आस्कर के बहाने : साम्राज्यवादी साजिशों का पर्दाफाश


पिछले वर्ष रामजी तिवारी की आस्कर पुरस्कारों की राजनीति पर एक महत्वपूर्ण किताब आई है 'आस्कर अवार्ड्स: यह कठपुतली कौन नचावै।' इस किताब पर हम जबरीमल्ल पारख की एक समीक्षा आप पहले ही प्रस्तुत कर चुके हैं। इसी किताब पर प्रस्तुत है दूसरी समीक्षा जिसे हमारे लिए लिखा है हमारे युवा कवि मित्र नित्यानंद गायेन ने। तो आईये पढ़ते हैं यह समीक्षा।    

नित्यानंद गायेन

वर्ष २०१३ में प्रकाशित पुस्तकों में चर्चित पुस्तकों में से एक पुस्तक है कवि –लेखक रामजी तिवारी जी की पुस्तक “आस्कर अवार्ड्स –यह कठपुतली कौन नचावे।” लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से विश्व सिनेमा और आस्कर पुरस्कारों के इतिहास के जरिये जनमानस के समक्ष नवसाम्राज्यवादी शक्तियों की साजिशों का पर्दाफाश किया है। लेखक का शोध और उनकी मेहनत इस किताब को पढ़ते हुए हम आसानी से महसूस कर सकते हैं।
६४ पृष्ठों की इस किताब में कुल १२ अध्याय है। देखने में बहुत पतली और सामान्य सी दिखने वाली इस पुस्तक में विश्व सिनेमा और आस्कर पुरस्कारों का अनोखा इतिहास छुपा हुआ है। आम दर्शक जब सिनेमा देखता है तो वह यह नही जानता कि वह सिनेमा क्यों देख रहा है? इसी बात पर लेखक ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि –“वह कौनसी चीज है जो आपको सिनेमा घरों तक खींच कर ले जाती है?” क्या यह मात्र मनोरंजन तक सीमित है? या फिर इनके बनाने में इस्तेमाल की गई तकनीक का आकर्षण आपको खींचता रहता है? वह अभिनय या पटकथा, गीत है या संगीत,छायांकन है या अभिनेता /अभिनेत्री हैं या खलनायक जिसे देखने के लिए आपका मन कुलबुलाता रहता है?” (पृ.१३, अध्याय -२) यह एक अहम सवाल है जिसे लेखक ने यहाँ पूछा है। और इसका जबाव है कि हममे से अधिकतर दर्शक कभी इन प्रश्नों तक पहुँच ही नही पाते कि हम सिनेमा क्यों देखते है। आम दर्शक तो अपने–अपने पसंदीदा अभिनेता और अभिनेत्रियों के लिए या निर्देशकों के लिए फिल्म देखने जाते हैं। फिल्म निर्माण के तकनीक तक बहुत कम दर्शक ही सोच पाते हैं। आज सिनेमा के प्रोमोशन के इस हाईटेक युग में दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा तो फिल्म का टेलर देखकर ही सिनेमा हाल पहुँच जाते हैं।

अध्याय -२ “दिल क्यों पागल है?” में लेखक रामजी तिवारी ने लिखा है –“सिनेमा का एक दूसरा माडल तानाशाहों का भी रहा है। इसमें व्यक्ति, जाति, धर्म और नस्ल को महामंडित किया गया है और ऐसा करने में तमाम प्रतिभाशाली लोगों का उपयोग किया गया है।” अपने इस व्यक्तव्य के समर्थन में रामजी तिवारी ने विश्व के दो तानाशाहों का बहुत ठोस उदाहरण दिया है ‘हिटलर और मुसोलिनी।' “मुसोलिनी ही वह पहला व्यक्ति था, जिसने फिल्मोत्सवों की विधिवत शुरुआत की थी।” (पृ.१३) यहीं पर लेखक ने मुसोलिनी के उद्देश्य का भी अनुमान लगाया है, उन्होंने लिखा है –“शायद मुसोलिनी ने सोचा था कि इसके जरिये उसे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में माना जायेगा जिसने सिनेमा को बेहतर ढंग से समझा और उसका उपयोग किया। लेकिन हम सब जानते हैं कि उसने क्या किया।”(पृ.१३ ,वही) इसी अध्याय में तिवारी जी ने सिनेमा के तीसरे माडल का भी उल्लेख किया है। यह माडल है वाणिज्यिक और कारपोरेट संस्थाओं द्वारा स्थापित माडल। जिसका सिर्फ और सिर्फ एक ही लक्ष्य है अधिक से अधिक पूंजी कमाना।

आस्कर का भ्रम और बाज़ार। पुस्तक के पहले अध्याय में लेखक ने फ़िल्मी बाजारवाद के एक अति महत्वपूर्ण पक्ष को उजागर किया है –“आस्कर की व्याप्ति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगली बार जब आप किसी सी.डी. लाइब्रेरी में जायेंगे,तो दुकानदार आपको उस सी.डी. रैपर के ऊपर लिखा आस्कर नामांकन का ‘लोगो’ अवश्य दिखायेगा और मजे की बात यह है कि आप उसे देखना भी चाहेंगे। यही नहीं, वरन भविष्य की सिने किताबों में भी इन फिल्मों के लिए पन्ने सुरक्षित हो जायेंगे, और पत्र –पत्रिकाओं में इन फिल्मों का परिचय कराने के लिए इसे एक तरीके के रूप में इस्तेमाल भी किया जायेगा।” (पृ.९ ,वही) यह बाजारवाद के विस्तार का एक अटल सत्य है जिसे हम सबने महसूस तो किया पर शायद कभी इस पर गंभीरता से विचार नही कर पाये हैं जैसे लेखक ने किया है। उनकी यही दृष्टि लेखक हम आम सिने दर्शकों से खुद को अलग करता है। इसी अध्याय में लेखक ने आगे लिखा है –“भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में आस्कर पुरस्कारों के प्रति ऐसा ही मोह और भ्रम पाया जाता है जबकि हकीकत यह है कि ये पुरस्कार अमेरिकी फिल्म इंड्रस्टी ‘हालीवुड’ के पुरस्कार हैं, जिसे ‘अकेडमी आफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज’ द्वारा हर साल प्रदान किया जाता है।”(पृ.१०,वही) पुस्तक के पहले अध्याय में आस्कर पुरस्कारों के इतिहास पर रामजी तिवारी जी ने विस्तार से लिखा है।

पुस्तक का तीसरा अध्याय भी बहुत रोचक है ठीक उसी तरह है चौथा अध्याय भी जिसका शीर्षक है ‘दुनिया जब जल रही थी’ पुस्तक के इस पाठ में लेखक ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किस तरह अमेरिका ने फिल्मों के जरिये अपनी छवि को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश की और हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिरा कर भी खुद को बेकसूर साबित करने की चेष्टा की साथ ही यूरोप के वे सभी देश जो दूसरे महायुद्ध के लिए जिम्मेदार थे अपनी साफ –सुथरी छवि प्रस्तुत की है यहाँ ऐसी फिल्मों की एक लंबी सूची है।

अध्याय पांच ‘वियतनाम युद्ध और हालीवुड मायोपिया’ में वियतनाम युद्ध का इतिहास और अमेरिका की भूमिका का संक्षिप्त किन्तु सटीक तथ्यों को पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है। किस तरह फिल्मों के जरिये अमेरिका ने खुद को दोष मुक्त करने का प्रयास किया है यहाँ उसका विवरण दिया गया है। ऐसी फिल्मों की सूची इस पाठ में मौजूद है।

कुल मिला कर इस पुस्तक में फिल्म और आस्कर पुरस्कारों के माध्यम से किस प्रकार अमेरिका और यूरोपीय देशों ने अपने वर्चस्व और साम्राज्यवादी सोच का विस्तार किया है यह हम इस पुस्तक को पढ़ कर ही समझ सकते हैं। किस तरह से एशिया और तीसरी दुनिया के देशों की फिल्म और मनोरंजन उद्योग और बाज़ारों पर कब्ज़ा करने की साजिश रची गई है इसका खुलासा किया गया है। किस प्रकार फिल्मों के जरिये एक्शन और सेक्स के माध्यम से युवाओं को भटकाकर आकर्षित करने का प्रयास किया जा रहा है उस रणनीति का खुलासा है यह पुस्तक। आस्कर के नाम पर भेदभाव और तथ्यों को नकारा गया और दुनिया भर में आस्कर के प्रति लालच फैलाया गया है इसे लेखक ने इस छोटी सी पुस्तक में बखूबी प्रस्तुत किया है साथ ही भारत जैसे देशों के फिल्मकारों के आस्कर के लिए झुकाव पर भी लेखक ने प्रश्न खड़ा किया है। कुल मिला कर २०१३ में आयी यह पुस्तक सर्वाधिक सार्थक और चर्चित पुस्तकों में से एक है और सदा बनी रहेगी इसकी पहचान। पुस्तक के अंत में विश्व के श्रेष्ठ फिल्मकारों की एक सूची उनकी संक्षिप्त जीवनी और महत्वपूर्ण फिल्मों के साथ प्रस्तुत है।

पुस्तक में उल्लेख बहुत सारी घटनाएँ और तथ्य इंटरनेट पर भी उपलब्ध है किन्तु उन्हें पढ़ कर और सही तरीके से प्रस्तुत करना कठिन कार्य है जिसे लेखक ने बहुत शानदार तरीके से किया है और आज की तारीख में इंटरनेट से जानकारी हासिल करना जरुरी भी है। सूचनाएं केवल इंटरनेट से ही नहीं ली गयी हैं बल्कि इसके लिए लेखक ने विश्व इतिहास और फिल्म इतिहास का गहन अध्ययन भी किया है। उनकी मेहनत को इस पुस्तक को पढ़े बिना समझना संभव नही है।

मैं इस पुस्तक को जब-जब पढ़ा मुझे हर बार मुझे एक नई समझ मिली। और मुझे इस पुस्तक में कोई कमी या त्रुटि नज़र नहीं आई है। केवल एक कमी है कि पुस्तक में लेखक से संपर्क करने का कोई माध्यम नही दिया गया है।

मैं इस पुस्तक के लिए लेखक और प्रकाशक को बधाई देता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि इसका दूसरा संस्करण भी पाठकों सामने जल्द आएगा।
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पुस्तक –आस्कर अवार्ड्स –‘यह कठपुतली कौन नचावे’
लेखक –रामजी तिवारी
प्रकाशक –द ग्रुप, जन संस्कृति मंच, गाज़ियाबाद
मूल्य -४०/ रू मात्र







समीक्षक –नित्यानंद गायेन
4-38/2/B, R.P.Dubey colony ,
Lingampally, Hyderabad -500019.
Mob-09642249030


टिप्पणियाँ

  1. Nityanand ji,
    Bahut aabhaar itni sateek sameeksha ke liye. Ham jald hi iska doosara sanskarn prakaashit karenge aur tab yad se Ramji bhai ka sampark likhenge. Kuchek aur bhi kamiyan isme hain design ki jiska vinamratavash aapne jikra nahi kiya use bhi thik karenge. Ho sakta hai tab tak Ram ji bhai ki cinema par ek nayi kitaab bhi taiyyar ho jise bhi ham prakaashit karne ka man banaaye hue hain. Aaabaar ke saath, Sanjay Joshi, Convener, The Group, Jan Sanskriti Manch

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  2. आभार 'पहली बार' का और नित्यानद गायेन का बहुत शुक्रिया ......

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