गणेश गनी की कविताएँ



गणेश गनी


अब तक हमें यही पढ़ाया जाता रहा है कि राज्य की निर्मिति में राजा, आभिजात्य वर्ग, सैनिक आदि आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन सच का पहलू कुछ और ही है। इस दुनिया को खूबसूरत बनाने में मेहनतकश लोगों का अप्रतिम योगदान है। उनके श्रम के बिना यह दुनिया इतनी खूबसूरत बन ही नहीं सकती थी। ये ऐसे लोग हैं जिनकी भूमिका पुरातन समय से ही प्रायः अलक्षित रहती आयी है। कवि का दायित्व यही होता है कि इस अलक्षित को लक्षित करे और दुनिया को सच से अवगत कराए। गणेश गनी ऐसे ही कवि हैं जिनकी कविताओं में इन मेहनतकश लोगों के श्रम, उनकी पीड़ा और उनकी आवाज को रेखांकित किया गया है। इस रेखांकन को गणेश ने अपने काव्य नैपुण्य से साधा भी है। आज पहली बार प्रस्तुत है कवि गणेश गनी की कविताएँ।


गणेश गनी की कविताएँ

 
उसकी पीठ फिर झुक जाती है!


मैंने उसे हमेशा देखा है
टोपी, कोट और गाची पहने
घर से निकलने से पहले
उसका तैयार होना
योद्धा की भांति लगता है।

पहले वो कोट पहनता है
ताकि पीठ की छीलन रुके
फिर वो गाची को कमर पर
कई कई घेरे लपेटता है
ताकि भूख छिपी रह सके
इसी मजबूत कमरबंद के पीछे
वरना भूख का क्या है
पेट से उछलकर
सीधे सड़क पर आ सकती है।

अंत में बड़े अदब के साथ
वो अपने दोनों हाथों से
रखता है टोपी अपने सर पे
और यही वो क्षण है
जब उसकी झुकी पीठ
अचानक हो जाती है सीधी

यह घर से निकलने का वक्त है।
अगर आप सुनोगे 
तो मैं शाम का किस्सा भी सुना सकता हूँ
इतना बता दूँ कि
शाम वाले दृश्य में 
उसकी पीठ फिर झुक जाती है
पर यह थाली से रोटी का कौर 
मुँह तक पहुँचाने का समय होता है।




 
थोड़ी मिट्टी मांगने आया हूँ!


एक सुबह बांग से पहले
उसे एक सपना आया
वो भागना चाहता था बचकर
पर उसके पैर मिट्टी ने पकड़े थे पक्के
उसने अपनी साँसों को 
सम्भाल रखा था मुश्किल से
नींद खुलने पर भी हांफना जारी रहा।

दिन चढ़ते ही उसे लगा कि
अब अपनी सांसें गिरवी रखे
खेत वापिस मिलने तक
उसकी चिंता यह भी है कि
नदी की सांसों को कैसे बचाया जाए
पेड़ों के पास कम से कम
जंगल तो है छुपने के लिए।

रात ढलने लगी तो
दीवारों की धड़कन बढ़ गई
आँगन सिसकने लगा
एक कोने में बैठा आसमान को ताकता
कुत्ता सुबकने लगा
दूसरे कोने में खाट पर लेटा 
तारों की ओर टकटकी लगाए 
वो प्रार्थना करने लगा।

अंतिम पहर में
आँगन पीतल जैसी रोशनी में चमकने लगा
उसके सिरहाने चाँद आ बैठा
उसके माथे को अपनी उंगलियों से 
सहलाते हुए बोला
केंचुवा अपनी सांसें मिट्टी में रखता है
मछली के गले में नदी बहती है
बैल अपने खुरों में खेत रखता है
तुम क्यों चिंता करते हो मित्र
देखो ....
मैं इनसे थोड़ी सांसें
थोड़ा पानी
थोड़ी मिट्टी मांगने आया हूँ।



किस्से चलते हैं बिल्ली के पाँव पर


उसने आग से मांगे चमकीले रंग
और रात के कैनवास पर उकेरी
एक मशाल जलती हुई
इसे थामने के लिए जिस हाथ की 
कल्पना की थी
वो हाथ ज्वालामुखी से निकला
और आकाश में ऊंचा उठता गया
अंधेरे में जहां जलती हुई मशाल बनी थी
यह धधकता हुआ लावा ठंडा होने पर ही
हुआ कड़ा और मजबूत

धरती पर उजाले का एक बिंदु बना
अंधकार बहुत बड़ा था
हत्याएं करने को
और जहां हत्यारे को पकड़े जाने का भय था
वहां खोज निकाला हत्या करने का नया तरीका
वह आत्महत्या करने को उकसाता था बस

जिन लोगों को अब तक नहीं हुआ था यकीन
कि अराजकता गणतंत्र की दहलीज़ तक पहुंची है
उनकी आंखें फटी और मुँह खुले रह गए
जब संविधान के पहले पन्ने से न्याय जैसा शब्द राजधानी में अदालत के बाहर सड़क पर आ गया

वो ऐसे सोता है इन दिनों
लोग सोचते हैं सुषुप्त ज्वालामुखी होगा
वो अभागा कहलाया जब से
उसने अपने सर पे 
लालटेन टांगना शुरू किया तबसे
हालांकि बदला कुछ नहीं अब तक

उसपर शक करना ठीक नहीं होगा
वो कविता की लय जानता है
वो जानता है यह भी कि 
आग से खेलना उतना खतरनाक नहीं होता
जितना भूख से
वो खाली पेट आग पर चल लेता है

वो आठवें सुर के गीत लिखता है
कहते हैं कि वो ताल का भी पक्का है
बर्फ़ के दिनों में किस्से चलते हैं बिल्ली के पांव पर
और क़िस्सागो अखरोट भी तोड़ता है ताल में।



       
सम्पर्क

मोबाइल : 09736500069


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की है।)

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज गुरुवार (02-08-2018) को "गमे-पिन्हाँ में मैं हस्ती मिटा के बैठा हूँ" (चर्चा अंक-3051) पर भी है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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