी।’’ जा माफी मांग ले।’’............’’ ..............’’’  कुछ देर स्तब्धता में बीतें। ’’अब जा भी!’’ ’’अजीब लड़की है।’’ इधर बबली के पैरों के आस-पास की जमीन पर कुद बूंदें गिरीं। ’’अरे! रो रही है बदमास! ........... उधर सोना जइसन लड़की के मन को ठेस पहुंचा के ई तमासा?’’  ’’चल सीधी तरह, चलकर माफी मांग बेचारी से। आज ओकर जन्मदिन है अउर अइसन दुःख दिहिस तू ओके।’’

    बबली गई अंदर, ’’चलो संध्या दीदी हम आइ गएन हैं!’’ इतना कह फफक कर रो पड़ी बबली।
    पाण्डे जी के घर कथा का यह अध्याय तो समाप्त हो गया लेकिन उसका अगला अंक जूठन बो के यहाँ आज जारी था। आज बबली पाण्डे जी के यहाँ बर्तन मांजने नहीं गई। हार कर, जूठन बो को जाना पड़ा उनके यहाँ चौका-बासन करने। ’’आज बबली के तबियत कुछ ठीक नै न!’’ जूठन बो ने बहाना बनाया। और घर आ कर बेटी पर भड़ास उतारना शुरू किया। ’’केतनी बार समझावा, कुछ तौर तरीका सीख ले अबहिने से। बड़कवों का कान मत काट। इज्जत-बेइज्जत का कुछ ख्याल कर। मगर ई महारानी हैं कि हमार नाक कटावे पर तुली हैं।’’ ’’नाक कटावे पर तुली है? अरे काम करते हैं तो मजूरी मिलती है। कौनो गुलाम हैं का हम उनके, जो उनकी बोली-कुबोली भी सुनते रहें और उनके बुलावें पर भी जांय। बड़कवा होंगे अपने घर के।’’ बबली के इस बोल ने बुझ चली आग पर सूखी घास का काम किया और जूठन बो की क्रोधाग्नि भड़क उठी। जूठन बो ने पास रखी कटोरी, जिसमें से पानी ले कर मसाले में डाल रही थी, चला कर बबली को दे मारा। कटोरी पहले बबली को लगी, फिर दरवाजे से होते हुए घर के बाहर चली गई। इसी बीच इन दोनों बच्चियों का घर में आना हुआ। दोनों सहमी सी कभी एक दूसरे को देखती, तो कभी अपनी माँ को, जो अभी भी गुस्से से हाँफ रही थी और धारा प्रवाह बबली को गालियाँ दिये जा रही थी।


    जगरदेव की खांसी बढ़ी। झल्लाई जूठन बो का ध्यान बटा, ’’मरियो जाते, जान छूटत। जाने कहवां का पाप भोग रही हूँ। हर तरफ से ई सब हमका मार डाले पर तुले हैं।’’ फिर बैठे-बैठे भोकार पार कर रोने लगी। कुद देर रोने के बाद, वैसे ही बैठी शून्य में ताकती रही।

    इस बीच बड़ी, बाहर से जा कर माँ की फेंकी कटोरी ले आई। सिलबट्टे पर पिसे-अधपिसे मसाले को उठाया और चूल्हा सुलगा, सब्जी भूंज-भांज कर कड़ाही में पानी डाल, छिपुली से ढॅंक दिया। माँ के पास आ कर बोली, ’सब्जी थोड़ी देर में बन जाए तो उतार देना। आँटा गूंथ कर रख दिया है, रोटी सेंक देना।’’

    बबली अपनी दोनों छोटी बहनों को ले कर सरकारी नलके पर नहाने चली गई। जब तीनों वापस लौटीं, खाना बन गया था। सब ने खाना खाया और जूठन बो अपनी तीनों बेटियों के साथ जमीन पर कथरी बिछा कर सो गई। कथरी पर लेटी जूठन बो के कानों में बबली की कही बात गूंज रही थी, ’’अरे काम करते हैं तो मजूरी मिलती है। कौनो गुलाम हैं का हम उनके, जो उनकी बोली कुबोली भी सुनें और उनके बुलावे पर भी जाएं।’’ ’ठीक ही तो कहती हैं बबली। आज ई कुम्हार की बिटिया न हो कर कवनो बाम्हन-ठाकुर की बिटिया होत, तो का केहू अइसे बोल के निकल जात?’’ ’’जूठन बो ने सोचा, ’मैंने अनायास ही इस पर हाथ उठाया, अलबत्ता ई मुंहफट हुई जा रही है, सो उमर ही अइसी है, का करे कोई? धीरे-धीरे मरियादा सीख जाएगी, एही में तिरिया का गुजर है।’ जूठन बो ने पास लेटी बबली के चेहरे पर आ गई लटों को हटा कर दुलार से उसके सर पर हाथ फेरा।

    ’’अइसने उमस भरा गर्मी के दिन रहा तब। जइसे काल्हे के बात होय।’’
    जूठन बो ने करवट बदलते हुए सोचा, ’’एहका बड़ा भाई भी तो अइसने बात करत रहा। आपन हक के बात, समाज मां बराबरी के बात। तब सांझ होते बिसेसर के दुआर पर मोहल्ला के सब मरद जुट जात रहेन, फिर जाने कवन खुसुर-फुसुर होत रहा उन लोगन माँ। अजीब उमस आ बेचैनी रही मउसम में। तब जाने कहाँ-कहाँ से अनजान मनई आवत रहेन बिसेसर के दुउरे, जिनका इ आपन दूर का रिश्तेदार बतावत रहा, सबसे। फिर उहाँ घंटन बैठकी जमी रहती थी लमटेन की बेमरिही बीमार रौशनी में। हम आपन राजू का खोजत जब पहुंचत रहे ओहर, तो सब चुप होइ जात रहने, हठाते। फिर एक दिन अइसही संझा का जो निकला हमार लाल लौट के नै आवा अबहिन तक। लोग कहत हैं, नक्सलैट होई गवा है हमार रजुआ।’’ जूठन बो ने डबडबा आई आँखों को आँचल से पोंछा और बबली की तरफ करवट बदली।

    दिन ढले आँख खुली सबकी। मुंडेरों से होते हुए सूरज पेड़ों के पीछे जा छिपा था। परछाइयाँ लम्बी हो चली थीं। मुंह हाथ धोकर माँ-बेटी अपने-अपने काम पर चली गईं। दोनो बच्चियाँ फिर निकल गईं खेलने। रह गये जगरदेव, एक-टक छप्पर निहारते। जाने क्या छुपा था वहाँ। घंटों नज़र वहीं टिकी रहती।

    शाम तक जगरदेव का कुनबा लौट आया था घर। चूल्हा सुलगा, धुँआ उठा, ढिबरी जली, खटर-पटर, ठक्क-छन्न............ फिर एक-एक करके सबके आगे थाली परसी गई। क्षुधा-पूर्ति कर सबने अपनी खाट, अपने बिछावन डाले और पड़ रहे आँगन-ओसारे।

अभी पहली ही झपकी लगी थी कि गली में कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आई। जगरदेवे खांसे। कुछ देरे टोह लेते रहे फिर करवट बदली। थोड़ी देर बाद दरवाजे की सांगल बजी। ’इतनी रात गए?’ मन में कुछ सवाल-जवाब के साथ जूठन बो अपनी चारपाई से उठीं। दरवाजा आधा ही खोला था कि कोई मुंह ढके तेजी से घर में घुसा और दरवाजा अंदर से बंद कर जड़वत खड़ी जूठन बो से धीरे से बोला, ’’माई। हम हईं राजू।’’ इतना सुनना था कि जूठन बो के मुंह से सिकारी सी निकली, ’’कहाँ चले गये रहे मोर लाल? अइसन जुलुम काहे किये अपनी माई पर?’ ’’आने वाले ने जूठन बो के मुंह पर हाथ रखा और बांह पकड़ कर आँगन से अंदर को ले चला। ’’कौन है बबली की माई?’’ जूठन ने दबी जबान में पूछा, ’’रजुआ है का?’’

    ’’चुप रहो! जब जान ही गए हो तो तिखार काहे रहे हो? रात के अंधेरे में अपने ही घर मुंह ढक कर आने वाला जूठन का बेटा राजू था।’’ चल बैठ, सब्जी बचल है अउर एक-दो रोटी भी होगी। खा तब तक, एक- आध रोटी अउर सेंक देइत है। हाथ-मुंह धो लें।’’ जूठन बो राजू की तरफ पीढ़ा सरकाते हुए बोली।

    ’’ना माई! खाना न खाइब। बस बबली का सुनि के चला आवा रहा। का हुआ रहा पांडे के घर? कुछ उल्टा-सीधा बोले थे इ सब बबली को?’’

    ’’अरे बच्चन का नोक-झोंक रहा, कउनों वैसी बात नहीं रही रे। सब बीत गवा, जवन भवा रहा। अब सब ठीक है।’’

    ’’कैसे ठीक है? हम कित्ती बार समझाए रहे, ई घर-घर चैका- बासन ना किया करो, लेकिन तुम सब करबो अपने मन का।’’

    ’’जब इत्ती फिकर थी तो घर छोड़कर काहे चले गए थे। झंडा उठाए। तुमको कुछ पता है कि कैसे चलता है ई घर? अउर तुम्हारे चलते कितनी परेसानी उठानी पड़ती है हम सब का। अभी परसो, पुलिस आई रही घर पर। दिन भर थाना मां बैठाए रहे हमका।’’ जूठन बोले। ’’अब चुप भी रहो, लगे कोसने इसको। आपन निठल्लापन नजर नहीं आवत। सगरी समसिया की जड़ तुम्हई हो। एतने कामकाजी रहते तो हमका पैर न निकाले पड़त घर से। बडे़ आए समझदारी अउर जिम्मेदारी समझावे वाले। ’’ फिर बेटे की तरफ दुलार से देखते हुए जूठन को बोली, ’’चल मोर भइया, कुछ खा ले। इनकी बात का बुरा नै मानत।’’

    माँ की बात का जवाब न दे कर राजू भर्राए गले से बोला, ’’बाबू तुम नहीं समझोगे, हम घर काहे छोड़े? तुम समझ ही नहीं सकते। कभी कउनो जिम्मेदारी उठाए हो? जब तक बाबा का जांगर चला, तुम्हार देख-भाल किए। जब इ खाट पर पड़ गए तब माई ने घर संभाला। तुम तो हमेसा आसरित रहे। तुम का जानो जिम्मेदारी का होती है? जिम्मेदारी से भागने को आजादी नहीं कहिते। हम घर काहे छोड़ें हैं, ई हम तुमका ठीक से समझा नहीं पाएंगे। बहुत बड़ी जिम्मेदारी उठाए हैं हम लोग।

    ’’ई तोर बड़की-बड़की बात हमरी समझ में नै आवत रे बाबू। कोहांर के हाथ में गोली-बंदूक नाहीं अच्छा लागत मोर लाल। ई सब छोड़ के घरे आई जाव मोरे भइया।’’ बेटे से गिड़गिड़ाते हुए जूठन बो ने कहा।

    ’’कोहांर का काम सिरजन है माई! चाहे इ चाक पर माटी के घड़ा बनावे के होय, चाहे अब समाज। अब माटी-पानी सब एक में मिलावे के होई, जरूरत पड़ी तो सब ठोंक-पीट के एक किहा जाई............... एक नया आकार देवे के हौ।’’ कुछ देर राजू एक-टक शून्य में निहारता रहा। सब कुछ कितना शान्त था, बस ढिबरी की लौ एक लय में नाच रही थी।

    राजू एक झटके से उठा, ’’माई, अब चले दे! नाहीं, अब बहुत देर होई जाई!’’ और दरवाजे की तरफ बढ़ा। जूठन बो लपक कर उसके आगे आ गई, ’’अरे, हमार नाहीं तो अपनी बहिनियन का खियाल कर मोर लाल। मति जा, तोर हाथ जोड़त हैं, गोड़े परत हैं, भइया।’’ खुसुर-फुसुर सुन कर लड़कियाँ भी उठ बैठीं। माँ को भाई के सामने गिड़गिड़ाते और रोकते देख, दबी आवाज़ में रोने लगी। जूठन बो ने सचमुच अपने बेटे के पैर पकड़ लिए। ’’माई, ई का? चल उठ! ई का कर रही है? बहुत बड़ा काम है रे, हमका ना रोक। नाहीं, सब चौपट हो जाएगा।’’

    राजू नहीं माना। उसने फिर अपना मुंह ढका और जैसे आया था वैसे ही चल दिया। पीछे-पीछे जूठन बो दौड़ी। इन दोनों के पीछे तीनों लड़कियाँ अपनी माँ के पीछे, पगडंडी पकड़े घुप्प अंधरे में, अंदाजे पर दौड़े चले जा रही थीं। अंधेरे में जूठन बो का पैर किसी चीज़ से टकराया और वो अरहर के खेतों में लुढ़की। पैर किसी ढूंठ पर पड़ा और पीड़ा से, ’’माई रे!’’ कह कर वहीं बैठ गई। बबली, सहारा देकर अपनी माँ को उसी पीपल के पेड़े तक ले आई। लहूलुहान, पसीने में लथपथ, वेदना भरे स्वर में जूठन बो बुदबुदाईं, ’’लौट आओ भइया।’’

सम्पर्क-
शिवानन्द मिश्रा
मो0-8004905851


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं।)  

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ह्रदय स्पर्शी कहानी है . सर्वहारा वर्ग की नई पीढ़ी सचमुच अब जागरूक हो रही है . समाज के एक हिस्से को इससे तकलीफ हो सकती है , पर यह निश्चित ही आशादायी है . कहानी में एक देशज शब्द आया है ''भोकार पसर के''. यह जानना दिलचस्प होगा कि मराठी में इसी अर्थ में एक मिलता-जुलता शब्द है -'' भोकांड पसरणे.''

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  2. ग्रामीण अंचल का वास्तविक रेखांकन करती हुयी हृदयस्पर्शी एक संवेदनशील व्यक्ति की समाज की विडम्बना की तरफ ध्यान आकृष्ट करती हुयी कहानी है. शिवानंद जी की ये कहानी पढते हुवे यूँ लगा मानो सभी पात्र सजीव हो कर आपसे बातें कर रहे हों ....हरे खेत ....और वो बनिए की दूकान ....साधुवाद इस कृति के लिए ....!

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