समीर कुमार पाण्डेय की कविताएँ।



समीर कुमार पाण्डेय
महान बांग्ला कवि चंडीदास ने कहा था ‘सबसे ऊपर मानव-सत्य है, उस से ऊपर कोई नहीं।’ एक कवि के साथ-साथ किसी भी समय-समाज के मनुष्य के लिए इससे बड़ा सत्य और कुछ हो भी नहीं सकता। लेकिन इस संसार में होता है ठीक इसका उलटा। सारे ताम-झाम में मनुष्यता सबसे पीछे हो जाती है और मानवीय दम्भ ऊपर हो जाता है। कहीं यह दम्भ ज्ञान का है, तो कहीं आभिजात्यता का। कहीं (जातीय/नस्लीय) बड़प्पन का झूठा दम्भ है तो कभी संपत्ति का अहमकपना। यह सुखद है कि हमारे युवा कवियों में चंडी दास की बात आज भी सूत्र-वाक्य की तरह सुरक्षित है। तभी तो युवा कवि समीर कुमार पाण्डेय लिखते हैं ‘किसी भी देश से बड़ा है/ एक मनुष्य/ जैसे कि भविष्य से बड़ा है/ एक वर्तमान।’ समीर गाँव में रहते हुए अध्यापन से जुड़े हैं और अच्छी कविताएँ लिख रहे हैं। समीर की कविताएँ आप पहले भी ‘पहली बार’ ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं। आइए आज एक बार फिर पढ़ते हैं संभावनाशील युवा कवि समीर कुमार पाण्डेय की कुछ बिल्कुल नयी कविताएँ।
             
समीर कुमार पाण्डेय की कविताएं
 
बड़ा होना

बड़ा वो नहीं
जो दिखाई दे बड़ा
जैसे-पहाड़, आसमान और देश....
किसी भी देश से बड़ा है
एक मनुष्य
जैसे कि भविष्य से बड़ा है
एक वर्तमान
पर तभी
जब मनुष्य देश का
और वर्तमान भविष्य का बोझ लिए
घर से निकले तो
जमीन पर धूप के बारे में जरूर सोचे....
पूरी दुनियां में सबसे बड़ा है
मेहनतकश मजूर
जो याचक नहीं
लुटेरा नहीं
कहीं अड़ा नहीं
बस अपने छोटे पैरों पर खड़ा है.....।

जरुरी नहीं है


जो उड़ते हैं
जरुरी नहीं पंछी ही हों
जो तैरते हैं
जरूरी नहीं मछली ही हों
जो तेज दौड़ते हैं
जरुरी नहीं चीते ही हों
जो जन की बात करते हैं
जरुरी नहीं जन-हितैषी ही हों
जो समर्थन में हैं
जरुरी नहीं सब देश-भक्त ही हों
जो विरोध में हैं
जरूरी नहीं सब देश-द्रोही ही हों....।

मरना


मरे हुए देश में
यूँ तो रोज ही मरते हैं लोग
पर उसका मरना बर्दाश्त से बाहर था
उसी के सहारे
बचा था यह देश
टिकी थी माँ की सूखी आँखे
खड़ा था लाठी टेकता बूढ़ा बाप
वह मासूम बच्चा
उसकी जलती नव-व्याहता...।


ईमान के बिना


कोई भी नक्शा खींचें
अगर उसमें
एक तरफ अँधेरा हो
दूसरी तरफ लकलक उजाला
नदी, पहाड़ और झरने हों
तो नयी दुनिया गढ़ने की बात गल्प ही है
मुग़ालते में न रहें
साँप सी आड़ी-तिरछी
रेखाओं को खींचने से पूर्व
सारा जहर उगल 'अहमक' बनना होगा
अन्यथा पहचान भूल जाओगे
आग, रोटी, कविता छोड़ो
गाँव-घर का पता भी भूल जाओगे...।

सम्भावना


उल्टी हवाओं में भी
जूतों पर नहीं
अपने पाँवों पर भरोसा हो
दर्द छलकता हो
जिन कुनमुनाती छातियों में
आँखें बची हों
सुर्ख लाल डबडबा कर कर भी
मौत के ठीक पहले
मरीज को बेहोश किये बगैर
जिंदगी के लिए ऑपरेशन कर दिया गया हो
जहाँ विद्रोह नहीं
खून देख कर दर्ज होती हो सूची
खाली आँखों से नहीं
आँसुओं से देखा जा रहा हो फलक को
जहाँ अनुवाद में नहीं
आँसुओं में तैरते हों हत्यारे
वहीं कुछ न कुछ बचा रहता है हमेशा
और उन्हीं आँखों में
रोशनी की सम्भावना भी बनी रहती हैं....।

साधारण असाधारण के बीच

मैं धरती पर
एक साधारण किसान मजूर के घर जन्मा
एकदम साधारण जीवन जिया
साधारण लोक-धुनों को भीतर तक उतारा
साधारण पानी की बूँदों
और साधारण फूलों की गंध को महसूस किया
एक-एक निवाले और साधारण भूख की भूख को समझा... ।
जिसे मैंने
आजाद मुल्क समझा
जिसकी असाधारणता से बौराया
कौशल से अपनी मिट्टी को भुला कर
मन को गिरवी रख उजाले की तरफ भागा
वहाँ पहुँच कर
मुझे भय मिश्रित आश्चर्य हुआ
वहाँ भाषा नहीं सिर्फ असाधारण शोर था
और तो और उस उजाले के भीतर घोर अँधेरा भी था....।
साहस

साथियों!
यह युद्ध
सतयुग का युद्ध नहीं है
पर अब भी युद्ध
सत्य के भरोसे
भ्रष्ट और चोर समय से
पूँजी नामक राक्षस के रचे असत्य-व्यूह से है...
पर जितना
यह समय इन क्रूर लोगों का है
उतना ही
हमारा अपना भी है....
याद रखो
मौसम नहीं बदलना है
साहस से मैदान में डटे रहना ही
सत्य और शांति के पक्ष में सबसे बड़ा युद्ध है...।

लड़ाई

हमें पता था
हम हार जायेंगे
क्यों कि
हवाओं का रंग धूसर था
कद बढ़ाने खातिर
अपने-अपने दर्शन गढ़ लिए थे लोगों ने
आदमी ही आदमी का सबसे बड़ा शत्रु था
और तो और इस झूठ को ही
वर्तमान का सबसे बड़ा सच माना जाता था....
क़ानूनी मलवों में
क्षुद्र शब्दों के भार से
चिचियाता रहता था संविधान
बोलने के पहले
दूसरों का मुँह देखने का चलन था
फिर भी
अपनी ही कविताओं से
धारा के विरुद्ध जा कर
मामूली लोगों के लिए लड़े
ऐसे झूठे समय में
पागलपन ही कहा था साथियों ने
कि उम्र भर की पूंजी
रिश्तों और काबिलियत को दाँव लगा कर
रण-भूमि में झोंक देना चतुराई नहीं होती.......।

पराजय के वक्त


वह दौड़ में
आगे निकल चुका था
उसकी शक्ल से
चिपटी पड़ी थी लोभ की संस्कृति
होठों से रिस रही थी शातिर हँसी
जिसमें रह-रह कर झलक जाता था खून
वह मरोड़ सकता था इतिहास का सिर
क्योकि उसका दायां हाथ पूँजी था
और बायां भय-मिश्रित चाटुकारिता....।
यहाँ कुछ नया नहीं था
पराजय पहले भी हुई थी
पहले भी अन्याय
सामर्थ्य के सिंहासन के नीचे दुबका पड़ा था
पहले भी झूठ पर हुआ था जयघोष
पहले भी कुत्ते दुम ही हिलाया करते थे
मनुष्यों के चरित्र को देख कर
पहले भी गिरगिटों ने की थी आत्महत्या....।
शायद
वे भूल रहे थे कि
यह धरती बाँझ नहीं है
भ्रष्ट दलदल में फँसे होने के बावजूद
कर्म और श्रम का मामूली संघर्षशील बीज
किसी वक्त निकल आएगा
भाग्य या करिश्मे से नहीं
केवल तन कर खड़े भर हो जाने से ही.....।

  धरती का संगीत


जब इच्छाओं का घेरा
चमड़ी के नीचे
नसों के चटकने तक का तनाव दे रहा हो
मन बहक चला हो आकाश में
पैरों तले खिसकने लगी हो उर्वर जमीन
तब मन को थिर कर के
मिट्टी में
अपने ही पैरों पर
नाखून गड़ा कर खड़े रहो.....।
धरती को
ऊसरता या कठोरता से
मत आँको
धीरे-धीरे महसूस करो
यह सजल धरती कैसे हाँफ रही है... ।
सुर्ख शोर से
खुद को बचा कर
धरती के भीतर की आवाज
बस कान लगा कर सुनो-
थके बैलों के खुरों का संगीत
बच्चों की किलकारियों की गूँज
किसानों की अधूरी उम्मीदों का आख्यान
अपने पुरखों के दर्द का आर्त-स्वर
जल का अनुनाद
मिट्टी से बाहर आने को आतुर
बीज की कसमसाहट का स्नेहिल संगीत....।

किसान : खुद के खिलाफ


धरती पर
जैसे बच्चों के लिए
थनों में उफ़न उठता है दूध
वैसे ही आसमान में
बादल निचुड़ कर
बुझाते हैं धरती की प्यास....
इस मधुर रस से
निर्मल हास भर जाता है बच्चों
किसानों, चिरई-चुरुंग, ताल-तलैयों में
ताल के धान
पानी में खड़े हो कर
पानी के ही खिलाफ
सिर उठाये अडिग खड़े रहते हैं
उत्सवी माहौल में....
फसलों के
झुक जाने पर
झुक जाता है किसान
खुद के ही खिलाफ चिलम की आग पर
नगाड़े की धुन पर
लहक उठता है किसान धुप्प अँधेरे में....।

सम्पर्क

ई-मेल : samirkr.pandey@gmail.com

मोबाईल - 9451509252


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.) 

टिप्पणियाँ

  1. सभी कवितायें लाजवाब ...
    एक ही शब्द " उम्मीदों की कवितायें "

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  2. सभी कवितायें लाजवाब ...
    एक ही शब्द " उम्मीदों की कवितायें "

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  3. इन कविताओं से आप यूँही नहीं गुजर सकते. यहाँ ठहरना हाेगा.. मुक्तिबाेध की वह प्रसिद्ध उक्ति 'पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है' का ज़िक्र बार-बार यूँही नहीं हाेता.. समीर की पक्षधरता बिलकुल स्पष्ट है. वे अपनी कविताओं में मुखरता से 'मजूर'के पक्ष में खड़े हैं..टटके बिंबाे एवं सहज प्रतीकाें के प्रयोग से समीर की कविताओं के मर्म काे गहराई से जज़्ब किया जा सकता है..

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