अनवर शमीम के कविता संग्रह 'अचानक कबीर' पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा 'चेतना सम्पन्न प्रतिरोध का सौन्दर्य'




अनवर शमीम का हाल ही में एक नया कविता संग्रह आया है - ‘अचानक कबीर’. इस संग्रह पर पहली बार के लिए एक समीक्षा लिख भेजी है जितेन्द्र कुमार ने. आज अनवर शमीम का जन्मदिन है. जन्मदिन की बधाई देते हुए हम प्रस्तुत कर रहे हैं अनवर शमीम के कविता संग्रह 'अचानक कबीर' पर जितेन्द्र कुमार की यह समीक्षा 'चेतना सम्पन्न प्रतिरोध का सौन्दर्य'.   


चेतना सम्पन्न प्रतिरोध का सौन्दर्य 


जितेन्द्र कुमार




कबीर के दोहों के साथ बड़ा हुआ
जिन्दगी की आपाधापी में
इतना व्यस्त हो गया
कि कबीर तो क्या
स्वयं को भी भूल बैठा

...........


कबीर ने मुझे आदमी बनाने की भरपूर कोशिश की
आदमी तो नहीं बन सका
होड़ की आड़ ले कर
घुड़दौड़ में जा मिला
और बस
आदमी सा दिखता भर रहा


अनवर शमीम, ‘अचानक कबीर’

अनवर शमीम लम्बे समय से कविताएँ लिखते रहे हैं। सन् 1999 में उनका पहला कविता-संग्रह आया था जिसकी अपेक्षित चर्चा नहीं हुई। उनकी कुछ कविताओं से मैं परिचित था। जुलाई 2017 में एक साहित्यिक गोष्ठी में धनबाद गया था तो वहीं अनवर शमीम से मुलाकात हुई। दूसरे दिन पटना लौटने के लिए रात में साढ़े दस बजे ट्रेन थी। अनवर शमीम मुझे विदा करने स्टेशन आये थे। आज के समय में उनकी विनम्रता ने मुझे प्रभावित किया। एक आदमी सिर्फ कविता लिख नहीं रहा है, कविता जी भी रहा है। कविता लिखने की एक जरूरी शर्त्त यह भी है।


"
अचानक कबीर" अनवर शमीम का दूसरा कविता संग्रह है। उनकी कविताएँ पढ़ते हुए उनकी काव्य वस्तुओं की ओर ध्यान जाता है जिनसे कवि की मूल काव्य-संवेदनाओं से साक्षात्कार होता है।


अनवर शमीम के काव्य-संसार में बाघ की तरह पीछा करता है आतंक। आम आदमी का मन बार-बार आशंकाओं की झाड़ी में उलझकर लहूलूहान होता है। इस आतंक का एहसास आम से खास तक है। ऐसा नहीं है कि ईद के लिए सामान खरीद कर घर लौटते हुए रेलगाड़ी में सिर्फ अव्ययस्क जुनैद मारा जाता है या कोई पहलू खाँ मारा जाता है; कलम चलाने वाली पत्रकार गौरी लंकेश और अंधविश्वास के खिलाफ लिखने वाले नरेन्द्र दाभोलकर भी मारे जाते हैं। आम जनजीवन में उदासी का ऐसा रंग तारी है कि आदमी पार्क में बैठ कर सूखे हुए फूलों को निहारता है या झड़े हुए पत्तों से जी बहलाता है। कोई मध्यवर्गीय जीवन शैली का चिकने चेहरे वाला आदमी कुछ आशा भरी बातें प्यार से करता है, सफेद कबूतर दिखाता है, तो उसकी बातों में छल की गंध मिलती है क्योंकि आदमी विश्वसनीयता खोता जा रहा है। क्योंकि चिकने चेहरे वाला आदमी शांति के प्रतीक जिस कबूतर की बात करता है उस कबूतर की आँखें पथराई दिखती हैं। कैसे हो विश्वास चिकनी चुपड़ी बातों पर। इस आतंक के साये को 'काली बिल्ली', 'काठ के दरवाजे', 'चिट्ठी','एक डरे हुए शहर का सच', 'अपने शहर से दूर' आदि कविताओं में महसूस किया जा सकता है।


समाजवादी लोकतन्त्र हमारा संवैधानिक संकल्प है। समता मूलक समाज हमारी परिकल्पना है। सबका साथ-सबका विकास की घोषणा है सत्ता की और इन घोषणाओं के बीच देश की तीन चौथाई सम्पत्ति पर एक प्रतिशत लोग अधिकार जमा लेते हैं। संकल्प, परिकल्पना, घोषणा और विकास के पाखंड और छल को शिद्दत से महसूस करते हुए कवि अनवर शमीम, सपाटबयानी से बचते हुए प्रतीकात्मकता के साथ कविता में चित्रित करते हैं –


देख रहा हूँ एकदम सामने
धन का एक घन जंगल है
जहाँ हीरे-जवाहरात के बेशुमार पेड़ हैं
कुलाँचे भरते सोने-चाँदी के ढेरों हिरण
हवा में लहराते कीमती वस्त्र
सत्तर व्यंजनों से भरे ढाल

(
पत्थर होने से बच जाऊँगा)


एक कंट्रास्ट देखिए। एक ओर जहाँ धन के घने जंगल हैं, हीरे-जवाहरात के बेशुमार पेड़ हैं, वहीं –


सखुआ के कच-कच हरे
मुलायम पत्तों का दोना बनाने वाली
उस बूढ़ी आदिवासी औरत के चेहरे पर
झुर्रीदार भूख का साया है

...........

अब तक
भूख और जीवन के रिश्ते को
बनाये-बचाये रखने में ही
खुद को खपाती रही है
बूढ़ी आदिवासी औरत

अनवर शमीम


ऊपर के काव्यांश में लोक-जीवन का अक्स है। लोकधर्मी कवि का धर्म इतना ही नहीं होता कि वह मानव जीवन के संत्रासों का अक्स भर दिखा दे, बल्कि यह भी उसका धर्म है कि मानवीय गरिमा को बचाने वाले संभावित रचनात्मक हाथों की परिकल्पना भी रचे। कविता की सार्थकता तभी है। इसलिए सखुआ के कच-कच हरे मुलायम पत्तों का दोना बनाने वाली बूढ़ी आदिवासी औरत में कवि अनवर शमीम यह बताने से नहीं चूकते कि जामुनी रंग की उसकी उंगलियाँ पत्तों को सहेजने-समेटने की कला में दक्ष हैं। इस आदिवासी स्त्री को काव्य नायिका बनाने का अलग महत्त्व है। यह काव्य पात्र एक तो स्त्री है, दूसरे आदिवासी समाज की है, तीसरे सर्वहारा है, चौथे अपने कार्य कला में दक्ष है। दक्ष लोग ही संघर्ष में हिरावल की भूमिका निभाते हैं। यह कवि की परिकल्पना मात्र नहीं है, सहज यथार्थ है। यथार्थ तो समय की धारा में तैरता है, उसे पहचानने वाली दृष्टि और संवेदना चाहिए। अनवर शमीम प्रतिभाशाली और अनुभवी कवि हैं। प्रतिभा और अनुभव तभी सार्थक है जब संवेदना और दृष्टि हो। गैर आदिवासी कवियों की कविताओं में आदिवासी समाज का चित्रण कम स्पेस पाता है कवि की लोकधर्मिता कसौटी पर खरी उतरती है।


कवि अनवर शमीम की एक उल्लेखनीय कविता है दिल्ली। दिल्ली पर अनेक महत्त्वपूर्ण कवियों ने कविताएँ लिखी हैं, लेकिन झारखंड के आदिवासी समाज की दृष्टि से शायद ही किसी कवि या कवयित्री ने 'दिल्ली' पर कोई कविता लिखी है। दिल्ली भारतीय सत्ता की प्रतीक है। यह गरीबों अमीरों सबके लिए सपने बेचती है।


दमित इच्छाओं की पूर्त्ति और सपनों की तलाश में जीतन माँझी, बुधनी उरावँ, रूप लाल एक्का आदि दिल्ली की तरफ हाँक दिये जाते हैं और पशुओं की तरह बिक जाते हैं। दिल्ली आदमी को लील जाने की कला जानती है। दिल्ली में इन आदिवासी लोग घरेलू दास में तब्दील हो जाते हैं –


ख़ूब बिके दिल्ली में
बच्चों की टट्टी
साहब का संडास
साफ करते हुए
हँसने के
इन बेहद कठिन
दिनों में भी
हँसते रहे ठाठ से
 
----------------


हँसते हँसते कैसे आ गया रोना?


अनवर शमीम की एक उल्लेखनीय कविता है - "बूढ़े का वॉयलिन"। बूढ़े की अँगुलियाँ बरसों से वॉयलिन के तारों पर तेजी से दौड़ती रही हैं। वॉयलिन की आवाज चतुर्दिक पसरे सन्नाटे को तोड़ती है। जिन्दगी की जद्दोजहद में जिन्दगी उसके हाथों से बार-बार फिसलती है। बूढ़े में पराजय बोध नहीं है। जिन्दगी के खिलाफ बेहद खतरनाक लोगों की साजिश को वह समझता है। इसलिए बूढ़ा 


"लगातार
बजा रहा है वॉयलिन"


यह चेतना सम्पन्न प्रतिरोध का सौंदर्य है। इस सौंदर्य को" किसी ऊल-जलूल समय में", और" नाखून" कविता में भी देखा जा सकता है।


खाड़ी युद्ध से हमारा देश कई तरह से प्रभावित होता है। क्यों कि वहाँ हजारों-लाखों भारतीय कार्यरत हैं। "खाड़ी देश" उल्लेखनीय कविता है जिसमें दो भाग हैं। दोनों में दो दृश्य हैं। एक दृश्य में रोटी बेलती लड़की है" जो खाड़ी युद्ध के/समाचारों से घिरी " है।
...खाड़ी युद्ध को/ याद करते हुए/ हर बार/ भूल जाती है/ रोटी बेलने की कला/"


एक दूसरा दृश्य है है जो व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता –


सड़क पर तेज
दौड़ती-हाँफती गाड़ियाँ
बदहवास लोग
डरी हुई आँखें
बन्द किराने की दुकानें
नई चमकती मूल्य तालिकाएँ
सफेद कबूतरों के
झुलसे हुए पँख
शांति के पक्ष में लिखी
किताबों के
बिखरे हुए पन्ने
ठहरी हुई
एक पूरी भीड़


रेलवे-कॉलोनी श्रृंखला में कई अच्छी कविताएँ हैं - रेल-रेल, रेलवे कॉलोनी में प्रेम, लिट्टी, तितली जितना प्रेम। इन कविताओं में कवि सामाजिकता के मूल्य को स्थापित करते हैं। रेलवे कॉलोनी के लोग कड़ाके की ठंड में एक साथ मिल कर लिट्टी सेंकने की तैयारी में हैं कवि एकत्रित लोगों की आत्मा में झांकता है। वे लोग थोड़ी देर के लिए "जिन्दगी के" तमाम कील-काँटों से" ,"सभी बँधनों से आजाद" हो कर" आग के चारो तरफ/ अपनी पूरी हँसी/ अपने पूरे वजूद के साथ/ उपस्थित हैं"। मुक्ति के इस एहसास के इस सौंदर्य को परखने और महसूसने की जरूरत है—

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ऐसे में/ अच्छा लगता है/ मिल जुल कर लिट्टी सेंकना/ और मिल-बाँट कर खाना"।

"
पानी और औरत", " माँ और परिंदे," " दिल्ली", "तहरीर चौक", "चाय", "घर से बाजार तक", "जंगल" उल्लेखनीय कविताएँ हैं।


अनवर शमीम कविताओं में मुहाबरेदार भाषिक सौंदर्य रचते हैं। तहरीर चौक का लड़का
'सिर्फ और सिर्फ/ अपने गुस्से को/ बूंद भर ओस होने से बचाने के लिए' बोलने की जिद पर अड़ा है।

चाय कविता में एक मुहाबरेदार बिम्ब है - "....खड़ा है गुमसुम अँधेरा/ हम दुधिया उजाले में हैं"।

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गिरानी में नाच(7)में एक पद है : "हमारे लिए/ आँगन/ दिन-ब-दिन/ ज्यादा ही टेढ़ा/ होता जा रहा है..."।

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हवा" कविता में हवा के प्रतीकात्मक अर्थ छवि की लड़ी है। "शायद/ हवा के भेद जानती है हवा.... शायद/ हवा को दबे पाँव कहीं जाना है/ शायद/ किसी आग के पास....।"


 
संदर्भ : अचानक कबीर(कविता संग्रह), कवि – अनवर शमीम
प्रकाशक : नयी किताब, 1/11829, प्रथम मंजिल, पंचशील गार्डेन, नवीन शाहदारा, दिल्ली—110032, मूल्य : 200 रुपये।









सम्पर्क –


जितेन्द्र कुमार, मदन जी का हाता, आरा-802301,

मोबाईल - 07979011585

ई-मेल : jitendrakumarara46@gmail.com


टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज गुरूवार (12-04-2017) को "क्या है प्यार" (चर्चा अंक-2938) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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