स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण 'एक सिनेमाबाज की कहानी-1'।
स्वप्निल श्रीवास्तव सिनेमा एक ऐसा माध्यम जिससे शायद ही दुनिया का कोई व्यक्ति अपरिचित हो। तकनीक के क्षेत्र में सिनेमा ऐसा माध्यम साबित हुआ जिसने दुनिया भर की संस्कृति और परिवेश को व्यापक तौर पर प्रभावित किया। इंटरनेट के युग ने सिनेमा के पुरातन स्वरूप में भी काफी बदलाव कर दिया है। खैर हम यह कह सकते हैं कि तब वह एक जमाना हुआ करता था और फिल्मों के पहले शो का टिकट हासिल करना और फ़िल्म देखना एक उपलब्धि की तरह होता था। ऐसे लोगों को ' सिनेमाबाज ' कहा जाता था। यह उपाधि बहुत हद तक नकारात्मक सेंस में होती थी। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव आजकल संस्मरणों की एक श्रृंखला लिख रहे हैं। हाल में ही उनके संस्मरण की एक उम्दा किताब ' जैसा मैंने जीवन देखा ' आयी है। संस्मरण लिखने का उनका सिलसिला आज भी अबाध चल रहा है। हमारे अनुरोध को स्वीकार कर उन्होंने अपने संस्मरण पहली बार को नियमित रूप से उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है। इसी क्रम में आज पहली कड़ी की हम शुरुआत कर रहे हैं। आज पहली बार पर प्रस्तुत है स्वप्निल श्रीवास्तव का संस्मरण ' एक सिनेमाबाज की कहानी ' । एक सिनेमाबाज...