शिरीष कुमार मौर्य




शिरीष कुमार मौर्य हमारे समय के महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं। आज की कविता का अगर कोई वितान बनाना हो तो शिरीष के बिना एक तो वह बनेगा ही नहीं और अगर तब भी बनाने की किसी ने कोई कोशिश की तब वह निश्चित तौर पर अधूरा होगा। बिना किसी शोरोगुल के शिरीष लगातार अपने रचना कर्म में लगातार सक्रिय हैं। आज जब कुछ चुनिन्दा लोग अपनी सुविधा के मुताबिक़ परिभाषाएं गढ़ने में मशगूल हैं शिरीष हमारी इस प्रकृति, हमारे इस जीवन और हमारे इस समाज, जो प्रायः अनदेखा रह जाता है, को अपनी कवि नज़रों से देखते और शिद्दत से महसूस करते हैं। वे बेहिचक यह कहते हैं कि 'पक्षी आकाश को चीरते नहीं उसकी पृष्‍ठभूमि में उड़ान भरते हैं/ धरती पर फसल को उजाड़ नहीं डालते अपनी ज़रूरत भर दाना चुगते हैं/ केंचुए मिट्टी की परतों में विकल करवटें बदलते हैं/असंख्‍य लोग अब भी धरती पर चलते हैं उसे रौंदते नहीं।' बड़ी सादगी से वे अपना प्रतिवाद सामने रखते हैं। तो आईये पढ़ते हैं शिरीष की कुछ तरो-ताज़ी कविताएँ जो उन्होंने विशेष तौर पर पहली बार के लिए भेजी है।       

मैं स्‍वप्‍न में अपनी मृत्‍यु देख रहा था
(चन्‍द्रकुंवर बर्त्‍वाल की विकल स्‍मृति और वीरेन डंगवाल की सुकूनदेह उपस्थिति के लिए)

मैं स्‍वप्‍न में अपनी मृत्‍यु देख रहा था

साफ़ कर दूं
कि अपनी मृत्‍यु का स्‍वप्‍न नहीं देख रहा था
स्‍वप्‍न में अपनी मृत्‍यु देख रहा था

मृत्‍यु कोई बनता हुआ बिम्‍ब नहीं थी स्‍वप्‍न में
घट रही घटना थी
उसमें सुकून नहीं था बेसम्‍भाल छटपटाहट थी
उसमें आखिरी शब्‍द बोलना जैसा कुछ नहीं था
घुटती-डूबती हुई
एक चीख़ थी

मेरे और उसके बीच सहमति नहीं थी
भरपूर ज़ोर-ज़बरदस्‍ती थी
वह अपने आगोश में नहीं ले रही थी मुझे
किसी सिद्धहस्‍त अपराधी की तरह
लूट रही थी

मैं मदद की पुकार नहीं लगा रहा था
लड़ रहा था
गालियां बक रहा था
एक गाली स्‍वप्‍न और नींद के बाहर छिटक गई थी
नोच-खसोट में एक खंरोंच माथे पर उभर आई थी
कुछ बाल तकिए पर गिर गए थे
ओढ़ना ज़मीन पर था आंखें खुलते हुए पलट गई थीं

मेरे जीवन ने झकझोर जगाया मुझको
कहा – किससे लड़ते हो
किसके लिए लड़ते हो
अपनी नींदें
अपने स्‍वप्‍न किन फितूरों में बरबाद करते हो
जानता हूं तुम्‍हारे शरीर में मृत्‍यु कुछ अधिक उपस्थित है
पर उससे लड़ना बेकार है 

मेरे लिए लड़ो मेरी तरह लड़ो
मैं अपने लिए अपराधी की तरह नहीं लड़ता
तुम्‍हारे शरीर पर लगा हर घाव दरअस्‍ल मेरे ही वजूद पर
लगता है
मन पर लगी खंरोंचों से रक्‍त नहीं अवसाद
रिसता है
इस अवसाद से तुम अपने लिए कुछ ज़रूरी
विलोम बना सकते हो
कुछ नहीं कई दिन इस समाज में यूं ही लड़ते हुए बिता सकते हो

जर्जर स्‍वप्‍नों में बिस्‍तर पर रोग-जरा-मरण से लड़ते नहीं
मज़बूत क़दम चलते
धरा पर दिखो 

अचानक गालियों पर उतरते हुए फिर कहा उसने-

साले लिखो
एड़ियां रगड़-रगड़ मरने से पहले
और सिर्फ़ लिखो नहीं जैसा लिखते हो वैसे ही बसो मेरे भीतर
लिखने के अलावा कई ज़रूरी काम हैं
मनुष्‍यवत्
उन्‍हें भी करो बल्कि पहले उन्‍हें ही करो

इस तरह
हो सकता है तुम बच जाओ कुछ और दिन के लिए
संसार में
अपने चूतियापे साकार करने की खातिर 



बाक़ी सब ठीक है

(प्‍यारे दोस्‍त डी एस के लिए)

बाक़ी सब ठीक है एक असाधारण वाक्‍य है
जिसे साधारण प्रश्‍न के रूप में पूछता और उत्‍तर के रूप में बोलता है रोज़ मेरा एक दोस्‍त
वह इसकी असाधारणता पहचानता है

इसमें बहुत सारा उजड़ जाने के बाद बचे हुए की कुछ सम्‍भावनाएं निवास करती हैं
बाक़ी होना बाक़ी रहना बाक़ी बचना
भाषा के प्रिय शब्‍द-युग्‍म हैं
बिना किसी निकट सामासिक सम्‍बन्‍ध के
स्थिति और क्रिया के बीच सम्‍बन्‍ध के एक अभिप्राय से
महान सामाजिक सम्‍बन्‍धों के बारे में बताते

प्रेम बाक़ी सब ठीक है में आता है
बहुत सारे उजड़े हुए की राख के भीतर प्रेम छुपी हुई गरमाहट हो सकता है
उसकी बदौलत गुज़ारी जा सकती है किसी सर्द जीवन की रात
उसे कुरेद कुछ लपटें दुबारा भड़कायी जा सकती हैं
नए ईधन के सहारे
जिन्‍होंने पुराना ईधन बचा रखा है उन्‍हें मैं सलाम करता हूं

शराब पीकर उत्‍पात मचाते बाप के घर
विरोध में छटपटाता
संकोच में कुछ न कह पाता जवान बेटा
एक पारिवारिक बाक़ी सब ठीक है
उसकी प्रशंसा होती है वह खुला विरोध करे तो एक समूची पीढ़ी का
बाकी़ सब ठीक है हो सकता है
पर वो अपने बाप की लगातार असफलताएं और अपमान पहचानता है
पीढ़ी के विरुद्ध न जा कर मानवीय सम्‍बन्‍धों का बाक़ी सब ठीक है हो जाता है
यह उसका निजी बाक़ी सब ठीक है भी है 

पक्षी आकाश को चीरते नहीं उसकी पृष्‍ठभूमि में उड़ान भरते हैं
धरती पर फसल को उजाड़ नहीं डालते अपनी ज़रूरत भर दाना चुगते हैं
केंचुए मिट्टी की परतों में विकल करवटें बदलते हैं
असंख्‍य लोग अब भी धरती पर चलते हैं उसे रौंदते नहीं

भूस्‍खलन में उजड़े हुए पेड़ जब कट कर बन रहे घर का हिस्‍सा हो जाते हैं तो
बाक़ी सब ठीक है की श्रेणी में  आ जाते हैं
मनुष्‍य की जिजीविषा उजाड़ से सम्‍भावनाएं बटोर लाने में हमेशा ही उत्‍कट साबित हुई है
बाढ़ में लुढ़की चट्टानें भी घरों की दीवार में लग जाती हैं
घर प्रकृति में घुल-मिल जाते हैं जिन घरों में कल विलाप था आज नामकरण है
यह सब मेरे जनों का बाक़ी सब ठीक है है

बाक़ी सब ठीक है अंधेरे में झिलमिलाता हमारा स्‍वप्‍न है
जीवन से लथपथ लालसा
एक मनुष्‍योचित लालच 

बाकी़ सब ठीक है एक दोस्‍त को
दिन की समाप्ति के बाद दी जा सकने वाली बड़ी सांत्‍वना है
जो दी जाती रहेगी हमेशा 
जब तक हममें से
हर एक
एक-दूसरे से इस वाक्‍य को सहज ही प्रश्‍न की तरह पूछेगा
उत्‍तर में कहेगा
जीवन में बाक़ी सब ठीक ही रहेगा



जो लाशों को ठग लेते हैं
(मित्र, शोध-विद्यार्थी, कवि और पुलिस कप्‍तान अमित श्रीवास्‍तव के लिए)

कप्‍तान बहुत मुश्किल है तुम्‍हारी नौकरी
दिन भर चोरों, हत्‍यारों, बलात्‍कारियों,  दंगाईयों और ठगों से पाला से पड़ता है
जाने कितनों को तुम पकड़ते हो
जाने कितनों से ठगे जाते हो

लाशें कुछ बोलती नहीं
लाशें मुंह नहीं खोलतीं नहीं जातीं थाना-कचहरी
लाशें गवाह नहीं हो सकतीं शपथ नहीं ले सकतीं सच बोलने की
किसी को कटघरे में खड़ा नहीं कर सकतीं ऐसा सोच कर
वे लाशों को ठगते हैं
सफ़ेद कलफ़ लगे कुर्ते उनकी करतूतें ढंकते हैं
वैसे जो बोल सकते हैं
उन जीवितों की भी कौन सुनता है
उन्‍हें कितना न्‍याय मिलता है यह अलग से सोचने की बात है

गुजरात की लाशें
न्‍याय के इंतज़ार में कंकाल हो चुकी ठगी गई हैं
मिट्टी की परतों के नीचे
ऊपर विकास के बोर्ड लगे हैं
छत्‍तीसगढ़ की लाशें धुंआ हो चुकी हैं
वायुमंडल में विलीन हो चुके उनके शरीरों के
ठगे गए कार्बन-कण
अब कोई डेटिंग संभव नहीं उनकी 
दिल्‍ली में जीवित स्त्रियां लाश हुईं
देह-भाषा में लाश होने से पहले भी उन्‍हें
लाश ही समझा गया
कुछ जो लाश नहीं हुईं लाशों की तरह पड़ी हैं
भविष्‍य के बिस्‍तरों पर
सड़कों पर लाशों की तरह खड़ी हैं
वे चलती हैं तो मृत्‍यु झरती है धूल और बालों की तरह

मनुष्‍य में पाशविकता के सारे सन्‍दर्भ ग़लत हैं
पाशविकता मनुष्‍यता जैसी ही चीज़ है
उसका हत्‍या, बलात्‍कारों, दंगों, मुक़दमों और ठगी से
दूर-दूर तक कोई रिश्‍ता नहीं

जो बाढ़ में डूब मर गए
पहले ही ठगे जा चुके थे उन्‍हें लाश की तरह ही देखा गया था
जिन्‍होंने आत्‍महत्‍या की अपने खेतों की बगल में उन्‍हें लाश समझकर ही
ठगा गया था

जो ढहते पहाड़ों के साए में रह रहे हैं
प्रकृति नहीं विकास के हाथों ठगे गए हैं उनका लाश होना तय है
उनके हिस्‍से के मुआवजे भी तय हैं विस्‍थापन के नाम पर

हमें दो सौ रुपए किलो हमारे ही आलू बेचते चिप्‍स के पैकटों ने ठगा
तो हम समझ नहीं पाए
बहुराष्‍ट्रीय, उदारीकरण और भूमंडल पर प्रवचन देते महानुभावों ने
वही चिप्‍स खाए
उनके मेज़ों पर रखीं मिनरल का दावा करती बोतलों में बंद
हमारे ही पानी की लाश
 
पता नहीं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहते हैं हम
कि सबसे बड़े ठगतंत्र में
संविधान जो आदमी को बचाने के लिए बनाया गया था
उसी से ठग लिया जनता को
जनता के लिए जनता के द्वारा जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों ने
अब वह एक किताब नहीं कलपती आत्‍मा है
अपनी पवित्रता से लगातार पिटती हुई

कप्‍तान
मैं तुम्‍हें किसी मुश्किल में डालना नहीं चाहता
बस इतना पूछना चाहता हूं
कि दंड संहिता की कौन-सी धारा लगती है उन पर
जो लाशों को ठगते हैं
और ठगते-ठगते जीवितों को भी लाश कर देते हैं

इस बार कवि की तरह नहीं
कप्‍तान की ही तरह बोलना या बोलना तुम्‍हारे सामने खड़े किसी सताए हुए की तरह
कवियों को छोड़ो
वो तो अकसर बिम्‍बों को ठग लेते हैं
भाषा को हर लेते हैं
फिर भाषान्‍तर कर लेते हैं 
तुम्‍हें अब सिर्फ़ कविता नहीं कविता में आलोचना भी लिखनी है

अच्‍छा चलो एक विद्यार्थी की तरह इतना भर बताओ
कविता जीवन की आलोचना है किसने कहा था
हो सकता है मैं तुम्‍हारे जवाब को अध्‍यापक की तरह नहीं
कवि की तरह सुनूं

या फिर कवि की लाश की तरह
अंतिम बार ठगे जाने से पहले।
  
उन्‍हें बोलने दो

कुलीन पतियो

उन्‍हें बोलने दो वे जितना बोलती हैं

उससे अधिक चुप रहतीं हैं

घर उनके लिए संसार है

बाहर के संसार में बिना कुछ कहे

बिना बसे वे चली जाती हैं एक दिन

उनके बाद घर में पक्षियों के झरे हुए पुराने पंख मिलते हैं किताबों के बीच

जिन्‍हें कभी उन्‍होंने पढ़ा था

कभी मत भूलना

कि अपने लिए संसार के नाम पर उन्‍होंने

सिर्फ़ तुम्‍हारा घर ही गढ़ा था



उन्‍हें बोलने दो अधिकारियो

दफ़्तरों में बुनाई लाना अब उन्‍होंने छोड़ दिया है

वे अपना काम बेहतर जानती हैं

वे जो लिखती हैं उसमें उन्‍हें किसी डिक्टेशन की ज़रूरत भी नहीं रही

तुम उनके लिए महज एक हस्‍ताक्षर बन चुके हो

तुम्‍हारी कुर्सियां तक अब उनके पास जा रही हैं

देश के कुछ दफ़्तरों से अब डिक्‍टेट कराती हुई उनकी आवाज़ आ रही है



कवियो तुम तो शर्म करो

अपनी कविता की नई बयानबाजियों से डरो

रघुवीर सहाय की कविता में जो बक-बक करती प्‍यारी औरतें थीं

या दु:ख के बने देह

या कंकाल लड़कियां

यहां तक कि भाषा तक के लिए स्त्रियों के वे रूपक

वो दुहाजू की बीवी

चन्‍द्रकान्‍त देवताले की आधी कविताओं के विरल स्‍त्री-संस्‍मरण

असद ज़ैदी की बहनें और मैं यूं ही किसी द्वार से निकल कर नहीं चला आया के

विरल मानवीय बोध से संस्‍कारित आदमी

अब कहां गई ये सब छवियां



विकट दिन हैं समाज में

उन्‍हें बोलने दो

वे चुप हो गईं तो दुनिया चुप हो जाएगी

हमारे भी बोलने की बहुत कम वजहें रह जाएंगी



गो वे किसी अनुमति की मोहताज़ नहीं हैं

बोलते हुए उनके चेहरे दुनिया के सुंदरतम दृश्‍यों में हैं

नरों के अ-दृश्‍यों में नारी के अभिलेख

कुछ शर्म बचाए हुए हैं

कुछ समाज

कुछ सम्‍भावनाएं जो सुखद हैं



उनके दु:खों पर अब भी जो प्रवेश निषेध है की तख्तियां लगी हैं

उन्‍हें भर हटा पाए तो

एक ऐतिहासिक बोझ हट जाएगा

दिल कुछ हल्‍का हो जाएगा



पूरी सुबह भले न हो पर अंधेरे को छांटता

कुछ धुंधलका हो जाएगा

उन्‍हें बोलने दो

अपने ठस अहंकार में जहां-तहां मत अड़ो

इस क़दर मत चरो समाज को

कुछ बचा भी रहने दो



सम्‍पादको-आलोचको

उन्‍होंने लिखना शुरू किया है तो उन्‍हें लिखने दो

हासिल करने दो अपने अभिप्राय

अभी से मत खोजो उनमें सधा हुआ शिल्‍प और सटीक विचारधारा

इस देश में हज़ारों साल का संताप उनका

अपने आप में एक अनगढ़ विचार है

उनका होना ख़ुद एक शिल्‍प है इस पृथिवी पर 



कठोर हृदयो अब तो उन्‍हें बोलने दो

कितना भी छटपटाओ

तुमसे कभी नहीं खुलेंगी तुम्‍हारी और तुम्‍हारे समाज की सारी गुत्थियां

हटो,

ज़रा उन्‍हें खोलने दो। 



कि वह इतना मीठा मूतता है


हम पाकिस्‍तान को कुचल कर रख देंगे

उस पर परमाणु बम फोड़ देंगे

अब तो हमारी अग्नि भी दस हज़ार किलोमीटर तक वार करेगी

अख़बार में छपा है

दफ़्तर में कह कर कोई ख़ुश हो रहा है



वाइफ प्राइमरी में सरकारी टीचर हो गई हैं

कुछ घंटे नौकरी पर जाएंगी बीसेक हज़ार तनख्‍़वाह पाएंगी

घर भी पहले जैसे ही संभालेंगी

उन्‍हें कपड़े-बरतन धोने और रोज़ के झाड़ू-पोंछे में कोई परेशानी नहीं होती

और भाई खाना तो वो बहुत मन से और लाजवाब बनाती हैं

दोस्‍त से कह कर कोई ख़ुश हो रहा है



कब तक ये लोक और जनता के दु:ख-दर्द विचारें

विश्‍व कविता थोड़ा पढ़ वहां से हिन्‍दी के लिए अब अपरिचित रही

कुछ भंगिमाएं, सूक्तियां और बिम्‍ब

नए विन्‍यास के साथ अपनी कविता में उतारें

बहुत हो चुकी समाज और राजनीति की कविता

अब वैश्विक सार्वभौम उत्‍तरआधुनिक आदि हो जाएं

कोई अंग्रेज़ी अनुवाद कर दे ढेर-सा

तो पश्चिम को जाएं

ख़ुद से ही कह कर कोई खु़श रहा है



मैं परेशान हूं

कोई अपने पेशाब पर ढेर सारी चींटियां रेंगते देख

यह सोच कर ख़ुश कैसे हो सकता है

कि वह इतना मीठा मूतता है? 
  

शिरीष कुमार मौर्य हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि हैं। इनका जन्म 13 दिसंबर 1973 को हुआ। वर्ष 2007 से उत्तराखंड के कुमायूँ विश्वविद्यालय नैनीताल के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत हैं। शिरीष एक बहुत जरुरी ब्लॉग अनुनाद के मोडरेटर हैं।


सम्पर्क
ब्लॉग-    
    http://www.anunaad.blogspot.com
    http://wordpress.com

ई-मेल
    shirishkumar.mourya@facebook.com  


मोबाईल-09412963674

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं।) 

टिप्पणियाँ

  1. युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं शिरीष जी की कविताएँ . शिरीष जी की रचनाएँ पढ़ना सदा सुखद रहा है . सादर | इस प्रस्तुति के लिए पहलीबार का आभार |
    -नित्यानन्द गायेन

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  2. मीठा मूतने जैसी त्रासद स्थितियां को बिना किसी शोर आतंक के कह जाना भाई शिरीष कुमार मौर्य से ही संभव होता है छवियों में व्यक्तव्य या व्यक्तव्य में छवियाँ उकेरना तो कोई इनसे सीखे ----कहने को बहुत कुछ हैं इन कविताओं के बारे में फ़िलहाल ----बधाई और शुभकामनायें ---भाई संतोष जी ---क्या गज़ब करते हो जी
    ---- रतीनाथ योगेश्वर

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  3. अंतिम कविता तो गजब की मारक है!!

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  4. बहुत अच्‍छी कविताएं। विषय अलग, अभिव्‍यक्‍त करने का अन्‍दाज अलग। कवि का अपना मज़बूत डिक्‍शन। धन्‍यवाद संतोष जी।

    -कृष्‍णप्रताप सिंह (केपी)
    https://www.facebook.com/krishnapratap.singh.9619

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  5. कमाल की कविताएँ....हर कविता अलग-अलग ध्यान और समय मांगती है जिसका फेसबुक के आने से चलन थोडा कम हो गया है. फिर-फिर से पढने लायक कविताएँ. Shirish भाई की चुप्पी कविताओं में गज़ब बोलती है. बहुत शुक्रिया संतोष भाई इतनी अच्छी कविताएँ पढवाने के लिए

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  6. Sabhee kavitain behad achchhee . Antim kavita yaad rah jaayegee. Shirish bhai aapka bahut bahut dhanyavaad .
    Abhaar Santosh jee...

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  7. शिरीष जी लम्बे समय कविता के मैदान में सक्रिय हैं , और कविता प्रेमी पाठकों के बीच पहचाने भी जा रहे हैं, पत्रिकाओं में जहाँ कहीं वे दिख जाते हैं , गौर से पढता हूँ . इन कविताओं पर कोई सीधे टिप्पणी करने के बजाय उनकी काव्य -संरचना पर कहना जरूरी समझता हूँ . शीरीष के पास काव्य -दृष्टि है, कविता के योग्य विषयों के चुनाव का बारीकी भी है , किन्तु उस दृष्टि , उस बारीकियत को धारदार और मनमुग्ध कारी सांचे में ढाल देने की सिद्ध कला का अभाव है , वैसे कुछ कविताएँ अच्छी सधी हैं . जैसे इसमें अमित श्री . के लिखी गयी कविता . अनियंत्रित गद्य की तानाशाही अंततः कविता की हत्या कर देती है . शीरीष गद्य के इस जहर से सावधान नहीं दिखते. मंगलेश जी, विष्णु खरे , और उदय प्रकाश जैसे कवियों ने अतिशय गद्यवादी कवितायेँ लिखकर खुद को भले स्थापित कर लिया , मगर पाठकों की नजर में कविता स्थगित हो गयी . और इसी नक्से कदम पर शिरीष जी . दूसरी विकट समस्या बौद्धिकता का अतिशय बोझ कविता पर लद उठनाहै . वह कविता ही क्या जिसमें अभिनव तरंग का राग छेडती बौद्धिकता न हो . मगर ..... कविता में बौद्धिकता ठीक दुधारी तलवार की तरह होती है , यदि वह कविता के उद्दाम व्यक्तित्व पर हावी हो गयी तो प्रभावशाली अर्थों की साड़ी ताकत सोख लेती है . शीरीष की इधर कई कवितायेँ बौद्धिकता के लगभग आतंक से कांपती नजर आती हैं . जन से लाइलाज दूरी बना चुकी आज की जन -कविता की नियति ऐसी ही बौद्धिक कविताओं के कारण है . शीरीष को वह हर कोशिश करनी होगी जो , चन्द साहित्य प्रेमियों को रीझाये नहीं , बल्कि कविता का विषय बनने वाले आम पाठक के करीब ले जाय , कहना जरूरी है की जनता , जमीन और आम लोगों के जमाने से बेपनाह प्यार किये बगैर यह सिद्धि संभव नहीं , हम नागार्जुन न बन सकें , न सही
    मगर नागार्जुनपन जी तो सकते हैं .

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    1. रचना प्रक्रिया पर एक सार्थक व्यक्तव्य के लिए आभार भरत प्रसाद जी
      ----रतीनाथ योगेश्वर

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    2. भरत भाई कविता को लेकर अक्सर ऐसी बातें करते हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि वह पाठको के आतंक की चिंता से ग्रस्त हैं या अपनी. शिरीष से लेकर गिरिराज और अन्य कई लोगों पर यह आरोप लगाया जाता रहा है लेकिन मुझे नहीं लगता कि समकालीन कविता में इनके पाठक किसी अन्य कवि से कम हैं. शिरीष के यहाँ तो वह आंतरिक लय जबर्दस्त है जिसकी कमी का ज़िक्र भाई भरत प्रसाद कर रहे हैं. अभी उनके द्वारा संपादित जनपक्ष का अंक भी देखा है और बेहद निराश हुआ हूँ. उनका संकलन भी सस्नेह प्राप्त हुआ था और तब भी निराशा इतनी ही भयावह थी. न जाने क्यों मुझे लगता है कि कविता को लेकर वह थोड़े कन्फ्यूजन वाली स्थिति में हैं.

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  8. पता नहीं कौन सी अतिरिक्‍त बौद्धिकता दिख रही है श्री भरत प्रसाद त्रिपाठी जी को? नागार्जुनपन की वे बात कर रहे हैं, लगता है उन्‍होंने नागार्जुन की कविता का गद्य पढ़ा नहीं ठीक से। इधर छपी शिरीष जी की सारी कविताएं आम जनता की कविताएं हैं, उसी की भाषा में हैं। समसामयिक राजनीतिक सामाजिक मुद्दों पर हैं। वे अपनी कविता में खुद कविता को लोक और जन से दूर ले जाने वाले कवियों पर व्‍यंग्‍य करते हैं। अमित श्रीवास्‍तव वाली कविता का जिक्र हुआ - देखिए उसमें हमारे आसपास के ठगे गए लोग किस तरह उपस्थित हैं - हर कविता में उपस्थित हैं। जनता, ज़मीन और ज़माने की बात ये नहीं है तो फिर कोई नहीं है।

    सच कहूं इधर मैंने बहुत सारी चीजे नेट पर पढ़ी हैं - मुझे लगता है कि एक सीमित दायरे में कुछ अर्द्धशिक्षित लोग अच्‍छी जनपक्षीय कविता का विरोध लोक और जन के नाम पर ही कर रहे हैं। दिस इज़ एन एब्‍सर्ड आफ अवर सोशियो-पोलेटिकल एंड पोएटिक टाइम्‍स।

    कृष्‍णप्रताप सिंह
    https://www.facebook.com/krishnapratap.singh.9619

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  9. फेसबुक पर भरत जी की टिप्‍पणी पर राय (आशा है इस बहस के लिए कवि से लेकर सभी टिप्‍पणीकार तक कोई बुरा नहीं मानेगा)। मैं इसे यहां पहली बार के पाठकों के लिए लगा रहा हूं।-

    Tiwari Keshav असहमत
    See Translation
    about an hour ago via mobile · Unlike · 2
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    Krishnapratap Singh Keshav जी वहां लिखते तो त्रिपाठी जी का कुछ ज्ञानवर्धन हो पाता मेरी टिप्‍पणी तो देख ही ली होगी आपने। मंगलेश जी, खरे जी और उदयप्रकाश की धारा तो इस कवि में है ही नहीं। कई बार सही लोगों की चुप्‍पी गलत सिद्धान्‍तों के गढ़ने में काम आ जाती है।
    about an hour ago · Edited · Like
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    Ashok Kumar Pandey भरत भाई कविता को लेकर अक्सर ऐसी बातें करते हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि वह पाठको के आतंक की चिंता से ग्रस्त हैं या अपनी. शिरीष से लेकर गिरिराज और अन्य कई लोगों पर यह आरोप लगाया जाता रहा है लेकिन मुझे नहीं लगता कि समकालीन कविता में इनके पाठक किसी अन्य कवि से कम हैं. शिरीष के यहाँ तो वह आंतरिक लय जबर्दस्त है जिसकी कमी का ज़िक्र भाई भरत प्रसाद कर रहे हैं. अभी उनके द्वारा संपादित जनपक्ष का अंक भी देखा है और बेहद निराश हुआ हूँ. उनका संकलन भी सस्नेह प्राप्त हुआ था और तब भी निराशा इतनी ही भयावह थी. न जाने क्यों मुझे लगता है कि कविता को लेकर वह थोड़े कन्फ्यूजन वाली स्थिति में हैं.
    See Translation
    33 minutes ago · Unlike · 1
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    Vimal Chandra Pandey कृष्णप्रताप जी, भरत जी को अभी और इसके पहले भी जितना भी पढ़ा है, हर बार मेरा विश्वास पुख्ता हुआ है कि उन्हें न तो समकालीन कविता की कोई समझ है और न कहानी की. उनका बस चले तो कविता लिखने से पहले हर कवि के लिए यह अनिवार्य कर दें कि वह पाठकों की दो-चार कक्षाएं ले ताकि उसे कविता समझ में आये. कम से कम शिरीष जी की कविताओं से अगर किसी को ऐसी समस्या है तब उसे खुद अपनी समझ पर एक बार रंदा मारने की ज़रूरत है, वह लगातार ज़बरदस्त कविताएँ लिख रहे हैं. मेरी और से उन्हें शुभकामनाएँ.
    7 minutes ago · Unlike · 3
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    कष्‍णप्रताप सिंह

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  10. भरत जी को अभी और इसके पहले भी जितना भी पढ़ा है, हर बार मेरा विश्वास पुख्ता हुआ है कि उन्हें न तो समकालीन कविता की कोई समझ है और न कहानी की. उनका बस चले तो कविता लिखने से पहले हर कवि के लिए यह अनिवार्य कर दें कि वह पाठकों की दो-चार कक्षाएं ले ताकि उसे कविता समझ में आये. कम से कम शिरीष जी की कविताओं से अगर किसी को ऐसी समस्या है तब उसे खुद अपनी समझ पर एक बार रंदा मारने की ज़रूरत है, वह लगातार ज़बरदस्त कविताएँ लिख रहे हैं. मेरी और से उन्हें शुभकामनाएँ.
    विमल चन्द्र पाण्डेय

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  11. ashok pandey ji, vimal chand aur krishna pratap ki asahj pratikya ka uttar santulit aur tarkpoon javab aaj 5-10-2013 ki shaam ko vistaar se milega. bas din bhar ka dharya banaye rakhiye.

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  12. मैंने अभी भरत भाई की टिप्‍पणी और उस परी चली चर्चा को देखा। भरत भाई मेरे वर्षों के परिचित हैं और साहित्‍य में भरपूर सक्रिय हैं। मेरा मानना है कि सबकी एक राय कभी नहीं होती। भरत भाई की अपनी राय(जिसका मैं सम्‍मान करताहूं) है और उस राय को दूसरे लोगों ने कसौटी पर कसा है(ऐसा होना भी लाजिमी ही है)। यह दुतरफा संवाद है। साहित्‍य में आप कुछ कहें तो उसकी प्रशंसा या भर्त्‍सना होनी ही चाहिए। दु:खद स्थिति होती है जब आपको इन दोनों में से कुछ नहीं मिलता। कविता में लोक, जन, विचारधारा, शिल्‍प, कला आदि पर मैंने अपने लेखों में बहुत लिखा है - ये सभी प्रसंग लिखने को उकसाते हैं लेकिन यहां मामला मेरे नाम से जुड़ा है इसलिए यहां लिखना अनैतिक होगा। किसी और कवि या कविता के प्रसंग में लिखूंगा जैसे हमेशा लिखता रहा हूं। अभी तो मैं इस पूरे संवाद को ध्‍यान से देखूंगा क्‍योकि मेरा हमेशा मानना रहा है कि बिना बहस के कविता मर जाती है। अभी मेरी कविता के जीते रहने के आसार अच्‍छे दिख रहे हैं :-) भरत भाई समेत सभी मित्रों को शुक्रिया कहना बनता है।

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  13. "साहित्‍य में आप कुछ कहें तो उसकी प्रशंसा या भर्त्‍सना होनी ही चाहिए। दु:खद स्थिति होती है जब आपको इन दोनों में से कुछ नहीं मिलता।" -- सहमत, परन्तु प्रशंसा या भर्त्‍सना तार्किक हो

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  14. रवीन्‍द्र जी यहां बहस इसी तार्किकता पर ही हो रही है।

    - कृष्‍णप्रताप सिंह

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  15. भाई शिरीष जी की कविताओं पर मेरी टिप्पणी के बाद कृष्ण प्रताप, अशोक पाण्डेय और विमल चन्द की प्रतिक्रिया आने के बाद मैं यक़ीनन आनंद और संकल्प से भर उठा, इस लिए नहीं की मेरी टिप्पणी पर बौखलाहट मच गयी है , बल्कि इसलिए की कविता पर दूध-पानी वाली बहस की शुरुवात तो अब हुयी है। पहले तो कह दूँ, की शिरीष जी या किसी भी वरिष्ठ -युवा कवि का न मैं अंध समर्थक हूँ न अंध विरॊधी। कविता पढने, गुनने और पीने के बाद जो आत्मा की गहराई से महसूस करता हूँ, लिखता वही हूँ, दोस्ती, यारी, भाईवाद से मुक्त रहकर। काँटों और जहरीले विरोधों से भरी इस आत्मघाती यात्रा को मैंने आत्मबलिदान की हर कीमत पर चुना है। आगे भी दीवाने की तरह इसी मार्ग पर चलता रहूँगा। तो बात शुरू करें अशोक पाण्डेय जी से, अशोक जी जनपथ के विशेषांक से बहुत निराश हैं, जिसका कारण उन्हें खुद नहीं मालुम। मैं कारण समझ सकता हूँ , मगर प्रसंग अवांतर हो जायेगा। बहुत पहले मैने अपना संग्रह भेज जिसको पढ़कर उनको भयानक निराशा है, अशोक जी आप से वाकई सहानुभूति हो रही है, क्योंकि आगे ऐसे ही कवितायेँ लिखी जाएँगी और संग्रह भी आयेंगे। रही बात मेरी कविता की तो आप पुनः याद दिला दूँ, भूमिका श्री भगवत रावत जी ने लिखी है, जो शायद आपकी पसंद के दायरे में नहीं आते। खैर आप एक बंधे -बंधाये दायरे की मण्डली से बाहर निकल कर कविता की सुबह न देखने की कसम खा चुके हैं तो कोई क्या कर सकता है, यह तो ही समझाएगा की सचमुच किसकी कविता भयानक रूप से निराश करती है, रही बात कनफूजन की तो मैं वाकई आप जैसे चरम कलावादी और भारी भरकम शब्दों का जाल बिछाने वाले कवियों से विशुद्धतः कन्फ्यूज हूँ, कभी एकांत मैं अपनी अंतरात्मा से पूछियेगा की आप अपनी कविताओं से वाकई निराश हैं या नहीं?
    विमल जी, मुझे ख़ुशी होती यदि और विस्तार से मुझे ख़ारिज किये होते। लेकिन तर्क और प्रमाण के साथ, मुझे याद है जब मैं उत्तर प्रदेश की खिड़की की आलोचना किया था तब भी आप का कुछ ऐसा ही आत्मग्रस्त उत्तर था, मैं समझ गया की इस समय प्रचार की पीठ पर सवार अन्य युवा कवियों की तरह आप को भी असमय ही महानता का रॊग लग चुका है, आप मान बैठे हैं की जो भी कहानी लिखेंगे वह निर्दोष, कालजयी, चर्चेय और किसी भी प्रकार की आलोचना से परे होगी, क्योंकि आप बड़ी से बड़ी पत्रिकाओं में छप चुके हैं, तमामसाहित्यकार आपके स्थाई समर्थक हैं और बड़े प्रकाशक आप नहीं छापेंगे तो किसे छापेंगे? इस नासमझ की एक सलाह है की चतुर्दिक प्रशंसा, वाहवाही, और चर्चा के व्यामोह से मुक्त होकर अपनी हकीकत और दर सच्चाई को समझने की आखें विकसित कीजिये, और जीवन एक ही बार मिलता है मित्र।
    कृष्ण प्रताप जी आप पाठक से ज्यादा भक्त नजर आते हैं, आपने भी पुराना राग अलापा, सीधे - सीधे आरोप, अब तो मुझे सचमुच पाठकों की चिंता सता रही है। आप जैसे पाठकों के रहते भला किसमें है दम जो साहित्य का भला कर सके? आपकी समझ पर फिर इत्मीनान से बात होगी, अभी कुछ और आपको पढ़ाना चाह रहा हूँ,
    मुझे शीरिष भाई की कविताओं से कोई एलर्जी नहीं है और न ही उनसे कोई व्यक्तिगत अन्तर्विरॊध। उनकी कविताएँ सीधे-सीधे ख़ारिज करने का सवाल ही नहीं, मैंने पहले ही कहा की उनकी कविताओं में मौलिक चिंतन है, नयी बातें है, उपेछित सत्य को कहने का साहस भी है, परन्तु यही पर्याप्त नहीं है, आपके पास ऐसी हुनर हो जो पढने, सुनने वालों की आत्मा को स्थाई तौर पर झंकृत कर सके, उनमें आदमी के नए संस्कार का बीज बो सके, और चालक, हिंसक, दगाबाज समय के सामने अपराजेय मोर्चा बन सके, हिंदी कविता में हजारों कवि आए, और बीत गए मगर, समय की कसौटी कितनी निर्मम है मित्र, टिके तो १० -१२ कवि। कभी सोचने का समय निकला कृष्णा जी, ऐसा क्यों हुआ? अज्ञेय जब आकाश बने हुए थे, तब मुक्तिबोध होकर भी नहीं के बराबर थे, मगर आज ? शिरिश जी की कविताओं में गद्य की अतिशयता है, जो अर्थ की मोहक ध्वनि और झंकार को दुर्बल बना देती है, कविता का अर्थ के भीतर झरने की धारा की तरह जितनी उतरती है, कविता की तासीर उतनी ही जबरदस्त होती है, मेरी इस बात से शीरिश भी सहमत होंगे की बड़े से बड़े कवि की कवितायेँ भी भाषा, बोध, शैली और की कसौटी पर पूर्णतः पूर्णतः निर्दोष नहीं होतीं,चाहे चाहे निराला हों, या नागार्जुन। फिर अपने बारे में इतना भ्रम क्यों? बेहतर होता की बात व्यक्तिगत आरोपों से मुक्त एक स्वस्थ और निर्णायक दिशा की ओर मुडती, किन्तु ऐसा आज के स्वार्थवादी समय में होता कहाँ है? अंत में यह जरूर कहूँगा, की इस नासमझ की नासमझी पर ऐसे ही आत्मग्रस्त संदेह करते रहिये, और नया परिवर्तन देखने के लिए तैयार रहिये।

    भरत प्रसाद, शिलांग

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    1. भरतप्रसाद जी आप तो पाठकों को ही साहित्‍य का भला न करने वाला बता रहे हैं, जिससे साहित्‍य पर आपकी समझ का पूरा पता चलता है। मैं किसी का भक्‍त वक्‍त नहीं हूं। जिस दिन शिरीष जी या कोई अन्‍य कवि जनता के पक्ष में नहीं लिखता दिखेगा, पाठक के तौर मेरे लिए महत्‍वहीन हो जाएगा। आप जरा केशव जी और उससे अधिक महेश पुनेठा जी का नीचे दिया कथन पढ़ें (दोनों फेसबुक पर इसी प्रसंग में आए हैं), आपको शायद बात समझ में आए कि आप क्‍यों ऐसा चाहते हैं कि दुनिया आपके हिसाब से चले। पाठकों यानी जनता का विरोध कर आप खुद को जनता का अलमबरदार समझ रहे हैं। विचारधारा का ठेका आपने ले रखा है बाकि सब मूर्ख हैं क्‍या। आज के दस-बारह टिके हुए वरिष्‍ठ नाम बताता हूं और अब आपकी समझ से परिचित होने के बाद शर्त लगा सकता हूं कि ये आपकी समझ के दायरे में नहीं आएंगे - कुंवर नारायण, लीलाधर जगूड़ी, चन्‍द्रकान्‍त देवताले, वीरेन डंगवाल, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, आलोक धन्‍वा, असद ज़ैदी...................छोडिये कहां तक आपसे संवाद करने का प्रयास करूं।

      - केपी

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    2. भरत जी, मुझे नहीं मालूम था कि आप इतने व्यक्तिगत हो जायेंगे. खैर इस स्तर पर पहुँच कर तो कह मैं भी सकता था कि आपका प्रलाप दरअसल एक असफल कवि और आलोचक का सफल प्रलाप है, लेकिन मैं यह नहीं कह रहा. आपने मुझे कलावादी कहा है, कुछ मित्र कलाहीन कहते रहे हैं सो मेरे लिए यह आनंद का ही विषय है और अपनी कविता पर इससे अधिक बात मैं तो नहीं ही करना चाहता. अगर मुक्तिबोध 'सरल' कवि हैं अज्ञेय की तुलना में तो मैं आपके विवेक को बस प्रणाम कर सकता हूँ :) किसने कहा कि जनपथ के ख़राब होने और इससे निराश होने के कारण मुझे नहीं पता? मेरे कारण स्पष्ट हैं - चयन की जगह संकलन अब हिंदी पत्रिकाओं की वह व्याधि बन चुकी है जिससे मुक्ति असंभव लगती है. लेकिन एक युवा विशेषांक में ऐसा कचरा टाइप का संचयन निराश न करे तो क्या करे? न तो कोई क्रम समझ में आता है न कोई प्रस्तुती है बस एक के बाद एक कवितायें चली आती हैं और क्या ही बकवादी कवितायें. किसी ऐसी पत्रिका को जिसमें आप खुद छपे हों, ख़राब कहना उस दौर में आसान नहीं होता जब फेसबुक कवियों के लिए प्रकाशन सूचना का अश्लील मंच बन चुका हो. लेकिन सच में मुझे अफ़सोस है उस संचयन का हिस्सा बनने के लिए (यहाँ बता दूं कि कवितायें आपने मांगकर ही छापी थीं, अयाचित मैं कवितायेँ किसी को नहीं देता, किसी को भी नहीं).

      अब आपके संकलन पर एक बात. अगर किसने भूमिका लिखी है, इससे ही तय हो जाता कि कौन सा कवि कैसा है तो हिंदी में आलोचना की ज़रुरत क्या थी? भगवत रावत मेरे प्रिय कवियों में नहीं, लेकिन उनके लिए मन में एक विशेष सम्मान है. हाँ, संकलन पढ़ते हुए मैं अक्सर भूमिकाएं नहीं पढता...मैं जानता हूँ कि वे कैसे लिखवाई जाती हैं. कई किताबों का ब्लर्ब लिखने के बाद मैं जानता हूँ कि ब्लर्ब क्यों और कैसे लिखे जाते हैं. मेरे प्रति सहानूभूति के लिए धन्यवाद लेकिन किताबें तो मेरे शहर में भी रोज़ छपती हैं और कूड़ेदान तक का सफ़र तय करती रहती हैं, और शहरों से छप के भी करें तो इसमें खुश या दुखी होने का क्या सबब है भाई? खूब किताबें लिखिए पुरस्कार पाइए छपते जाइए...मेरी बला से :)

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    3. कहने को मैं भी कह सकता था कि फलां-फलां ने मुझे फलां-फलां कहा है लेकिन उस स्तर पर उतरने वाली उम्र नहीं रही :) सूचना दे दूं कि इस संकलन में कोई भूमिका नहीं रहेगी तो आप 'वंश-कुल-गोत्र-विहीन' कवि कह सकते हैं ;)

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  16. Tiwari Keshavposted toKrishnapratap Singh
    Yesterday
    के पी भाई पोस्ट लग नही पा रही है। आप मुझ से भी मुखातिब हैं। दिल से कहूँ आप की बात से सहमत हूँ। लोक और जनपद की बहस कविता ही को न विस्थापित कर दे हमारी भी चिंता में है। आज शिरीष की कविता पर ये सब पढ दिल दुःख गया कोई बात होती तो हम आगे बढ़ कबूलते। पर ये सब हिंदी का क्या कहूं साथी। यार हम तो खुले में कहते आओ ।पर ---

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  17. Mahesh Punetha
    शिरीष कुमार मौर्य अपनी कविताओं के माध्यम से हमारे समय और समाज में जरूरी हस्तक्षेप कर रहे हैं . उनकी जनपक्षधरता असंदिग्ध है .सब एक ही तरीके से लिखें कोई जरूरी नहीं है . कथ्य और शिल्प की विविधता ही हमारे साहित्य को समृद्ध करती है इसका स्वागत होना चाहिए . इधर वरिष्ठ से कनिष्ठ पीढी तक में एक प्रवृति अधिकांश साहित्यकों में देखने को मिल रही है कि वे ऐसे किसी स्वर को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं जो उनसे भिन्न है . अपने से भिन्न को ख़ारिज करने की होड़ मची हुयी है .मुझे तो लगता है कि सबसे पहले यह देखा जाना चाहिए कि कवि किसके पक्ष में खड़ा है यदि वह जनता के पक्ष में खड़ा है तो हमें स्वीकार होना चाहिए .
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    15 hours ago · Unlike · 11

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  18. :-) भरत भाई आप बहुत मजेदार आदमी हैं....

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  19. मित्रों, बेहतर होता, यदि हम शिरीष जैसे महत्वपूर्ण कवि की कविताओं पर बात करते. लेकिन यह बहस पूरी तरह से विषयांतर होती चली गयी है. ब्लॉग का मोडरेटर होने के नाते आप सब सुधी मित्रों से हमारी अपेक्षा एवं विनम्र निवेदन है कि हम अब इस प्रकरण को यहीं पर समाप्त करें. आप सब यहाँ पर आये इसके लिए आप सब का हृदय से आभार. .

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  20. बहुत-बहुत शुक्रिया संतोष। मैं ख़ुद आपसे कहने वाला था। मुझे निजी तौर पर तकलीफ़ हो रही थी। मेरे कमेंट के बाद सोच रहा था इति हो जाएगी पर अति हो गई। महेश पुनेठा ने सबसे तार्किक बात कही और मुझे लगता है कि कभी उनके कहे को प्रस्‍थानबिन्‍दु बना कर यहीं इसी ब्‍लाग पर इसी विषय पर यहां शामिल सभी लोगों(और अन्‍य भी) को आप परिचर्चा के लिए आमंत्रित करें। यह एक दिलचस्‍प और बेहद सार्थक आयोजन होगा।

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  21. मुझे पक्का यकीन था की जल्द ही आपकी सभी साहित्य - प्रेमियों की ऐसी ही प्रतिक्रियाएं मिलेंगी , और हुआ भी यही। जनपथ के विशेषांक पर आपके जड़ पूर्वाग्रह की आँखें खोलना जरुरी समझता हूँ अशोक जी। यह चर्चित , स्थापित , गगनभेदी युवा नामों का मंच नहीं है मित्र, यह अंक दृश्य में सार्थक उपस्थिति बनाये रखने वाले महत्वपूर्ण कवियों को रेखांकित
    करने का प्रयास है , साथ ही १० -१५ ऐसे नए चेहरों को भी सामने लाना है , जो अभी अपनी पहचान न बना पाने के बावजूद अच्छी कवितायेँ लिख रहे हैं और जो भविष्य की पुख्ता सम्भावना नजर आते हैं। पुनः आपसे कहूँगा , संभावनाओं के प्रति आशावान बनिए, वरना याद है न जो तटस्थ हैं , समय लिखेगा उनका भी। ……. क्रम पर आपका नजरिया बेहद सतही नजर आता है , दृश्य में कौन कितना महत्वपूर्ण घोषित है और कौन स्टार है , इस जादुई भ्रम से मुक्त रहते हुए मैंने उम्र की वरिष्ठता को आधार बनाया , इसके साथ ही वह दृश्य मे सार्थकता के साथ दमदार मौजूदगी बनाये हुए हो। अगर आपके सबसे आगे आने का शौक था , तो यहाँ के लिए अफ़सोस है। मेरी कविताओं और आलोचना पर आप तो क्या न जाने कितने मेरे असफल हो जाने , बदनाम हो उठने , टूट- टूटकर उड़ जाने का सपना वर्षों से संजोये बैठे हैं , यहाँ मुझे प्रसंगवश घात लगाने की भी आहट सुनायी दे रही है। मुझे आपने असफल घोषित किया , वो भी बिना किसी देरी के, इसके लिए शुक्रिया,मगर भूल मत जाईयेगा जो आज कहा है , क्योंकि कल हम नहीं , यही हिंदी साहित्य आपके इस वाक्य को कसौटी पर निर्ममतापूर्वक कसेगा मित्र। शीरिष भाई मेरी आलोचना उतना नकारात्मक नहीं ले रहे जितना आप त्रिमूर्तियों ने ले लिए। असल में कवि के दोषों और दुर्बल्तायों की आलोचना , उसकी बेहतरी का चुनौतीपूर्ण मार्ग तय करना है। रही बात कृष्ण प्रताप की तो अभी नए -नए साहित्य में अवतरित हुए हैं , उन्हें मेरी तो क्या अपने किसी भी प्रिय कवि की आलोचना में कही खरी बात समझ में नहीं आएगी , प्रसंसा में अक्सर कवि की मौत छिपी होती है , और खरी आलोचना में उसके भविष्य की रोशनी , यह रहस्य भी कृष्ण प्रताप जी को जल्दी कहाँ समझ में आने वाली ? पाठक , पाठक में बहुत फर्क होता है , साहित्य को आप जैसा कट्टर भक्त पाठक नहीं, सचेत , प्रबुद्ध और निष्पक्ष अंतर्दृष्टि रखने वाला पाठक चाहिए। यह आप कैसे मान लिए की अपने किसी प्रिय और पसंदीदा कवि में कमियां हो ही नहीं सकती ,
    मेरी आलोचना शीरीष को ख़ारिज करने के बजाय एक संभावनाशील कवि की उस सख्त कमजोरी को सामने लाकर उन्हें सचेत करना हैं , जो उनकी कविता को उर्ध्व दिशा में कत्तई विकसित नहीं होने देंगी। यदि शीरिश भाई में कुछ बात न होती तो आप पूर्वाग्रहियों की अपमानजनक निंदा सुनकर भी माथा न खपा रहा होता। बहस लम्बी हो जाएगी , अपने -अपने काम पर लगिए , अशोक जी तरह मेरे घनघोर असफल होने का ख्वाब पालिए , और साहित्य के कुछ नया करने का संकल्प लीजिये। मेरी आप सभी मूर्तियों को सुभकामनाएँ। भरत प्रसाद , शिलोंग



    --
    Thanks and Regards
    Bharat Prasad

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