राकेश रोहित की कविताएँ



राकेश रोहित
जन्म : 19 जून 1971.

संपूर्ण शिक्षा कटिहार (बिहार) में. शिक्षा : स्नातकोत्तर (भौतिकी).

कहानी, कविता एवं आलोचना में रूचि.
पहली कहानी "शहर में कैबरे" 'हंस' पत्रिका में प्रकाशित.

"
हिंदी कहानी की रचनात्मक चिंताएं" आलोचनात्मक लेख शिनाख्त पुस्तिका एक के रूप में प्रकाशित और चर्चित. राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन.

सक्रियता : हंस, समकालीन भारतीय साहित्य, आजकल, नवनीत, गूँज, जतन, समकालीन परिभाषा, दिनमान टाइम्स, संडे आब्जर्वर, सारिका, संदर्श, संवदिया, मुहिम, कला आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, लघुकथा, आलोचनात्मक आलेख, पुस्तक समीक्षा, साहित्यिक/सांस्कृतिक रपट आदि का प्रकाशन.

संप्रति : सरकारी सेवा.

किसी भी कवि के लिए कविता लिखना दरअसल उस प्रकृति के साथ होना है जिसमें रंग हवा पर सवार होते हैं और जिसे जीते हुए लगता है कि ऐसी आदिम ख़ुशी पहली बार मिली है।  हर जमाने में बार-बार होते हुए भी यह पहली बार जैसा अहसास वाकई अनूठा होता है।  कविता लिखना वस्तुतः उस अनकहे को जीना-लिखना होता है जिसे लिखा जाना कहा जाना जरुरी था और है। यह लिखा और कहा जाना मनुष्यता को बचाए रखने के लिए है।  प्रकृति का मतलब सिर्फ पेड़-पौधे, फूल-तितली, बादल-बारिश ही नहीं, बल्कि प्रकृति के वे स्वभावगत गुण भी होते हैं, जो हमेशा मानवता के पक्ष में खड़े होते हैं।  जो एक साथ अधिकाधिक लोगों को ख़ुशी का अहसास कराते हैं।  राकेश रोहित प्रकृति पर लिखते हुए हमें सजग करते हैं 'कुछ कहने- सुनने से बेहतर है/ प्यार किया जाए'  यहाँ प्रकारान्तर से मानवता के पक्ष में खड़े होने की बात की गयी है।  आइए आज पहली बार पर पढ़ते हैं युवा कवि राकेश रोहित की कुछ नयी कविताएँ।  
        

राकेश रोहित की कविताएँ 

ऐसे तो मैं

ऐसे तो मैं कविता लिखता हूँ
जैसे अचानक भूल गया हूँ तुम्हारा नाम
जैसे याद करना है उसे अभी- के-अभी
पर जैसे छूट रहा है जीभ की पहुँच से
दांत में दबा कोई रेशा
जैसे पानी में डूब- उतरा रही है
किसी बच्चे की गेंद
जैसे सामने खड़ी तुम हँस रही हो
पर नहीं देख रही हो मुझे
कि जैसे तुम्हें पुकारना
है दुनिया का सबसे जरूरी काम!


ऐसे तो मैं कविता लिखता हूँ
जैसे तितलियों के साथ नाच रहे हैं 
नंग- धड़ंग बच्चे
और फूल खिलखिला कर हँस रहे हैं
कि जैसे रंग हवा पर सवार हैं
और मन में कोई मिठास जगी है
कि जैसे वक्त की खुशी
इतनी आदिम पहले कभी नहीं हुई
कि जैसे इससे पहले कभी नहीं लगा
कि कुछ कहने- सुनने से बेहतर है
प्यार किया जाए!


ऐसे तो मैं कविता लिखता हूँ
कि इस बार लिखना है मन के पोर- पोर का दर्द
कि जैसे यह समय फिर नहीं आयेगा
कि जैसे न कह दूं तो कम हो जायेगी
किसी तारे की रोशनी
कि जैसे पृथ्वी ठहर कर मेरी बात सुनती है
कि जैसे बात मेरी खामोशियों से भी बयां हो रही है
कि जैसे जान गये हैं सब यूं ही
क्या है कहने की बात
कि जैसे अब दुविधा मन में नहीं है
कि जैसे कहना है कि अब कहना है!

ऐसे तो मैं कविता लिखता हूँ।


 एक कविता नदी के लिए

हम सबके जीवन में
नदी की स्मृति होती है
हमारा जीवन
स्मृतियों की नदी है।

नदी खोजते हूए हम
घर से निकल आते हैं
और घर से निकल हम
खोयी हुई एक नदी याद करते हैं।

नदी की तलाश में ही कवि निलय उपाध्याय
गंगोत्री से गंगासागर तक हो आए
अब एक नदी उनके साथ चलती है
अब एक नदी उनके अंदर बहती है।

बचपन में कभी
तबीयत से उछाला एक पत्थर*
नदी के साथ बहता है
और
नदी की तलहटी में कोई सिक्का
चुप प्रार्थनाओं से लिपटा पड़ा रहता है।

सभ्यता की शुरुआत में
शायद कोई नदी किनारे रोया था
इसलिए नदी के पास अकेले जाते ही
छूटती है रुलाई
और मन के अंदर
कहीं गहरे दबा प्यार
वहीं याद आता है।

नदी किनारे अचानक
एक डर हमें भिंगोता है
और गले में घुटता है
कोई अनजाना आर्तनाद।

कुछ गीत जो दुनिया में
अब भी बचे हुए हैं
उनमें नदी की याद है
अब भी नदी की हवा
आकर अचानक छूती है
तो पुरखों के स्पर्श से
सिहरता है मन!

दोस्तों!
इस दुनिया में
जब कोई नहीं होता साथ
एक अकेली नदी हमसे पूछती है -
तुम्हें जाना कहाँ है
?

(*एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों - दुष्यंत कुमार)


एक अच्छी कविता लिख कर उदास हो जाता है कवि 


जो सपने नहीं देखते
वे कविता का क्या करते हैं?

अंततः एक कवि को स्वप्न-द्रष्टा होना होता है।
आश्चर्य नहीं,
एक अच्छी कविता लिख कर उदास हो जाता है कवि
वह जानता है बहुत कठिन होता है
अच्छी कविता का जीवन!
आसान नहीं होती राजपथ पर
हजार सपनों से सजे बचपन की राह।

अंधेरे ब्रह्मांड में जो तारों को
हजार सूरज की तरह चमकाता है
कोई नहीं जानता इस कृष्ण- विवर में
कवि इतनी ऊर्जा कहाँ से लाता है?

उम्मीद से भरे शब्द
कवि के लिए
कविता में एक सपना बुनते हैं!
जब दिल देता नहीं साथ,
गहन निराशा में
हम कविता की सुनते हैं।

है ऐसे में सहज यह अचरज
जो सपने नहीं देखते
वे कविता का क्या करते हैं


सोयी हुई स्त्री, कविता में 

दोस्तों गजब हुआ,  यह अल्लसबेरे...
मैंने पढ़ी एक कविता स्त्रियों के बारे में। 
कविता थी पर सच-सा उसका बयान था,
कविता सोयी हुई स्त्रियों के बारे में थी।

सोये हुए के बारे में बात करना अक्सर आसान होता है
क्योंकि एक स्वतंत्रता-सी रहती है
कथ्य बयानी में,
पता नहीं कवि को इसका कितना ध्यान था
पर कविता में नींद का सुंदर रुमान था।

बात सोये होने की थी
समय सुबह का था
अचरज नहीं कविता में एक स्वप्न का भान था.
मैं पढ़कर चकित होता था
पर यह तय नहीं था कि मैं जगा था।

सुबह-सवेरे देखे  गए सपने की तरह
कविता का अहसास  मेरे मन में है
पर सोच कर यह बार-बार बेचैन होता हूँ –
सोयी हुई स्त्री जब कविता में आती है 
तो क्या उसकी नींद टूट जाती है?



कविता और जादू

कविता है या जादू?

सौ जादू होते हैं कविता में
पर सबसे बड़ा जादू
कविता के बाहर होता है
जब हरे पत्तों पर
कोई पीला फूल खिलता है।

मैं हर बार ताजे रंग ले कर
लौटता हूँ कविता में
मैं जानता हूँ
हर बार जादू बाहर रह जाता है।


सम्पर्क-

ई-मेल : rkshrohit@gmail.com

(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय राकेशजी
    आपकी कविताएं पढ़कर अति प्रसन्ता हुई। कोई तो है जो हमारी भाषा हमारी धरोहर को संजो कर रख रहा है।
    मैं भी इसी ओर छोटा सा प्रयास कर रही हूँ।
    सुरंजली खत्री

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  2. सभ्यता की शुरुआत में
    शायद कोई नदी किनारे रोया था
    इसलिए नदी के पास अकेले जाते ही
    छूटती है रुलाई
    और मन के अंदर
    कहीं गहरे दबा प्यार
    वहीं याद आता है।"
    - बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति - रचना राय, बरहामपुर

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