स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएँ




आज का समय कुछ लोगों के लिए बहुत हड़बड़ी का समय है. वे एक क्षण में सब कुछ पा जाना चाहते हैं. उनके शब्दकोष में जैसे 'धैर्य' शब्द ही नदारद है. आखिर वे कौन लोग हैं. ऐसे लोग सर्वहारा वर्ग के नहीं हैं. सर्वहारा तो आज भी अपने उन दिनों की प्रतीक्षा में असीम धैर्य के साथ आज भी खड़ा है जब उसे काम के बदले उचित पारिश्रमिक मिल सकेगा, जिससे वह दो वक्त की रोटी पा सकेगा। निश्चित रूप से ये बुर्जुआ वर्ग के लोग हैं जो बिना परिश्रम के सब कुछ क्षण भर में ही हासिल कर लेना चाहते हैं. कवि स्वप्निल श्रीवास्तव अपनी कविता में इस सर्वहारा वर्ग की शिनाख्त करते हैं. आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं अपने पसंदीदा कवि स्वप्निल श्रीवास्तव की कुछ नवीनतम कविताएँ। तो आईए पढ़ते हैं स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएँ।

  
1. गैन्डे

इन्हें  जंगल  में  रहना  चाहिए
लेकिन ये  हमारी  दुनियां  में  दिखाई
दे  रहे  है
जंगल  महकमे  के  लोग  परेशान  है
वे  बाघ  की  तरह  हमलावर  नही  हैं
रौंद जरूर  देते  है
वे  स्वभाव  से  लद्धड़ हैं
मोटी  चमडी  वाले  इन  गैंडों के  बारे  में
कहा  जाता  है  कि  ये  गुदगुदाने  के  एक  हफ्ते
के  बाद  हंसते  हैं
गैंडों  को  राजमार्ग  की  ओर  जाते  हुए
देखा  गया  है
यह  सियासत  के  लिये  बुरी  खबर  है

2. सभा

गूंगों  ने  एक  सभा  की
जिसमें  अभिव्यक्ति की  आजादी  पर
विचार  किया  गया
बहरों  ने  कहा - जो  बोल  न
हीं सकते
वे  बोलने  के  बारे  में  क्या  जाने
हमारे  समय  में  कोई  इशारों  से  बात
नहीं समझता
गूंगों  और  बहरों  के  बीच  जो  विमर्श  हुआ
उसे  ब्रेल  लिपि  में  दर्ज  किया  गया
उसे  पढने  के  लिये  अंधों  की  खोज 
की  जा  रही  है

3. पगड़ी

जिंदगी  भर  वे  पगड़ी  के  साथ  रहे
किसी  मुसीबत  में  पड़ते  तो  दूसरो  के 
पांव  पर  रख  देते  थे  पगड़ी
उम्र  भर  खेलते  रहे  पगड़ी  का  खेल
जाते  समय  पिता  ने  सौंपी  थी  यह  पगड़ी
और  कहा  था-  यह  जादुई  पगड़ी  तुम्हे  हर
मुसीबत  से  बचा  सकती  है
पगड़ी  कभी  सिर  पर  कभी  किसी  के 
पांव  पर  पड़ी  रहती  थी
वह  सुविधानुसार  बदलती  रहती  थी  जगह
पगडी  को  नांव  बना  कर  वे  सीख  गये  है
भवसागर  पार  करने  की  कला 




4. जन्मदिन

वे  शहर  के  नामी  गिरामी  नागरिक  है
कई  अफवाहों  में  आया  है  उनका  नाम
शहर  के  गुमनाम  हत्याओं में  उनका  जिक्र
बहुत  शान  से  किया  जाता  है
वे  अकेले  नही  अंगरक्षकों  की  फौज  के
साथ  चलते  है
शहर  के  लोग  अदब  से  नही  डर  से
सलाम  करते  हैं
उनके  बिना  नही  बनता  शहर  का  बजट
कागज  पर बनती  है  सड़कें पुल
हल्की  बारिश  में  गल जाता  है  कागज
मिट  जाते  है  सुबूत
शहर  की  हत्याओं के  लिये  उनकी  अनुमति
जरूरी  है  अन्यथा  हत्यारों  की  खैर  नही
उनके  जन्मदिन  के  समारोह  में  पूरा  शहर
इकट्ठा  हो  जाता  है
वे  केक  के  सामने  चाकू  ले कर
झुके  रहते  हैं
एक सिरफिरा  चुपके  से  कहता  है
वे  केक  नही  किसी  आदमी  की  गर्दन
काट  रहे  हैं 

5. रास्ता 
उन्हें  रास्ता  दीजिए वे  बहुत  जल्दी  में  हैं
इन्होनें  कई  नदियों  में  जाल  डाल  रखे हैं
इन्हें  नदी  की  सारी  मछलियां  एक  साथ  चाहिए
सोने  की  मुर्गी  के  अंडे  उन्हे  एक  दिन  चाहिए
इनके  शब्दकोष  में  प्रतीक्षा  और  धैर्य  जैसे  शब्द  नहीं हैं
वे  अपने  मित्रों  के  कंधों  पर  पांव  रख कर
पार  करना  चाहते
हैं रास्ता
उन्हें  तुरंत  चाहिये  यश  और  धन
वे  थोड़े से  राजी  न
हीं हैं
इन्हें  समूची  कायनात  चाहिए

6. जरूरी  काम
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जिन्दगी  में  बहुत  से  काम  हैं
सबसे  जरूरी  काम  है  सुंदर  दिखना
स्त्रियों  के  सामने  यह  तलब  कुछ  ज्यादा  ही 
बढ  जाती  है
आदमी  हो  जाता  है  सजग
उगुंलियों  से  संवारने  लगता  है  बाल
और  सुंदर  दिखने  की  कोशिश  करता  है
चालीस  के  बाद  यह  आदत  छूटने  लगती  है
वह  दाम्पत्य  में  उलझ  जाता  है
एक  मकड़ी उसके  लिये  बुनने  लगती  है  जाल
उसे  आईने  से  चिढ  होने  लगती  है
उसे  लगता  है  आईने  में  दिखने  वाला  चेहरा 

उसका नहीं  है
यह  किसी  दूसरे  आदमी  का  चेहरा  है
एक  जमाने  में  जो  चीजे  सुंदर  थी  उन  पर 
जमने  लगती  है  धूल




7.  खपरैल  का  मकान

अच्छा  था  खपरैल  का  मकान
जहां  छूट  जाती  थी  कुछ  न कुछ  जगहें
वहां  पक्षी  बनाते  थे  घोंसले
सुबह  जागने  के  लिये  मुझे  एलार्म
लगाने  की  जरूरत  नही  पड़ती
हम  कलरव  से  जाग  जाते  थे 
पक्का  मकान  बनने  के  बाद  चीजें
बदल  गई
नही  बची  नीड़  बनाने  की  जगह
पक्षी  बहुत दूर  उड़  गये
सामने  वाले पेड  पर  बैठे  हुये कभी  कभी
उन्हें  उन  जगहों को  निहारते  हुए देखा  है
जहां  उन्होंने बनाये  थे  घर 

8.  साइबेरिया

जो  सच  बोलते  है  उन्हे साइबेरिया  भेज 
देना  चाहिए
ज्यादा  सच  बोलने वालों  के  लि
सलीब
सबसे  अच्छी  जगह  है
ठ्न्ड  से  कांपते  हु
शब्द  उष्मा  के 
लिये  परेशान  हैं
उष्मा  कहां  मिलेगी  पर्वत  प्रांतर  बर्फ  से
ढंके  हुए हैं
साइबेरिया  के  सारस  भरतपुर  पक्षी  बिहार  में
प्रवास  कर  रहे 
हैं
वे  कैमरों  में  अपने  किलोल  के  साथ
कैद  हो  रहे 
हैं
वृक्षों पर  उन्होंने बनाये  है  नये  घोंसले
उसमें  से  दिख  रहे  है  उनके  लाल  लाल  चोंच
वे  उड़ने  की  तैयारी  में  हैं
बर्फ  के  दिनों  में  साइबेरिया  में  पक्षी 
नहीं रहते  तब  कौन  रहता  है 
साइबेरिया  में



9.  सामंत

मुकुट  छिन  गया, छिन  गई  जमीन
लेकिन  वे  अपने  अच्छे  दिनों  के  बर्बर
दिनों  के  साथ  जीवित  हैं
वे  धोखे से  मारे  गये बाघ  के  साथ
बहादुरी  की  मुद्रा में  अपना  चेहरा  दिखा  रहे  हैं
बाबू  साहब  वे  दिन  गये  जब  आप  रियाया  को
भेंड़  समझते  थे, उसे  अपने  कांजीहाउस  में  हांक  कर 
जुर्माना  लगाते  थे
तुम  अपने  हरम  में  रह  गये  हो  अकेले
तुम्हारे  किले  के  प्राचीर  पर  बैठे  हुये  है  गिद्ध
एक  लोकगायक  तुम्हारे  पतन  पर  गा  रहा  है
लोकगीत
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सम्पर्क -
स्वप्निल  श्रीवास्तव
510,  अवधपुरी  कालोनी,  अमानीगंज
फैजाबाद  224001
उत्तर प्रदेश
मो0 09415332326
 


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)

टिप्पणियाँ

  1. kavitaye achi he. achi lage. khas kar khaprel ka makan, saiberia. vijendra ji ki paintings bahut sunder he. Manisha jain

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  2. neta, vyavshtha aur aaj admi ke dohre charitra par vyang karti ye utkrishta kavitayen padhkar sukhad anubhuti huyi. shailendra

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  3. कविताएं बहुत अच्छी हैं। बोल-चाल कि भाषा में लिखी गई सभी कविताएं बहुत खूब हैं। शाहनाज़ इमरानी

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  4. स्वप्निल श्रीवास्तव की प्रस्तुत कविताओं में गुजरे हुए समय और वर्तमान की आहट है जो बड़ी सहजता और मार्मिकता से हमें उनके रचना-संसार से अवगत कराती है | कविता के मुहावरे कविता को जीवंत और पठनीय बनाते हैं | विजेंद्र जी की पेंटिंग भाववाचक वैशिष्ट्य का बोध कराते हैं |

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