नीलमाधव



                                                             (नीलमाधव)

जन्म तिथि :   4/9/1967, पटना, बिहार 
नीलमाधव चौधरी 
पिता का नाम : स्व  श्री राजकमल चौधरी 
विवाह : 1995 में श्रीमती  नूतन चौधरी निवासी धाकजरी मधुबनी से 
शिक्षा : प्रारंभिक  शिक्षा ग्रामीण परिवेश में, फिर पटना, कटिहार, दिल्ली
मिडिल क्लास उग्रतारा माध्यमिक विद्यालय महीसी  से 1979 में उत्तीर्ण
नवीं एवम्‌ दसवीं  की परीक्षा आसों देवी प्यारे झा हाई स्कूल महिसी सहरसा  से किन्तु मैट्रिक बोर्ड  कि परीक्षा सीता मुरलीधर  हाई स्कूल बसैठ मधुबनी से तत्पश्चात पटना ए एन कालेज से स्नातक , एवम्‌ डी एस कॉलेज कटिहार (एल एन एम यु दरभंगा) से  
स्नकोत्तर इतिहास की पढाई पूरी की.
गृहस्थ जीवन कि शुरुआत बिनय कर्बोनिक्स से , फिर अजन्ता पब्लिकेशन , जी सी एल , सैटिन क्रेडिट केयर लिमिटेड, ..
सम्प्रति - आधार श्री ग्रुप में सेल्स मैनेजर के पद पर  कार्यरत


ख़ुद को दिया हुआ  चन कि पिताजी की रचनावली जब तक प्रकाशित नही हो जाती स्वयं की रचना नही प्रकाशित करेंगे. वैसे उम्मीद नही थी कि इतना ज्यादा समय लग जयेगा. 23 साल पह्ले राजकमल प्रकाशन से अनुबंध हुआ था अब प्रकाशित हो रही है. हिन्दी प्रकाशक अब भी आर्थिक रूप से इंग्लिश प्रकाशन की होड़ नही कर सकता .पता नही क्यों हम हिन्दी को राष्ट्रभाषा मान बैठे है.

(पिता राजकमल चौधरी द्वारा नीलमाधव के बचपन की ली गयी एक यादगार तस्वीर)

नीलमाधव जी प्रख्यात साहित्यकार राजकमल चौधरी के सुपुत्र हैं। साहित्यिक संस्कार इन्हें विरासत में मिला है। नीलमाधव जी की कवितायें आज कल के हालात, राजनीति और पूंजीवाद की विडंबनाओं पर सीधा प्रहार करती हैं। एक सजग कवि होने के नाते नीलमाधव अपने कवि दायित्वों के प्रति पूरी तरह सजग और सचेत है। इसीलिए वह जनता को सीधे तौर पर जगाने का आह्वान करते हैं। 

कहीं पर भी प्रकाशित नीलमाधव की ये पहली कवितायें हैं। नवागत के स्वागत
के साथ-साथ प्रस्तुत है नीलमाधव जी की कवितायें। 

 


उन्हें तो जगाया जाय

उफनती हुई नदी को छेडने
की हिम्मत कर भी लिया कभी
इस पागल दिल ने
तो भी ये संस्कारगत
आत्मबोध
कहाँ हमेँ पत्थर फेँकने की
इजाजत देता हैँ सराह तो लोग जरा सी बात पर देते हैँ
मौका मिला नही
कि ताली बजा देते हैँ
पर जरा सोचिए उन पे क्या गुजरती है
जिन्हेँ
जिगर के टुकडे की तिरंगे मे
लिपटी लाश मिलती है
बचपन के बहाने
या जवानी की आड में
जब भी जीवन के प्रति उत्सुकता जगी
कोई आरुषि
कोई परी
तो कोई फलक
तो कोई और
तो कोई और
आखिर कब तक
सच जीवन की संपन्नता
सार्थकता
भ्रम लगने लगता है
सारी सभ्यता संस्कृति
मोडर्नाइजेशन
हाईटेक दुनियाँ झूठ लगता है
ये बंधन
ये टूटन
ये बिखराव
स्वंय को एक अलग पंक्ति मेँ
पाने की स्पृहा
एक सुनियोजित वीभत्स
षडयंत्र का शिकार
हमारा तंत्र
पाने की सिर्फ पाने की हवश
बात सिर्फ नफा-नुकसान की
ईन्सानियत की बात
बीते जमानोँ की बात
ये घृणित प्रेरणा हमारे युवाऔँ मेँ
सिर्फ एक योजना कैसे
वैभव के भवन को मजबूती दी जाय
किसी के प्राणोँ के उत्सर्ग पर
राजनीतिक प्रपंच ना किया जाय
चाहे वो आईपीएस ही सही
स्वतः ही राजनीतिक मजबूती मिलेगी
जनता की घनघोर सहानुभूति मिलेगी
सुनोँ हमारे हमवतन साथियों
संभव नहीँ
हर एक की अवधारणा को एक साथ परिवर्तित करना
पर इतना तो किया ही सकता
जिनकी आत्मा जागृत है
उन्हें तो जगाया जाय



प्रश्न अभीष्ट

सजल नेत्र मेँ सिर्फ करुणा थी या था प्रेम का अनुनय-विनय
कई बार की कोशिश मन पढने की पर हर बार ही रहा संशय।
इस मनुज स्वभाव की कथा अनंत कब किस ओर ले धारा मोड़
किस बात पे गूँजे शहनाई किस बात पर छिड़ जाए रण-घनघोर।
वीणा की तार ये जीवन मैँ अनभिज्ञ असभ्य-अशिष्ट
क्या सुर निकलेगा इस लय से नासुलझ सका ये प्रश्न अभीष्ट।


कैसे स्वीकार करुँ मैं

भूले जिनको अर्से हो गये उनको क्या अब याद करुँ मैं।
शिथिल प्राण से नवकलियोँ का बोलो क्या श्रृँगार करुँ मैं।
सुबह किरण की लाली फुटती तब जाके कुछ चैन मैं पाता
समझ ना पाया काली रातो का कैसे प्रतिकार करुँ मैं।
ये भी तो अब याद नहीँ छायी कब थी हरियाली
मन-मधुबन मेँ नवजीवन का बोलो कैसे संचार करुँ मैं।
पल दो पल के प्यार के खातिर कोई सारी खुशियाँ ले ले
इन भीँगे नयनोँ से कैसे खुशियों का इजहार करुँ मैं।
हमने तो पहले जाना था अपनी किस्मत ही है ऐसी
परतु है इस जहाँ का मालिक कैसे स्वीकार करुँ मैं।



उठो वत्स रुको नहीं मिली अभी मंजिल नहीं


गए पैंसठ साल, अब भी हम वहीं ठहरे हुए                                         
इंतजार की वहीं लम्बी इन्तहां
देखते ठीक उसी तरह
जैसे कि अंग्रेजी हुकूमत में
हमारे बाबा-दादा किया करते थे
न्याय के लिए, अधिकार के लिए, स्वाधीनता के लिए                                      
मगर फर्क है                                                   
एक महीन मगर महान फर्क है
तब उम्मीद ही कहां होती थी रहम की
बेबाक हो हम विरोध करते थे
हंसते-हंसते जां भी देने से गुरेज नही करते थे
मगर अब आजादी के पैंसठ साल बाद किसी भी स्वदेशी सरकारी कार्यालय के                            
एक दो बार के परिचय से ही सहम जाती है उम्मीद
शिकायत क्या किससे,
कौन सुन रहा है अन्ना की वापसी हो या रामदेव का चातुर्य-पलायन
इतना तो जरुर बता गया
कि हम आजादी का सिर्फ और सिर्फ ढोंग करते हैं
अब भी हम सर से पाँव तक परतंत्र हैं
दोषी कौन?
जनता ?
मीडिया ??
सरकार ???



अब तो हमें जग जाना चाहिए

इतनी तेज तरक्की के बाद ईन्सान प्रसन्न नही हो पाता
खुशी हम से दूर हो गयी है
मासूमियत हमसे छीन ली गयी है
मायूसी मायूसी मायूसी
खौफ, जीवन का खौफ
कल का खौफ
आने वाला कल क्योँ भयावह लगने लगा है
असुरक्षा की भावना निकल नहीं पाती आम जनता से
सेना प्रमुख तक स्वयं को असूरक्षित महसूस कर रहे हैं
दिन ढलता नहीँ कि धमाके दिल्ली से मुम्बई पहुँच जाते हैं
पर कदम किसी के रुकते नही
शहर घंटा दिन-सप्ताह के बाद पुनः उसी रफ्तार से चलने लगता है
सजने लगता है सँवरने लगता है देर-सवेर
पुनः वही रफ्तार
सब सामान्य
मगर थम जाते है कई जोडे आँखे किसी एक माला सहित तस्वीर पर
हे भारतीय सपूतो, इन आँखो की नमी को स्वीकार करो
इनमेँ कोई बनावट नहीँ
कोई नाटकीयता नही है
सच्चे निरीह-कमजोर रुह की दयनीयता है
इन आँखो मेँ समायी है भयंकर खौफ
कल-कल-कल कोई नही पूछता
पापा कहाँ गये
भैया कहाँ गया 
बेटा कहाँ गया
कोई नही पूछती कि उसके माथे का सिन्दूर क्योँ पोँछ दिया गया
हमारी ललनाएँ वीरांगनाएँ है
सहन कर लेती सारी वेदनाएँ
शहीद की विधवा माँ बहन बन कर
मगर प्रश्न वहीँ
कब तक हम गद्दारोँ व देशद्रोहियोँ के किए कामो की सजा भुगतते रहेंगे
दायित्व किस का
कल की क्या गारँटी
हम कब तक छद्मवार्ताओ का दामन थामे
अपने सीने पर चोट खाते रहेंगे
अब तो हमेँ जग जाना चाहिए क्या?



हमारी संसद हमारे सांसद?

रोक रखा है तुम्हीँ ने हमारे प्रगति की राह को।
अब अपने अपने स्वार्थ तुम्हे तजना होगा।
अब आसान नहीँ हमारी राह का रोडा बनना
हट जाओ मेरे मार्ग से वरना अब कुचलना होगा।
कब तलक यूं बातों से बहलाते रहोगे
भूखी खोई जनता को कोला व पोपकोर्न खिलाते रहोगे
देख ली तेरी विश्व एकता।
एक वृत के अन्दर सारी दुनियाँ।
हर एक की अलग दुनियाँ।
घर के सदस्य सभी साथ-साथ पर अलग-अलग।
अपनी जमीर तक तो सँभाला जाता नही
देश को कितना नेक, ईमानदार बना पाओगे।
विकास की बात करते समझ आता
प्यार व सम्मान की बात करते समझ आता
पर नहीँ
फरेब का महाजाल फैलाओगे।
कोन तेरी इन बातो पर इज्जत करेगा
समय है छोड दो मार्ग।
सुख से मर पाओगे
जीते जी तो कुछ हासिल ना कर सके
मर कर खुद को अमर कर जाओगे।



हँसी छीन ली तुमने

पहले हमारे चेहरे से
अब हमारे निवाले पर तेरी ये गिद्ध नजर
कहूँ क्या ना कहूँ कैसे हमारे रखवाले
जिस्म पर तो नजर है पर पेट से बेखबर
इक फूल खिले इस चाहत मेँ पूरे बाग को यूँ वीरान किया
नापाक इरादे ने तेरे पूरे देश को था हैरान किया
मत करो मान –सम्मान की बाते भूख से अभी बिलख रहे अपने बच्चे
ये देश लो समाज लो
लो ये लोक-लाज लो
सब फरेब है सिर्फ एक तुम सच्चे
हर बात मानूंगा
पेट की ज्वाला जागृत है
कुछ भी नही बाँकी
सब तुम्हे ही अर्पित है
बस इतना सा करो मुझ पर उपकार
तुम चुपके से दे दो जहर कह दो ये अमृत है

तुम्हारे इस सभ्य समाज की सभ्यता पर हँसी आती है
फूल तो खिलते है रोज
पर खुशबू ना ठहर पाती है हर मुकाम हासिल है
सिवाय इन्सानियत के
ईन्सानियत के नाम पर नजर झुक जाती है
चाँद तभी तक चाँद है
जब तक साथ सितारे है
तुम भी तब तक जगमग हो
जब तक हम तुम्हारे है
जब छोर सितारो का दामन चाँद निकल आगे आता है
तब देखो स्वयं चाँद का अस्तित्व ही मिट जाता है



बंद का क्या औचित्य?                                                        

क्यौं? किसलिए?
और अन्ततः किसके लिए ?              

इब्तदा तो हो चुकी
इन्तहॉ बॉकी है छिटपुट बम फुट रहे हैं
ये तो बस झॉकी है
कहते है बेजार कर दिया जाएगा उनके लिए दुनियॉं
जो गर्भ में पनप रहें हैं
जिनका इस दुनियॉ में आना बॉकी है
किस नस्ल के है ये लोग?
क्या खा-पी के पले बढे हैं?
किस दुनियॉ से ये रिश्ता रखते हैं?
किस कौम से इनका नाता है?
नही ये नही हो सकते हमारे देश समाज संसार के प्राणी
जरूर ये अदेशी असामाजिक अ-संसारी हैं
मगर बन्धु कहॉ के हैं ये?
ये प्रश्न निरूत्तर है ये प्रश्न असत्य है
सत्य है तो बस इतना कि
देश समाज दुनियॉ ही इनके लिए उत्तरदायी है
संस्कार कभी भी गलत ढंग से पैसे कमाने की इजाजत नहीं देता
और और ये हमारे नेता सही राह पर हमें चलने नहीं देते
फिर हमारे क्रूर नियम कायदे?
व्यवस्था आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त
आम जनता करें तो क्या ?
आंदोलन बंद चक्का जाम उपद्रव
मगर इसमें पिसता कौन?



मन के आशियाने में

नीन्द भूख दहशत और क्या है तेरे ठिकाने मेँ जिन्दगी
मै ठगा सा रहा तुझे आजमाने मेँ
कभी मिला जो मौका करीब आने का
रह गया मैँ रुठने मनाने मेँ
बेबाक हो के कहुँ भी तो किससे कहुँ
सुनने को बचा ही कौन जमाने मेँ
जिसे देखूँ मुझसे ज्यादा परेशां है
खुशी बची कहाँ अब इस खजाने मेँ
सुनो वत्स ये समय का कालचक्र रुकेगा नही
किसी भी बहाने मे
रुको जो रुक सको पल भर के लिए
शुकुँ व समन के आशियाने मेँ।


अब हम नही जाते

नही अब हम नही जाते मंदिर-मस्जिद शांति के लिए
नही अब हम नही देते अपनी जान क्रान्ति के लिए
अब हम स्वयं को नहीँ सुख-समृद्धि को बचाना चाहते
निकल जाता बेबस प्राण बेवजह किसी भ्रांति के लिए।
ना तुम्हारे दूध का ये दोष है
ना हमारा खुन ही कसुरवार है
है कमी तो हमारे सोचने-समझने की
है जिन्दगी को हमने ही बना डाला व्यपार है।
हम अपनी सोच से अलग जा पाते नहीँ
सिवाय दर्द-तडप के कुछ और गुनगुनाते नहीँ
क्या नही है अपने पास जिसके लिए होँ हम बेचैन
अपने आप ही अपनी भी रक्षा कर पाते नहीँ।
और थोडा और इस और का है अन्त कहाँ
हर फूल पे बहार हो ऐसा कोई बसंत कहाँ
चाहत
की ज्वाला मेँ सुन्दर मन खाक किया
बीते पल को जो लौटा दे हुआ ऐसा संत कहाँ।
मेरी आवाज सुनोगे अभी ना सही फिर कभी रुह तो तेरे भी काँपेन्गे
अभी ना सही फिर कभी पर
तब तुम्हारे पास ना जज्बा ना आलम होगा
वहीँ जा के तुम भी रुकोगे जहाँ रुक जाते सभी।


फिर मानुष क्योँ रोता है।

आँखो मेँ जब अंगारे हो
अश्क कहाँ तब बहता हैँ,
जिस्म के घाव तो मिट जाते
जख्म जिगर कब भरता हैँ|
रो-रो कर था हाल बुरा
जब अपना कोई बिछुडता था,
शायद वो बचपन के दिन थे
अब देख उन्हे डर लगताहै|
जीवन उन्माद मेँ डुबा हो तो कहाँ सता पाता है भय,
रोज कहाँ से खुशियाँ ढूंढूं जीवन संचय जीवन-संशय।
जीवन सांस की लय टूटी
कि पल भर मेँ सब खोता है
अंतिम सत्य यहीँ जीवन की
फिर मानुष क्योँ रोता है


तस्वीर साफ है।

हमारे देश के लिए गरीबी अभिशाप है
हमारे महामहिम महोदय ने कहा है
सर्वप्रथम इस ओर ध्यान देन्गे
भुखी जनता को भरपुर ज्ञान देन्गे
अमीरोँ की लो संगत सपनो का साथ होगा
जिधर भी कदम बढेन्गे अपनो का हाथ होगा
क्या रखा है इमानदारी के तहखाने मेँ
ढेर सारा धन पडा है देश के खजाने मेँ।
खुब तलाश लो इमानदारी मेँ सिर्फ और सिर्फ संताप है।
तस्वीर बिल्कुल साफ है।
पैसे से मर्यादा पैसे से पुरुषत्व पैसा जो पास हो पास सारे गुण-तत्व
पैसे से इज्जत पैसो का राज है
पैसा से देश पैसो से समाज है
समझो हे जनता-जनार्दन
जो अब तक राज है
पैसो से जिन्दगी पैसो से ताज है।
ना समझे अब भी तो सामने विलाप है।


ये बाग तो सजा था

ये बाग तो सजा था कि हर फुल पर बसंत हो
हुआ किया ऐसा किये
अन्त के करीब है हर फुल पर निखार था
हर कली जवान थी
हुआ क्या कुछ ऐसा सब एक दुसरे के रकीब है
पुरे होँशो-हवास मेँ हर पौध को सीँचा गया था
झोँक दी थी पुरी ताकत
हर पौध को निखारने सँवारने में
गुलशन तो सजा चमन का मिजाज
फिर बिगडने लगा हर माँ की चाहत हर बाप का अरमान
दुनियाँ मेँ नाम करेँ सन्तान हर
एक वो प्रयास जिससे उसकी नीँव मजबुत हो
वह तो शिखर पे पहुँच गया पर मिटता गया
दे का सम्मान अपना कैरियर अपनी दुनियाँ
अपनी समस्याएँ हर एक की
अपनी एक सीमा है
हर अगली पीढी पिछली पीढी की निगाह मेँ
सीमा का अतिक्रमण करती रहती है
और वो देखने को विवश है।


संपर्क : 
के : 1071 , सेक्टर : 23
संजय नगर गाज़ियाबाद (यु पी)
मोबाइल नम्बर : 09818757445
                           09811757664
e-mail: bluealways4u@gmail.com.co.in

(कविताओं में प्रयुक्त सभी पेंटिंग्स सतीश गुजराल की हैं जिन्हें हमने गूगल से साभार लिया है।)

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (20 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  2. Aap mere priya kavi Raajkamal choudhary ke bete hain. Badi khushi hui aapkee kavitain padkar. Abhaar

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