रविशंकर उपाध्याय


रविशंकर उपाध्याय का जन्म १२ जनवरी १९८५ को बिहार के भभुआ जिले के कैमूर में हुआ. इस समय बनारस हिन्दू  विश्वविद्यालय से हिंदी में पी- एच. डी. कर रहे हैं. रविशंकर की कविताएँ  जनपथ, परिचय, युवा संवाद  जैसी पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित हुई हैं. 

रविशंकर हिंदी कविता के प्रदेश में ऐसे नवोदित कवि हैं जिनकी नजरें अपने समय की नब्ज पर हैं. वे यह जानते हैं कि हमारा यह समय लटकने वाला समय है. यानि विचारो की अस्पष्टता का भयावह समय है आज का समय. अपनी सुविधा से किसी समय कोई राह चुनी जा सकती है. ऐसा कविता के क्षेत्र में भी है. लेकिन उम्मीद की बात यह है कि अंततः वह आदमी ही एक समय अपनी बुलंद आवाज के साथ खड़ा हो जाता है. कहीं न कहीं आदमी को अपनी पक्षधरता स्पष्ट करनी ही होती है. मुक्तिबोध स्पष्ट रूप से पूछते है- 'तुम्हारी पालिटिक्स क्या है पार्टनर' यह सवाल आज के समय में उतना ही मौजू है जितना कभी मुक्तिबोध के समय रहा होगा. रविशंकर यह बात जानते हैं कि भय और विश्वास के बीच जीतता सदैव आदमी ही है. जीने की हमारी आदिम आकांक्षाएं पृथ्वी के साथ नाभिनालबद्ध हैं. इस कवि के पास 'उम्मीद अब भी बाकी है' यह हमारे लिए बड़े सूकून की बात है.


संपर्क- रविशंकर उपाध्याय, शोध छात्र, हिंदी विभाग, बी एच यू, वाराणसी


मोबाइल-  09415571570
ई- मेल- ravishankarbhu@gmail.com         



यह  समय




न अपनी  जमीन का एहसास है
और न ही अपने   छत का अधिकार
विश्वामित्र के अहंकार
और देवताओं के नकार के बीच
दन्त कथाओं में आज भी लटक रहा है त्रिशंकु
जिसके लार से बह रही है कर्मनाशा  
आज हर कोई लटक रहा है
निर्वात में !
अब तो विचार भी लटक रहे हैं.
यह विचारधारा से मुक्ति का समय है
यह परंपरा और आधुनिकता के बीच
लटकने का समय है 
यह बंधन और मुक्ति के बीच 
लटकने का समय है 
यह गाँव  और शहर के बीच 
लटकने का समय है 
अब  तो ईश्वर  भी लटक रहा है 
कभी पकड़ने और कभी छोड़ देने के बीच 
यह समय अपने लिए
अपनों को भूल जाने का समय है
इसी समय में एक आदमी 
माउस और की-बोर्ड से 
खोलता है दरवाजा 
और प्रवेश कर जाता  है 
एक दूसरी दुनिया में 
वह लगाता है चक्कर गोल-गोल 
तभी अचानक याद आती है 
की अरे  वह लाटरी तो निकल चुकी होगी
अरे अब तो बाजार गर्म हो चुका होगा
वह उछलने लगता है सेंसेक्स  की तरह  
वह उछलता है तो कभी गिरता भी 
गिरने को देख 
पाने की भूख से बेचैन  आदमी 
खोने के भय में डूब जाता है
और जो खो चुका है सब कुछ
वह भय मुक्त हो 
खडा  हो जाता है अपनी बुलंद आवाज  के साथ
मौसम  में गर्मी बढ़ने लगती है 
और पहाड़ के हर चट्टान  का 
पिघलना शुरू हो जाता है.
   



पथिक 



तुम्हारे कम्पन में प्रवेश करना ही
मेंरा  धर्म है
तुम्हारी रुग्णता  में पसर जाना 
मेरा  कर्म 
वर्षों  तक यात्रा पर निकले 
पथिक की साधना
तुम्हारे सिहरन  की एक बूंद हो 
टपक जाना है 



उम्मीद अब भी बाकी है



जब धुंधली होने लगती है
उम्मीद की किरण
जब टूटने लगता है आशा और विश्वास 
तभी 
प्रकृति की अनंत दुनिया में से 
आती है आश्वासन की एक आवाज 
जो धीरे-धीरे भर देती है 
एक ललक जीवन के उद्दाम आकांक्षाओं की. 

भय और विश्वास के बीच 
जीतता सदैव विश्वास ही है 
भले ही सीता को हर ले जाये रावण 
भले ही भिक्षा में मांग ले जाये इन्द्र कवच कुंडल 
भले ही कारागार  में डाल दिए जाय देवकी और वासुदेव
भले ही अनसुनी  कर दी जाय
नागासाकी और हिरोशिमा  से उठती कराह....
भले ही मिट्टी में मिला दी जाये 
करुणा और शांति की आदमकद प्रतिमाएं 
भले ही बार-बार प्रहार करें 
मनुष्यता  के दुश्मन बनारस और लाहौर पर 
भले ही न बख्सा जाये 
घंटे की ध्वनि  और अजान  की आवाज 
भले ही न बख्सी  जाये 
गंगा और जमुना की अजस्र धारा 
भले ही न छोड़ी जाय 
कोयल की कोकिल कंठी तान  से मुलायम  हो रही डाल 
भले ही उजाड़ दिए जाय 
चिड़ियों के घोंसले. 

अपने वजूद और अपनी मिट्टी से 
जुडे  लोगो को 
उनकी आदिम आकांक्षाएं 
उन्हें बचा ही लेंगी  
जब  तक बची रहेगी 
पृथ्वी.  

    

  

टिप्पणियाँ

  1. "पहली बार " को एक रचनात्मक ब्लाग के रूप में लगातार विकसित होते हुए देखकर सुखद अनुभूति होती है.....इस ब्लाग की विविधताये उसे और भी महत्वपूर्ण बनाती है......आज" किसलय " श्रेणी के अंतर्गत रविशंकर जी की कविताये padhi ...इस हतास कर देने वाले समय में कविता के माध्यम से इन yuwao के इस tewar को dekhakar bahut उम्मीद बँधती है.....inke pas apne samaj के vidrup होते chehre की samajh भी है और उसे सँवार लेने की aasha और utkantha भी..."इस समय" कविता में रविशंकर उस बदहवासी और आपाधापी का जिक्र करते है, जो आज हर कही मूल-मंत्र के rup में japi जा रही है और छाई हुयी है, ...उसकी इच्छाओ का ज्वालामुखी उसे किसी भी स्तर पर ठहरने नहीं देता , जीने नहीं देता.... उसके लिए "जो मिलता है" , से महत्वपूर्ण जो "नहीं मिलता है" हो गया है....लेकिन रविशंकर उम्मीद नहीं छोड़ते...उनके samne wah दुनिया भी है , जिसमे सब कुछ खो चुका आदमी उठ कर खड़ा होता है और पहाड़ो की चट्टानें भी पिघलने लगती है...."उम्मीद अभी बाकी है" शीर्षक कविता में भी रविशंकर यही करते है....एक लम्बे आख्यान के सहारे वे हमारा परिचय हमारे समय की विद्रूपताओ से कराते है , लेकिन वे अंत में आम आदमी की आदिम आकांक्षाओ के बचे होने की उम्मीद को जिन्दा रखते हुए इस पृथ्वी को भी बचा लेने का sapna देखते है.........इस युवा kavi को hamari dher sari subhkamnaye , की वे aage भी हमें apni कविताओ के माध्यम से bhavishya की बेहतरी की aasha का sanchar करते rahe....ha ..pahlee बार के modratar को भी सार्थक टिप्पड़ी के साथ इन कविताओ को लगाने के लिए बधाई....ramji tiwari

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  2. Bharat Prasad- yah samay aur ummid abhi baki hai...... yah samay kavita main ravishankar ne aajke sansay grast aur duvidhagrast aur nishchayshunya aadmi ki niyati ka chitra khincha hai. dusari kavita hamare, aapke , unke aur sabke bhitar maujood us amog...ha shakti par prakash dalti hai jise ummid kaha jata hai. ummid arthat pran ka pran , jine ka khad-pani,. ummid khushiyon ka mool bij hai. harkar bhi sat-pratishat parajay n manne ki akhand jid hai. manushya ke rom-rom ko prasanna rakhane wala amrit ras hai, yah ummid. ravi shankar ne dharyapurn bareek dristi ka parichay dete huye ummid ki asadharan takat ko gahrayi se shbdbaddha kiya hai. dr. bharat prasad.shillong.

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  3. subtle understanding of the modern hollowness and anxiety. simple but sharp.
    keep it up.
    shyam babu EFL-University Hyderabad.

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