राज कुमार राकेश के कहानी संग्रह 'एडवांस स्टडी' पर उमा शंकर सिंह परमार की समीक्षा



बेहतर भविष्य के नाम पर पूँजीवाद और उदारवाद का जो तिलिस्म हमारे देश में खड़ा किया गया अब उसकी पोल खुलने लगी है. इसके परिणामस्वरूप किसान आत्महत्याओं की तरफ अग्रसर हुए हैं. कर्मचारियों की नौकरियाँ खतरे में है और बेरोजगारों को रोजगार देने के नाम पर भयावह शोषण किया जा रहा है. साहित्यकारों ने वास्तविकता की जमीन पर खड़े हो कर इसका सशक्त विरोध कर अपनी जनपक्षधरता स्पष्ट कर दी है. राजकुमार राकेश ऐसी ही प्रतिबद्धता वाले कहानीकार हैं जो अपनी रचनाओं के मार्फत आम जनता के साथ खड़े हैं. अभी हाल ही में राकेश का एक नया कहानी संग्रह 'एडवांस स्टडी' प्रकाशित हुआ है. इस पर पहली बार के लिए एक समीक्षा लिखी है आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ने. तो आइए पढ़ते हैं यह समीक्षा.
           
एडवांस स्टडी - नव उदारवाद-प्रतिरोध और प्रयोग

उमा शंकर सिंह परमार
 
अमरीकी साम्राज्यवाद का पुराना स्वरूप जो कभी शक्ति के सहारे विकासशील देशों को बाजार की तरह प्रयोग करता था आज वही अमरीकी साम्राज्यवाद आर्थिक साम्राज्यवाद का स्वरूप धारण कर चुका है। विश्व पूँजी के इसी आर्थिक साम्राज्यवाद को नवउदारवाद कहा जाता है। इस नवउदारवाद को भारतीय बाजार में खड़ा करने के लिए भारतीय पूँजीपतियों व सरकारों ने विश्व पूँजी के समक्ष घुटने टेकते हुए वर्ष-1991 में समाजवादी समाज”  की अवधारणा को धता बताते हुए अपरिमित पूँजीनिवेश का रास्ता अपना लिया। इस नई व्यवस्था ने आते ही हमारे देश के वर्गीय ढ़ाचें में असंतुलन उत्पन्न कर दिया एवं मुक्ति के विकल्पों की खोज में बढ़ रही जनता के कदमों को बांध दिया। किसान, मजदूर, व्यापारी, लघु सीमान्त उत्पादक, कामगार वर्ग की अवस्था बद् से बद्तर होती जा रही है। छोटे उद्योगों के विनाश से बेरोजगारों की फौज अनवरत बढ़ने लगी है, यही कारण है कि नवउदारवादी व्यवस्था के साथ ही अपराधीकरण का ग्राफ भी बढ़ा है। इस व्यवस्था ने केवल वर्गीय असंतुलन ही नही अपितु प्रतिरोध की क्षमता का भी ह्रास किया है। जनता को यह समझाने की कोशिश की गयी कि लोकतन्त्र की सुरक्षा एवं रक्षा विश्व पूँजी के संरक्षण में ही निहित है, विश्व पूँजी को दर-किनार करने का अर्थ है लोकतन्त्र और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होना। क्योंकि स़त्ता और पूँजी के आपसी गठजोड ने बाजारवाद को भारतीय नैतिकता व अनिवार्यता घोषित करने का झूठा प्रचार करने में कोई कसर नही छोड़ी है। इस कुप्रचार ने किसानों और मजदूरों की राजनैतिक ताकत का अन्त किया है, जिसका परिणाम यह निकला कि वर्गीय प्रतिरोध खत्म होता गया और वर्गीय असंतुलन बढ़ता गया, जिसका दर्दनाक पहलू आज हम सबके सामने उपस्थित है। 

      भारतीय समाज में नवउदारवादी व्यवस्था का पहला प्रभाव वर्गीय चेतना के अंत के रूप में आया एवं दूसरा प्रभाव अलगाव के स्वरूप में आया। अलगाव के फलस्वरूप पारिवारिक, वैयक्तिक, सामाजिक चरित्र में भयंकर गिरावट देखी जा रही है, इन दोनों प्रभावों के कारण नैतिकता के सन्दर्भ में सामूहिक नजरिया भी बदल गया है, मानवीय संवेदना, दया, करूणा, सहानुभूति जैसे भारतीय संस्कार लुप्त होकर फायदा, मुनाफा, ब्याज जैसी अवधारणाओं के समक्ष बौने हो चुके है। व्यक्ति एक वस्तु है। अतः वह अकेला है। दूसरे व्यक्तियों से उसके संबंधों का निर्धारण प्रेम व रिश्ते नही करते हैं, बाजार करता है। व्यक्ति की चेतना को जकड़ कर बैठा हुआ बाजारवाद घुटन, संत्रास, पीड़ा, मृत्युबोध, आत्म हनन जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रहा है, यही अलगाव का त्रासदीपूर्ण सच है। 

                पूँजीवाद का यह नया चेहरा भूमण्डलीकरण जब से अस्तित्व में आया है तब से ही प्रगतिशील जनवादी लेखकों/कवियों में इसको लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गयी है। विभिन्न साहित्यिक व सांस्कृतिक उपागमों में इसको लेकर जनता के बीच फैली बेचैनी का उल्लेख बार-बार किया गया है, लेकिन पिछले एक दशक से हिन्दी साहित्यकारों में इसको लेकर जबरदस्त आक्रोश देखने में आया है, कारण है नवउदारवाद ने अपना असली विनाशकारी रूप 2001 के बाद और भी स्पष्ट कर दिया है। इस अन्तराल में कई लेखक तो ऐसे रहे जिन्होनें नवउदारवाद के खिलाफ प्रतिरोध के स्वर को ही अपनी रचना धर्मिता घोषित की है। ऐसे लेखकों में साथी राजकुमार राकेश अग्रणी है, इनकी सम्पूर्ण साहित्य यात्रा नवउदारवाद के खिलाफ प्रतिरोध से सनी है। ज्यो-ज्यो समय बढ़ता गया भूमण्लीकरण के प्रतिगामी प्रभाव व्यापक रूप धारण करते गये त्यो-त्यों राजकुमार राकेश का प्रतिरोधात्मक स्वर और मुखरित होता गया। साउथ ब्लाक में गाँधी (2002), निर्वासित प्रेतों की जीवनी (2004), धर्म क्षेत्र (2013) जैसी कृतियों में निरन्तर विकासमान प्रतिरोध का स्वर साफ सुना जा सकता है, लेकिन 2014 में आधार प्रकाशन पंचकुला से प्रकाशित उनका नया कहानी संग्रह एडवांस स्टडी”  नवउदारवाद के खोखले दावों और त्रासदीपूर्ण प्रभावों का काला चिठ्ठा बन गया है। यह उनकी रचनाधर्मिता का उत्कृष्ट उदाहरण है एवं नवउदारवादी व्यवस्था का सांगोपांग अध्ययन है। संग्रह में कुल नौ कहानियाँ हैं। हर एक कहानी अलग-अलग पृष्ठभूमि का कथानक लेकर चलती हैं, कहानियों के चरित्र का गुम्फन परिवेशगत औजारों से इस प्रकार किया गया है कि वे वाद”  का रूप धारण कर लेते है। तमाम प्रकार के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, पारिवारिक द्वन्दों से टकराता हुआ चरित्र अन्तोगत्वा भूमण्डलीकरण के महायज्ञ में आहूति की तरह स्वाहा हो जाता है। चरित्र के इस संस्कार में राजकुमार राकेश कल्पना, फन्टेसी, मिथक जैसे साहित्यिक उपागमों को कथानक में फेटकर यथार्थ का सबसे प्रभावी चित्र प्रस्तुत करते हैं। एडवांस स्टडी की कहानियाँ भूमण्डलीकरण के दोनों प्रभावों का साथ लेकर चलती है, जैसा मैने बताया है कि भूमण्डलीकरण का प्रभाव हमारे वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में दो प्रकार से आया है एक अलगाव और दूसरा प्रतिरोधहीनता। राजकुमार राकेश इन दानों प्रभावों को अपना कथ्य बनाते है। कथ्य के अनुरूप चरित्र का संस्कार करते है और फिर चरित्र को यथार्थ का कटु उपभोक्ता बनाते हुए भूमण्डीलकरण का प्रतिक्रियावादी, फांसीवादी चरित्र उजागर कर देते है।

                इन कहानियों में राजकुमार राकेश ने यह दिखाने का प्रयास किया है कि उत्पादक वर्ग अपना चरित्र नहीं बदलना चाहता। वह साधनों का परिवर्तन तो कर लेता है पर चरित्र को अपरिवर्तित रखना चाहता है। नये संबंधों का परिष्कृत रूप तो उसे नागवार है। वह केवल मुनाफा की कामना करता है। यही मुनाफा बाजार की खोज व बाजार निर्माण का कार्य करता है। उत्पादक वर्ग पहले गाँव फिर कस्बे और फिर पूरा शहर पूरा देश बाजार बना देता है। जब मुनाफाखोरी की लत पड़ जाती है तो उत्पादक वर्ग, उत्पादन संबंधों का विश्वव्यापी आधार देने की कोशिश करता है, सत्ता के साथ पूँजी का गठजोड़ स्थापित होता है, उद्योगों का आधुनकीकरण होता है, मशीनीकरण होता है छोटे-मोटे उद्योग नष्ट हो जाते है एवं तथाकथित विकास के द्वारा विश्वव्यापी उत्पादन होने लगता है। नई आवश्यकतायें सृजित करने के लिए सरकारी प्रचार के साधनों का खुलकर प्रयोग होता है, सरकारे आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बैंक के माध्यम से फाइनेन्स कम्पनियों के माध्यम से सस्ते दरों पर कर्ज देती है, कर्ज लेना इस नवउदारवादी व्यवस्था में मजबूरी नही है, स्टेटस सिम्बल है, कुप्रचारित आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु निम्न मध्यमवर्गीय जनमानस कर्ज के महाजाल में उलझ जाता है और अंत में घुटन, त्रासदी, अलगाव जैसी समस्याओं में बह कर भीषण त्रासदी का शिकार होता है। राजकुमार राकेश नवउदारवादी व्यवस्था का ताना बाना बुनते समय उत्पादक और श्रम के बीच बढ़ते अन्तराल का जिक्र करने से नही चूकते इस कथा प्रक्रिया में वें उन पहलुओं पर भी गौर फरमाते है जिनसे त्रासदी भयावह हो जाती है व प्रतिरोध गैर कानूनी नक्सलवाद बन जाता है। 

                राकेश जी की किस्सागोई का सबसे अच्छा उदाहरण अबू मलंग का कंकाल” लगी। यह कहानी अपनी विशिष्ट शब्द भंगिमा के कारण पाठक को संमोहन में बांध देती है अबू मलंग उदारवादी विश्व व्यवस्था में खुद को न्यौछावर कर दिया है उसका पुत्र दास कबीर पीढ़ी दर पीढ़ी वर्गीय उत्पीड़न का प्रतीक है। मै नामक पात्र जिसे लेखक से जोड कर देखा जा सकता है वह समय का सच्चा अन्वेषक बनकर इस कहानी में आया है। अबू मलंग के कंकाल की खोज पूरी व्यवस्था का पोस्टमार्टम है। यह पोस्टमार्टम सिद्ध कर देता है कि बाजारवाद और मुनाफाखोरी को जब राजनैतिक आश्रय उपलब्ध हो जाता है तब लोकतन्त्र फासीवाद से भी बद्तर हो जाता है कहानी का सबसे प्रभावकारी दृश्य डाक बगले की मीटिंग और अय्यासी का दृश्य है। जिसमें नकाब पहने हुए ठेकेदार, अधिकारी, पंडित, पत्रकार सबके सब इस व्यवस्था को चूस रहे है, यह फन्टेसीमय चित्र पूरी कहानी को बहुआयामी बना देता है। जिस प्रकार अन्धेरे में” कविता में रात्रिकालीन जुलूस निकलता है जिसमें समाज का अपराधी बुर्जुवा सफेद पोसाकों में लैस अपना-अपना मन्तव्य घोषित कर देते है, इसी प्रकार इस कहानी में रात्र को डाक बगले का दृश्य सत्ता और बुर्जुवा के व्यापक गठजोड़ को व्यक्त करता है। लेखक ने इस कहानी के द्वारा शोषण और उत्पीड़न के राजनैतिक समाजशास्त्र का पूरा खाका खीच दिया है। 

                भूमण्डलीकरण की आग में जलकर खांक हो चुकी मानवीय संवेदनाओं और टूटने की कगार पर खड़ी रिश्तों की बुनियादे नवउदारवादी व्यवस्था का असली सच है। यह बिखराव और टूटन इस व्यवस्था का निष्कर्ष है, इस संबंध में राजकुमार राकेश की दूसरी कहानी सितारो पार” उल्लेखनीय है। इस कहानी में कथाकार ने अवसाद और अलगाव का अमानवीय पहलू प्रस्तुत किया है। रिश्ते अमूमन विश्वास और धर्म के सुरक्षा घेरे में बधे होते है इसी बंधन में सामाजिक संरचना की बुनियाद टिकी होती है स्वाभाविक है जब रिश्ते टूटेगे तो सामाजिक संरचना भी टूटेगी कहानी में सिद्ध किया गया है कि नवउदारवादी आर्थिक प्रभावों ने धर्म और आस्था को भी बाजार के रहम पर छोड़ दिया है। फलतः धर्म और आस्था की बुनियाद पर बनने वाले रिश्ते भी बाजार के उतार-चढ़ाव से प्रभावित होने लगे है। बाजार की चकाचौध आवश्यकता उत्पन्न करती है, इस आवश्यकता के कारण गैर जरूरी वस्तु भी जरूरी हो जाती है, सरकारे और उत्पादक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर्ज को भी एक आवश्यकता बना देते है। मनुष्य आवश्यकताओं के जाल में उलझ कर खुद एक वस्तु बन जाता है वह बिकने को तत्पर हो जाता है। कहानी में डिंगा सिंह सरीन ऐसा ही बाजारग्रस्त चरित्र है। जिसकी पत्नी सुलभा के पड़ोसी व्यापारी सर्वेकर के साथ अवैध संबंध है, डिंगा सिंह का अवसाद और टूटन तब और बढ़ जाता है जब उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी सुलभा फ्रिज और कूलर इत्यादि की ऐसो आराम के चाहत में अपना चरित्र बेच चुकी है। जालान  मोटर्स के मालिक की मौत का रहस्य इस व्यवस्था का सबसे घिनौना रूप है, उसकी मौत सबित कर देती है कि बाजार में देह और वस्तु का कोई अन्तर नही है, भोग की उद्दाम लालसा लिए हुए जालान की मौत यही बाजार करती है, डिंगा सिंह का अवसाद एवं जालान मोटर्स मालिक की मौत सिद्ध कर देते है कि जीवन और मौत ईश्वरीय कारण से नही बाजार के उतार-चढ़ाव से आते है। पूँजीवादी व्यवस्था के मूल चरित्र अलगाव का इससे उम्दा वर्णन शायद ही कही मिले।

 (चित्र : कहानीकार राजकुमार राकेश)
               
 साथी राजकुमार राकेश के कथा साहित्य में प्रयोग धर्मिता मुख्य औजार है, उनकी हर एक कहानी अपनी पूर्ववर्ती कहानी से अलग कथासूत्र एवं गठन लेकर उपस्थित होती है, कही पर इतिहास का रूपक द्वारा अन्वेषण है तो कहीं अवान्तर कथाओं के माध्यम से एक लम्बी कहानी की बुनावट है। नवउदारवादी व्यवस्था का भारत में पदार्पण होते ही समाजवाद व साम्यवाद जैसी विचारधाराओं का हाशिये पर चला जाना कैसे संभव हुआ इस प्रश्न का उत्तर उन्होनें अपनी अनूठी कहानी सपने समाज और पूँजी”  में बड़ी शिद्दत के साथ दिखाया है। भारत के आर्थिक एवं राजनैतिक परिवर्तनों की गहन पड़ताल करती हुई यह कहानी व्यवस्था द्वारा किये गये दावों की असलियत भी खोलकर रख देती है। मिस्टर दीपांकर मुखोपध्याय एक प्रतीकात्मक चरित्र है, वह सम्पूर्ण जनता के प्रतीक बनकर आये है, उनका पहला प्रेम राष्ट्रीकरण एवं समाजवादी समाज के नारों के बीच पनपा पर इजहार न कर पाने के कारण वे परवान नही चढ़ सका, इसी बीच बंगाल में साम्यवादी शासन आया वैयक्तिक नफा-नुकसान जैसी बाते खत्म हुई सामूहिक लाभ, सामूहिक हानि का नारा दिया गया, नौकरी से निकाले जाने का खतरा खत्म हो गया तभी दीपांकर का विवाह मालिनी से सम्पन्न हुआ। मालिनी साम्यवाद का प्रतीक है, दीपांकर का मालिनी से मोह भंग क्या हुआ देश में कट्टरतावाद और साम्प्रदायिकता का झंण्डा बुलंद हो गया। दीपांकर को भी जेल जाना पड़ा, नौकरी से हाथ धोना पड़ा। बीच-बीच में समाजवाद की प्रतीक सांत्वना दिलासा देती रही। दीपांकर बाबू थक हारकर आत्महत्या की ओर प्रवृत्त हुए तो उनके जीवन में मिसेज अरगडे का आगमन हुआ। मिसेज अरगडे और दीपांकर बाबू का मिलना ही नवउदारवाद का आगमन है। विदेशी कम्पनियों के स्वागत में देशी कम्पनिया बंद हो गयी, जनता बेरोजगार होकर इधर-उधर पलायन करने लगी ,विज्ञापनों में फीलगुड का नारा आता रहा, जनता गरीबी, लाचारी से मरती रही और अंत में सांत्वना जो कि समाजवाद का प्रतीक है पूँजीवाद के हाथों खुद को सौपकर दीपांकर पर बलात्कार का मुकदमा कर देती है। इस कहानी में लेखक ने राजनैतिक विचारधाराओं के अवमूल्यन की स्पष्ट व्याख्या की है सबसे बड़ा क्षय तो सांत्वना का हुआ जो समाजवाद की प्रतीक है, वह आज पूँजीवाद के हाथों साम्यवाद के खिलाफ एक हथियार बन चुकी है। समाजवाद आज जनता की पक्षधरता नही कर रहा वह पूँजीवाद की पक्षधरता कर रहा है। राजकुमार राकेश की इस कहानी का अंतिम सन्देश यह है कि साम्यवाद के प्रति एक निष्ठता ही हमारे सपनों को सार्थक कर सकता है। 

                साम्राज्यवाद के बदले हुए स्वरूप में ऊपरी आकर्षण का आभाव नही है सबकुछ अच्छा है सब कुछ विकासपूर्ण है ऐसा ही प्रतीत होता है। लगता है जीवन स्तर सुधर गया है, विकास का विज्ञापन और रूपहले पर्दे की दुनिया दोनों नई बाजारी संस्कृति के पुरोधा बनकर उभरे है। राजकुमार राकेश ने रूपहले पर्दे की दुनिया को माध्यम बनाकर अपनी कहानी विलाप” में संत्रास, घुटन एवं अमानवीय परिवेश का यथार्थ परक चित्र उपस्थित किया है। इस कथा के द्वारा वह विश्व पूँजी द्वारा निर्मित नई वर्ग व्यवस्था का संकेत भी कर देते है। सुरभि जामलपुर नामक एक साधारण गाँव की नवयुवती है वह उच्च जीवन एवं नामवर हस्ती बनने की अदंम्य इच्छा रखती है यही इच्छा उसे गाँव छोडने को मजबूर कर देती है वह बम्बई जाती है एक संपादक के यहाँ नौकरी करती है एवं कई पुरूषों के सम्पर्क में आते -आते अन्ततः वह राकेश भट्ट नामक निर्देशक यहाँ तीन वर्ष के कान्ट्रेक्ट पर अभिनेत्री बन जाती है। वह अभिनेत्री नही एक बधुवा मजदूर है, राकेश भट्ट का भय उसे इस कदर जकड़कर रखता है कि वह अपने माँ और प्रेमी से चाहकर भी नही मिल पाती है। अपने अस्तित्व एवं स्वतन्त्रता की मधुमय अनुभूति के लिए झटपटाती रहती है। यह कहानी गुलामी और बधुंवा मजदूरी को इस नई विश्व व्यवस्था से जोड़कर नये स्वरूप में प्रस्तुत करती है। सुरभि की महत्वाकांक्षाएँ अन्तोगत्वा जलालत की जिन्दगी जीने का बाध्य कर देती हैं यह कहानी इन्सान से मजदूर बनने की नवउदारवादी प्रक्रिया का उम्दा उदाहरण है। 

                इस संग्रह की सबसे आकर्षक कहानी अश्वमेध” है अश्वमेध एक पौराणिक यज्ञ है जिसे राजा विश्वविजय के उपरान्त किया करता था, इस कहानी के माध्यम से राकेश जी ने दिखाया है कि पूँजीवाद ने आज अपना विस्तार कर लिया है। वह सम्पूर्ण संसाधनों का सर्वाधिकार संपन्न स्वामी है और प्रतिरोध हीनता उसके स्वामित्व को बल दे रही है, प्रतिरोध की समाप्ति ही अश्वमेघ है यह पूँजीवाद की विजय है। इस कहानी की कथाभूमि गाँव से लेकर शहर तक फैली है, गाँव की संस्कृति को लेखक ने देव संस्कृति कहा है, शहर की संस्कृति को विकास संस्कृति कहा है देव संस्कृति अन्धविश्वास, कुतर्क, खाप- निर्णय के सहारे प्रतिरोध को खत्म करती है, तो विकास की संस्कृति कानून, पुलिस, प्रशासन के बल पर प्रतिरोध को समाप्त करती है। यह दोनों संस्कृतियाँ पूँजीवाद के दोहरे चेहरे है, लेखक एक स्थान पर कहता है कि बलात्कार, डकैती के खिलाफ खड़े होना आसान है पर देव संस्कृति के विरूद्ध खड़े होना असंभव है। देव संस्कृति सामान्ती पक्ष धरता रखती है तो विकास की संस्कृति बहु राष्ट्रीय निगमों की पक्षधरता करती है। इन दोनों संस्कृतियों का ध्वजावाहक आलमगीर” है, जो सत्ता, धर्म और पूँजी का तिहरा चरित्र है। कैसे गाँव के गाँव उजड़ कर नष्ट हो गये, कैसे शहर की बस्तियाँ उजड़ गई इस उजाड़ में किसका हित साधन हुआ और कौन तडीपार हुआ अश्वमेध कहानी में सब दिखाया गया है। इस कहानी में पूँजी के महायज्ञ में तिल-तिल आहुति बन रही आम जनता की करूण गाथा है। 2008 के बाद ऐसी ही करूण गाथायें ऐसी ही अश्वमेध अक्सर समाचार पत्रों में दिखाई देते रहे। इस कहानी में राकेश ने पूँजी के उत्पीडक चरित्र व साधनों का तर्क संगत उदाहरण प्रस्तुत किया है।

                नवउदारवाद ने केवल बाजार ही व्यापक नही किया अपितु उत्पादन प्रक्रिया का बदलाव भी व्यापक कर लेता है विश्व पूँजी ने विकासशील देशों को कच्चे माल की तरह प्रयोग किया है। विकासशील देशों को आर्थिक रूप से विकलांग करने के लिए उत्पादक वर्ग किस प्रकार से फर्जीवाड़ा छल, प्रपंच, झूठ का सहारा लेता है इस तथ्य का खुलासा राजकुमार राकेश ने अपनी कहानी दादागिरी”  में जबरदस्त ढंग से किया है। यह कहानी ऊपरी तौर पर देखने में भोपाल गैस त्रासदी से उत्प्रेरित लगती है पर लेखक ने सीधे तौर पर इस भ्रम का खण्डन किया है, कुछ भी हो यह कहानी भूमण्डलीकरण के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले विनाशकारी त्रासदियों का दर्दनाक खाका खीचतीं है। रामनाथ कहानी का केन्द्रीय पात्र है वह आम भारतीय की तरह अपनी जमीन और संस्कारों को सहेज कर रखना चाहता है, लेकिन पूँजीपतियों के एजेन्ट के रूप में उसकी पत्नी और बेटा जमीन को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को नीलाम कर देते है। रामनाथ की सौतेली माँ आन्दोलन करती है लेकिन यह आन्दोलन उसकी मौत के साथ ही दम तोड़ देता है। कारखाना खुलता है। इस कहानी का सबसे बडा टर्निंग प्वाइन्ट मिल में जहरीली गैस का रिसाव है, जिसके कारण हजारों लोग मारे जाते है, कम्पनी मालिक और उसके एजेन्ट विदेश भाग जाते है, बेचारा रामनाथ इस सम्पूर्ण त्रासदी का द्वोष ढोते हुए जेल भेज दिया जाता है, जो व्यक्ति व्यवस्था के प्रतिरोध में है उसी को व्यवस्था का सूत्राधार बना दिया जाता है। न्याय और सत्ता के इसी बुर्जुवा चरित्र को राकेश जी ने अपनी कहानी दादागिरी में दिखाया है। 

                सामान्यतया व्यक्ति की सोच का निर्धारण सामाजिक स्तरों पर व्यक्ति के निजी संघर्ष से होता है, अनुभव व अनुभवहीनता जैसे शब्द इसी आनुभविक संघर्षों के अन्तर को दिखाते है। जनरेशन गैप एक सामान्य अनिवार्यता है। वृद्धों का अतीत के प्रति मोह और युवाओं का भविष्य के प्रति उत्साही होना इसी जनरेशन गैप का नतीजा है। हमारे परम्परागत पारिवारिक ढ़ाचे में यह गैप रिश्तों के दायरे से बाहर नही जाता था,  वृद्धों का सम्मान एवं उनके अनुभव का सम्मान करने की आदत सर्वदा से रही है, नई विश्व व्यवस्था ने जनरेशन गैप को खतरनाक अवस्था तक ला दिया है। एक बेटा अपने पिता की हर सोच को अपने विकास के मार्ग में खतरा समझता है यही कारण है कि हमारा पारिवारिक ढ़ाचा छिन्न-भिन्न होने के साथ-साथ सामाजिक ढ़ाचा भी ध्वस्त होता जा रहा है। राजकुमार राकेश की कहानी एडवांस स्टडी”  इसी बिखराव को प्रस्तुत करती है। प्रेमशंकर का अदम्य उत्साह व कुछ नया कर गुजरने की भावना उसके बेटा दयाशंकर द्वारा गैर वाजिब आरोप युक्त जासूसी टूटे रिश्तों की एक बानगी भर है। दयाशंकर द्वारा मंगला के संबंधों पर खोज अपने पिता पर चारित्रिक सन्देह ही नही वरन गिरती हुई नैतिक दीवारों का प्रतिनिधित्व करता है। त्रासदी, पीडा, घुटन, अस्त्विबोध को साथ लेकर चलती यह कहानी प्रयोग धर्मिता का बढ़िया उदाहरण है।

                व्यंग्यपरकता और विभिन्न कथा शैलियों के लिहाज से यदि देखा जाय तो इस संग्रह की सबसे उम्दा कहानी हत्या”  है। इस कहानी की कथा भूमि बदलते गांवों की दास्तान व सरकारी ऑफिसों में व्याप्त भ्रष्टाचार का खुलासा करती है। सरकारी ऑफिसों की उबाऊ प्रक्रिया व जनप्रतिनिधियों का भ्रष्टाचार जरूरतमंद व्यक्तियों के लिए कैसे मौत का ताना बाना बुन देता है हत्या कहानी में सफलतापूर्वक दिखाया गया है। जगबीर सिंह दंडी एक रिटायर्ड बाबू है, वह सेवानिवृत्ति के उपरान्त अपने गांव लौटता है गांव का बदला हुआ चरित्र व गांववासियों की स्वार्थपरकता के कारण वह गांव में अपने पैर नही जमा पाता और शिमला वापस लौटने को मजबूर हो जाता है। शिमला भी उसे पराया जैसे प्रातीत होता है, वही लोग जो उसके सहकर्मी थे उसको न पहचानने का ढ़ोग करते है और उसकी पेन्शन जारी करने के लिए रिश्वत लेते है, काम न होने पर जगबीर सिंह डाकू से नेता बने तहसीलदार सिंह के पास जाता है उसे भी दो हजार रू0 रिश्वत देता है, उसका काम नही होता उसकी पेंशन जारी नही होती। पेंशन ऑफिस के चक्कर काटते-काटते उसके प्राण पखेरू उड जाते है। उसकी लाश लावारिस घोषित करके अस्पताल में रख दी जाती है। लेखक उसकी लाश को उसके पुत्रों तक पहुँचाता है वह जानता है कि जगबीर सिंह की मौत अस्वाभाविक है वह मौत के कारणों की खोज करता है, खोज के बाद तीन कथा रूप कारणों के रूप में प्रस्तावित करता है। यह तीनों कथारूप एक दूसरे से अन्तर संबंधित है, ये तीनों कथारूप सम्पूर्ण कहानी में अलग-अलग शैली का आनन्द देते है मै शैली, रिर्पोताज शैली, वसीयतशैली इन शैलियों में लिखे गये ये कथारूप आराम से सिद्ध कर देते है कि जगबीर की मौत आत्म हत्या नही ईश्वरीय कोप नही वरन हत्या है। यह हत्या जगबीर की ही नही हर आम इन्सान को इस हत्या से गुजरना पड़ता है। ऑफिसों में हर रोज ऐसी हत्यायें होती है। जुमलेबाजी और व्यंग श्रीलाल शुक्ल की याद दिला देता है यह कहानी व्यंग्यपरकता के साथ-साथ एक अनूठे कथा गुम्फन का उदाहरण भी है।

                राजकुमार राकेश की 'एडवांस स्टडी' नवउदारवादी व्यवस्था के खिलाफ प्रयोग पूर्ण प्रतिरोध का स्वर है। इसकी प्रयोगधर्मिता मिथक कल्पना फन्टेसी विसंगति, बिड़म्बना, लीजेन्ड इत्यादि अपरूपों को बड़े ही सजग ढंग से यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए तैयार करती है, इन उपागमों से प्रयोगवाद में साहित्य में मध्यम वर्गीय कुंठाओं से युक्त क्रान्ति विरोधी साहित्य लिखा गया। इन्ही उपागमों से राजकुमार राकेश ने नवउदारवादी व्यवस्था के खिलाफ समाज के अन्तस में सुलग रहे प्रतिरोध के स्वर को उकेरा है। एडवांस स्टडी पढ़ने के बाद फरवरी 2014 में इलाहाबाद साझा संस्कृति संगम में घोषित घोषणा पत्र स्मरण हो आता है, यदि आर्थिक उदारीकरण के फलस्वरूप नई उत्पादन प्रक्रियाओं व इनके फलस्वरूप निर्मित नये वर्गीय संबंधों व विलुप्त होती क्रान्ति चेतना का अध्ययन करना है तो एडवांस स्टडी से बेहतर कोई पुस्तक नही है, यह पुस्तक भूमण्डलीकरण का श्वेत पत्र है।




सम्पर्क 

उमाशंकर सिंह परमार

जिला सचिव, जनवादी लेखक संघ बाँदा

मोबाइल नं0-9838610776

    

टिप्पणियाँ

  1. एक बहुत अच्छी किताब की हर दृष्टि से स्तरीय समीक्षा की है आचार्य जी ने, बधाई !

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