प्रतिबद्ध लोकधर्मी कवि पाब्लो नेरूदा



 

इस वर्ष के जनवरी माह से हमने लोकधर्मी कवियों की परम्परा पर एक श्रृंखला आरम्भ की थी। इसे पहली बार के लिए वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी ने हमारे आग्रह पर लिखा है। इस श्रृंखला की आठवीं कड़ी में प्रस्तुत है प्रख्यात लोकधर्मी कवि पाब्लो नेरुदा पर आलेख। 
 
विजेंद्र       

नेरूदा की एक कविता है, ‘कविता’। वो बताते हैं कि कवि की नियति है उसे अपने उस जन से जोड़ना जिसे क्रूर सामाजिक व्यवस्था ने आहत किया है। जो विद्रोही है। खौफ की वजह से जो भूमिगत हो कर काम करता है। वे भी जो कठिन श्रम करने के बाद जीवित रहते है -यानि हर हालत में कवि को जुड़ना संघर्षधर्मी, विद्रोही तथा श्रमशील उपेक्षित जन से ही है-

और इसलिये कवि ने अपनी नियति
अपने उस बंधु के साथ जोड़ी
जिसे उन्होंने आहत कर डाला था
-


कुछ रूपवादी समीक्षक नेरूदा की कविता का मूल स्वर न बता कर उनके उस रूप को बताते हैं जो उन समीक्षकों की दुर्बलताओं को ढक सके। बड़ी चालाकी से वह नेरूदा की जनपक्षधर संघर्षशीलता को दरकिनार करते हैं। वह उसे एक ऐसा आधुनिक कवि मानते हैं जिसमें ‘आसक्ति’ और ‘लगाव’ है। जबकि पश्चिमी औपनिवेशिक आधुनिकता में ‘अलगाव’ तथा ‘एकांत’ है । नेरूदा के संदर्भ में ये दोनो बातें बेमानी है। क्योंकि इनसे कवि की मूल विश्वदृष्टि व्यक्त नहीं होती। यह तभी व्यक्त होती है जब हम समय, समाज तथा व्यवस्था के प्रति अपना दृष्टिकोण साफ करें। ऐंसे समीक्षक इधर उधर से ले कर वे सब बातें कहेंगे जो नेरूदा की कविता में छायाप्रतीति को तो बतायें। पर उसके सारतत्व से परिचित न होने दें। अशोक बाजपेयी यह कभी न कहेंगे कि नेरूदा कविता को एक अस्त्र की तरह काम में लेते हैं। वह सर्वहारा के पक्ष में इस दुनिया को रूपांतरित करने के लिये अपनी कविता के माध्यम से लड़ रहे हैं। यही तो है नेरूदा की कविता का सार तत्व। कुछ मार्क्सवादी कहे जाने वाले समीक्षकों ने भी नेरूदा को ‘राजनीति’ से कहीं अधिक ‘शब्दो में उलझा’ कवि  बताया है। उन्होंने उनकी सुपरिचित कविता, ‘स्मृति लेखा’ से कुछ वाक्यों को दिया है। नेरूदा कहते हैं, ‘आप जो चाहे कह सकते हैं, जी हाँ, लेकिन वह शब्द ही हैं जो गाते हैं, जो ऊपर उड़ान भरते हैं ....जो नीचे उतरते हैं..... मैं उनके सामने नतमस्तक हूँ .....कितनी महान भाषा है मेरे पास.... वह सुंदर बर्बर विजेताओं से हमें विरासत में मिली है.... शब्द उन बर्बरों के बूटों से , घोड़ों के नालों से , टोप से , दाढ़ियों से लोढ़े की तरह लुढ़क पड़े थे... वे सब कुछ लूट ले गये..... सिर्फ शब्द छोड़ गये ..हमारे लिये’। यहाँ शब्दों की बात को सरलीकृत रूप में बता कर डा0 नामवर सिंह ने इसे नेरूदा की ‘शब्दों की भूख’ कहा है। दरअसल लेनिन के अनुसार शब्द भी ‘क्रियायें’ हैं। वे मानवीय संक्रियाओं से जन्म कर नयी संक्रियायें पैदा करते हैं अपने अर्थ संकेत से। नेरूदा शब्दों द्वारा उन संक्रियाओं को ध्वनित करते हैं जो आदमी के जीवन को क्रियाशील तथा आवेगमय बनाते हैं। दूसरे, नेरूदा शब्दों से अपनी विरासत तथा परंपरा की याद दिलाते हैं। यानि भाषा न तो एक दिन में बनती है। न एक व्यक्ति बनाता है। उसका प्रफुस्टन समाज के विभिन्न वर्गों की संक्रियाओं से होता है। संकेत है शब्दों के पीछे मनुष्य की कोमल, कठोर, रूपवान, विरूपवान, सुंदर-असुंदर जीवन की संक्रियाओं का अटूट बल का होना! दरअसल यह ‘शब्दों की भूख’ न हो कर उनके पीछे छिपी असंख्य तथा अनेकरूपा मानवीय सक्रियाओं के सामूहिक बल का संकेत है। यही बल हमारी परंपरा का सार है जिसे पा कर हम अग्रसर होते रहते हैं। ध्यान दें उस पंकित पर कि, ‘ वे सब कुछ लूट ले गये... सिर्फ शब्द छोड़ गये। संकेत है भौतिक संपदा नष्ट होने पर भी कविता नष्ट नहीं होती। यहाँ मैंकाले का एक संस्मरण याद आता है। उससे किसी ने पूछा कि यदि कोई तुमसे ब्रिटिश साम्राज्य छीनते समय किसी एक वस्तु को तुम्हें रखने के लिये कहे तो तुम क्या मागोंगे। मैंकाले ने जवाब दिया कि ‘सिर्फ शेक्सपियर’। शब्द और नेरूदा का सही रिश्ता समझने के लिये उनकी एक और कविता,  ‘शब्द’ पर ध्यान देना जरूरी है। कवि कहते हैं -

शब्द ने
रक्त में जन्म लिया
स्याह तन में बढ़ा, स्पंदित
और होठों तथा मुख से उड़ा -


यह कविता प्रदीर्घ है। इस कविता के घ्वन्यार्थ को समझ कर हम यह नहीं कहेगें कि कवि नेरूदा को ‘शब्दों की भूख थी’। या वे शब्द चातुर्य से कवि केदारनाथ सिंह कुँवरनारायण या विनोदकुमार शुक्ल की तरह अर्थविहीन ‘वाग्मिता’ रचते रहे। बल्कि वे बताना चाहते हैं कि किस तरह मनुष्य के विकास की संघर्षपूर्ण यात्रा कितनी कठोर और चुनौतीपूर्ण रही है। शब्द की यात्रा अजेय मनुष्य की यात्रा का ही पर्याय बनी है। शब्द दूर और निकट की यात्रायें करके विगत पूर्वजों और यायावर जातियों,  देशों, अपने कबीलों से हो कर लौटता रहा है। वह वहाँ भी गया जहाँ मनुष्य ने नई भूमि और जल को एक दूसरे से संसिक्त किया। इससे उसने नये शब्द उपजाये। यही हमारी विरासत बनी -
ताकि वे अपने शब्द पुनः उपजा सकें
और यूँ यही विरासत है - जो हमें विगत मानवों तथा उनके उदय से हमें जोड़ती है।
कवि यहीं नहीं थमते वे ‘प्रथम शब्द’ के कहे जाने से वायुमण्डल के काँपने का संकेत देते है -

अभी तक वायुमण्डल
उस प्रथम शब्द से
जिसे भय और आह के वस्त्र पहना कर
उच्चरित किया गया , काँप रहा था
शब्द ने बड़े मानवीय संघर्ष के बाद ही उपयुक्त अर्थ ग्रहण किये हैं -
कालान्तर में -
शब्द अर्थ से संपृक्त होने लगा
सदा गर्भ धारण किये
मनुष्य के जीवन से जुड़ने लगा
हर चीज़ जन्म ही जन्म और ध्वनि ही ध्वनि
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क्रिया ने सारी शक्ति अर्जित की
और अपनी आकर्षकीय विद्युत से
अस्तित्व को अर्थवत्ता से जोड़ा
मानव का शब्द, शब्दांश
वंशगत पात्र जिसमें रक्त के संप्रेषण संकलित है
मैं शब्द ग्रहण करता और उसका संचार
अपनी इंद्रियों में इस तरह करता रहा
मानो वह मानव रूप के सिवा कुछ भी नहीं है
शब्द का मातृ स्रोत
$     $   $
मेरे गीत को जन्म देते हैं
और दीप्त जीवन है -रक्त है वह
वह रक्त जो अपना तत्व व्यक्त करता है
शब्द काँच का गुण प्रदान करते हैं
रक्त को रक्त का
और स्वयं जीवन को जीवन का  -


अतः नेरूदा शब्द के बारे में शब्दक्रीड़ा के लिये नहीं कहते। वह उसके द्वारा मनुष्य के संघर्ष तथा उसके संघर्षपूर्ण सांस्कृतिक विकास क्रम को कहते हैं। यानि शब्द की यात्रा अजेय मानव की संघर्षपूर्ण यात्रा बनी है। मैंने इस प्रसंग को इस लिये विस्तार दिया जिससे हम किसी कवि की परख सही परिप्रेक्ष्य में कर सकें। हिंदी आलोचना ऐसी विसंगतियों से भरी पड़ी है। कुछ तो अज्ञता और आलस के कारण। कुछ  कवि के सार तत्व को उसकी छाया प्रतीतियों से ढकने के कारण।



     नेरूदा को उनकी किशोर अवस्था में ही कवि की पहचान मिल चुकी थी। उन्होने कविता की अनेक शैलियाँ अपनाई हैं। अतियथार्थवादी कवितायें, ऐतिहासिक महाकाव्यात्मक प्रदीर्घ कवितायें। ऐसी कवितायें भी जो खुल्लमखुल्ला राजनीतिक घोषणापत्र लगती हैं। बेजोड़ गद्य में उन्होंने अपनी आत्म कथा लिखी है। वैषयिकता से परिपूर्ण ‘बीस प्रेम कतिपयें और हताशा का गीत’ (1924) में सामने आया। कहा जाता है कि नेरूदा अक्सर हरी स्याही से लिखते थें। यह उनके लिये उनकी निजी इच्छा तथा आशा का प्रतीक था। नेरूदा को उनके जीवन काल में अनेक राजनयिक पदों पर कार्य करने का अवसर मिला था चीले की कम्युनिस्ट पार्टी के सीनेट सदस्य भी रहे थे। ब्राज़ील के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट नेता कैरोल प्रैस्तिस के सम्मान में नेरूदा ने एक लाख श्रोताओं के सामने काव्य पाठ किया था। 1948 में जब चीले के अध्यक्ष गौन्ज़ाले विदेला ने कम्युनिज्म को अवैध घेाषित किया तब नेरूदा की गिरफ्तारी का वारंट निकाला गया। उस समय नेरूदा के मित्रों ने उन्हें महीनों तक तहखाने में छिपा के रखा। कुछ सालों के बाद नेरूदा छिप कर पहाड़ के दर्रे से निकल कर अर्जिटीना के लिये  चले गये। कुछ साल बाद वह समाजवादी नेता सल्वाडोर एलन्दिे के सहयोगी बने। कहा जाता है कि जब नेरूदा नोबिल सम्मान लेकर चीले लौटे तो एलिन्दे ने उन्हें सत्तर हज़ार श्रोताओं के सामने काव्य पाठ के लिये आमंत्रित किया। औगस्टो के समय चीले मे सहसा शासन बदला। उस समय नेरूदा कैसर से पीड़ित थे। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। तीन दिन के बाद हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। कुछ लोग कहते हैं कि उनकी जुन्टा ने हत्या कराई थी। नेरूदा जीवन में एक मिथक की तरह रहे। उनके निधन की अनुगूँजें पूरी दुनिया में गूँजने लगीं। औगस्टो ने नेरूदा की मृत्यु को सार्वजनिक घटना न बनाने का आदेश जारी किया। इसके बावजूद हज़ारों लोगों ने कर्फ्यू  का उल्लंघन कर सड़कों पर जुलूस निकाले ।

नेरूदा का जन्म 12 जुलई , 1904 को चीले प्राल नामक शहर में हुआ था। सैन्ट्यागो से लगभग 350 कि0मी0। उनके पिता रेयअस मोराल्स रेलवे मुलाज़िम थे। जबकि उनकी माता रोज़ा बासोल्टो एक स्कूल अध्यापिका थीं। नेरूदा की माता उन्हें सिर्फ दो महीने का छोड़ कर दुनिया से विदा हुई। नेरूदा तथा उनके पिता जल्दी ही टेमको आ गये। यहाँ आके नेरूदा के पिता ने दूसरा विवाह कर लिया । कहते हैं कि 1914 में नेरूदा ने अपनी प्रथम कविता रची थी। नेरूदा के पिता इस पक्ष में न थे कि नेरूदा कविता लिखें। या साहित्य का अध्ययन करें। 1921 में 16 वर्ष के होन पर नेरूदा सैन्ट्यागो चले गये। यहाँ उन्हों ने फ्रांसीसी भाषा का अध्ययन किया। वह एक शिक्षक होना चाहते थे। पर कुछ ही समय बाद नेरूदा कविता में जुट गये।

1923 में उनका पहला कविता संग्रह ‘Book Of Twilights’ सामने आई। दूसरे साल ‘Twenty Love Poems And a Song Of Despair’ छपा। इस संग्रह की कविताओं में कामोद्दीपक तथा श्रृगांरिक कविताओं का बाहुल्य होने के कारण विवाद खड़ा हो गया। फिर भी दोनों कविता संग्रहों ने नेरूदा की पहचान बनाई। इन कविताओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद हुआ। उनकी बिक्री भी खूब हुई। यद्यपि इनके नये संस्करण नहीं छपे। 1926 में अगला कविता संग्रह ‘The Trying Of Infinite Man’ आया । एक उपन्यास भी, ‘The Inhabitant And His Hope’  छपा। 1927 में आर्थिक संकट के कारण नेरूदा ने रंगून में वाणिज्य दूत का काम ले लिया। यह बर्मा के उपनिवेश का एक हिस्सा था। इससे पहले नेरूदा ने उपनिवेश जैसा नाम नहीं सुना था। यहाँ नेरूदा को घोर एकांत तथा अकेलेपन का एहसास हुआ। जावा में उनकी भेंट एक डच महिला से हुई। वह बैंक में काम करती थी। नेरूदा का विवाह उससे हो गया। इस दौर में नेरूदा ने बडी संख्या में कवितायें लिखी। अनेक काव्य रूपों के प्रयोग किये। दो जिल्दों में उन्होंने ‘Recidencia En La Tierra’ की रचना की। इनमें अधिकांश कवितायें अतियथार्थवादी (Surrealistic) हैं। अनकी संप्रेषणीयता भी सहज नहीं है। इन कविताओं में नेस्दा का मूल स्वर व्यक्त नहीं होता। चीले वापस आने के बाद नेरूदा को पहले स्पेन के ब्यूनस एअर्स तथा बाद में बार्सीलौना में राजनयिक पदों पर नियुक्त किया गया। इसके बाद माड्रिड में वाणिज्य दूत के पद पर कार्य किया। यहाँ उनका एक साहित्यिक परिकर बना। कई प्रख्यात लेखकों से मैत्री हुई। इनमें प्रमुख हैं राफेल अल्बर्ती,  फैडिरिको ग्रासिया लोर्का तथा पीरू के कवि सिज़र वैलेजो। 1934 में नेरूदा को पुत्री प्राप्त हुई। उसका नाम रखा गया माल्वा मेरियाना त्रिनिदाद। पर दुर्भाग्य से बहुत कम अवस्था में ही उसकी मृत्यु Hydrocephalus (शिरोजल रोग) से हो गई। इस दौरान जाने क्यों नेरूदा अपनी पत्नी से विमुख होने लगे। यही नहीं बल्कि उनके संबंध एक अर्जनटाइन महिला से शुरू हुये। यह महिला नेरूदा से कम से कम 20 साल बड़ी थी। नाम था डेलिया केरिल। स्पेन में जैसे जैसे गृहयुद्ध बढ़ने लगा नेरूदा प्रथम बार राजनीति के सचेत होते गये। इस गृहयुद्ध के परिणामों ने भी कवि को झकझोरा। धीरे धीरे नेरूदा अपनी आत्मनिष्ठता से मुक्त हुये। अब उनका रुझान जन समूह तथा जनता के संघर्ष की ओर ज्यादा था। इसी वजह से वह एक प्रबल क्म्युनिस्ट बने। महत्वपूर्ण बात है कि फिर वह जीवनपर्यन्त कम्युनिस्ट की तरह ही रहे। न कोई विचलन। न ढुलमुल अवसरवाद। हिंदी के कई तथाकथित पथच्युत मार्क्सवादी नेरूदा की कविता की तो प्रशंसा करते हैं। उनके जीवन के बारे में भी बताते हैं। पर वे उनसे वैचारिक दृढ़ता तथा उनके अविचल मार्क्सवादी बने रहने से कोई नसीहत नहीं लेते। आखिर क्यों?
 कहते हैं कि नेरूदा पर उनके अनेक वामपंथी मित्र कवियों का असर था। पर सबसे अधिक उन्हें प्रेरणा मिली ग्रासिया लार्का की दुखद हत्या से। स्पेन के तानाशाह फ्रेंको का लोर्का की हत्या में परोक्षतः हाथ रहा है। नेरूदा ने अपने लेखन तथा व्याख्यानों से लोकतंत्र का समर्थन किया। तानाशाही का पुरजोर विरोध। 1938 में प्रकाशित उनकी कृति ‘Spain In The Heart’ से यह लक्ष्य किया जा सकता है। परिणामतः वहाँ की तानाशाह राजनीतिक उग्रता ने उन्हें वाणिज्य दूत के पद से हटा दिया। इससे कुछ पहले 1936 में उन्होंने तलाक लिया।  नेरूदा से अलग हो कर उनकी पत्नी पहले मोन्टी कार्लो चली गई। बाद में नीदरलैण्ड्स को चुना। उनके साथ एक बच्ची थी। कहते हैं दोनों फिर कभी नहीं मिले। अपनी पत्नी को त्याग कर नेरूदा डेलिया डेल कैरिल के साथ फ्रांस में रहने लगे। 1938 में नेरूदा को पेरिस में स्पानी प्रवासियों के लिये विशेष वाणिज्य दूत नियुक्त किया गया। यहाँ नेरूदा को ऐसा काम सौंपा गया जिसे उन्होंने अपने ‘जीवन का श्रेष्ठ काम’ बताया है। उन्होंने स्पेन से 2000 चीले प्रवासियों को स्वदेश भेजा। ये लोग बहुत ही गंदे और कुत्सित कैपों में रह रहे थे। नेरूदा पर आरोप लगा कि उन्होंने उन लोगों को वरीयता दी जो कम्युनिस्ट थे। उन लोगों के साथ भेदभाव किया जो लोकतंत्र के लिये लड़े थे। पर ऐसे भी लोग हैं जो इस आरोप को गलत बताते हैं। नेरूदा की दूसरी नियुक्ति प्रमुख वाणिज्य दूत के पद पर मैक्सिको में हुई। वह यहाँ 1940 से 1943 तक कार्यरत रहे। मैक्सिको में उन्होंने डेल केरिल से विधिवत शादी की। उन्हे यह भी सूचना मिली कि उनकी आठ वर्षीय पुत्री मालवा नाज़ियों द्वारा कब्जे में किये गये नीदरलैण्ड्स में नहीं रही है। 1942 के आसपास मैक्सिको में नेरूदा की भेंट वहाँ के प्रख्यात कवि आक्टोविया पाज़ से भी हुई । कहा जाता है कि दोनो में किसी बात पर लात-घूसो तक की नौबत आ गई थी।

       नेरूदा अपनी कवितायें अक्सर हरी स्याही में लिखते रहे । यह उनकी आकांक्षा तथ आशा की प्रतीक रही होगी ।

       1943 में नेरूदा चिली लौट आये। फिर उन्होंने पीरू की यात्रा की। वहाँ उन्होंने माच्चू पीच्चू के शिखर को गहराई से देखा समझा। उसी से प्रेरित होकर उन्होंने पर्याप्त लंबी कविता 1945 ‘माच्चू पीच्चू’ रची है। हिंदी में इस कविता का अनुवाद कमलेश, नीलाभ, प्रभाती नौटियाल तथा चंद्रबली सिंह ने किया है। मेरे विचार से सर्वाधिक प्रमाणित अनुवाद प्रभाती नौटियाल का ही होना चाहिये। क्योंकि यह मूल स्पानी भाषा से किया गया है। प्रभाती नौटियाल को स्पानी भाषा की खासी जानकारी थी। इस कविता में अमरीका की प्राचीन सभ्यता को अनेक पहलुओं से व्याख्यायित करने वाला कथ्य नेरूदा ने चुना है। इसी कथ्य को उन्होंने बाद में (Canto General) में विकसित किया है। कहते हैं कि माच्चु पीच्चू अत्यंत विकसित इंका सभ्यता का महत्वपूर्ण नगर का किला था। सन 1911 से पूर्व इसका किसी को पता ही न था। यहाँ घना जंगल , पहाड़ , पहाड़ों से ढरकती तेज बहाव वाली नदियाँ  हैं। दुर्गम पथ हैं। हमें विस्मित कर देन वाला इसका बारीक स्थापत्य है। चट्टानों को काट कर सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। यहाँ सब कुछ सघन वनों से आच्छादित हो चुका है। नेरूदा ने अपने ‘संस्मरण’ में इसका प्रसंग बताते हुये लिखा है ‘पेरू में ठहर कर मैंने माच्चू पीच्चू के खण्डहरों की यात्रा की। तब कोई राजपथ न था। अतः घोड़ो पर चढ़ कर यात्रा करनी पड़ी। इस कविता को हिंदी में खूब पहचाना गया। मुझे यह कविता अत्यंत दुरूह लगती है। वैसे नेरूदा जनवादी कवि हो कर भी इतने दुरूह क्यों हुये,  मेरी समझ में नहीं आता। उन्हें ब्रेख्त, नाजिम हिकमत तथा माइकोव्स्की की तरह सहज क्यों नहीं होना चाहिये। या हिंदी में नागार्जुन,  केदार बाबू तथा त्रिलोचन की तरह। उनकी कविताओं में ठीक मुक्तिबोध की कविताओं की तरह बड़ी उलझनें हैं। नेरूदा को सहज सरल कवि नहीं कहा जा सकता। बहुत जगह अस्पष्टता है। उनके बिंब कई बार वाग्मिता में बदल जाते हैं। जैसे केदारनाथ सिंह के यहाँ होता है। मुझे  नेरूदा की एक दूसरी लंबी कविता, ‘रेल श्रमिक को जागने दो’ इस कविता से ज्यादा महत्वपूर्ण लगती है। इस का प्रथम प्रकाशन अक्टूबर, 1950 में हुआ था। हमारे अग्रज कवि केदार बाबू ने इस कविता का अनुवाद करते समय नाम दिया है, ‘रेल भंजकों को जागने दो’। चूँकि अंग्रेजी नाम है ‘Let The Rail Splitter Awake A Splitter’ का शब्दानुवाद किया ‘भंजक’। पर भंजक से अर्थ साफ नहीं होता। नेरूदा का संकेत है कि जो रेल की पटरियों की देख रेख करता है -उन्हें ठौंकता पीटता है उन्हें बिछाता सुधारता है -वह जागे। यानि श्रमशील सर्वहारा के जगाने का आह्वान है इस कविता में। दूसरे , ‘बहुवचन’ न होकर ‘एकवचन’ ही है पर केदार बाबू ने भंजकों कह कर शायद लय पर ध्यान दिया है। यहाँ रेल श्रमिक उस सर्वहारा का प्रतीक है जो क्रूर पूँजीकेंद्रित व्यवस्था के बुनियादी ढाँचे को बदल कर समता मूलक समाज की स्थापना करेगा। अतः आज के संदर्भ में नेरूदा को विश्व कवि के रूप में समझने के लिये हमें इस कविता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये। इस कविता में लगभग 700 पंक्तियाँ हैं। बीसवीं  सदी की सुविख्यात एलियट की कविता ‘द वेस्टलैण्ड’ से यह कविता अधिक लंबी है। उससे अधिक महत्वपूर्ण तथा आज के संदर्भ में प्रासंगिक भी। यह कविता अतुकांत है। अंग्रेजी में इसे कहेंगे ‘ब्लेंक वर्स’। महाकवि मिल्टन और वर्डस्वर्थ आदि ने भी ब्लेंक वर्स में लिखा है। इसमें आंतरिक लय से भाव गुँथे बिंधे रहते हैं। पंक्तियों को दोहरा कर कवि ने लय को साधा है। जहाँ तहाँ तीखे व्यंग्य हैं। आद्यंत बड़ी कोमल प्रगीति भी है। लगता है नेरूदा इस कविता में अपने पूर्ववर्ती कवि वाल्ट ह्विटमैंन की तरफ निहार रहे हैं। कहना न होगा कि वाल्ट ह्विटमैंन की ‘Leaves Of Grass’  की उत्कृष्टतम पक्तियाँ यहाँ देखी जा सकती हैं। ध्यान रहे कि वाल्ट ह्विटमैंन की यह नकल कतई नहीं है. कथ्य के स्वभाव को देखते हुये नेरूदा ने काव्य रूप अपनाया है। कवि अमरीकी साम्राज्यवादियों  के अपराधों की बात कहते हैं -

वे .... तुम्हें खून का प्याला पेश करते हैं
( एक ने एक सौ को मौत के घाट उतार दिया )
मार्शल की सुरापान गोष्ठी
युवकों का खून पसंद करती है -
चीन के किसान, स्पेन के कैदी
खून और पसीना क्यूबा के ईख- खेतों में
चीले की ताम्र खदानों में
स्त्रियों के आँसू




नेरूदा वाल्ट ह्विटमैन की तरह स्टालिनग्राड के स्त्री पुरुष श्रमिको का आह्वान भी करते हैं। वह अमरीकियों को चेताते हैं कि यदि उन्होंने युद्ध थोपा तो दुनिया के लोग उनके विरुद्ध प्रतिरोध के लिये खड़े होंगे। पूरी पृ्थ्वी युयुत्सुओं के विरुद्ध खड़ी होगी -

.... लेकिन इससे आगे
प्रफुल्ल और सुदृढ़
स्पाती, मुस्कराते हुये
जो तैयार है गाने को और युद्ध को
वे तुम्हारे इंतज़ार में हैं
टुण्ड्रा के टायगा के
पुरुष, स्त्रियाँ
वोल्गा के वे योद्धा
जो मृत्यु को भी करते हैं पराजित
स्टालिनग्राड के बच्चे
उक्रेन के भीमकाय लोग
अगर तुमने यह प्राचीर छुआ भी
तुम गिरोगे मुँह के बल
कारखानों में कोयलों की तरह


जल कर राख हो जाओगे -इस तरह की हिला देने वाली चेतनावनी दी है नेरूदा ने अमरीकी साम्राज्य को। नेरूदा को भरोसा है कि विश्व की संघर्षधर्मी जनता साम्राज्यवादियों के कुचक्रों को विफल कर देगी। कवि उत्तरी अमरीकी जनता को अब्राहम लिकन की उस महान परंपरा की याद दिलाते हैं जिसमें दासता के विरुद्ध संघर्ष की ज्वालायें छिपी हैं:

ऐसा कुछ घटित नहीं होने देंगे -
रेल श्रमिक को जागने दो
आबी को उसके कुल्हाड़े के साथ आने दो
किसानों के साथ भोजन करने के लिये
उसे अपनी काठ की तशतरी के साथ आने दो


कविता के अंत में  नेरूदा शांति का यशोगान करते हैं। उस शांति का जिसके लिये विश्व की जनता लड़ रही है। यहाँ उनकी कविता में बाइबिल जैसे सादगी है। पर उसके अर्थ अति दूरगामी हैं। कवि शब्दों की पुनरावृत्ति से गहन भावों की गहराइयाँ मापता लगता है -

फटी पौ के लिये शांति आनी ही है
शांति पुलों को
शांति शराब को
उन छंदों को
जो मेरा पीछा करते हैं
जिनमें धरती और प्रेम के गीत रचे हैं
शांति भोर होते शहर को
जबकि पाव रोटी जागती है
नदियों का स्रोत
शांति मिसीसीपी नदी को
शांति मेरे भाई की कमीज़ को
शांति उन सबको
जो जीवित है
हर देश को
हर समुद्र को।




इस कविता को पढ़ कर मुझे लगा कि आज के संदर्भ में यह एक अत्यंत तात्विक तथा जरूरी कविता है। अमरीकी साम्राज्यवाद अपनी युयुत्सा को वित्तीय पूँजी में छिपाये अधिक आक्रामक हुआ है। अधिक क्रूर। अधिक विनाशक। खासतौर से भारत में उसका कुचक्रीय जाल गले का फंदा बन चुका है हमारे हर लोकधर्मी कवि का यह पवित्र दायित्व है कि अपनी कविता को उसके विरुद्ध खड़ा करे। इस से यह नहीं समझ लेना चाहिये कि नेरूदा सिर्फ राजनीतिक कविता ही लिख रहे थे। उनकी प्रारंभिक कवितओं में प्रकृति, प्रेम तथा कोमल भावों की प्रचुरता है -

तूफानों के साथ भोर जीवित है
उफनती ग्रीष्म में
विदाई के समय
सफेद झक्क हिलते रूमालों की तरह बादल
तेज़ हवा में मँडराते है
हमारे कोमल प्यार पर
हवा के झकोरों के साथ
असंख्य हृदय धड़कते हैं


इन प्रारंभिक कविता में नेरूदा का प्रकृति प्रेम प्रतिभासित है। बिंबों की ताज़गी है। कवि की वाणी भरपूर है। नेरूदा फ्रांस के बाद्लेयर तथा रिम्बो जैसे प्रतीक -कलावादी अभिशप्त कवियों के रिक्थ को तिरस्कृत नहीं करते। पर उनकी नकल भी नहीं करते। न उनकी पतनशील विश्वदृष्टि को अपनाते हैं। जहाँ वे इन कवियों से प्रभावित है वहाँ कविता दुरूह हुई है। उन्होंने लोर्का की तरह चीले की लोकधर्मी कविता के अनुप्राणित करने वाली चेतना को आत्मसात किया था। नेरूदा माइकोवस्की से भी प्रभवित थे। उन्होंने उनकी कविता को अपने ‘समय की सर्वोत्कृष्ट कविता’ कहा है। ऐसा क्या था इस कवि मे जो नेरूदा को आकृष्ट करता रहा। शायद कवि की निजता में महान विचार का घुल मिल जाना। वाल्ट ह्विटमैंन उनके प्रिय कवि थे। उनकी कविता ने नेरूदा को स्वयं को थाहने के लिये प्रेरित किया होगा। ह्विटमैन के लिये उन्होंने एक पंक्ति लिखी है -

मुझे दो अपनी वाणी
अपने हृदय की चिंतायें -

एक सवाल सहसा मन में उठ सकता है कि इतना लोकधर्मी तथा संघर्ष प्रिय कवि आखिर उदास तथा विषादग्रस्त कैसे होता गया। जैसा कि कवि ने स्वयं माना है कि उन्होंने ‘मृत्यु के शब्द कोश का अनुशीलन किया है’। जिस कवि ने हर समय जीवन को उत्सव की तरह जिया उसने मृत्यु को अपने सामने क्यों देखा। इसे शायद साहित्यिक विमोहन या काव्य आसक्ति से नहीं समझा जा सकता। क्या यह समय ही ऐसा नहीं था! ब्रेख्त, लोर्का, नाजिम हिकमत के सामने भी मृत्यु बिंब कौंधते हैं। मायकोव्स्की ने आत्महत्या की ही थी। बीसवे दशक के अंतिम तथा तीसरे दशक के शुरू में मृत्यु नेरूदा की कविता में एक ऐसा सत्य है जिसकी अनदेखी शायद ही कोई कवि कर पाये। नेरूदा ने मृत्यु के इस कोलाहल को रूपक दिया है ‘शोक और विलाप का जामुनी लोहा’। जनता के प्रति उनकी दृष्टि ने उन्हें एकाकीपन का एहसास कराया। एक रिक्तता और जीवन की संश्लिष्ट  समझ से यह एकाकीपन गहन हुआ। यही वजह है कि शायद नेरूदा को एक ऐसी भाषा रचने को विवश होना पड़ा जिसे आसानी से नहीं समझा जा सकता। ऐसे भाव साहचर्यों की उपस्थिति जो रहस्यमय लगने की वजह से हमें उलझन में डाल सके। मैंने पहले कहा है कि नेरूदा जनवादी होकर भी मुक्तिबोध की तरह अति कठिन कवि है। इसे उनकी कविता की सीमा कहा जा सकता। और शक्ति भी। एक तरह से उनकी कविता अथाह समुद्र हो जैसे। एमादो अलोनसो जैसे प्रख्यात  समीक्षक ने नेरूदा पर एक पुस्तक लिखी है। नाम है, ‘अथाही कविता की व्याख्या’। फिर भी ऐसे कठिन समय में नेरूदा की कविता लगातार पठनीय बनी रही। प्रसिद्ध फ्रांसिसी कवि लुई अरागाँ ने एक कविता लिखी। शार्षक है, ‘पाब्लो नेरूदा का गीत’। तीसरे दशक के प्रारंभ की स्थिति बताते हुये कहा है -

मुझे अभियान करते सैनिकों के
भारी भारी कदमों पर
भरोसा नहीं हुआ
जब मैंने नेरूदा की कविता के
उफनते ज्वार को सुना 

                                                                               
चीले में रह कर नेरूदा ने एक पुस्तक लिखी। नाम है, ‘स्पेन मेरे हृदय में‘ ।यह पुस्तक दरअसल दर्शकों के लिये न हो कर सैनिकों के लिये अधिक प्रेरक होगी। लोर्का  ने भी नेरूदा को ‘महान कवि’ स्वीकार किया है। एक महान कवि की कविता में जो सादगी तथा संश्लिष्टता होनी चाहिये वह नेरूदा ने स्टालिनग्राड के बारे में जो कवितायें रची है तथा ‘रेल श्रमिक को जागने दो’ कविताओं में अर्जित कर ली है। स्पानी कविताओं में भाव साहचर्यो का बहुत उलझाव है। उन्हें समझना बहुत कठिन है। नेरूदा को आभास था कि योरुप तथा अमरीका का भविष्य और मानवीय सभ्यता की सुरक्षा स्टालिनग्राड पर  निर्भर है। नेरूदा सिर्फ कविता के माध्यम से संघर्ष नहीं करते। वे बोलते भी हैं। व्याख्यान भी देते है। पैम्फ़लेट भी लिखते हैं। हर लोकधर्मी कवि को यह जरूरी है। सिर्फ कविता से ही संघर्ष नहीं किया जा सकता। नेरूदा की बात को अमरीका के लोग ध्यान से सुनते थे। नेरूदा वर्गशत्रुओं के कुचक्रों तथा साजिशों को बेनक़ाब करते रहे। उन्होंने लेखकों का आह्वान किया कि वे जनवादी संस्कृति की रचना करें। तटस्थ या चुप रहने वाले लेखकों को उन्होंने बेनकाब किया। उन्होंने एक जगह कहा है कि जब ‘देखता हूँ अर्जनटीना या क्यूबा के लोग काफ्का, रिल्के या लारेन्स के लिये तड़पते हैं। या जो कला- रूपवादी कविता के लिये परेशान दिखते हैं -मैं क्रोध से भर उठता हूँ .....आज जो कवि या लेखक लड़ नहीं सकता वह कायर है। आज के समय के लिये यह उचित नहीं है कि हम अतीतोन्मुख हो कर स्वप्नो या भूलभुलैयों में खोये रहें। मनुष्य के जीवन और संघर्ष ने हमारे समय में वह वैभव पा लिया है कि हमारी कविता तथा कविता के स्रोत वहीं से उमड़ेंगे। बोल्शविकों की ओर संकेत करते हुये कहा है कि ‘महान कम्युनिस्ट पार्टी ही सर्वहारा की पार्टी’ है। नेरूदा की कविता का विकास बताता है कि कलावादी कवियों तथा उनके बीच खाई बढ़ती ही गई है। वह कवि के सामाजिक तथा राजनीतिक दायित्व को कविता से कभी अलग नहीं करते। वे मानते हैं कि उदात्त भावों के स्रोत उदात्त मानवीय सोच तथा उदात्त संक्रियायें ही है। नेरूदा ने चीले के तमाम कम्युनिस्टों का महिमा गान किया है। कम्युनिस्ट पार्टी को ‘अमर’ कहा है। 1948 में नेरूदा ने ‘Chronicle of 1948’ कविता लिखी। उन्होंने इस वर्ष को एक घृणित वर्ष, अंधे चूहों का वर्ष तथा द्वेष तथा रोष का वर्ष कहा है। यह कविता नेरूदा के सीनेट में दिये व्याख्यान के एक महीने बाद लिखी गई थी। और जब कविता लिखी  उस समय देशद्रोही गोन्ज़ालेज़ विदेला उनके आँखों के सामने खड़ा था। कविता का अंत एक प्रेरक संदेश होता है

मेरी जनता विजयी होगी
दुनिया की जनता विजयी होगी।


    ऐसा लगता है कि यह कविता नेरूदा की महान कविता ‘रेल श्रमिक को जागने दो’ का सफल पूर्वाभ्यास है। क्योंकि इस प्रदीर्घतम कविता में कवि ने अपने समय का समग्र दुखांत नाटक प्रदर्शित किया है। सारे दुख। सारे त्रास। सारी गहन पीड़ायें। ध्यान रहे जब कोई अर्जिनटीना या चिली का कवि अमरीका की बात करता है तो उसके मन में दो अमरीका होते हैं। लैटिन अमरीका या उत्तरी अमरीका। ‘रेल श्रमिक को जागने दो’ में भी दो अमरीका साफ दिखते हैं। एक अमरीका साम्राज्यवादियों का। दूसरा अमरीका जनता का। इसीलिये यह कविता समस्त आधुनिक कविता में अत्यंत मार्मिक तथा अनन्य है। ‘वेस्टलैण्ड’ में एलियट विश्व की त्रासदी का समाधान धर्म के पुनरुत्थान तथा नृपतंत्र की पुनः सथापना में खोजते हैं नेरूदा दमित, शोषित, पीड़ित सर्वहारा की मुक्ति द्वारा प्रतिष्ठित लोकतंत्र में। एलियट को आधुनिक कविता का पिता कहते हैं। नेरूदा भी आधुनिक कवि हैं। दोनों समकालीन भी हैं। वह ऐसी क्या बात है जो दोनो अपनी अपनी कविता में भिन्न दिखाई पड़ते हैं। हमें यह भी तय करना होगा कि दोनों की आधुकिता तथा समकालीनता में से किसे अधिक प्रासंगिक तथा समयोचित मानें।



      1966 में नेरूदा को ‘अंतर्राष्ट्रीय पैन सम्मेलन’ ने न्यआर्क में आमंत्रित किया था। अधिकृत रूप से न्यूआर्क आने की उन पर पाबंदी थी। क्योंकि वह एक कम्युनिस्ट कवि थे। लेकिन सम्मेलन के आयोजक तथा प्रख्यात नाटककार आर्थर मिलर ने उस समय के प्रशासकों को अनुमति देने के लिये विवश किया। नेरूदा ने कविता पाठ ही नहीं किया बल्कि कांग्रेस पुस्तकालय के लिये अपनी कविताओं को रिकोर्ड भी कराया। मिलर ने अपने वक्तवय मे कहा कि नेरूदा को कम्युनिस्ट होना इस बात का संकेत है कि ‘बुर्जुआ समाज ने  उनका निरंतर तिरस्कार किया है। इस सम्मेलन को शीतयुद्ध का अंत भी कहा गया है। नेरूदा न्यूआर्क से लौटते समय पीरू में रुके थे। वहाँ अध्यक्ष फर्नान्डो ने उनका स्वागत किया। वहां उन्होंने  बहुत बड़े जनसमुदाय के सामने काव्य पाठ किया। बोलोविया में चैगुवेरा की मृत्यु के आद नेरूदा ने कई आलेख लिखे। उन्होंने उस ‘महान वीर नायक’ की मृत्यु पर गहरा दुख व्यक्त किया था। 1970 में नेरूदा का नाम चीले के अध्यक्ष पद के लिये प्रस्तावित हुआ। पर सल्वाडोर एलैन्दे के पक्ष में उनहोंने अपना नाम वापस ले लिया। अपनी विजय के बाद उनहोंने नेरूदा को फ्रांस का राजदूत नियुक्त किया। 1970 से 1972 तक यह उनका अंतिम राजनयिक कार्यकाल था। सेहत के गिरने की वजह से वह चीले वापस आ गये। 1971 में उन्हें नोबिल पुरस्कार मिला। वह पहले कम्युनिस्ट कवि थे इस पुरस्कार को पाने वाले। इस पुरस्कार का महत्व यही है कि लोग इसके विजेता को विश्व कवि मानने लगते हैं। यदि रवि बाबू को यह न मिला होता तो वह शायद ही विश्व कवि कहलाते। 1973 में प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित हुये। जनरल औगस्टो ने एलैन्दे सराकार पर तीखे आक्रमण किये। चिली को एक कम्युनिस्ट राज्य देखने की नेरूदा की उम्मीदें बिखर गई। उनके घर की तलाशी ली गई। यह उनकी उपस्थति में ही हुआ। सैनिकों ने चारो तरफ देख कर कहा कि सबसे बड़ा खतरा तुम्हारे लिये ‘तुम्हारी कविता’ ही है। 23 सितंबर, 1973 को नेरूदा की मृत्यु हृदयाघात से सैन्ट्यागों के सान्टा मारिया अस्पताल में हुई। उनकी अंत्येष्टि पुलिस की देख रेख में कराई गई। नेरूदा के घर को  उसी तरह उजाड़ा गया जैसे मिल्टन के घर को सैनिकों ने उजाड़ा था। उनकी पुस्तके जब्त कर ली गई। या उन्हें नष्ट कर दिया गया।

    1974 में उनके मैमौर्यस (संस्मरण) ‘I Confess I Have Lived’ पुस्तक आई। उससे लगता है अंतिम समय तक नेरूदा एक दायित्वशील कवि की तरह जिये। चुनौतियाँ दी। उन्हें स्वीकार भी किया। कठिन से कठिन जोखिम उठाये। 2012 में नेरूदा के अंतिम दिनों के बारे में भी एक पुस्तक आई है। 2011 में चीले के एक न्यायधीश ने उनकी मृत्यु के कारकों की खोज बीन कराने का अभियान चलाया है। उन्हें संदेह है कि नेरूदा की हत्या ज़हर देकर तो नहीं की गई। चीले की कम्युनिस्ट पार्टी ने मेरियो कारोज़ा नामक न्यायाधीश से निवेदन किया है कि उनके शरीर के अवशेषों का उत्खनन कराके जाँच कराई जाये। चीले के न्यायालय नेरूदा की मृत्यु के कारणों की सघन जाँच कर रहे हैं।

      नेरूदा ने कविता के स्वभाव तथा अपनी विश्वदृटि के बारे में कुछ ऐसी महत्वपूर्ण बाते कहते रहे हैं जिन्हें जान कर हम उनकी कविता को और बेहतर समझ सकते हैं। इन बातों पर हिंदी में चर्चा न के बराबर हुई है। नेरूदा ने बड़ी विनम्रता से कहा है कि वह कविता में कोई ‘समाधान नहीं देते’। यह उनकी कवि सुलभ विनम्रता है। नेरूदा की महत्वपूर्ण कविताओं में विकल्प की ध्वनियाँ बराबर सुनी जा सकती हैं। वही उनके समाधान का भी संकेत है। विश्व की कोई महान कविता ऐसी नहीं जो कलात्मक ढंग से हमें पथ न सुझाये। दूसरे, कविता से उन्होंने एक अप्रतिम प्रतिमान भी रचा है। बिल्कुल नया सौंदर्यशास्त्र निर्मित किया है। कविता के केंद्र में वह सर्वहारा के संघर्ष को लाये हैं । श्रम सौंदर्य को प्रतिष्ठित किया है। उनकी महत्वपूर्ण कवितायें कलावादी कविता के तर्क को ध्वस्त करती हैं। उस विचार को भी निर्मूल करती है कि श्रेष्ठ कविता तथा राजनीतिक विचारधारात्मक कविता में कोई गहरी असंगति है। एक बार अर्जेंटीना के एक पत्र ‘ला होरा’ में नेरूदा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण साक्षात्कार छपा था। जब उनसे पूछा गया कि उनकी गतिविधियों के बुनियादी कारक क्या हैं। उनका जवाब है मानवीय उत्पीड़न और उसके दुख के विरुद्ध संघर्ष। ध्यान रहे यहाँ दुख या उत्पीड़न किसी आध्यात्मिक अर्थ में नहीं है। बल्कि सामाजिक अन्याय से उपजे दुख के अर्थ में है। इसके लिये कुछ मनुष्य ही जिम्मेदार है। .....जो लेखक राजनीति से दूर भागता है वह मिथक है। इसका सृजन और समर्थन पूँजीवादी त़त्र ही करता है। दाँते के समय ऐसे लेखक नहीं थे जो राजनीति से सीधे सीधे जुड़ सकें। उसमें हस्तक्षेप करें। ‘ कला कला के लिये’ सिद्धांत बड़े बड़े उद्योगपतियों द्वारा सींचा और सराहा जाता है।

 उनसे पूछा गया कि  पश्चिम और पूर्व में विभाजित दुनिया के बारे में उनका क्या मत है ....क्या तीसरा युद्ध सन्निकट है! उनका कहना है कि ‘पश्चिमी संस्कृति’ शब्द का प्रचलन हिटलर जल्लाद ने किया था। मेरे लिये भारत तथा पश्चिम दोनों जगह भूख और भुखमरी पीड़ादायक हैं। सोवियत रूस का वैज्ञानिक विकास -वहाँ का शोध कार्य मेरे लिये अधिक फलदायक तथा अग्रगामी लगता है अपेक्षाकृत अमरीका में मुनाफाखोर उत्पादन के। स्टालिनग्राड ने यह साबित किया है कि मानवीय संस्कृति को संघातिक खतरे से बचा लेने का काम सोवियत अस्त्रों , मार्क्सवादी साहित्य तथा वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी ने किया है .....चैकोव्स्की, मार्क्स,  बाख, शेक्सपियर,  पुश्किन तथा पाव्लोव आदि के विचार संपूर्ण मानवता को बड़ा संबल हैं।

     पाब्लों नेरूदा देह से हमारे बीच अब नहीं हैं। पर कवि हमारी साँसो में, रगों में, आँखों की रोशनी में आज भी जीवित हैं। जीवित रहेंगे। उनका जीवन तथा उनकी कविता का महत्व हमारे लिये तभी है जब हम उन से कुछ सीख कर  उसे अपने रचना कर्म तथा जीवन में उतारें।

    कहा जाता हे चीले में नेरूदा के पास तीन मकान थे। उन तीनों के लिये सार्वजनिक रूप से अजायबघर में बदल दिया गया है। नेरूदा की एक कविता है ‘जनतां’। उसकी कुछ पंक्तियों से अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा -

उस आदमी की याद है मुझे
उसने न
घोड़े  पर की यात्रा न रथ पर
सिर्फ पैदल
मिटा दी उसने दूरियाँ
जबकि न साथ थी तलवार न कोई और हथियार
सिर्फ कंधे पर जाल थे
कुल्हाड़ी, हथौड़ा या फावड़ा
कभी नहीं लड़ा अपनी प्रजाति में किसी से:
उसका संघर्ष पानी और ज़मीन से था
गेंहूँ से ताकि वह रोटी बने
भीमकाय पेड़ों से ताकि लकड़ी बने
दीवारों से ताकि उसमें दरवाज़े खुलें
मिट्टी गारे से ताकि दीवारे बने
और समुद्र से कि वहाँ से कुछ उपजे
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जहाँ कहीं भी रहा
जो भी चीज़ उसने छुई,फूली फली
उस हठी पत्थर को
उसी के साथियों ने तोड़ा
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रोटी के पिता को भुला दिया गया
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मैं सोचता हूँ कि जिन्होंने इतने सारे काम किये
उन सबका मालिक भी उन्हीं को होना चाहिये
और रोटी पकाते हैं उन्हें वह खानी भी चाहिये

और खदान में काम करने वाले को रोशनी चाहिये
हो बहुत गया अब बेड़ी में बँधे मैले -कुचैले लोगो
बहुत हो गया अब पीले पड़े मृतको
कोई भी न रहे बगैर राज किये
एक भी स्त्री न हो बगैर मुकुट के
प्रत्येक के हाथ के लिये सोने के दस्ताने हों
अँधेरे के सभी लोगों के लिये सूर्य के फल हों।



विजेंद्र जी वरिष्ठ कवि एवं 'कृति ओर' पत्रिका के संस्थापक सम्पादक हैं।
 

संपर्क-  

Mobile- 09928242515

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(3-8-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  2. ओह ...क्या शानदार लेख है यह ...कहूं तो पूरी श्रृंखला ही ..| कितना अच्छा होता कि इस पूरी सीरीज को एक पुस्तक के रूप में लाया जाता | फिलहाल विजेंद्र जी आभार |

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  3. ye post mail kar den... print out lene hetu...

    sksaagartheocean@gmail.com

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  4. एक और बेहद महत्वपूर्ण आलेख ....विजेन्द्र जी को नमन और पहलीबार के प्रति आभार प्रकट करता हूँ |
    - नित्यानंद गायेन

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