रेखा चमोली की कविताएँ




रेखा चमोली एक सजग कवियित्री हैं. सहज भाषा में वे अपने आस-पास की घटनाओं को कविता में ढाल लेती हैं. उनके पास विषयों की कमी नहीं है.  छोटी-छोटी चीजें, आसपास की चीजें और परिवेश उन्हें आकृष्ट करते हैं और वे सहज रूप से उनकी कविता में आ जाते हैं.  और यही रेखा की विशिष्टता है. बेहद निराशाजनक माहौल में भी वे आवाज में उत्सव तलाश लेती हैं. उनकी कविताओं में यह स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है. रेखा को पता है, उन्हीं की पंक्तियाँ उधार ले कर कहें तो 'जिन्होंने चुरा ली /मेरे हिस्से की सारी धूप, सारी जमीन/ और मुझे अपनी गलियों में चलने लायक भी नहीं छोडा/ सब कुछ जानते हुए भी /कुछ न कर पाना / कितनी पीडा देता है.' वाकई यह स्थिति त्रासद होती है. रेखा इस स्थिति को अपने कविताओं में वर्णित करने से नहीं चूकती बल्कि साफ़-सफ्फाक लहजे में यह सब कह डालती हैं. प्रस्तुत है रेखा चमोली की कुछ इसी अंदाज वाली नयी कविताएँ.
        
रेखा चमोली

उसकी आवाज एक उत्सव है
                                             

सुबह की हड़बड़ी में
एक कप चाय जैसी उसकी आवाज
थकी दोपहरी में
हौले से दरवाजा खोल
हालचाल पूछती
कभी कभार
सोते हुए थपथपाती
जहॉ-जहॉ नहीं होता वो साथ मेरे
होती उसकी आवाज
खुशी में चहकती
उत्साह में खनकती
दुख और उदासी में बेचैन होती
नाराजगी में लुडकती हुई सी
कैसे भी करके
मुझ तक पहुॅच ही जाती
जब कुछ नहीं सुन पाती मैं
सुन पाती हूॅ
उसकी आवाज
उसकी आवाज पहचानते हैं
मेरे कपडे, बर्तन, घर, किताबें, रास्ते
मेरे जबाब न देने पर
बतियाने लगते हैं उससे
उसे क्या पता
एक उसकी आवाज के सहारे ही
चल रही है सारी दुनिया।

काला चश्मा 

इतनी सर्दी में
शरीर उस गेंद की तरह हो गया है
जिसे गुम हो जाने पर
छोड आते हैं बच्चे
मैदान में ही
सुबह धूप पडने पर
बूॅद-बूॅद टपकती है
रात भर जमी ठंड
गेंद सा बना मेरा शरीर
जोर की अंगडाई लेना चाहता है
मुझे नहीं चाहिये
थोडी सी धूप
थोडी सी जमीन
मुझे मेरे हिस्से का पूरा चाहिए
मुझे नहीं पता कैसे मिलेगा
पर मैं जानती हॅू
मेरे घुटने पेट में धॅसने के लिए नहीं बने
मैं उन्हें अच्छी तरह पहचानती हॅू
जिन्होंने चुरा ली
मेरे हिस्से की सारी धूप, सारी जमीन
और मुझे अपनी गलियों में चलने लायक भी नहीं छोडा
सब कुछ जानते हुए भी
कुछ न कर पाना
कितनी पीडा देता है
मेरा हिस्सा चुराने वाले भी इस बात को जानते हैं
इसीलिए
देखते ही मुझे दूर से
पहन लेते हैं काला चश्मा
सोचती हूॅ
सोते हुए तो चश्मा उतारना ही पडता है
तब क्या इन्हें नींद आ पाती होगी ?



सीखने के दरवाजे
 

रोज किसी न किसी सवाल का हाथ पकड
घर लौटता है मेरा बेटा
कभी ये दुनिया
सुंदर पंखुडियों की तरह खुलती उसके सामने
तो कभी हो जाती
अंधेरे सी धोकेबाज
कभी दूर से फेंके
कूडे की थैली सी फट से खुलती
वो डर और विस्मय से घिर जाता

कभी उत्तेजित करती उसे
लहरों पर चलने
अंतरिक्ष में गोता लगाने को

किताबों की व्यवस्थित दुनिया से फिसलकर
गलियों मुहल्लों में घूमती, रंग बदलती बातें
अपनी सहुलियत के हिसाब से उसे
बडा या छोटा कर देते लोग

मेरे लाख खीजने डॉटने पर भी
नहीं भूलता वो सवाल करना
बडे लोग सवाल नहीं करते
कई बार वे सवाल करने लायक भी नहीं बचते
बच्चों के मन में उठते रहें सवाल
खुले रहें सीखने सिखाने के दरवाजे।
     

गणेशपुर की स्त्रियॉ
 

इन दिनों इन्हें खेतों में होना चाहिए था
बिजाड़ की गुडाई करते
मेड. बनाते
खरपतवार उखाडते
रोपाई की तैयारी में
इन सबसे व्यस्त दिनों में
पुष्पा दी की एक आवाज पर
दौडी चली आती हैं सब
गॉव का हर घर यथा सार्मथ्य मदद करता है
सडक किनारे सुलगाती हैं चूल्हा
कुशल हाथ गूंथते हैं आटा
फटाफट सिंकती हैं रोटियां
आलू प्याज की रसदार सब्जी 
कभी पूरी, कभी खिचडी
स्वाद भूख में था
मिठास बनाने वालियों के हाथों में
चुपचाप सुन लेती हैं
थके हारे यात्रियों की आपबीती
सप्रेम खिलाती हैं जो बन पडा
उनका बैग उठाए जाती हैं दूर तक छोडने
बदले में पाती हैं आशीष
धमकाती हैं बदमाश ड्राइवरों ,खच्चर वालों को
मन तो बहुतों का किया होगा
पर सब काम छोड
मुसीबत में फंसे लोगों के लिए
सडक पर चूल्हा जलाने का साहस
हर किसी के बस की बात नहीं
अजब गजब हैं गणेशपुर की स्त्रियां
अजब गजब है उनकी पुष्पा दी।


(इस वर्ष 16-17 जून को उत्तराखंड में आयी भयंकर आपदा के दौरान उत्तरकाशी के गणेशपुर की स्त्रियों ने 8-10 दिनों तक वहॉ से गुजरने वाले यात्रियों को भोजन कराया व अन्य मदद की)




प्रकृति बिना मनुष्य
 

नदी तब भी थी
जब कोई उसे नदी कहने वाला न था
पहाड तब भी थे
हिमालय भले ही इतना ऊॅचा न रहा हो
ना हों समुद्र में इतने जीव

नदी पहाड  हिमालय समुद्र
तब भी रहेंगे
जब नहीं रहेंगे इन्हें पुकारने वाले
इन पर गीत लिखने वाले
इनसे रोटी उगाने वाले

नदी, पहाड़, हिमालय, समुद्र
मनुष्य के बिना भी
नदी, पहाड, हिमालय, समुद्र हैं
इनके बिना मनुष्य, मनुष्य नहीं।
 

बड़ी होती बेटी
 

मॉ कहना चाहती है
खूब खेलो कूदो दौडो भागो
पर मॉ कहती है
गली में मत जाना
रात हाने से पहले लौट आना

मॉ कहना चाहती है
खूब हॅसो खिलखिलाओ
खुश रहो, मस्त रहो
पर मॉ कहती है
लडकियों को इतनी जोर से नहीं हॅसना चाहिए
राह चलते ज्यादा बातें नहीं करनी चाहिए

मॉ कहना चाहती है
कोई बात नहीं
एक बार और कोशिश करो
गलतियॉ सीखने की सीढियॉ हैं
पर मॉ कहती है
क्या होगा तेरा
एक भी काम ठीक से नहीं कर सकती
और बॉह खींचकर चाय के बर्तन धोने भेजती है

मॉ कहना चाहती है
कितनी प्यारी लग रही हो
इसे, इस तरह से पहनो
ऐसे नहीं, ऐसे करो
प्यार से माथा चूमना चाहती है
पर मॉ कहती है
ये बन ठन के कहॉ जा रही हो
फैशनेबल लडकियों को अच्छा नहीं माना जाता
ये सब अपने घर जा के करना।

           
मोरी

‘‘दो सौ रूपये से
एक रूपये भी कम-ज्यादा नहीं’’
कहा उसने
वह सोलह-सत्रह वर्ष की लड़की
जिसे अपलक देखा जा सके
शताब्दियों तक
लेना है कि नहीं?
कांसे की थाली सी बजी उसकी हँसी

दो सौ रूपये के सौ अखरोट रखकर
और 15-20 दाने डाल दिए उसने
घर पर लेने आए हो तो
हमारी ओर से बच्चों के लिए

लौटते समय
नदी के विस्तृत पाट देखकर
सोचती हूँ
इन्हीं की तरह हैं
यहाँ की लड़कियां
सुन्दर जीवंत स्वनिर्मित।

(मोरी, उत्तरकाशी जिले का दूरस्थ, बेहद दुर्गम ब्लॉक)



मिठास

बहुत कुछ बताया उसने
कल गाँव में हुए
थौलू के बारे में
कैसे देवता औतारे
रासौ करने में कौन थी सबसे आगे
किसके घर आए कितने मेहमान
चूड़ी-बिन्दी, खिलौने-चर्खी, खाना खिलाना
पर जो चमक
दस रूपये के दो आमों
के बारे में बताते हुए
उसकी आंखों में थी
उसकी मिठास के आगे
सब फीका पड़ गया।

(थौलू-स्थानीय मेला, रासौ-पहाड़ी सामूहिक नृत्य)


नदी का उड़ना

एक नदी
उड़ी उड़ी उड़ी
उसके साथ उड़े
मछलियां, घोंघे, सांप, कछुए, कमल, मगरमच्छ

नदी को उड़ता देख
चिड़ियाएं चौंकी
बादल मुस्कुराए
इन्द्रधनुष ठिठका
सूरज चमका.........और तेज

नदी देर..........शाम लौटी
थकी-थकी नदी
रात भर चुपचाप बहती रही
सुबह के अखबार में
नदी के उड़ने की खबर पढ़कर
हुए सब हैरान।

ड्राइवर
 

मत चलाओ
इतनी तेज गाड़ी
ये पहाड़ी रास्ते
गहरी घाटियों में बहती तेज नदी
जंगल जले हुए
लुढ़क सकता कोई पत्थर
जला पेड़
मोड़ पर अचानक

तेज बरसात से
बारूदी बिस्फोटों से
चोटिल हैं पहाड़
संभल कर चलो
गाड-गदने अपना
पूरा दम खम दिखा रहे

ड्राइवर
मत बिठाओ
इतनी सवारी
शराब पीकर गाड़ी मत चलाओ
फोन पर बात फिर कर लेना

कुछ दिन पहले
देखा तुम्हें
कॉलेज आते-जाते
कहाँ सीखी ये हवा से बातें करना?

ऐसा भी क्या रोमांच?
जो गैरजिम्मेदार बना दे

मेरे घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं
तुम्हारे घर में कौन-कौन हैं?




आओ बातें करें

सबके पास होंगे मोबाइल
खूब बातें होंगी
प्रीपेड
पोस्टपेड

आस-पास के दस घरों में
चूल्हा नहीं जला
जानकर मिट जाएगी भूख
बहुत लोग हैं
जो घुटने पेट में घुसा सोए है
जानकर
थम जाएगी ठंड

राजकुमार भी नहीं गया
दस दिनों से स्कूल
सुनकर
आंसू पोंछ लेगा
रोता सचिन
नाते-रिश्तेदारों की कुशल

पहुंचेगी मिनटों में

वे सबको अपनी बात कहने का
अवसर देना चाहते हैं।

पीढ़ी दर पीढ़ी

इतने वर्षों के साथ में
कभी ख्याल भी न आया
जब देखी कोई सिकुड़न कहीं
खुल कर बात की सबसे प्रेम से
डरा धमकाकर
सुधारा
जो भी बिगड़ता दिखा आसपास
फिर भी
कहां चूक हो गयी जो
उसका विश्वास डगमगाया
नहीं बुलाया
अपने भाई की शादी में
गुपचुप किया सब
फिर नहीं आया कई दिन स्कूल
इस तरह
एक और पीढ़ी पुख्ता हुई जाति।

 

सम्पर्क-

रेखा चमाली
जोशियाडा, उत्तरकाशी
उत्तराखण्ड 249193
        

मोबाईल- 9411576387


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स विजेन्द्र जी की हैं) 

टिप्पणियाँ

  1. चौंका देने वाली है ..नदी का उड़ना..कविता। अन्य कविताएं भी बेहतरीन हैं ....बधाई।

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  2. रेखा चमोली की कविताओं का एक करीबी भूगोल मुझे हमेशा आकर्षित करता है और यह कहना ज्यादा ठीक लग रहा है कि वह रेखा की कविताओं में वह भूगोल सिर्फ भूगौलिक विशेषताओं के साथ ही नहीं होता बल्कि उस खास भूगोल का जन जीवन भरपूर होता है़

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  3. ''बड़े लोग सवाल नहीं करते ''

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  4. नदी का उड़ना अच्छी लगी। इस कविता के लिए रेखा जी को बधाई

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  5. अति सुन्दर सूक्ष्म संवेदनाओं की ताज़ी कवितायें पढ़ीं ...नदी का उड़ना और पहाड़ , जंगल रह सकते हैं मनुष्य के बिना मनुष्य इनके बिना नहीं.......

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  6. बेहतरीन और ताजगी से भरी कवितायेँ

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