नील कमल





जन्म-१५.०८.१९६८ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)

शिक्षा- गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर।

सम्प्रति- पश्चिम बंगाल सरकार के एक विभाग में कार्यरत।

कविता संग्रह- "हाथ सुंदर लगते हैं" २०१० में कलानिधि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित एवम चर्चित। कविताएँ व लेख मत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित (प्रगतिशील वसुधा, माध्यम, वागर्थ, कृति ओर, सेतु, समकालीन सृजन, सृजन संवाद, पाठ, इन्द्रप्रस्थ भारती, आजकल, जनसत्ता, अक्षर पर्व, उन्नयन, साखी, शेष, समावर्तन, अनहद व अन्य)। दो आरंभिक कहानियां "फ़िर क्या हुआ" (प्रगतिशील वसुधा, जुलाई-दिसम्बर २०१२) और "इंक़लाब ज़िन्दाबाद : वाया सर्पेन्टाइन लेन" (बया, अप्रैल-जून २०१३) प्रकाशित। कुछ कविताएँ व लेख बांग्ला में प्रकाशित।

'आओ बात करें/ आज दुनिया की सबसे आदिम भाषा में' जैसी पंक्ति लिखने वाले कवि नीलकमल सचमुच अपनी कविताओं में उस आदिम की बात करते हैं जहाँ कुछ भी बनावटी नहीं। एक कुदरती लगाव है, एक कुदरती सौन्दर्य है इनकी कविताओं में। यह एक पारखी कवि की ही दृष्टि है जिसमें 'सिर्फ़ फूलों-फलों से/ नहीं पहचाने जाते हैं पेड़।' बल्कि उस पहचाने जाने के पीछे और भी ढेर सारे आयाम हैं। इन आयामों को अपनी जमीन पर मजबूती से खडा कवि ही जानता-पहचानता है। यह जमीनी ताकत ही है जिसकी बदौलत कम लिख कर भी नीलकमल ने आज की हिंदी कविता में अपनी एक मुकम्मल पहचान बना ली है। तो आइए पढते हैं नीलकमल की कुछ इसी भाव-भूमि की कवितायें।
   

जब तक प्यार है..

मैं
जीवन की
सबसे लम्बी
कविता लिखूंगा
तुम्हारी हँसी के छन्द
जिसमें खिलखिलाएँगे

कई-कई
आकाश जब
तुम्हारी आँखों
की गहराई में
उतर रहे होंगे,
मैं कोई ख़ूबसूरत-सा
लफ़्ज़ तुम्हारी साँसों
की ख़ुशबू के लिए सोचूँगा

तुम्हारे
माथे की
सिकुड़ती हुई
लकीरों से शुरु
होगी मेरी कविता

रोम-रोम
उगे सन्दल
सी महकती
मेरी कविता
पृथ्वी की विशालता
को चूम लेगी

और
मैं चाहूँगा
कि यह सब
कभी ख़त्म न हो
जब तक रक्त है
साँसें हैं, प्यार है।

आम के पेड़..


दो पेड़
आम के,
एक बौराया
दूसरा उदास गुमसुम

अगले मौसम में
इसका उलट भी
हो सकता है, कौन जाने

मौसम
एक सा
नहीं रहता,
क्या आप कह
सकते हैं कि इसमें
साजिश नहीं किसी तीसरे की

पेड़ों को
पहचानते हैं
उन्हें प्यार करने वाले
उनकी हरी पत्तियों से भी

अपने
काठ से भी
पहचाने जाते हैं पेड़
आरी से चीरे जाने पर,
यहाँ तक कि पेड़ की
छाल भी एक मुकम्मल
पहचान हुआ करती है 

सिर्फ़ फूलों-फलों से
नहीं पहचाने जाते हैं पेड़

याद रखिए
जो बौराया नहीं अबकी साल
वह भी है आख़िरकार
आम का ही पेड़

वह भी देता रहा है
मीठे रसीले आम
पिछली गर्मियों तक

माचिस..

मेरे पास एक माचिस की डिबिया है
माचिस की डिबिया में कविता नहीं है

माचिस की डिबिया में तीलियाँ हैं
माचिस की तीलियों में कविता नहीं है 

तीलियों की नोक पर है रत्ती भर बारूद
रत्ती भर बारूद में भी कहीं नहीं है कविता

आप तो जानते ही हैं कि बारूद की जुड़वाँ पट्टियाँ
माचिस की डिबिया के दाहिने-बाँए सोई हुई हैं गहरी नींद

एक बारूद जगाता है
दूसरे बारूद को कितने प्यार से,
इस प्यार वाली रगड़ में है कविता।

साँड़..

उसे
सचमुच नहीं
मालूम, कि यह
है शांत हरा रंग, और 
वह लाल रंग भड़कीला

उसे दोनों का फ़र्क तक
नहीं पता, यक़ीन जानिए

वह निर्दोष बछड़ा है
किसी निर्दोष गाय का
जिसके हिस्से का दूध
पिया दूसरों ने हमेशा

वह बचता बचाता
आ गया है सभ्यता के
स्वार्थलोलुप चारागाह से
जहाँ बधिया कर दिए गए तमाम
बछड़े, खेतों में जोते जाने के लिए,
उन्हें पालतू मवेशी में बदल दिया गया

साँड़ को बख़्श दीजिए
अफ़वाहें न फैलाइए कि
भड़क जाता है वह लाल रंग देखकर

यह कैसा भाषा-संस्कार है आप का
कि जिसमें बैल कहलाए, जो पालतू हुए, और
जिन्हें पालतू नहीं बना सके आप, वे साँड़ कहलाए ।

भाषा-व्याकरण..

आओ बात करें आज
दुनिया की सबसे आदिम भाषा में

लाओ अपना हाथ मुझे दो
बस थोड़ी देर थामूंगा उसे
इस थामने में ही समाई होगी
एक भाषा और उसका पूरा व्याकरण


सम्पर्क
२४४, बाँसद्रोणी प्लेस  
(मुक्त-धारा नर्सरी-के.जी. स्कूल के निकट), 
कोलकाता-700070
 

मोबाइल- 09433123379

E-mail: neel.kamal1710@gmail.com



टिप्पणियाँ

  1. भाई नीलकमल की कवितायें सदा आकर्षित करती हैं मुझे … शुक्रिया संतोष भाई फिर से पढवाने के लिए …

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    1. त्वरित टिप्पणी के लिए आभार मनोज भाई.

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  2. शानदार ... कुछ विम्ब और सवाल तो बेहद मारक और उम्दा हैं ..बधाई नील कमल जी को

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  3. एक बारूद जगाता है
    दूसरे बारूद को कितने प्यार से,
    इस प्यार वाली रगड़ में है कविता।

    बहुत अच्छी कविताएं नील कमल की। नील कमल मेरे प्रिय कवियों में से हैं। यहां उनकी ताजा कविता पढ़कर बहुत अच्छा लगा। बधाई....।।

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  4. जब से कविता अस्तित्व में आई है इसकी परिभाषा भी दी जाती रही है। संस्कृत के कवियों वाल्मिकी ,मम्मट भवभूति कालीदास से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और धूमिल से आज तक परिभाषा में कविता का विस्तार दिखता रहा है। कविता के कथ्य और शिल्प के अन्तर संबंधो को लेकर भी निरंतर बातचीत होती रहती है। रूसी कवि रसूल हमजातोव ने मेरा दागिस्तान जैसी महान पुस्तक ही लिख डाली। इस विषय पर कल मैं अपनी तलाश के क्रम में कवियों की पृथ्वी पर लगे ब्लाग पहली बार पर नील कमल की एक छोटी सी कविता पढकर दंग रह गया और घंटो सोचता रहा। शिल्प और कथ्य के अंतर संबंध को यह कविता जिस तरह व्यक्त करती है इसकी मिसाल मुझे अब तक कहीं नहीं मिली।

    मैं चाहता हूं कि आप भी इसे पढे और कविता में आए महज तीन शब्द जो कवि की भूमिका है ( कितने प्यार से ) की रगड को शिल्प और कथ्य के बीच महसूस करे जिसकी आंच पर कोई कविता पकती है और कवि आकार लेता है। यह प्रश्न भी है और पैमाना भी। कविता का शीर्षक है माचिस। ( निलय उपाध्याय के फेसबुक वॉल से साभार)

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