स्वाती ठाकुर




स्वाती ठाकुर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की शोधार्थी हैं। इनकी कविताओं में एक ताजगी है। यह ताजगी उस युवा स्वर की है जो यह बेहिचक कहती हैं- 'मैं बचाना चाहती हूँ/ प्रतिरोध की उस ताकत को/ जो हममें आग भरता है/ लड़ने को/ विषमताओं के विरूद्ध।' किसी भी समय की रचना मुख्यतः प्रतिरोध का स्वर होती है। यह सुखद है कि हमारी इस युवा कवियित्री में प्रतिरोध का यह स्वर और प्रतिरोध की यह ताकत बनी और बची हुई  है। पहली बार पर प्रस्तुत है स्वाती की कुछ नवीनतम कविताएँ। 



मैं बचाना चाहती हूँ,

मैं बचाना चाहती हूँ,
उन स्मृतियों को,
जिनमें हम साथ थे,
उस छुअन को,
जिसमे जीवित कुछ एहसास थे!


मैं बचाना चाहती हूँ,
उस हिम्मत को,
जिसके बल पर
लड़ सकूँ
अपने 'स्वत्व' के लिए!


मैं बचाना चाहती हूँ,
प्रतिरोध की उस ताकत को,
जो हममें आग भरता है,
लड़ने को,
विषमताओं के विरूद्ध


मैं बचाना चाहती हूँ,
उन सच्चे एहसासों को,
जो हममें जीवन भरते हैं
उन अठखेलियों  को,
जो गायब होते जा रहे हैं,
उन स्वाभाविक अट्टहासों को,
जो भद्रता की आड़ में,
दबा दिए जा रहे हैं,


मैं बचाना चाहती हूँ
उस महक को,
जो अपने जमीन से आती है!


मैं बचा लेना चाहती हूँ
गहरे अंधकार के बीच भी,
उजाले की एक छोटी सी किरण को!!


'सच' और 'सही' /जूझना ही तै है

तमाम कोशिशों के बाद,
फिर से,
वही सच सामने आया,
जो सही नहीं है,
जिसे चाहती थी बदलना,
क्योंकि मैं,
मानती रही हूँ,
कि,
सच और सही,
एक हों सदा,
यह जरूरी नहीं।
आज भी,
कायम तो है ही,
मेरा यकीं,
पर थका पाती हूँ,
खुद को,
सच की विरूपताओं से,
लड़ते लड़ते,
अपनों ने दिया साथ,
समय के सच का,
और मेरी पक्षधरता,
रही सही के संग।
सो,छूट चला है,
आज,हर साथ,
टूटती हूँ यक़ीनन,
फिर भी,
जाने कहाँ से,
पाती हूँ विश्वास...
औ कहती हूँ खुद से,
जूझना ही तै है!!!




कविता

तुम कहते हो,
कुछ नया लिखो,
दुहराव सा है,
तुम्हारी बातों में,
सच ही कहते हो शायद,
पर क्या करूँ,
कहाँ से लाऊँ,
बड़े बड़े विचार,
तुम्हारे जैसे,
कला तुम सी,
पिरोने की,
शब्दों को,
किसी ने कहा था,
बहुत जतन करने पड़ते हैं,
पोसना पड़ता है,
शब्दों को,
बड़े प्यार से,
बन पाती है ,
तब कहीं
कोई कविता
और मैं तो,
पोसती रहती हूँ
अपने,
अनुभवों को,
स्मृतियों को,
एक घेरा सा बना हुआ है,
और उसके भीतर
कैद मैं,
बुनती रहती हूँ,
स्मृतियों को!!



क्या कुछ भी, बचा है हममें,

एक ही बिंदु,
से जन्मे,
दो अलग-अलग,
वृत्त हैं हम।
पर देखो तो,
क्या कुछ भी,
बचा है हममें,
एक-सा...!!



(इस पोस्ट में प्रयुक्त सभी चित्र गूगल से साभार लिए गए हैं।)

संपर्क-
80'ए' ढक्का
भाई परमानन्द कॉलोनी
मुखर्जी नगर
दिल्ली।

ई-मेल: chotimailme@gmail.com

टिप्पणियाँ

  1. मैं उस घेरे को जानता हूँ , इसलिए नहीं कहता कि इनमे दुहराव सा है , या कि आप कुछ नया लिखिए | वरन मैं इनका आगे बढ़कर स्वागत करता हूँ | बधाई आपको |

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बहुत आभार सर आपका ... मेरी कविताओं को अपने ब्लॉग में स्थान देने के लिए भी और उनपर टिप्पणी के लिए भी ... प्रतिरोध का स्वर तो है, उसे दबाने की कोशिश भी की जाती है, मैं कितना उसे बचा पाती हूँ और अपने लेखन में कितना उसे उकेर पाती हूँ, ये आप सुधी जन ही बता पाएंगे। एक बार फिर से आभार !!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर रचनाएँ।
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायेँ ।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. शुक्रिया सर .. आपको भी भी नव वर्ष की शुभकामनायें

      हटाएं
  4. सभी कविताएं सीधी, सरल और सार्थक...बधाई आपको...

    उत्तर देंहटाएं
  5. Swati jee aapki kavitain Aam paathak ko sahaj aakrshit krne vaalee hain.
    Aapko isse aage ki kavitai ke liye haardik shubhkaamnain. Badhai. Santosh jee Abhaar. - Kamal Jeet Choudhary ( J n K )

    उत्तर देंहटाएं
  6. bahut bahut dhanyawad tippani aur shubhkamnayen dono ke liye...!!

    उत्तर देंहटाएं
  7. Khate, meethe, kadve anubhavon se jujhtee huee saral kavitain. Bahut bahut shubh kamnaon ke sath badhaai swati ji

    उत्तर देंहटाएं
  8. जन्मदिन की बधाई. कवितायें पढ़ीं. कुछ व्याकरण की ग़लतियाँ खटकती हैं. साथ में अभी कवितायें संपादन की मांग करती हैं. उम्मीद करूँगा कि वह और सुगठित तथा मानीखेज़ कवितायें लिखेंगी. शुभकामनाओं सहित

    उत्तर देंहटाएं
  9. अंतिम कविता की धार और मार्मिकता बेजोड है . कम से कम शब्दों में एक बड़ा सवाल , जिस पूछने की हिम्मत आज भी जुटाना मुश्किल है .

    उत्तर देंहटाएं
  10. मार्मिक कवितायेँ ---बधाई और शुभकामनायें
    ----रतीनाथ योगेश्वर

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें