अखिलेश श्रीवास्तव चमन की कहानी 'अनाम रिश्ता'



अखिलेश श्रीवास्तव चमन


आधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ में रिश्ते नाते सब छीजते जा रहे हैं। वास्तविकता की जगह अब आभासी दुनिया ने ले ली है। लेकिन साहित्य की तो यही ताकत होती है कि वह हमेशा संवेदनाओं के पक्ष में आ खड़ा होता है। वह रिश्ते नाते को बचाने की क्षीण संभावनाओं को भी उकेर कर मानव को जोड़ने का प्रयास करता है उस मानावता से जो सबसे ऊपर है। अखिलेश श्रीवास्तव चमन की कहानी 'अनाम रिश्ता' में एक रिक्शेवाला सहज ही उस लड़की से जुड़ जाता है जो पारिवारिक कलह की शिकार है। रिक्शेवाला शशि में अपनी बेटी का चेहरा तलाश लेता है तो लड़की उसमें बाबा का अक्स। अखिलेश श्रीवास्तव चमन की यह कहानी दैनिक जागरण के पुनर्नवा में 5 जुलाई 2015 को संक्षिप्त रूप में प्रकाशित हुई थी। हम इस कहानी को उसके मूल रूप में यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। तो आइए पढ़ते हैं अखिलेश श्रीवास्तव चमन की कहानी 'अनाम रिश्ता'

अनाम रिश्ता

अखिलेश श्रीवास्तव चमन

       ‘‘बस....बस। यहीं....गेट पर रोक देना बाबा।’’ बॉंसुरी की स्वर लहरी सी मीठी, सुरीली आवाज कानों में पड़ी तो राममिलन का रोम-रोम हर्षित हो उठा। ऐसे स्नेह, सम्मान और आत्मीयता भरे सम्बोधन तो बस कभी कभार ही सुनने को मिलते हैं। वरना तो नित्य सुबह से शाम तक दिन भर का समय अबे, तबे और गाली-गलौज की भाषा सुनते ही बीत जाता है। कानों से उस मधुर आवाज के टकराते ही राम मिलन के हाथ और पॉंव एक साथ हरकत में आ गए। पैरों ने पैडल घुमाना रोक दिया और हाथ की अंगुलियॉं अपने आप ब्रेक पर कस गयीं। रिक्सा थोड़ी दूर रेंगने के बाद गेट के सामने आ कर रूक गया। दोनों लड़कियॉं रिक्शे से उतर पड़ीं। उस गोरी चिट्टी लड़की ने, जो रिक्शे में पहले बैठी थी, पहले से ही रूपया निकाल कर हाथ में ले रखा था। उसने राम मिलन के हाथ में दस रूपए की कड़कड़ाती नई नोट पकड़ायी और उसके बाद वह दोनों ही युनिवर्सिटी गेट में घुस कर तेजी से आगे बढ़ गयीं। अॅंगौछे से पसीना पोछता राम मिलन हक्का-बक्का हो उन्हें देखता रह गया।

       ‘‘अजीब पागल लड़की है। बाकी पैसे वापस करने का मौका भी नहीं दिया। पावर हाउस कॉलोनी से युनिवर्सिटी तक का सात रूपएहद से हद आठ रूपए किराया होता है। मोल भाव करने वाले छः रूपए में भी आ जाते हैं। लेकिन यह लड़की तो दस की नोट थमा कर ऐसे चलती बनी जैसे किसी लाट गवर्नर की बेटी हो या उसके घर नोट छापने की मशीन लगी हो। ऐसा भी नहीं लगता कि पहली बार आयी हो.....रोज आती, जाती है तो उसे रेट तो पता होगा ही। फिर क्यों अधिक किराया दे गयी....? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके बुढ़ापे पर तरस खा कर जान-बूझ कर अधिक पैसे दे गयी हो....? या हो सकता है अपनी सहेली से बातें करने में इतनी मशगूल रही हो या क्लास में जाने की इतनी जल्दी रही हो कि बाकी पैसे वापस लेना भूल गयी हो। जो भी हो जरूर किसी बड़े बाप की बेटी है...। मॉं-बाप मुॅंह मॉंगा पैसा देते होंगे इसीलिए लुटाती फिर रही है।’’ युनिवर्सिटी गेट पर खड़ा राम मिलन न जाने क्या-क्या सोचे जा रहा था कि तभी पीछे से कार का तेज हार्न बजने लगा। चौंक कर उसने पीछे की तरफ देखा तो पाया कि पीछे एक कार खड़ी थी और कार में ड्राइवर की सीट पर बैठा आदमी उसकी तरफ जलती ऑंखों से घूर रहा था।

   ‘‘अबे स्साल! बीच सड़क पर क्यों खड़ा है..? तेरे बाप की सड़क है क्या..? चल, हट किनारे।’’ राम मिलन से नजरें मिलते ही कार में बैठा व्यक्ति खिड़की से मुॅंह निकाल कर चिल्लाया। राम मिलन का मन एकदम कसैला हो आया। जल्दी से रिक्शा घसीटता हुआ वह सामने पेट्रोल पम्प की तरफ बढ़ गया।

     पेट्रोल पम्प के पास सड़क के किनारे नीम के पेड़ के नीचे रिक्शा खड़ी कर के उसने बीड़ी सुलगायी और रिक्शे में बैठ कर पुनः उन्हीं लड़कियों के बारे में सोचने लगा। ‘‘न कोई बोझ न सामान....हाथ में दो-दो कापियॉं लिए फूल सी हल्की दो लड़कियॉं....और किराया भी ड्योढ़ा। न कोई मोल-भाव न झिक-झिक। भला इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है....? ऐसी ही दो-चार सवारियॉं रोज मिल जाया करें तो फिर तो मजा ही आ जाय। युनिवर्सिटी में पढ़ती हैं दोनों इसका मतलब रोज ही आती होंगी....। अगर कल उसी टाइम उसी जगह पॅंहुच जाऊॅं तो शायद कल भी मिल जायें.....। हो सकता है सक्सेना जी के बच्चों की तरह ये भी परमानेन्ट सवारी बन जायें...। फिर तो रोज दस रूपए की दिहाड़ी पक्की।’’ मन में यह ख्याल आते ही उसकी ऑंखें खुशी से चमक उठीं। 

         पुनः दूसरे दिन सवेरे सक्सेना जी के बच्चों को स्कूल छोडने़ के बाद वह पावर हाउस कॉलोनी की तरफ तेजी से भागा। अभी कॉलोनी गेट पर पॅंहुचा ही था कि अंदर से वही कल वाली लड़की आती दिख गयी। उसने दूर से ही हाथ हिला कर रूकने का ईशारा किया। राम मिलन रिक्शा रोक कर खड़ा हो गया।

 ‘‘यूनिवर्सिटी चलोगे.....?’’ पास आने के बाद उस लड़की ने पूछा। उसे क्या पता था कि राम मिलन तो उसी के लिए आया ही था। उसके हामी भरते ही अपना दुपट्टा समेटती वह रिक्शे में बैठ गयी। पिछले दिन की ही तरह चॉंदगंज से उसकी सहेली को लेने के बाद वह दोनों को युनिवर्सिटी गेट  पर छोड़ आया। उस दिन भी पावर हाउस कालोनी से बैठने वाली उसी गोरी लड़की ने ही दस का नोट पकड़ाया और अपनी सहेली के साथ युनिवर्सिटी के अंदर चली गयी। फिर तीसरे दिन, चौथे दिन, पॉंचवें दिन, छठें दिन और उसके बाद तो यह रोज का नियम ही हो गया। यानी वह दोनों लड़कियॉं राम मिलन की परमानेन्ट सवारियॉं हो गयीं। सक्सेना जी के दोनों बच्चों को सेण्ट जॉन स्कूल छोड़ने के बाद वह सीधे पावर हाउस कॉलोनी की ओर भागता था। वहॉं सुनीता नाम की वह लड़की उसके इन्तजार में खड़ी मिलती और बगैर कुछ पूछे उसके रिक्शे में सवार हो जाती थी। फिर आगे चॉंदगंज से उसकी सहेली रिक्शे में बैठती थी और वह उन दोनों को युनिवर्सिटी गेट पर छोड़ देता था। बगैर कुछ कहे सुनीता उसे दस रूपए का नोट थमाती और अपनी सहेली के साथ अंदर चली जाती।

   ‘‘इसे कहते हैं भगवान की कृपा। सचमुच ऊपर वाले की माया अपरम्पार है। कैसा-कैसा संयोग बना देता है वह। सवारी के रूप में इन दोनों लड़कियों का मिलना दैवीय संयोग नहीं तो भला और क्या है। अगर उस दिन भी रोज की ही तरह वह गोल चौराहा ही चला गया होता तो कहॉं भेंट होती इन लड़कियों से।’’ जब भी खाली बैठता राम मिलन ऐसा ही सोचता। वह पिछले चार सालों से शास्त्रीनगर के सक्सेना जी के जुड़वां बच्चों को सेण्ट जॉन स्कूल पॅंहुचाने और ले आने का काम कर रहा था। सुबह लगभग आठ बजे उन बच्चों को स्कूल छोड़ने के बाद खाली रिक्शा लिए वह सवारी की तलाश में गोल चौराहे की तरफ चला जाता था। कभी तो तुरन्त कोई सवारी मिल जाती और कभी-कभी घंटों यूॅं ही खाली खड़ा रहना पड़ता। यह उसकी रोज की दिनचर्या थी। लेकिन उस दिन उसके मन में न जाने क्या आया कि सक्सेना जी के बच्चों को स्कूल गेट पर उतारने के बाद अनायास ही गोल चौराहे की तरफ जाने के बजाय उसने रिक्शा उल्टी दिशा में यानी पावर हाउस कॉलोनी की तरफ मोड़ ली। पावर हाउस कॉलोनी के गेट पर हाथ में दो-तीन कापियॉं और एक छोटा सा पर्स लिए एक गोरी-चिट्टी सुन्दर सी लड़की खड़ी थी। खाली रिक्शा आते देख उसने हाथ के ईशारे से रोका और पूछा- ‘‘यूनिवर्सिटी चलोगे?’’ और राम मिलन के हॉं कहते ही किराए के बारे में पूछताछ किए बगैर ही वह रिक्शे में बैठ गयी। रास्ते में चॉंदगंज में एक गली के सामने उसने रिक्शा रूकवाया। एक दुबली, पतली सॉंवली सी लड़की गली के अंदर से लपकती हुयी आयी और रिक्शे में पहले से बैठी लड़की के बगल में बैठ गयी। दोनों युनिवर्सिटी गेट पर आ कर उतर गयीं। पहली लड़की ने दस का नोट थमाया और आपस में बतियातीं वह दोनों युनिवर्सिटी में घुस गयीं। फिर तो यह रोज का ही सिलसिला हो गया। 

   तीसरे या चौथे दिन की बात है। चॉंदगंज में गली के सामने उस सॉंवली लड़की के इन्तजार में उसे काफी देर तक खड़ा रहना पड़ा था। रिक्शे में बैठी लड़की बार-बार अपनी कलाई में बॅंधी घड़ी देखती और उकताती रही। उसकी सहेली पॉंच-सात मिनट के बाद गली के अंदर से दौड़ती हुयी सी आयी और उचक कर रिक्शे में बैठ गयी। वह बुरी तरह हॉंफ रही थी। उसके बैठने के बाद राम मिलन रिक्शा ले कर चल पड़ा। 

    ‘‘क्या बात है....आज देर कर दी तुमने....।’’ पहली लड़की ने पूछा।
    ‘‘क्या बताऊॅं यार....सब कुछ तो तुम जानती ही हो...। तैयार हो कर निकलने ही वाली थी कि बबलू चिल्लाने लगा मेरी स्कूल की शर्ट प्रेस नहीं है। महारानी जी ने हुक्म सुना दिया-शशी.....बबलू की शर्ट प्रेस कर दो।अब उनके आदेश का पालन तो करना ही था वरना आसमान सर पर उठा लेतीं देवी जी। सो जल्दी-जल्दी बबलू का शर्ट प्रेस कर के उसे दे के तब आयी हूॅं।’’

    ‘‘तुम इतना सहती ही क्यों हो ? मना क्यों नहीं कर देती ? तुम दबती रहती हो इसीलिए वह और दबाती रहती है......। वाकई बहुत दुष्ट औरत है वह।’’

    ‘‘मना करने का परिणाम मैं जानती हूॅं न ....। वह तो हर समय मुझे परेशान और दुःखी करने का मौका ढ़ूॅंढ़ती रहती है.....। उससे तो भलाई की उम्मीद करना ही बेवकूफी है। लेकिन जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरे को क्या दोष देना। यह सब तो पापा को समझना चाहिए न....। वे तो मेरे सगे हैं....। लेकिन उन्हें तो लगता है जैसे कोई मतलब ही नहीं। वे तो बस उन्हीं महारानी जी की ही ऑंखों से देखते और उन्हीं के कानों से सुनते हैं। जिस दिन भी कुछ बोलूॅंगी या किसी काम के लिए मना करूॅंगी समझो कि विस्फोट हो जाएगा घर में। देवी जी को एक बहाना मिल जाएगा और पढ़ाई छुड़ा कर घर बिठा देगी मुझे...। वैसे भी वह कई बार कह चुकी है कि बी0 ए0 के बाद आगे नहीं पढ़ाना है। मेरी पढ़ाई पर हो रहा खर्च बहुत अखरता है उन्हें।’’ शशी ने कहा और एक गहरी सॉंस खींच कर खामोश हो गयी। शेष रास्ते दोनों चुप ही रहीं।


       वाकई यह मन बहुत ही मनमाना है। कोई वश नहीं चलता इस पर। न जाने कब कहॉं उड़ जाए, कब किससे जुड़ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। राम मिलन का मन शनैः-शनैः शशी नाम की उस सॉंवली लड़की के साथ जुड़ता जा रहा था। दरअसल रोज ही चॉंदगंज से युनिवर्सिटी गेट तक रास्ते भर वह दोनों लड़कियॉं बातें करती आतीं थीं जिनका कुछ टुकड़ा छन-छन कर राम मिलन के कानों में भी पड़ता रहता था। उनकी बातें सुन सुन कर उसे इतनी जानकारी हो गयी थी कि सुन्दर सी गोरी लड़की का नाम सुनीता तथा दुबली, पतली सॉंवली सी लड़की का नाम शशि था। यह भी कि शशि की मॉं बचपन में ही मर चुकी थी और उसकी सौतेली मॉं उसे बहुत तकलीफ देती थी। यह भी कि उसके पिता पूरी तरह से उसकी मॉं के कहने में रहते थे और उसकी तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते थे। राम मिलन ने यह भी गौर किया कि रिक्शा का किराया रोज सुनीता ही देती है। इतने दिनों में कभी भी एक दिन भी शशि ने किराया नहीं दिया। ‘‘बेचारी शशि के पास पैसा रहता ही नहीं होगा तो भला कहॉं से दे वह....? वह तो भला हो सुनीता का जो रोज उसे अपने साथ युनिवर्सिटी ले आती है वरना पैदल ही आना-जाना पड़े बेचारी को।’’ राम मिलन ने सोचा और उदास हो गया । यद्यपि कोई मतलब नहीं था फिर भी न जाने क्यों धीरे-धीरे उसे शशि के साथ लगाव और गहरी सहानुभूति सी होती जा रही थी।

      ऐसे ही एक दिन उन दोनों की बातचीत से उसे पता चला कि अगले सोमवार से सुनीता युनिवर्सिटी नहीं जाया करेगी। उसकी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। लेकिन शशि को अभी पूरे महीने भर जाना होगा। उसकी कक्षायें चलती रहेंगी। आखिर वह दिन भी आ गया जब सुनीता ने उसे मना कर दिया- ‘‘बाबा! अब कल से मत आया करना। कल से युनिवर्सिटी नहीं जाऊॅंगी मैं।’’ 

    वह शनिवार का दिन था। राम मिलन सारे दिन, सारी रात शशि के बारे में ही सोचता रहा। इतवार को भी सारे दिन, सारी रात उसके दिलो दिमाग पर शशि ही छायी रही। ‘‘बेचारी शशी को अब चॉंदगंज से युनिवर्सिटी तक पैदल ही जाना पड़ेगा.....। इतनी तेज धूप में इतनी दूर कैसे जाएगी वह.....? कहीं ऐसा न हो कि वह बीमार पड़ जाय.....। अगर बीमार पड़ गयी तो उसकी सौतेली मॉं तो ठीक से उसका इलाज भी नहीं करायेगी....। कहीं उसकी पढ़ाई ही न छूट जाय।’’ इसी तरह की तमाम बातें सोच-सोच कर परेशान होता रहा वह। उसका दिमाग शशि की चिन्ता में उलझे रहने के कारण दो, तीन बार तो उसका रिक्शा दूसरे वाहनों से टकराते, टकराते बचा। देर रात तक चिन्ता और उलझन में रहने के बाद आखिर उसने मन ही मन एक ठोस निर्णय लिया तब जा कर उसे चैन मिला। सोमवार की सुबह सक्सेना जी के बच्चों को स्कूल छोड़ने के बाद वह खाली रिक्शा लिए तेजी से चॉंदगंज की तरफ भागा। रास्ते में किसी सवारी ने उसे रूकने के लिए आवाज भी दी लेकिन वह रूका नहीं। भागता हुआ जा कर वह शशि की गली के सामने खड़ा हो गया। तीन-चार मिनट बाद तेज कदम चलती शशि अपनी गली से निकली। उसने एक नजर राम मिलन की तरफ देखा फिर सिर झुकाए पैदल ही आगे बढ़ गयी। राम मिलन किंकर्तव्यविमूढ़ सा गली के मुहाने पर खड़ा रह गया। लेकिन अगले कदम के बारे में निर्णय लेने में उसे देर नहीं लगी। उसने तुरन्त रिक्शा आगे बढ़ाया और सड़क के किनारे-किनारे भागती चली जा रही शशि के पास पॅंहुच कर रिक्शा रोकते हुए बोला- ‘‘बिटिया.....! आओ बैठ जाओ।’’

    शशि ने बहुत कातर, बेचारगी भरी नजरों से राम मिलन की तरफ देखा, पल भर असमंजस की स्थिति में ठिठकी रही फिर चुपचाप रिक्शे में बैठ गयी। राम मिलन रिक्शा ले कर चल पड़ा।

     ‘‘बाबा ! चेन्ज नहीं है मेरे पास.....सौ रूपए का नोट है.....।’’ यूनिवर्सिटी गेट पर रिक्शे से उतरने के बाद शशि ने कहा।
     ‘‘कोई बात नहीं बेटी......पैसे शाम को दे देना....। शाम को कितने बजे निकलोगी यहॉं से....? मैं शाम को यहीं आ जाऊॅंगा।’’
   ‘‘एक चालीस पर मेरा क्लास छूटता है....।’’
   ‘‘ठीक है.....मैं आ जाऊॅंगा.....यहीं इन्तजार करना मेरा....।’’ राममिलन ने कहा और आगे बढ़ गया।

    सक्सेना जी के बच्चों का स्कूल दो बजे छूटता है। स्कूल से उनके बाहर निकलते-निकलते सवा दो तो बज ही जाता है। कोई खास परेशानी नहीं होगी.... शशि को चॉदगंज छोड़ कर वहॉं पॅंहुचा जा सकता है.....। बहुत होगा पॉंच-दस मिनट देर हो जाएगी....इतनी देर तो बच्चे इन्तजार कर ही लेंगे। राम मिलन ने मन ही मन सोचा और आश्वस्त हो सवारी की खोज में निकल गया।

     ठीक एक बज कर चालीस मिनट पर वह यूनिवर्सिटी गेट पर पॅंहुच गया था। लगभग दस मिनट बाद शशि गेट पर आयी। ‘‘बाबा ! अगर चेंज हो गया हो तुम्हारे पास तो अपना सुबह का पैसा काट लो।’’ शशी ने उसकी तरफ सौ रूपए का नोट बढ़ाते हुए कहा।
     ‘‘रिक्से में बैठो......तुम्हें घर लौटना भी तो होगा।’’

     ‘‘नहीं...नहीं, मैं पैदल चली जाऊॅंगी...तुम अपने पैसे ले लो...।’’ शशि रिक्शे में बैठने में हिचक रही थी। परेशानी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। राम मिलन उसकी मनः स्थिति अच्छी तरह से समझ रहा था इसलिए उसका संकोच तोड़ते हुए बोला- ‘‘जल्दी बैठो बिटिया....देर न करो....तुम्हें घर छोड़ कर मुझे बच्चों को लेने सेण्ट जॉन स्कूल जाना है।’’ राममिलन की इस बात ने जाने कैसा जादू किया कि मंत्रमुग्ध सी शशी रिक्शे में बैठ गयी और राममिलन पूरी ताकत से पैडल मारता तेज गति से रिक्शा भगाता चल पड़ा। चॉंदगंज में गली के सामने शशि को उतारने के बाद उसे पैसे देने या कुछ कहने का मौका दिए बगैर वह रिक्सा ले कर तेजी से आगे बढ़ गया। 

     अगले दिन सवेरे पुनः राममिलन सक्सेना जी के बच्चों को स्कूल छोड़ने के बाद चॉंदगंज की तरफ भागा और शशि की गली के मोड़ पर आ कर खड़ा हो गया। लगभग दस मिनट बाद शशि गली से निकली। ‘‘बाबा! तुम अपना कल का पैसा ले लो और चले जाओ। मैं रोज-रोज रिक्शा भाड़ा नहीं दे पाऊॅंगी।’’ शशि ने उसकी तरफ बीस रूपए का एक नोट बढ़ाते हुए कहा। 

    ‘‘अजीब लड़की हो.....तुमसे पैसा कौन मॉंग रहा है जी......? दोगी तो भी मैं पैसा नहीं लूॅंगा तुमसे...। अपनी बेटी से भाड़ा लेता है कोई....? चलो जल्दी बैठो....देर हो रही है।’’ राम मिलन ने ऑंखें तरेर कर, बनावटी गुस्सा दिखा कर ड़ॉंटते हुए कहा। असमंजस की स्थिति में खड़ी शशि की ऑंखों में ऑंसू छलछला आए। ऐसे अपनत्व और प्यार भरी मीठी झिड़की सुनने के लिए उसका मन जाने कितने वर्षों से तरस रहा था। वह दुपट्टे के कोर से अपनी ऑंखें पोंछने लगी।

    ‘‘अरे ! अरे ! जरा सी ड़ॉंट पर रोने लगी..। अभी तो थप्पड़ भी मारूॅंगा अगर मेरी बात नहीं मानोगी तो....। चलो बैठो जल्दी....पागल कहीं की।’’ राम मिलन ने हॅंसते हुए कहा तो शशि को भी हॅंसी आ गयी और वह उचक कर रिक्शे में बैठ गयी। राम मिलन रिक्शा ले कर चल पड़ा।

    फिर तो जैसे मौन संधि हो गयी दोनों के बीच। राममिलन रोज सुबह नौ बजे चॉंदगंज से ले जा कर शशि को युनिवर्सिटी छोड़ता और दो बजे युनिवर्सिटी से ले आकर वापस चॉंदगंज गली के मोड़ पर। इस अवधि में मन से मन का जोड़ पुख्ता़ होता चला गया और वे दोनों एक दूसरे से काफी घुलमिल गए। अब शशि आते-जाते रास्ते भर राम मिलन से बतियाती रहती और वह भी खोद-खोद कर उसके बारे में पूछ-ताछ करता रहता। अगर किसी दिन वह उदास दिखती तो चुहल कर के उसे हॅंसाने की कोशिश करता। जब कभी वह बहुत दुःखी या परेशान होती तो राम मिलन उसे समझाता-बुझाता, सांत्वना देता और यहॉं-वहॉं की बातें तथा तरह-तरह की कहानियॉं सुना कर उसका हौसला बढ़ाए रखता। राम मिलन के रूप में शशि को एक ऐसा हमदर्द मिल गया था जिससे अपने मन की हर बात कह कर वह अपना जी हल्का कर लेती थी। रविवार और अवकाश के दिनों में जब उनकी भेंट नहीं हो पाती उस दिन दोनों ही बेचैन हो जाते थे। 

    लगभग एक महीने बाद शशी की भी कक्षायें चलनी बंद हो गयीं। ‘‘बाबा ! आज से मेरा क्लास खत्म हो गया। अब कल से मुझे युनिवर्सिटी नहीं जाना है लेकिन अभी इतनी जल्दी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ूॅंगी......परीक्षा के समय तुम्हें फिर परेशान करूॅंगी। बीस दिनों के बाद यानी अगले महीने की सत्रह तारीख से मेरे पेपर हैं और पेपर तो तुम्हें दिलवाना ही पड़ेगा।’’ एक दिन रिक्से से उतरते समय श शि ने कहा।
    ‘‘सत्रह तारीख को कितने बजे आ जाऊॅं बेटी...?’’
    ‘‘सात से दस बजे तक मेरे पेपर होंगे। तुम्हे सवा छः बजे तक तो जरूर आ जाना होगा ताकि हर हालत में पौने सात तक मैं यूनिवर्सिटीपॅंहुच जाऊॅं....।’’

    ‘‘तुम परेशान मत हो बेटी मैं छः बजे ही आ जाया करूॅंगा....बस तुम अपने शरीर और पढ़ाई का ध्यान रखना। और हॉं मेरी कसम है तुमको कभी दुःखी ना होना। बेटी ! हर अॅंधेरे के बाद उजाला और हर धूप के बाद छॉंव होती है। समझ लेना कि तुम्हारा इम्तिहान ले रहा है ऊपर वाला.....। वह सब ठीक कर देगा....। सभी का ध्यान रखता है वह।’’ राम मिलन ने भरे गले से कहा।

   बीस दिनों का समय गिन-गिन कर काटा राममिलन ने और सत्रह तारीख को सुबह छः बजे वह शशी की गली के सामने उपस्थित था।
    ‘‘अरे बाबा! तुम तो बहुत पक्के निकले अपनी बात के़.....समय से पहले आ गए..। मैं तो ड़र रही थी कि कहीं तुम भूल न गए हो।’’ रिक्शे में बैठती शशी ने चहकते हुए कहा।
   ‘‘हॉं बेटी..! मैं भी यही सोच रहा था कि जानबूझ कर देर कर दूॅं और तुम्हारी परीक्षा छुड़वा दूॅ तो मजा आ जाय....।’’ राम मिलन ने हॅंस कर जबाब दिया और रिक्से को सरपट दौड़़ाने लगा।

    फिर तो जिस जिस दिन शशि के पेपर होते राम मिलन सवेरे छः बजे ही चॉंदगंज में शशी की गली के सामने पॅंहुच जाता और पेपर समाप्त होने के समय यूनिवर्सिटी गेट पर हाजिर रहता। जिस दिन यूनिवर्सिटी से आखिरी पेपर दे कर निकली उस दिन शशी बहुत उदास थी। राम मिलन की भी मनःस्थिति लगभग वैसी ही थी। दरअसल दोनों ही इस बात को लेकर दुःखी थे कि आज के बाद उनकी भेंट होनी बंद हो जाएगी। पिछले लगभग दो-ढाई महीनों के अंदर उन दोनों के बीच एक ऐसा अनोखा सम्बन्ध बन गया था जिसे किसी रिश्ते के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता था। अन्य दिनों रास्ते भर यहॉं-वहॉं की कचर, पचर बतियाती रहने वाली शशी उस दिन बिल्कुल चुप थी। राम मिलन भी बिल्कुल खामोशी से रिक्शा खींचता रहा। रास्ते भर किसी ने कोई बात नहीं की। अपनी गली के बाहर रिक्शे से उतरी तो शशी की ऑंखें ड़बड़बायी हुयी थीं। ‘‘बाबा.! मुझे माफ करना.....तुम्हें बहुत परेशान किया मैंने.....।’’ शशी ने रूॅंधे गले से कहा।

    ‘‘अरी हॉं.......बहुत चालाक न बनो........मैं तुम्हे ऐसे थोड़े न छोड़ूॅंगा......अगले जनम में मेरी बेटी बन कर पैदा होगी तो अपनी खूब सेवा करा के सारा हिसाब बराबर कर लूॅंगा।’’ राम मिलन ने चमक कर, हाथ नचा कर कुछ ऐसे अंदाज में कहा कि रो रही शशि को भी हॅंसी आ गयी । दुपट्टे के कोर से ऑंसू पोंछती वह पलट कर गली में घुस गयी। राम मिलन वहीं जड़वत खड़ा उसे तब तक देखता रहा जब तक कि वह ऑंखों से ओझल नहीं हो गयी।


               
सम्पर्क-
अखिलेश श्रीवास्तव चमन
सी-2, एच-पार्क महानगर
लखनऊ-226006
                
मोबाईल - 09415215139 

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की है)       

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