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विनय उपाध्याय की कविताएँ

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विनय उपाध्याय रोजी-रोजगार का क्रम कुछ ऐसा होता है जिसमें न चाह कर भी आदमी को अपना घर-परिवार-जमीन-देस छोड़ना पड़ता है. लेकिन अपनी जमीन से बिछड़ने की टीस हमेशा रहती है. कवि विनय उपाध्याय ने इस अहसास को खूबसूरती से अपनी कविता में व्यक्त किया है. तो आज पढ़ते हैं विनय की कविताएँ जिसे हमें उपलब्ध कराया है चित्रकार-कवि मित्र के रवींद्र ने. विनय उपाध्याय की कविताएँ डायरी फिर सम्हाल कर रख दी है मैंने   सुन्दर जिल्द वाली डायरी   शायद काम आ सके किसी दिन   जैसे यह पुरानी डायरी जिसके क्षत-विक्षत   कुछ - कुछ ज़र्द हो चुके पन्नों पर   एक दिन उकेर दी थी मैंने   ज़िन्दगी की धूप-छाहीं इबारतें   डायरी के इन्ही पन्नो पर लिखते-लिखते   एक दिन हार गयी थी कलम छोड़ दी थी मैंने खाली जगह   कागज़ के मौन में भी   अक्सर पढ़ लेता हूँ कुछ रेशमी कवितायें   भले ही चिन्दियों की नियति से गुज़र रहे हों   पुरानी डायरी के पन्ने   पर नयी डायरी के सामने   अब भी उजले हैं पुराने हस्ताक्षर   महफ़िल तुम्...