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मंगलेश डबराल का आलेख बचाने और बदलने के बीच राग संगीत

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मंगलेश डबराल भारतीय गायन परम्परा में रागो और धुनो का अपना एक पारम्परिक स्थान एवम महत्व रहा है. गायक इस परम्परा का प्रतिबद्धता से पालन करते रहे हैं. लेकिन समय के साथ सब कुछ बदलता है. राग और धुन में भी कुछ साहसी लोगो ने प्रयोग किये और उसे एक नया रुप प्रदान करने की सार्थक कोशिश की. जाने माने कवि मंगलेश डबराल संगीत के भी बेहतर ग्याता रहे हैं. आज पहली बार पर प्रस्तुत है मंगलेश जी का आलेख 'बचाने और बदलने के बीच राग संगीत'. यह आलेख आजकल के हालिया अंक में प्रकशित हुआ है.          बचाने और बदलने के बीच राग संगीत   मंगलेश डबराल   कहते हैं कि संगीत और नृत्य में बदलाव बहुत कम होता है या बहुत देर बाद होता है जब दूसरी ज़्यादातर चीज़ें बदल जाती हैं. ध्रुपद गायन की हज़ारों वर्ष पुरानी परंपरा या चौदहवीं सदी में अमीर खुसरो से शुरू हुए ख़याल गायन में बहुत कम परिवर्तन हुए हैं. लोक गायन में भी पुरानी धुनें उसी तरह जीवित हैं और फिल्म संगीत में वह सुरीला, अक्सर शास्त्रीय रागों या लोक धुनों पर आधारित दौर चार दशक तक चलता रहा जिसे ‘सुनहरा दौर ’ क...

रोहित ठाकुर की कविताएँ

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  रोहित ठाकुर परिचय  जन्म तिथि - 06/12/ 1978 शैक्षणिक योग्यता - परा-स्नातक राजनीति विज्ञान विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र - पत्रिकाओं  ‘ हंस ’ , ‘ बया ’ , ‘ दोआब ’ , ‘ समकालीन हिन्दी साहित्य ’ , ‘ अक्षर पर्व ’ , ‘ ककसाड़ ’ , ‘ समहुत ’ , ‘ सदानीरा ’ आदि में कविताएँ प्रकाशित  मराठी और पंजाबी भाषा में कविताओं का अनुवाद प्रकाशित  विभिन्न ब्लॉगों पर कविताएँ प्रकाशित  वृत्ति - सिविल सेवा परीक्षा हेतु शिक्षण   रूचि - हिन्दी-अंग्रेजी साहित्य अध्ययन  मशहूर नाट्यकर्मी और कलाविद हबीब तनवीर का मानना है कि 'उत्कृष्ट साहित्य समग्र समाज की संस्कृति से अनुप्राणित होता है'। भारतीय समाज उस बागीचे की रूपाकृति जैसा रहा है जिसमें विविध किस्म, जाति प्रजाति और आस्वाद वाले पेड़ पौधे एक साथ निर्द्वन्द्व भाव से फलते फूलते और जीते रहे हैं। राजनीतिज्ञों ने इस रूपाकृति को संकीर्ण बनाने का काम किया है। इसे आगे बढ़ाने का दायित्व रचनाकार बखूबी निभा रहे हैं। रोहित ठाकुर ऐसे ही युवा कवि हैं जिनके यहाँ उस घर की सं...