वन्दना शुक्ला का संस्मरण 'आँखों में ठहरा हुआ वो मंज़र'







इतिहास की कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जिनका नाम आते ही हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसी ही एक तारीख़ थी - 2 दिसम्बर 1984. 

यह तारीख़ न केवल भोपाल बल्कि पूरे देश के लिए एक गहरे जख्म की तरह है जो रह-रह कर आज भी रिसता रहता है। यूनियन कारबाईड कंपनी से रिसी मिथायलआईसोसायनाइड नामक गैस कई लोंगों के लिए मौत का मंजर ले कर सामने आयी वैसे तो साल 1984 भारत के लिए कई आपदाएँ ले कर आया। यही वह वर्ष था जब अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को चरमपंथियों से आज़ाद कराने के लिए आपरेशन ब्ल्यू स्टारहुआ और जिसकी कीमत देश को अपनी प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी की जान चुका कर अदा करनी पड़ी। 
लेखिका वन्दना शुक्ला का ताल्लुक त्रासदी के साक्षी इस भोपाल शहर से ही है और वे उस मंजर की साक्षी रही हैं। इस दिन मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हम प्रस्तुत कर रहे हैं वन्दना शुक्ला का यह संस्मरण आँखों में ठहरा हुआ वो मंजर
      
आँखों में ठहरा हुआ वो मंज़र 

वन्दना शुक्ला



छूटे हुए शहर उन कहानियों की तरह होते हैं जिन्हें हमने लिखते लिखते अधूरा छोड़
दिया था। लेकिन वो कहानियां कभी मरती नहीं बल्कि समय की तलहटी में
स्मृतियों के शैवाल बन डूबती उतराती रहती हैं और वहीं अपना एक अलग संसार
बसा लेती हैं। उन कहानियों को अपने मौन से छूना किसी यातना से गुजरना भी
होता है।


हर दिल में एक शहर बसता है। उस शहर में अतीत की बस्तियां होती हैं, कच्चे प्रेम की मिसालें होती हैं, खुशियों के झरने और आधी अधूरी इच्छाओं के सूखे-हरियाले खेत होते हैं, स्मृतियों की हरहराती नदियाँ होती हैं। धडकनों के तागे से बुने हर दिल में बसे शहर की राग रंगत सुर्ख शफ्फाक ही नहीं होती। इनमें समय  के दाग धब्बे, और हालातों के ज़ख्म भी होते हैं। मीठी यादें दिल को गुदगुदाती हैं तो उदास कर देने वाली मुरझा देती हैं। न जाने कितने मंज़र, कितनी अनुभूतियाँ लिए एक अव्यक्त की चीख सा वो शहर हमारी आत्मा में ताजिन्दगी कौंधता रहता है। मेरे ज़ेहन में बसी स्मृतियों के इस शहर में अट्टालिकाएं हैं, चौड़ी चमचमाती सडकें, संग्रहालय, पहाड़ियां, तालाब, उनमें तैरती रंग-बिरंगी कश्तियाँ, कश्तियों में बैठे जवान सपनों से लबालब खिलखिलाते जोड़े हैं तो छीजतीं, खँडहर होतीं पौराणिक पत्थर की इमारतें हैं, मीनारें हैं, तंग गलियाँ हैं, मंदिर-मस्जिदें हैं, नमाज़ें हैं, गलियों से गुज़रती काले बुरखे में लिपटी महिलायें हैं, उन महिलाओं की आँखों में सपने हैं और उनके सपनों में ‘’कभी आज़ाद’’ होने की उम्मीदें हैं। अलावा इसके अजाने हैं, मंत्रोच्चार हैं, कविता है, मूर्तियाँ है,शास्त्रीय संगीत की स्वर लहरियां हैं तो लोक संगीत की सोंधी गंध और गजलों की बेहतरीन बंदिशें भी। राजा भोज की इस नगरी में ‘’भोजपाल’’ से लेकर ’’भोपाल’’ होने तक की दास्ताँन और स्मृति चिन्ह आज भी मौजूद है। इस शहर के इतिहास में दर्ज सल्तनतों, झीलों की बिंदास झिलमिलाहट और संस्कृति की झंकार में उतराते-डूबते पृष्ठ पलटते हुए अचानक उंगलियाँ ठिठक जाती हैं। वो एक मनहूस पन्ना, जिसकी पेशानी पर एक काला सा धब्बा है और जिसका मुड़ा हुआ कोना इसकी लाचारी को और उदास बना रहा है। न चाहते हुए भी मैं उसे खोलती हूँ और एक बार फिर थरथरा जाती हूँ। इस पन्ने के माथे पर कुछ हिलती हुई सी अस्पष्ट लिखावट में तारीख दर्ज है 2 दिसम्बर 1984.। मेरी स्मृतियाँ सहसा पीछे की और दौड़ने लगती हैं और एक ख़ास ‘’वक़्त’’ पर ठिठक जाती हैं जो वक़्त घड़ी की सुइयों में हौले हौले सरक रहा है। मैं गौर से देखती हूँ ये सुइयां न आगे जा रही हैं और न पीछे। एक जगह काँप रही हैं। ये ठहरा हुआ समय है रात के बारह बज कर बीस मिनिट। मुझे याद आता है पिछले बत्तीस बरस से ये काँटा यूँ ही काँप रहा है बस अपनी जगह पर। ज़र्द दिनों की इस मनहूस तारीख का ये वक़्त लोगों की आँखों में यहीं ठहरा हुआ है।
ये ठिठुराती ठंडों की आधी रात का वक़्त है। ज़ाहिर है तमाम शहर रजाइयों में दुबका गहरी नींद में डूबा हुआ। सर्दी की ठंडी काली गहरी रात। बहुतरूपिया मौत कभी काले अँधेरे ओढ़ कर भी आती है। गहरी नींद की छाती पर मौत का तांडव बहुत भयानक होता है। ये सिर्फ हम जैसे कुछ भाग्यशाली लोग कह सकते हैं जिन्हें वो छू कर निकल गयी। जिनको वो अपने साथ ले गयी वो अपने अहसास कहने के लिए इस धरती पर नहीं रहे।

पिछले दिनों हुई कानपुर रेल दुर्घटना की विभीषिका का मंज़र कुछ ऐसा ही रहा होगा जब रात के गहरे अँधेरे में बोगियों में सोये या ‘’कल’’ की सुनहरी योजनाओं को सोचते मौत की इस ‘साजिश’ से बेखबर यात्री अचानक जोर-जोर से हिलने लगे होंगे। जब तक वो इस गर्जना को सपना नहीं सच समझ पाते तब तक बोगियां एक दुसरे पर गिरने, टूटने और चीत्कारों से पट गईं। लोग लाशें बन कर एक दूसरे पर गिरने लगे। सन्नाटे...अँधेरे ...रात और हाहाकार। इन रातों की सुबहें बड़ी मनहूस और दुखदायी होती हैं। ये सुबह भी ऐसी ही थी ..सिर्फ तबाही, रुदन और चीत्कार। उन बोगियों के ध्वस्त अवशेषों के नीचे दबे अधमरे लोगों की कराहें .... तमाशबीनों का सैलाब। जो लोग ऐसी विभीषिकाओं के चश्मदीद होते हैं उनकी आँखें ताजिन्दगी ये मंजर नहीं भूल पातीं।




आँखों में अटकी दो दिसंबर की वो काली रात ...

चरम पर जाड़े की ये वही मनहूस रात थी जब हम चार लोग स्कूटर पर रात के एक बजे पता नहीं कहाँ पता नहीं किस दिशा की और भागे जा रहे थे। उनींदे...रुआंसे...भयभीत से। बस भाग रहे थे। क्यूँ कौन कहाँ कैसे कुछ होश नहीं। हमें निरंतर लग रहा था जैसे मौत हमारा पीछा कर रही है क्यूँ कि सांस घुटने की वजह तब तक नदारद थी और सड़क पर कम्बल रजाई ओढ़ कर भागते लोग सड़क पर ही गिर कर मर रहे थे। आधा भोपाल जैसे युद्ध क्षेत्र बन गया था। जिसके एक और मौत थी और दूसरी और निहत्थे, लाचार, कारण से अनभिग्य भोपाल वासी। ये शिकारी द्वारा शिकार पर पीठ पीछे किये गए हमले जैसा वीभत्स था।

स्कूटर दो एक बार सांसों के थमने पर गिरते-पड़ते ऐसे लोगों से टकराता हुआ बचा। लोग चीख रहे थे, रो रहे थे, रोते हुए भाग रहे थे। कुछ लोग नींद में उसी दिशा में पैदल भागे जा रहे थे जिस दिशा में यूनियन कार्बाईड में से रिसी  मिथायलआईसोसायनाइड  नामक मौत उनका इंतजार कर रही थी। निशातपुरा, जहांगीराबाद, बरखेडी, भोपाल टॉकीज आदि की सड़कें लाशों से पटने लगीं। सब जगह अफरातफरी। जब तक कारण पता पड़ा मौत के मुह में समा जाने वालों के लिए देर हो चुकी थी।

अगली सुबह भयावह थी। अस्पतालों में पैर रखने को जगह नहीं। पूरा भोपाल डर से सिहर रहा था, कई इलाकों में लोग बेतरह खांस रहे थे, फेंफडों में भरी विषैली हवा का उनके पास निरतर खांसने के अलावा फिलहाल कोई समाधान नहीं था। जहरीली गैस ने बचे हुए लोगों के शरीर को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया था। कुछ लोगों की आँखें गहरी लाल हो कर उभर सी आई थीं। कुछ लोग हड्डियों की बीमारी के कारण चलना भूल चुके थे। झुग्गी, कच्चे घरों के सामने घोड़े, बकरे, मुर्गे-मुर्गियां न जाने कितने गूंगे विवश मवेशी मरे हुए पड़े थे। चीलें, गिद्ध  आसमान में मंडराने लगे थे। दूसरे आसपास के कस्बों, शहरों से घासलेट मंगाया जा रहा था। लाशों के ढेर फूंकने के लिए केरोसीन कम पड गया था। शहर के आसपास के ‘’सुरक्षित’’ लोग आ कर व स्वयंसेवी संस्थाएं रात दिन घायलों की सेवा कर रहे थे। मौत इस कदर भयभीत कर चुकी थी कि लोग शहर से भाग रहे थे। सरकार ने अन्य महफूज़ ठिकानों पर जाने के लिए यात्रियों को ट्रेन की फ्री सुविधा दी थी। चार पाँच दिनों तक रह रह कर अफवाह उठती कि फिर से गैस लीक हो रही है और बस भगदड़ मच जाती। लोगों को जो वाहन जहाँ आता-जाता मिलता उस पर चढ़ जाते। सरकार को इन अफवाहों पर अंकुश लगाना मुश्किल हो रहा था। स्थिति इतनी नाज़ुक थी कि लोगों को विरोध, विद्रोह या आन्दोलनों का न होश था न वक़्त। ज़िंदगी कुछ पटरी पर आई तो लोग अपने उन घरों में वापस लौटे जिन्हें ज़ल्दबाजी में वो बिना ताला लगाए खुला छोड़ गए थे। उस दौरान काफी चोरिया भी हुईं।


जब हालात सम पर आने लगे तो आंदोलनों ने जोर पकड़ा। अमेरिका में बैठे यूनियन कार्बाईड के मालिक एंडरसन के पुतले जलाये जाने लगे। जान माल के नुकसान के लिए मुआवजे की मांगें हो रही थीं। अपने आबाद, गुलज़ार और खूबसूरत शहर को यूँ जलते हुए देखना कितना भयावह और दर्दनाक था ये उन प्रत्यक्षदर्शियों के सिवा कोई नहीं जान सकता। 




सरकारें किसी व्यक्ति की चेतावनी को किस कदर नज़र अंदाज़ करती हैं। वे नहीं जानतीं कि उनका ये ignorance  शहर की कितनी जानों को लील जाएगा इस सत्य की ये औद्योगिक त्रासदी सबसे जीती जागती मिसाल है। गौरतलब है कि भोपाल के पत्रकार श्री राजकुमार केसवानी ने राष्ट्रीय अखबारों तक में कार्बाईड की इस जहरीली गैस के दुष्परिणामों के लिए पहले ही सरकार को कई बार चेताया भी था ‘’अब भी सुधर जाओ वरना मिट जाओगे’’ उन्होंने अफ़सोस और दुःख में लिखा था ये खबर इस भयावह त्रासदी से डेढ़ महीने पहले अक्टूबर में लिखी गयी थी। भोपाल गैस त्रासदी के करीब 32 साल बाद मध्य प्रदेश सरकार ने रविवार को घोषणा की कि वह दुनिया के सब से भयावह औद्योगिक त्रासदियों में शामिल इस त्रासदी के लिए स्मारक बनवाएगी।

बहरहाल, सवाल आज भी वहीं का वहीं है कि हमारी सरकारें दुर्घटना होने पर मुआवजा देने के लिए जो तत्परता दिखाती हैं उसे पहले रोकने की कोशिश क्यूँ नहीं होती? दूसरे,  अविकसित और विकासशील देशों को अपनी चारागाह समझने वाली कंपनियों को यहाँ पनाह क्यूँ दी जाती है


उन सभी बेकसूर नागरिकों को श्रद्धांजलि जिन्होंने किसी और की गलती का खामियाजा अपनी जान गंवा कर भरा

 
वन्दना शुक्ला






ई-मेल : shuklavandana46@gmail.com

(इस पोस्ट में प्रयुक्त तस्वीरें गूगल से साभार ली गयी हैं.)

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-12-2016) को "ये भी मुमकिन है वक़्त करवट बदले" (चर्चा अंक-2546) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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