सुमन कुमार सिंह की कविताएँ

सुमन कुमार सिंह

























परिचय

जन्म : 23 जनवरी, 72

शिक्षा : एम. ए., पी-एच. डी. (हिंदी)

रचनाएँ : हिंदी तथा भोजपुरी के स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ, कहानियां, समीक्षाएं आदि प्रकाशित.
सम्प्रति: डीएवी पब्लिक स्कूल, आरा में अध्यापन 

अगर आपको किसी भी समय का प्रतिरोध देखना हो तो इधर-उधर भटकने की बजाय उस समय के कवियों की कविताओं को पढ़िए. आपको सब कुछ वहाँ स्पष्ट रूप से दिख जाएगा. जी, मैं कवि की बात कर रहा हूँ. उनकी नहीं जो अपनी स्वार्थ-पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं. और सत्ता के चाकर की तरह काम करते हैं. इतिहास गवाह है कि फासीवादी शक्तियों के सत्तासीन हो जाने के बावजूद प्रतिरोध की यह परम्परा अबाध रूप से हर जगह चलती रही. सुखद है कि इस परम्परा को हमारे युवा कवियों ने आज भी बचाए-बनाए रखा है. सुमन कुमार सिंह ऐसे ही कवि हैं जिनके यहाँ यह प्रतिरोध स्पष्ट रूप से दिख जाएगा. छपने-छपाने और चर्चा में बने रहने की कलाओं से दूर सुमन आरा जैसी समृद्ध धरती पर लेखन कार्य में सतत लगे हुए हैं. आज पहली बार पर प्रस्तुत हैं सुमन कुमार सिंह की कुछ नयी कविताएँ     

सुमन कुमार सिंह की कविताएँ

तुम्हारे ठिये से मैं 

पता नहीं
यह देश मेरा है
कि तुम्हारा ठिया
जहाँ अपने ही गोश्त की
बोली लगाते-लगाते
थका जा रहा मैं

मेरे बच्चों के चिप्स व कुरकुरे में
नमक सी घुली
तुम्हारी कुटिल मुस्कान
अब एक जरुरी स्वाद में
तब्दील हो चुकी

उस्ताद, अब तो
अठारह इंच के अपने
साधारण टी. वी. स्क्रीन पर
तुम्हारी असाधारण उपस्थिति में
नाच उठता मेरा भी
जमूरा मन,

हर बार तो
यहीं हुआ कि मेरी
कविता के पूरी होने तक
बढ़ गए दाम
गैस, नमक, तेल, चीनी, दूघ
सब्जी व कपड़ों के संग
अनाज के दानों पर लगी
तुम्हारी मुहर
मुँह चिढ़ाने लगी

यूँ  लग रहा है कि घोषित
युवाओं का यह देश
उलटे पाँव भागते–भागते
आ खड़ा हो गया
मध्यकाल की दहलीज पर

पता नहीं
खेती के अत्याधुनिक औजारों
के साथ
मैं तोड़ रहा बंजर जमीन
कि खोद रहा कब्र
अपनी व अपने बीज़ों के लिए,

पता नहीं
मैं कविता लिख रहा
कि साजिश कर रहा 
अपने व अपनों के खिलाफ..? 


निरुत्तर 

अब तुम्हीं बताओ जरा
कैसे समझाऊँ
आँखों की
अपनी जुबान को

चीख रहे
जिसके प्रत्येक शब्द
“चुक गए–चुक गए
हाथ ये कानून के,
धुल गए–धुल गए
दाग सारे खून के,
फुट गए–फुट गए
ढोल सब विकास के,
बिक गए-बिक गए
आश सारे न्याय के,”

जरा बताओ तो सही
क्या करूँ
अपने उस आकाश का
वर्षों से सहेजे रखा जिसे
अपनी फाइलों में

रचे जा रहे उस विधान का
क्या करूँ मैं
जिसकी खुलती रही पोल
प्रत्येक बार
प्रत्येक लोक सभा में

मैं अपने उस आकाश के
ऊपर के आकाश का क्या करूँ
जहाँ चंद लोगों की बैठकी व कहकहे
बदल रहे इस देश की सूरत


बूढी हो रही माँ

मंद–मंद मुस्कुराती
दाव देती
चिंताओं–चतुराइयों को
बूढी हो रही माँ

सहज ही छू लेने को
धरती
वह कमान हुई जा रही

वह बूढी हो रही
मुझे चलते देख तन कर
विश्वासपूर्वक

वो अविरल गंगे
श्रद्धा और भक्ति की
कल–कल करती तुम्हारी
अविरल धाराएँ
क्या कुछ नहीं जानती

जिसने भी कहा तुम्हें
वैतरणी/ मोक्षदायिनी
छला और सिर्फ छला,
जिसने भी जलाए दीप
तना तनोवा
फूंके शंख / बजाये घंटे–घड़ियाल
फैलाया अंधकार गहन

जानती हो तुम
स्वच्छता की सीमाएँ
उनके धरना–प्रदर्शन व
आमरण अनशन की
सर्वहितकारी कामनाएँ
वे पहले रोग गिनाते हैं
फिर रोग का कारण
‘मिनरल वाटर’ – सा
“गंगाजल” के रैपर तले
बोतलों में भर दी जाती हो
तुम व तुम–सी कई और

गंगे, जलती चिताओं और
भष्म होती आत्माओं के
मोक्ष के प्रण
कैसे पूरेंगे?
सिर्फ ऋषियों के होते तो
अलग बात थी,
दुनिया का उतरन आखिर
किस घाट लगेगा?

संपर्क:

C/o प्रो. टी एन चौधरी
बजाज शो रूम की गली.
फ्रेंड्स कॉलोनी
कतिरा, आरा – भोजपुर
802301 बिहार
Mob: 8051513170
Email: singhsuman.ara@gmail.com 

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की है.)

टिप्पणियाँ

  1. सुमन कुमार सिंह जी से परिचय और उनकी सुन्दर रचनाओं की प्रस्तुतिकरण हेतु आभार!

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  2. सुमन, बहुत बढ़िया लिख रहे हैं. संतुलित व संप्रेषनीय भाषा ...

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  3. आप सबों का बहुत-बहुत आभार !

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