रमेश यादव



जन्मः 5 जून,1973 गांवः महदीउल,ज़िला तब बनारस,अब चंदौली,उत्तर प्रदेश। 
स्कूल शिक्षा: गाँव में ही जहाँ अब खिचड़ी खिलायी जा रही, तब न बैठने का टाट होता न भवन। खुला आसमान ही अपना सब कुछ रहा। अभाव और  अव्यवस्था से परिपूर्ण। 
शिक्षाः महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी से 2005 में 'बिहार की हिन्दी पत्रकारिता और  नक्सलवादी आन्दोलन' पर पत्रकारिता एवं जनसंचार विषय में पी-एच.डी. 
आन्दोलन: 1994 से लगायत 2000 तक रैडिकल वाम छात्र आन्दोलन, पूर्वांचल में खेतिहार-किसान, मज़दूर, महिला आन्दोलन के साथ ही साझी संस्कृति और साझी विरासत के अभियान में सक्रिय भागीदारी। 
पत्रकारिता: वाराणसी में ही 2000 से 2006 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता यानी क़लम की मज़दूरी। 
अध्यापन: 2006 से पत्रकारिता में अध्यापन। 
लेखन : पत्रकारिता में दाख़िल होने के साथ ही समाज, राजनीति, साहित्य के अलावा देश-दुनिया के समसामयिक विषयों और मसलों पर निरंतर लेखन। 
फ़िलहाल: पत्रकारिता एवं नवीन मीडिया अध्याय विद्यापीठ, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय,नई दिल्ली में सहायक प्रोफ़ेसर।


हाल ही में हमारे देश का अग्रणी विश्वविद्यालय जिसे हम प्यार से जे. एन. यू कहते हैं, एक लड़की पर उसके तथाकथित प्रेमी के हमले से अभी हाल ही में चर्चा में रहा।  लेकिन जे. एन. यू. की संस्कृति तो बिलकुल अलग रही है। यहाँ वह खुलापन है जो आम तौर पर हमारे भारतीय परिवेश में नदारद है। रमेश यादव ने कुछ दिन जे. एन. यू. में बिताये हैं और अपनी यादों को डायरी के सहारे लिपिबद्ध किया है। तो आईये हम भी रमेश की डायरी के पन्ने खोल कर देखते हैं कि उन्होंने जे. एन. यू. में कैसा महसूस किया था। 

 
आज तबीयत न खयालों से बहल पायेगी...

रमेश यादव
5 अगस्त,2013,नई दिल्ली.

हाल ही में घटी घटना के बाद जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय चर्चा में है. सर्वाधिक चर्चा मूल्यहीन,सिद्धांत हीन,आदर्श हीन और बाजारपरस्त मीडिया के मोर्चे पर हो रही है.
हर कोई जेएनयू,उसके परिवेश,जीवन मूल्य,संस्कृति और सरोकार को प्याज की तरह छिल कर देख रहा है.
15 फरवरी,2008 को एक मित्र के साथ,जेएनयू जाना हुआ.कुछ महीने बाद हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रेम करने वालों के खिलाफ कातिलाना घटनाएँ घटीं.
जीवन में पहली बार ‘कोलाज़’ नाम से ब्लॉग बनाया और 5 अगस्त,2009 को एक लेख पोस्ट किया.आज उसे बिना किसी कांट-छांट के पुनः पोस्ट कर रहा हूँ.

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कोलाज 1
5 अगस्त, 2009

दोस्तों !
बहुत दिनों से कुछ खास नहीं लिखा.लगता है,इन दिनों जिन्दगी,मुझसे जितना ले रही है, उतना वापस नहीं दे रही है.लगता है, हमारे पास साझा करने के लिए कुछ नहीं है.जो है,वह सिर्फ ‘शब्द’ और ‘विचार’ हैं। इनको ‘कोलाज’ बना कर आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ.काम का दबाव इतना है कि व्यवस्थित लेखन व शब्दों को प्रवाह नहीं दे पा रहा हूँ.इस पर आप सभी की तारीफ नहीं आलोचना आमंत्रित करता हूँ।


खूंनी पंचायतें


बात जुलाई, 2009 के अंतिम सप्ताह की है.हरियाणा के कैथल जिले के सिंहवाला गांव में पुलिस की मौजूदगी में,वेद पाल नाम के युवक को कत्ल करके उसके शव को चौराहे पर फेंक दिया गया। वेद प्रकाश हाई कोर्ट के आदेश पर मिली सुरक्षा के साथ अपनी पत्नी सोनिया को लेने उसके गांव गया था.

सर्वे-आंकड़े बताते हैं कि भारत में एक साल में कम से कम 650 लड़के-लड़कियों  को सम्मान (ऑनर कीलिंग) के नाम पर मार दिया जाता है और इसमें 90 फीसदी मामले हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के होते हैं.

यहां खाप पंचायतें इतनी असरदार हैं कि उनके आगे प्रदेश की सरकारें और प्रशासन घूटने टेक देता है.जाहिर है, शासन के अधीन प्रशासन होता है.शासन सरकारें चलाया करतीं हैं.
सरकार में आने के लिए वोट चाहिए होता है.वोट जनता देती है.जनता की ही पसंद खाप पंचायतें होती हैं.यहीं पंचायतें समीकरण बनाती-बिगाड़ती हैं.जाहिर है,कौन सरकार बराबर सत्ता में नहीं रहना चाहेगी.

यदि सत्ता में बने रहना है तो बनी बनायी सामाजिक व्यवस्था को कौन चुनौती देना चाहेगा.इनका पोषण ही सत्ता का स्वाद चखा सकता है.इसी का नतीजा है कि न्यायिक और जनवादी होने की वजाय पंचायते खूनीं साबित हो रहीं हैं और सरकारें मूकदर्शक बनी हुई हैं.

भारत और अमेरिका


कितना अन्तर है. भारत और अमेरिका में.इस घटना से आप अंदाजा लगाइए.  बात 3 अगस्त, 2009 की है.अमेरीका के एक शहर में ज्यूरी ने एक माता-पिता को इस बात के लिए 25 साल कारावास की सजा सुनाई कि वे अपने बीमार  बेटी का इलाज कराने की बजाय उसके चारों तरफ इकठ्ठा होकर ठीक होने के लिए प्रार्थना कर रहे थे.अंततः बेटी की मौत हो गयी.
ज्यूरी के सामने पिता का तर्क था कि यदि मैं ईश्वर की प्रार्थना करने की बजाय बेटी को डाक्टर के पास ले जाता तो इसका मतलब यह होता कि मैं डाक्टर को ईश्वर से बड़ा स्थान दे रहा हूँ.
काश !
हमारे यहां की न्याय व्यवस्था भी इतनी ही सक्रिय होती...?

शहर और गांव

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अजीब विडंबना है.अमिताभ बच्चन के साथ,बहू ऐश्वर्या राय पर्दे पर नाच सकती हैं,अब भी गांव की बहुएं,ससुर-भसुर के सामने एक हाथ का घूंघट लटका कर ही आती हैं.

खुले रैम्प पर अक्षय कुमार की पत्नी ट्विंकल खन्ना पैंट की जीप खोल सकती है.गांव में लोग आज भी रात के अन्धेरे में ही पत्नी के पास जाते हैं.

रिसलिटी शो ‘राखी का स्वयंवर’ का बाजारू नाटक सभी देख चुके हैं.जिन बातों को लोग ‘सच का सामना’  रियलिटी शो में सार्वजनिक तौर पर बता देते हैं उन्हीं बातों को समाज का बहुसंख्यक हिस्सा अपने अन्दर ले कर दुनिया से विदा हो जाता है.

लोग सब कुछ कर सकते हैं,लेकिन प्रेम और प्रेम विवाह को नहीं सह सकते. समाज के मठाधीश और कठमुल्ले,जो धर्म,समाज और संस्कृति की रक्षा के नाम पर अपनी दुकान चलाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार बैठे हैं. उनकी दुकानों पर ताला लगाओ...
भाई।

कानून बनाम समाज

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यहां समलैंगिक संबंधों को न्यायालय कानूनी मान्यता तो दे दिया है.लोग इसे बराबरी की संज्ञा भी दे रहे हैं.देखिए इनके प्रति सामाजिक धारणा बदलने में कितनी सदियां गुजरती हैं.

जातीय पंचायतें,प्रेम विवाहों को सामाजिक मर्यादा के उल्लंघन का हवाला देकर संवैधानिक अधिकारों की खून कर रही हैं.पता नहीं लोग उन सामाजिक परम्पराओं, मूल्यों, आदर्शों, रीति-रीवाजों और वसूलों को क्यों पालते-पोषते हैं,जो उन्हीं के बेटे-बेटियो और बहुओं की बलि चढ़ाता है...?

मठ, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा और चर्च में मत्था टेकने वाले लोग अपने अन्दर के अपराधी मन-मानसिकता को क्यों नहीं बदलते-खत्म करते हैं...? ये लोग अपने भगवान-ईश्वर, अल्लाह, गुरू और ईश से डरते क्यों नहीं ...?

आस्था और यथार्थ

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जब भारतीय गांवों की तरफ वापस लौटता हूँ,तो पता नहीं क्यों एक अजीब सी पीड़ा और ग्लानी सी महसूस होती है.
आखिर बासठ सालों में हमने किस लोकतांत्रिक आजादी का विकास किया और कौन सी प्रगतिशील सामाजिक परिवेश को गढ़ा.
जिसमें पुरूषों और महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं मिल सका.सामाजिक मर्यादा, मूल्य और इज्जत के नाम पर कहीं जातीय तो कहीं धार्मिक तो कहीं गोत्र की पंचायतें न्यायिक बनेने की बजाय,हत्यारी या खूनीं भूमिका निभा रही हैं।

यह समाज इक्कीसवीं सदी में चल रहा है और लोगों की मानसिकता चौदहवीं सदी में काम कर रही है.इंसानीं जानों की तुलना में सामाजिक मूल्य-मर्यादायें भारी पड़ रही हैं।

कितनी अजीब बात है कि लोग पहले बेटे-बेटियों की शादी के लिए पनही (जूता)  घिस देते हैं,फिर बच्चा पैदा करने की वंशानुगत कमजोरी का शिकार हो जाते हैं।
समय से बच्चा न होने की स्थिति में ओझइती-सोखइती, देवी-देवताओं से लगायत इंट-पत्थर तक का मत्था टेकते हैं.मर्दानगी पर सवाल न उठे,इसके लिए जड़ी-बुटी से लगायत अंग्रेजी दवाओं तक का सेवन करते हैं।

यदि तमन्ना लड़के की हो और पता चल गया कि गर्भ में लड़की पल रही है तो उसे गर्भ में ही मार डालने की क्रूरतम करतूत करते हैं.यदि इसे हत्यारी सामाजिक मानसिकता की झलक का नाम दिया जाय तो कैसा लगेगा...?

जरा सोचिए !
लोग कितने उदार हैं कि ईंट-पत्थर को भगवान मान कर पूजते हैं और ‘गंगा’ नदी को ‘मां’ का दर्जा देते हैं.खटिया की पाटी पकड़कर कराहती अपनी ‘मां’ को भले एक ग्लास पानी न देते हों,आस्था इतनी की ‘मृत्यु’ के बाद ‘स्वर्ग’ और ‘पुर्नजन्म’ की अभिलाषा पाले रखते हैं,दर्शन-पूजन करते-फिरते हैं और बात करते हैं ‘वसुधैव कुटुम्बकम’  की।

यह उसी देश की दास्तान है,जहां लोग ‘गाय’ को ‘माता’ कहते हैं और ‘गो’ हत्या का विरोध करते हैं,लड़के की लालसा में लड़कियों की भ्रूण हत्या करते हैं.दहेज के लिए बहुओं को जलाते हैं और गोत्र के बाहर शादी करने वाले जोड़ों को गाजर-मूली की तरह काटते हैं.

फिर भी ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा...’ नारा लगाते हैं,नारे का क्या है ?  लगाते रहिए...।
   

और एक परिवेश यह भी

अंतिमः

बात 15 फरवरी, 2008 की है.
एक शिक्षक के मित्र साथ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कैम्पस में रात के करीब एक बजकर, चौबीस मिनट पर टहल रहे थे.

उनकी पी-एच.डी. तक की शिक्षा यहीं हुई है.हम लोग लाइब्रेरी से होकर आगे बढ़ रहे थे.थोड़ी दूरी पर एक छा़त्रा Wagonr खड़ी करके जंगल वाली पगडंडी से आगे बढ़ी जा रही थी.

उसी रास्ते से हम दोनों,आगे बढ़ रहे थे.रोशनी के नाम पर चांदनी से लिपटी रात थी,जो नींद के आगोश में मंद-मंद गति से ढल रही थी.हवा से बदन में सिहरन पैदा हो रही थी.हमारा मन भय से सिकुड़ रहा था.

मित्र से बोला, कहां चल रहे हैं.इस जंगल में मुझे डर लग रहा है,लेकिन उस नौजवान लड़की को आगे जाते देखकर अपना डर कम होने लगा था.थोड़ी देर में हम एक पत्थरनुमा टिले पर खड़े थे.
पूछा तो मित्र ने बताया कि यह ‘मजनू का टिला’ है. देख लीजिये.पहली बार,यहाँ आये हैं.जेएनयू के ‘शब्दकोश’ में यह जगह ‘लविंग पाइंट’ के नाम से ख्यात है.
यहां वे आते हैं जो ‘लवर’ होते हैं.यहां की एक खूबी है.टिले के आस-पास जितने ‘लवर’ बैठे होते हैं,‘आलिंगनबद्ध’ या फिर किसी ‘गरम मुद्रा’ का ‘आनंद’ ले रहे होते हैं,उनके बीच इतनी प्यारी समझ होती है,कि वे एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप नहीं करते...

ये उस परिसर के परिवेश की संस्कृति है,जिसके खिलाफ आमतौर पर कोई नहीं जाता.हमारे मित्र ‘ओपेन एयर थियेटर’  की तरफ इशारा किये और उसकी खूबियों के बारे में बताये.जहाँ छात्र-छात्राएं खुले आसमान के नीचे कला का आनंद लेते हैं.

इसी समय हमारी एक दोस्त ने फोन किया.हमने पूछा- तुम्हें नींद नहीं आ रही हैं ? इतनी देर रात गए काल... ?

कुछ देर सन्नाटा रहा,फिर अचानक से टूटा, उसने किसी की पंक्ति दुहरायी -

“आज की रात बड़ी शोख,बड़ी नटखट है
आज तो तेरे बिन नींद नहीं आयेगी
आज तो तेरे ही यहां आने का मौसम है
आज तबीयत न खयालों से बहल पायेगी...”

तभी हमने देखा,टीले की तरफ से (संभवतः पूरब दिशा बनता है)
वह नौजवान लड़की,दो अन्य लड़कियों व तीन लड़कों के साथ वापस आ रही थी.
ठीक उसी वक्त हम लोग टीले से नीचे उतर रहे थे.जब हम लोग नर्मदा, ताप्ती छात्रावास और 24/7 से होते गंगा ढाबा (क्रम याद नहीं)  की तरफ जा रहे थे.देखा कि छात्र-छात्राएं समूह बनाकर बैठे,चाय के साथ सिगरेट का कश ले रहे हैं.

चांदनी रात जवानी की दहलीज पार कर,ढलान की तरफ बढ़ रही थी.बेपरवाह लोग,कहीं-कहीं वैचारिक गलबहियां मिलाये बैठे थे...

जब हमने, मित्र से पूछा कि-
क्या यहाँ कमजोर आर्थिक वर्ग और मजबूत आर्थिक आय वाले लड़के-लड़कियां,बिना किसी भेद के एक,दूसरे से पूरी संज़ीदगी के साथ प्यार करते/ करती हैं ?
 बोले !
नहीं.आर्थिक सम्पन्नता का फिसलनवाद यहाँ भी है...?

 गौर करने वाली बात यह है कि यहां सही मायने में लोग अपने अधिकार और आजादी को जानते, पसंद करते और उसकी रक्षा के लिए लड़ते हैं.यहां लड़कों के छात्रावास में,दिन हो या रात कभी भी,जाने के अधिकार को छात्राओं ने लड़कर हासिल किया है और यह कि कई छात्रावास तो आमने-सामने बने हैं.

यहां पढ़ने वाले बताते हैं कि जेएनयू की अपनी खुद की एक संस्कृति है जो देश की संस्कृति से मैच नहीं करती या यूँ कहा जाये,इस संस्कृति का विकास-विस्तार देश के दूसरे हिस्से में नहीं हो सका,अन्य शिक्षण संस्थाओं के कैम्पसों में भी..
   
काश !
ऐसा ही परिवेश पूरे देश का होता, जहां सभी नौजवान सम्पूर्ण आजादी के साथ जीवन का सफर तय करते, बिना कठमुल्लावादी हस्तक्षेप के...
जहां बराबरी का माहौल होता.प्यार और जीवन में बाजारू और भोगवाद का मिलावट न होता.संवेदनाओं और भावनाओं की सौदागिरी न होती और हर कोई एक दूसरे का दोस्त होता...

संपर्क :
डॉ. रमेश यादव
सहायक प्रोफ़ेसर
कमरा संख्या 6,खंड 15,
पत्रकारिता एवं नवीन मीडिया अध्ययन विद्यापीठ,

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय,
मैदान गढ़ी,नई दिल्ली 
 ई-मेल : dryindia@gmail.com, 
मोबाईल -09999446868
     

टिप्पणियाँ

  1. पहले पहल
    'पहली बार'
    ने एक पहल की है.
    सामाजिक परंपरा और आधुनिक (?) होती संस्कृति-संस्कार पर व्यापक संवाद की.
    यहीं पहलकदमी 'पहली बार' को निरंतर पहल जारी रखने के लिए पहल करती है...

    शुभकामनाओं सहित !

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  2. वाह ! बहुत ही बढ़िया अपनी तरह से अलग ही है यह अभिव्यक्ति का प्रस्तुतीकरण ..'खुले आसमान के नीचे कला का आनंद लेते हैं' ..

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