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दीपांकर यादव की कविताएँ
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| दीपांकर यादव |
दुनिया का हर रचनाकार अपने समय का सजग शिल्पी होता है. वह
अपने हवाले से दुनिया को देखने की शुरुआत करता है और एक समय ऐसा आता है जब अपने
सुख दुःख को दुनिया से एकाकार कर लेता है. यह सब अनुभवजनित होता है. इसके लिए उसे
देश-दुनिया की संवेदनाओं से बावस्ता होना पड़ता है. साहित्य सृजन इस अर्थ में
महत्वपूर्ण होता है कि वह हमें मानवीयता का पक्षधर बनाता है. युवा कवि दीपांकर यादव
की कविताओं से गुजरते हुए यह महसूस हुआ कि कवि में आगे जाने की तमाम संभावनाएँ हैं.
कवि नामुमकिन को भी मुमकिन बनाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है. इसी क्रम में
दीपांकर लिखते हैं - ‘ये कुव्वत है कवि की/ कि एक नामुमकिन सी/ कोशिश किये जाता है फिर भी/ काल को भाषा में अनूदित करने की.’ आज पहली
बार प्रस्तुत है युवा कवि दीपांकर यादव की कविताएँ,
दीपांकर यादव की कविताएँ
प्रार्थना-घर
शहर की सड़कें लाशों से अटी पड़ी हों,
और
भोज
के
इंतज़ाम
में
चारों
तरफ
गिद्ध
मंडरा
रहे
हों;
तो
क्या
फर्क
पड़ता
है?
यदि
हजारों
बरस
पहले
सरयू
नदी
के
किनारे
किसी
रघुकुल
में, दशरथ के घर
पुरुषोत्तम
राम
पैदा
हुए
थे;
या किसी बाबर ने
ये
समझा
कि
'दूसरे' भगवान का प्रार्थना-घर उजाड़ कर
'अपने' खुदा की इबादतगाह बना लेगा!
सदियों की खताओं के लिये
लम्हों
को
दागदार
क्यूँ
करें?
जिसे प्रार्थना करना आता है
वह
किसी
वृक्ष
के
नीचे,
किसी
नदी के तट पर
या
अपने
घर
की
दहलीज को ही
'दैरो-हरम' बना लेगा.
कविता की विफलता
हर कविता एक विफलता है.
अब समूचे आकाश को
बगैर एक सितारे को छोड़े
हाथों में तो नहीं पकड़ा जा सकता!
मगर ये कुव्वत है कवि की
कि एक नामुमकिन सी
कोशिश किये जाता है फिर भी
काल को भाषा में अनूदित करने की
प्रतिबन्ध पर
कली खिली
सुगंध उमगी
उपवन में रंग बिखर गया,
माली ने नुकीले तार फैलाये
काँटों की बाड़ लगायी
माली कितने ही नुकीले तार फैला ले
कितने ही काँटों के बाड़ लगा ले,
जब कली खिलेगी
सुगंध उमगेगी
उपवन में रंग बिखरेगा;
तो
अदृश्य, अबूझ आकर्षण में बंध कर,
पुष्प के मौन आमंत्रण पर;
मदमत्त हो कर मीलों से
भ्रमर रसपान के लिये आएंगे ही
सिविल सर्विसेज अभ्यर्थियों से बावस्ता
(मुखर्जी नगर में)
नियमित नींद और लैपटाप की
स्क्रीन से ऊबी हुई
मोटी पलकें, संजीदा चेहरे,
काले अक्षरों पर
सफ़ेद कागज के
नक्काशीनुमा चढ़ाई गई
रंगीन हाइलाइटर्स की कई परतें
जो गिरह खोलती हैं
इस गांठ का कि
रटा जा चुका है
नोट्स कितनी बार!
या कि
मानव इंटेलिजेंट्शिया के
आत्मघात की प्रक्रिया
कितनी धीमी और सुस्त हो सकती है!
आइआइएमसी में
यूजुअली तो मै सिगरेट नहीं पीता!
मगर कैम्पस के बाहर
अरुणा आसफ अली मार्ग पर
इकलौती सिगरेट शॉप के बाहर
यूं ही बेतकल्लुफ़ कशें लेता!
नुमाइश के लिए, बहलाव के लिए
या विशुद्ध पोस्टमाडर्निस्ट बेतुकेपन की खातिर
(मालूम नहीं!)
खूबसूरत छल्ले बनाता
धुएँ के
जैसे कि वक़्त को ही
इनहेल और इक्ज़हेल करता,
हरेक लम्हे को समेटता
हरेक सांस को गिनता
अचेतन में इंटेलेक्चुएलिटी की छवियाँ बुनता
कि‘सिगरेट फूंकना कान्फ़िडेन्स से
बौद्धिकता का अल्टिमेट पैमाना है’
दया, देव और दीपांकर की
एडिटोरियल, विजुअल्स, एथिक्स
और न्यू मीडिया की बातों पर
जी में आता कि
ज़ोर से चिल्ला कर
कोई बहोत गंदी सी
इलाहाबादी गाली दे दूँ!
सम्पर्क -
रूम नं- 104
सर जी. एन. झा हॉस्टल,
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
मोबाईल - 6392732353
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की है.)
बहुत खूबसूरत कविताएँ
जवाब देंहटाएंकल को भाषा में अनूदित करना सिर्फ कवि के बस की बात है..
शुक्रिया सुयश, कवि कोशिशें किये जाता है नातमाम!
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया
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