कुमार कृष्‍ण शर्मा



कुमार कृष्ण  का जन्म अखनूर और जम्मू के लगभग बीच में अवस्थित पुरखु नामक गाँव में १३ अगस्त १९७४ को हुआ. महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर से इन्होने बी.एस-सी. (कृषि) की पढाई पूरा किया. इन्होने  सन 2008 से ‌हिंदी में कविताएं लिखना शुरू किया। 2003 से हिंदी दैनिक अमर उजाला जम्मू के साथ पत्रकार के तौर पर आज तक काम कर रहे हैं। भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान, पा‌किस्तानी गजल गायिका फरीदा खानम, संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा, डा. नामवर सिंह, ज्ञानपीठ प्राप्त  प्रो. रहमान राही आदि का साक्षात्कार कर चुके हैं। जम्मू कश्मीर के हिंदी कवियों की कविताओं पर आधारित किताबतवी जहाँ से गुजरती है में शामिल। विभिन्न पत्रिकाओं में छपने के अलावा रेडियो, दूरदर्शन और जम्‍मू कश्मीर कला, संस्कृति और भाषा अकादमी की ओर से आयोजित कवि सम्मेलनों में शिरकत।  

हिन्दी कविता का वितान व्यापक है. जम्मू  जैसे सुदूरवर्ती राज्य में  भी हिन्दी कविता अपने समृद्धतम रूप में दिखाई पड़ती है. यहाँ की आबो-हवा, परिवेश और पर्यावरण, समकालीन सामाजिक सन्दर्भों के साथ इस कविता में सुरक्षित है. खासतौर पर हमारी युवा पीढ़ी कविता लेखन जैसे गैर उपभोक्तावादी सरोकारों से गंभीर रूप से जुडी है. कुमार कृष्ण एक ऐसे ही युवा कवि है जो पत्रकारिता जैसे पेशे से जुड़े होने के बावजूद ऐसी संवेदनशील कवितायें लिखते हैं जो अनायास ही अपनी तरफ हमारा ध्यान आकर्षित कर लेती हैं. ‘उसका जिक्र’ इनकी ऐसी ही एक कविता है. जिसमें प्रियतमा के साथ प्रकृति ऐसे गुंथी हुई है कि उसे अलगा कर इन दोनों को ही नहीं समझा जा सकता. पहली बार पर इस नवागत कवि का स्वागत.     



लक्ष्मण रेखा और सीता  

रावण रूपी पाप को 
जड़ समेत उखाड़ फेंकना  हो 

निरंकुश और सत्ता पिपासुओं के बीच
रामराज्य की उत्कृष्टता को जनना हो 

मर्यादा, पत्नी धर्म और समर्पण की
पराकाष्ठा को जानना हो 

तो 

जरूरी है
सीता का
लक्ष्मण रेखा को लांघ जाना। 

नारी जाति के विरुद्ध
चलाए जो रहे षडयंत्रों के
इस खतरनाक दौर में
हे नारी स्वाभिमान की प्रतीत सीते
तुम्हें कोटि कोटि प्रणाम। 

अगर तुम नहीं लांघती 
लक्ष्मण रेखा
तो कोई नहीं मनाता
दीपावली और विजय दशमी का पर्व
तुलसी
नहीं रच पाते
रामचरितमानस
कोई दल नहीं लेता
तेरे पति रूपी बैसाखी का सहारा
सत्ता की कुर्सी हथियाने के लिए
श्री राम
राम ही रहते। 

आडंबर के आवरण से लेकर
लक्ष्मण रेखाओं की सीमा को
हर युग में
सीता को ही
तोड़ना होगा लांघना होगा 

तभी तो परास्त होंगे असुर
तभी तो प्रज्जवलित होगा प्रकाश
तभी तो स्‍थापित होगा धर्म
धर्म जिसकी जय हो
अधर्म जिसका नाश हो। 

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उसका जिक्र 

उसके
डोगरी लोक गीतों जैसे
चेहरे को पढ़ कर ही
मैंने लिखी है
कविता।
उसकी
तुंबकनारी जैसी
गुफ्तगू सुन कर ही
मैंने समझी है
गजल। 

उसका
कविता गजल का वजूद
मानो
वितस्ता का ठंडा पानी
तवी के गर्म पत्‍थरों से
टकरा कर उछल जाए
जैसे
लल के वाख को
कोई भाख के सुरों में
पिरो कर गा दे
जैसे
डल के ठहरे पानी में
चिनाब का यौवन मिल जाए। 

उसकी
रोउफ जैसी चाल को
देख कर ही
मैंने किया है कुड।
उसकी
बर्फ जैसी खामोशी को सुन
मैंने समझी है
गर्म हवाओं के थपेड़ों की भाषा। 


उसका रोउफ बर्फ जैसा सिरापा 
जैसे
चिल्ले कलान की बर्फ में
ज्येष्ठ की लू मिल जाए
जैसे
शीन मुबारक
कोई बैसाखी के ढ़ोल की थाप पर दे रहा हो
मोनो
पतझड़ के चिनार के तंबेई रंग में
कोई कच्चे आम की खटास मिला जाए। 

उसको पढ़ लेना
उससे बात कर लेना
संग उसके चलना
उसकी खामोशी से गुफ्तगू करना
कविता पढ़ लेना है
गजल लिख लेना है
नाच उठना है
मुस्कुराना है। 



तुंबकनारी - कश्मीर पारंपरिक वाद्य यंत्र
लल - कश्मीर की शिव भक्तन
भाख- डोगरों की पारंपरिक गायन शैली
रोउफ- कश्मीर की पारंपरिक नृत्य शैली
कुड- डोगरों की पारंपरिक नृत्‍य शैली
चिल्ले कलान - कश्मीर की सर्दियों के सबसे ठंडे चालीस दिन
शीन मुबारक - कश्मीर में सीजन की पहली बर्फबारी होने पर शीन मुबारक कहा जाता है 

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हमारे समय का ईश्वर  

हमारे समय के ईश्वर के
एक कान में
खाज हो गई है
सितार, गिटार, रबाब की आवाजें सुन 
उसमें खारिश शुरू हो जाती है   

हमारे ईश्वर की
जीभ आधी है
उसे लाल रंग का खून तो पसंद है
लेकिन लाल रंग का पानी नहीं। 

हमारा ईश्वर काना भी है
भेड़ों की रंग बिरंगी ऊन
कबूतरों के पंख
मुरगाबियों की परवाजें
उसकी
सलामत आंख को
चुभती हैं। 

मेरी छोड़ो
आप बताएं
क्या हमारे समय का ईश्वर ऐसा ही होगा 

क्या ईश्वर को
कभी कोई
संक्रमण होता होगा
ईश्वर
लाल रंग के खून और लाल रंग के पानी में से
किसको पीना पसंद करेगा
क्या ईश्वर
भेड़ों, कबूतरों और मुरगाबियों को
पिजंरों में बंद कर
बाहर बड़ा सा ताला लगा देगा। 

क्या
सच में हमारा ईश्वर
इतना खतरनाक और क्रूर होगा। 

वसंत की इस ऋतु में
अब जब हम
इन प्रश्नों के जवाब तलाश रहे हैं
ठीक उसी समय
बच्चों ने हंसते हुए
मिट्टी का शिवलिंग बना
उसे सरसों के पीले फूलों से सजा दिया है
बागों में खिलने लगी हैं गुलाब की कलियां
कोयल करने लगी है कूकने की तैयारी। 

क्या अब भी ईश्वर
गुस्से से भरा निकलेगा बाहर
और दांत किटकिटाते हुए
रोकेगा यह सब
या
हमारे समय
का ईश्वर 
जोर-जोर से हँस रहा होगा. 
...


पता-
कुमार कृष्ण शर्मा
निवासी पुरखू (गड़ी मोड़)
पोस्ट आफिस- दोमाना
तहसील और जिला- जम्मू
जम्मू कश्मीर 181206

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स अमृता शेरगिल की हैं जिसे हमने गूगल से साभार लिया है।)
 
संपर्क-
मोबाईल- 0-94191-84412
Mobile: 0-97-962-14406e-mail : kumarbadyal@gmail.com | krishans@jmu.amarujala.com
Blog :
www.vipakshh.blogspot.com

टिप्पणियाँ

  1. kumar ji...badhai...aap ke likhne ka apnea andaz hai...teeno kavitian sunder. uska jikr un tatvo ke liye shankhnad hai jo jammu our kashmir ko alag alag krne ki baat krte hai. pehli our tesri rachna kai kathor sawal khde ke rhe hai...abhar

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  2. Bade bhai ko bahut bahut badhai sabhi kavitaain gad gad kar gayee. Pahli kavita nari ko bandhan mukat hone ki parerna ke sath aaj ke danvon ko khatam karna hoga, dharm ki jai karni hogi to nari hee mukhay roop se aadhar ban sakti isee baat ki pushti karti dikhaee deti hai . Doosri apne lok rang ko liye . Pyar ke bahane se ekta sthapit karne kee aawaj mukhrit karti hui sateek rachana hai . Abhar....

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  3. Kumar jee aapke kavyakarm ka adhaar Prem hai.
    Is adhaar par khada aadmee abhivyakti ke khatre uthaane ko tyar rahta hai. Upeksha aur aalochna ke baad svikriti miltee hai... aapkee kavitain ati saarthk hain . Mathon , sattaon ke mukhote utaartee hain . Dost haardik shubhkaamnain . Santosh jee manch dene ke liye aapka vishesh abhaar.

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  4. सबसे पहले संतोष जी आपका मंच देने के लिए धन्यवाद। अ‌ग्निशेखर जी, संगीत जी, अमित जी, नरेश जी और मेरे दोस्त कमल। आप सभी का प्रेम और प्रोत्साहन के लिए आभार।

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  5. अच्छी कविताएँ ...
    -नित्यानंद गायेन

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  6. वाह वाह क्या बात है कुमार साब सशक्त अभिवियक्ति है आपकी /ईश्वर से आपने भी पंगा लिया आखिर /लेकिन कविता सचमुच सम्पूर्ण है उत्कृष्ट रचना /बधाई /

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  7. आप की कविताएँ अपने निहित भावों को उजागर करने में पूर्णतः सक्षम है.......आप को हार्दिक बधाई...................आपकी पंक्तियों को पढ़कर सहसा बहुत सी तस्वीरें आँखों के सामने तैरने लगती हैं।

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  8. नित्यानंद जी, निशा जी, कुलविंद्र जी और आशुतोष जी, आप सभी का धन्यवाद

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  9. कविताओं ने आह्लादित किया ! बधाई! आपने अपना मुहावरा अर्जित कर लिया है, यहां लोक भी है तथा लोकचिंताएं भी. फैंटेसी और आख्यान को भी आप पूरे हौंसले से साध रहे हैं, यह स्वर और गूंजे ,यही विश्वास है ! मनोज शर्मा

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