एकान्त श्रीवास्तव के उपन्यास 'पानी भीतर फूल.' पर जीतेन्द्र कुमार की समीक्षा


एकान्त श्रीवास्तव मूलतः कवि हैं. अभी हाल ही में उनका एक नया उपन्यास आया है 'पानी भीतर फूल.' इस उपन्यास की पृष्ठभूमि में छतीसगढ़ का ग्रामीण जीवन है जिसके साक्षी एकान्त खुद हैं. वे मूलतः उसी अंचल के रहने वाले हैं इसीलिए वहाँ के जीवन, प्रकृति और समस्याओं से भलीभांति अवगत हैं. एकान्त की अपने अंचल अपने गाँव की आवाजाही लगातार बनी हुई है इसीलिए उनके लेखन में वे देशज शब्द भी आते हैं जो अब लुप्तप्राय हो चले हैं. ये देशज शब्द किसी फैशन के तहत नहीं बल्कि जरूरतों के अनुसार ही आये हैं. इसलिए क्योंकि आज भी इनके लिए हिन्दी में हमें समानार्थी शब्द नहीं मिलते। और ये आज जो हिंदी है उसकी समृद्धि के लिए भी यह जरुरी है कि वह इन आंचलिक शब्दों को स्वीकार करे, अपने में समाहित करे. इस उपन्यास की एक समीक्षा लिखी है कवि-कहानीकार जीतेन्द्र कुमार ने. तो आईये पढ़ते हैं हैं यह समीक्षा।            

'पानी भीतर फूल': प्रेम, शांति और आनंद का स्वप्न-संसार

जितेन्द्र कुमार

‘‘हम दीवार पर जमें सारे कैलेंडर उतार दें
और ब्रह्माण्ड की गति में चलने के पहले
पूरी ताकत से इनकार करें
समय को पहचानने की इस तकनीक को’’

- कटौती (काव्य-संग्रह)
निलय उपाध्याय

    एकांत श्रीवास्तव का उपन्यास ‘पानी भीतर फूल’ उत्तर आधुनिक जीवन शैली, भूमंडलीकरण, औद्योगीकरण, मशीनीकरण, कंप्यूटरीकरण आदि यानी विकास की वर्तमान अवधारणा का विकल्प परम्परागत सामुदायिक जीवन शैली को प्रतिपादित करता है। उपन्यास में छत्तीसगढ़ के ग्राम्य-जीवन का अनोखा चित्रण है। आये दिन छत्तीसगढ़ का जन-जीवन मीडिया की सुर्खियों में रहता है। कभी सलवा जुडुम की चर्चा होती है, कभी किसी अधिकारी या नेता की हत्या की, कभी आदिवासियों को जंगल से खदेड़ने की, कभी उनके सशस्त्र प्रतिरोध की, कभी पुलिस-दमन और मानवाधिकार हनन की। उधर मुख्य मंत्री का विज्ञापन-प्रचारित करता है- ‘‘छत्तीसगढ़-उच्च शिक्षा का नया शिखर-विश्वास का आधार, विकास लगातार। छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा संस्थाओं की संख्या 250 से बढ़कर हुई 690, उच्च शिक्षा की राज्य विकास दर 17.90 प्रतिशत है जो कि राष्ट्रीय विकास दर 7 प्रतिशत के ढाई गुना से अधिक है। मुख्यमंत्री का दावा है कि सकल दर्ज अनुपात (जी. ई. आर.) 2.5 से बढ़ कर हुआ 20. राज्य में आई. आई. एम., एम्स, एन. आई. टी., राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय आदि आरंभ।" यानी आंकड़ों का खेल जारी है।

    राजनीतिज्ञों के इन आँकड़ों के खेल या मीडिया की सुखिर्यों की कोई तस्वीर नहीं है- ‘पानी भीतर फूल’ में। उपन्यास के नायक निताई गुरु जी कुसुमपानी गाँव के निवासी हैं। अपने गाँव कुसुमपानी से सोलह कोस दूर प्राथमिक विद्यालय सेम्हरतरा में वे शिक्षक हैं।

    प्राथमिक विद्यालय सेम्हरतरा में निताई गुरु जी के अतिरिक्त दो और शिक्षक हैं। पुरुषोत्तम जी एवं प्रधानाध्यापक जोगी जी। वे लोग वहीं रहते हैं, लेकिन निताई गुरु जी प्रतिदिन अपनी पुरानी सायकिल से सोलह कोस जाते हैं और सोलह कोस आते हैं।

    ‘पानी भीतर फूल’ के कथा-पात्रों में कोई आदिवासी चरित्र नहीं है। छत्तीसगढ़, झारखंड, गढ़चिरौली अथवा नंदीग्राम, लालगढ़, मिदनापुर, पुरूलिया के आदिवासियों की गरीबी, उनके शोषण-दमन की चर्चाएं मीडिया और साहित्य में बराबर पढ़ने को मिलती है, लेकिन गैर-आदिवासियों की गरीबी एवं संकटग्रस्त जीवन की चर्चा कोई नहीं करता। ‘पानी भीतर फूल’ के कथा-पात्रों में निताई-श्यामली, मोंगरा-बैशाखू, दुकलहिन, मरही दाई, रामबाई, नोना, मंगलू, मोहन सतनामी उर्फ घेंचकटा, शंकर गौंठिया, सोरदहिन, खोरबाहरिन, चमारिन, केवड़ा, रमौतिन, गौरी-भगोली,दुग्दी, बंशी पटेल, भैंसा मोती, राजाराम-कुशाली, भोकलू, बोटारी, यशोदा, गीता, कुंती, गैंदी, संतोषी, मुण्डी उर्फ सावित्री, कोंदा, रंगी, फोटकू, इंदरमन, लक्ष्मण, राधू, अमर, बय्यन गोंठनिन (सोनारीन), परदेसी, हिरदे, शत्रुधन, प्रहलाद और मनबोध आदि हैं। इनमें मोहन सतनामी उर्फ घेंचकटा परसबानी का हरिजन है। राजाराम-कुशाली सेम्हरतरा के दलित हैं, कुशाली सेम्हरतरा प्राथमिक विद्यालय का छात्र है। कोंदा राउत है, उसके तीन बेटे हैं- परदेसी, हिरदे और शत्रुघन। कोंदा बरदिहा है यानी पहरिया। गाँव की बरदी (रेवड़) चराना और घर-घर जाकर गाय-भैंस दुहना उसका काम है। कोंदा की पत्नी मंगतिन है। वे ग्वाले हैं। घर में प्र्याप्त गाय-भैंस पालते हैं। उनलोगों का दूध का छोटा-सा व्यवसाय है। कोंदा के बेटे हिरदे, परदेशी और शत्रुघन भी कोंदा के साथ बरदी में जाते हैं।

    मरही दाई और सोरदहिन दरिद्रता के सीमान्त पर खड़े हैं, पर अपनी आजीविका अपना जाँगर ठेठा कर प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें दुनिया-जहान किसी से कोई शिकायत नहीं हैं। वे गैर-आदिवासी समूह से आते हैं। अजगूत है कि दोनों विधवा स्त्रियाँ हैं, उनको कोई परिवार नहीं। उनके कोई स्वप्न नहीं हैं, कोई समस्या नहीं है, बस जीवन जीते जाना है। कुसुमपानी में न कोई पंचायत है, न कुसुमपानी किसी पंचायत में है। वहाँ न कोई पुलिस-स्टेशन है, न रेलवे स्टेशन, न कोई चिकित्सालय। कुसुमपानी के ग्रामीणों के दिन बीत रहे थे-

    ‘‘जिनके प्रारब्ध में जितने दिन थे, उतने दिन। जिसकी जेब में जितने सिक्के थे, उतने ही खर्च होते थे। रामी ने सबको गिनकर साँसें दी थीं। इस हिस्से और हिसाब से अधिक कोई एक भी साँस नहीं ले सकता था (पृष्ठ-62, पानी भीतर फूल)।

    उचित शिक्षा के अभाव में कुसुमपानी गाँव के ग्रामीणों में आधुनिक चेतना का अभाव है। वे नियतिवादी हैं। सत्रह वर्षीय केवड़ा सम्पन्न वंशी पटेल की बेटी है। दुगदी का युवा पुत्र भगोली उससे प्रेम करता है। लेकिन वह जाति का साहू (तेली) और गरीब घर का लड़का है। राजमिस्त्री का काम कर अपनी जीविका उपार्जित करता है। एक रात सोये में केवड़ा को करैत सांप डंस देता है। केवड़ा को गलतफहमी है कि उसे मुसुआ (चूहे) ने काट लिया। वह चूहे के काटने और सर्पदंश में फर्क नहीं कर पाती और बगैर इलाज के मर जाती है। इलाज भी कहाँ होता, आसपास कोई चिकित्सालय नहीं दीखता। प्रारब्ध के हवाले कर देना ज्यादा सहज है।

    ‘पानी भीतर फूल’ के कथाकेन्द्र में मूलतः कुसुमपानी गाँव है। अन्य दो सहायक गाँव सेम्हरतरा और हथबंध हैं। सेम्हरतरा इसलिए कि उपन्यास के नायक निताई गुरु जी वहाँ के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हैं, और हथबंध में निताई गुरू की पत्नी श्यामली की सहेली वसंता का विवाह हुआ है। सेम्हरतरा और हथबन्ध गाँवों की पूरी या अधूरी छवि उपन्यास में नहीं उभरती। फिर भी, यह मान कर चला जा सकता है कि उन दोनों गाँवों के ग्रामीणों की जीवन-स्थितियाँ भी कुसुमपानी से अलग-थलग नहीं हैं। वहाँ भी अनेक मरही दाइयाँ होंगीं जिनका घर मात्र एक बरामदा और एक कोठरी का होगा। दीवारें मिट्टी की होंगी और छानी पत्तों की। उस बूढ़ी स्त्री के आगे-पीछे अब कोई नहीं बचा होगा। निताई गुरु जैसे कुछ समझदार दयालु लोगों की करूणा और दया पर उसे कभी-कभी कोतरा मछली मिल जाती होगी, लेकिन भुण्डी और सिंघी नहीं क्योंकि कोतरा मछली में काँटे अधिक होते हैं; भुण्डी गोल-गोल काले रंग की स्वादिष्ट मछली होती है। इसमें खून भी खूब होता है। सिंघी, लाल रंग की लम्बी मछली होती है। यह भी जानदार होती है।

    एक ओर शासन का दावा है कि छत्तीसगढ़ का खूब विकास हो रहा है; उस विकास का हिस्सा मरही दाई और सोरदहिन तक नहीं पहुँच रहा है। एक सुखद स्थिति यही है कि कुसुमपानी में ‘परंपरागत भाई-चारा, प्रेम-मोहब्बत और बुजुर्गों के प्रति सम्मान का भाव बचा हुआ है। भूमंडलीकरण जनित संकीर्णता और बाजार की आमानवीयता और संवेदनहीनता से यह गाँव बचा हुआ है, भले ही तथाकथित विकास की रश्मियों के दर्शन यहाँ नहीं होते। निताई गुरु एक दिन सेम्हरतरा स्कूल जाते हुए मरही दाई को खेत के पास डबरे के पानी में पसहर धान झड़ाते हुए देखते हैं। वे सायकिल रोक कर मरही दाई जैसी गरीब बूढ़ी स्त्री का कुशल-क्षेम पूछते हैं तब अपनी सायकिल आगे बढ़ाते हैं। आज की आधुनिक या यों कहें उत्तर आधुनिक जीवन शैली के आपाधापी में अपनी माँ का कुशल क्षेम पूछने का समय नहीं है किसी पुत्र के पास। ऐसे में निताई गुरु का मरही दाई से पूछना,‘‘क्या कर रही हो माँ?’’ बहुत बड़ी बात है। एकांत श्रीवास्तव की लेखकीय टिप्पणी है।-‘‘गाँव में बड़े बुजुर्गों को देख कर नजर अंदाज करने की प्रथा न थी (पृष्ठ 140)।’’

    एकांत श्रीवास्तव के दूसरे कविता-संग्रह ‘‘मिट्टी से कहूँगा धन्यवाद’’ में लगभग सैंतालीस पंक्तियों की एक कविता है- ‘‘पसहर झड़ाने वाली स्त्रियाँ’’-। यह कविता मरही दाई जैसी स्त्रियों पर ही। छत्तीसगढ़ के गाँव की स्थिति इसमें झलकती है-

‘‘वे आती हैं भूख की पगडंडियों पर चल कर
 ............................
व्याह का हर गहना साहूकारों के पास गिरवी रख कर
वे आती हैं बस सुहाग की चूडि़याँ पहने
जो उन्हीं की तरह होती हैं चुप और उदास    
कभी कभी ‘हाँ-हूँ’ करती हुई

वे पसहर झड़ाने वाली स्त्रियाँ हैं
जो सुदूर घरों से आती हैं
भूख की पगडंडियों पर चल कर

वे उतरती हैं पानी में
पहुँचती हैं धान के पौधों के पास
जिन्हें वे बाँध गई थीं भादों में
वे फैलाती हैं आँचल एक हाथ से
दूसरे हाथ से झड़ाती हैं दाने


यों कुसुमपानी गाँव का समाज सहकारिता, भाईचारा और प्रेम की धुरी पर ही चलता है। वहाँ मनोरंजन के आधुनिक साधनों का अभाव है। भोजन-पानी के अतिरिक्त जीवन की अन्य आवश्यकताएँ हैं, जैसे-साड़ी, धोती, गमछा, सलूखा,फल-सब्जियाँ, टिकुली-चूड़ी आदि मनिहारी के सामान, जूत-चप्पल, साबून, नमक, सिले-सिलाये वस्त्र। वहाँ आसपास के गाँवों में बारी-बारी से किसी एक गाँव को मड़ई (मेला) के लिए चुना जाता है। निताई-श्यामली और कुसुमपानी गाँव के अन्य कई स्त्री-पुरुष और बच्चे लखना गाँव के मेले (मड़ई) में जाते हैं। श्यामली-मोंगरा उड़न खटोले में चढ़ते हैं। निताई-बैशाखू गन्ने का रस पीते हैं। चलते समय श्यामली मरही दाई के लिए काली किनारी वाली सफेद सूती साड़ी खरीदती है। श्यामली करूणा में निताई से आगे निकल जाती है, बल्कि निताई चौंकते हैं। घर लौटते समय श्यामली मरही दाई को साड़ी भेंट करती है। मरही दाई उसे असीसती है। निताई-श्यामली अभी निःसंतान हैं। मरही दाई जैसी अनाथ बूढ़ी स्त्रियों के आशीर्वाद की आवश्यकता है उन्हें। खाली वक्त में मरही दाई श्यामली के घर आती है। वह जंगल से तेंदू पत्ती तोड़ कर मेले में बेचती है जिससे उसे दैनिक खर्च के लिए कुछ पैसे प्राप्त हो जाते हैं। क्या जंगल का गार्ड मरही दाई को तेंदू पत्ती तोड़ने देता है? कोई व्यवधान नहीं डालता? इस बारे में उपन्यास चुप क्यों है?

मरही दाई का अतीत उपन्यास में इस तरह नहीं दीखता, जैसा रामबाई-मोहन सतनामी का दीखता है। वह स्वप्न पर जिस तरह अपना विचार व्यक्त करती है, उससे लगता है कि वह पढ़ी-लिखी शिक्षित स्त्री है। निताई की पत्नी श्यामली एक रात एक अजीव-सा सपना देखती है कि एक सफेद पक्षी दूधिया आलोक से दमकता हुआ उड़ कर आया और उसके पेट में समा गया। निताई सपने की बात पर अधिक ध्यान नहीं देते। श्यामली ने मरही दाई से सपने के बारे में पूछा। मरही दाई सुशिक्षिति ज्येतिषाचार्य की भाषा में कहती है- ‘बेटी, ऐसा लगता है, कोई मेहमान इस घर में आनेवाला है, लेकिन पंछी का रंग सफेद है जो देवत्व, त्याग और संन्यास का रंग है-तो ऐसा मालूम पड़ता है जैसे यह मेहमान अधिक दिन रूकेगा नहीं (पृष्ठ-35)।’’ श्यामली गर्भवती होती है, प्रसव होता है, लेकिन वह मरे बच्चे को जन्म देती है। मरही दाई की स्वप्न-व्याख्या सही होती है। यहाँ कोई लेखकीय टिप्पणी नहीं है।


‘पानी भीतर फूल’ में दरिद्र मरही दाई की प्रतिरूप सोरदहिन दाई है। सोरदहिन दाई सेम्हरतरा प्राथमिक विद्यालय में बच्चों का मध्याह्न भोजन बनाती है, जिस विद्यालय में निताई गुरु जी अन्य दो शिक्षकों के साथ शिक्षक हैं।’’ वह गाँव में अकेली थी-आगे-पीछे कोई नहीं। उसकी आवश्यकता भी अल्प ही थी (उपन्यासकार के अनुसार)। थोड़ी सब्जी में ही उसका गुजारा हो जाता। छुट्टियों को छोड़ कर दिन में उसे विद्यालय की दलिया मिल ही जाती थी जिसे बनाना उसी का दायित्व था। साल में एक बार तीनों अध्यापकगण आपस में रुपये मिलाकर सोरदहिन दाई को एक साड़ी भी दे दिया करते थे। सोरदहिन का संसार इतने में चल जाता था। फिर दलिया बनाने का वेतन उसे विद्यालय की ओर से प्रतिमाह दिया ही जाता था। (पृष्ठ-66)।’’ एकांत श्रीवास्तव उपन्यास में सोरदहिन दाई के अतीत पर प्रकाश नहीं डालते। मध्याह्न भोजन का दलिया स्कूल के प्रभारी अध्यापक या प्रधानाध्यापक ठेके पर बनवाते हैं। स्कूल सरकारी है, फिर विद्यालय के शिक्षक आपस में रुपये मिलाकर सोरदहिन को साड़ी क्यों खरीदते हैं? यह एकांत का मर्यादित स्वप्न है या यथार्थ? विद्यालय का परिसर बहुत बड़ा था और वहाँ कई प्रकार की सब्जियाँ चैथी-पाँचवीं कक्षा के बच्चों के श्रम के सहयोग से उगाई जाती हैं। सिंचाई और गुड़ाई का काम बच्चे देखते हैं। विद्यालय परिसर में सब्जियों की क्यारियां बनी हैं। उन क्यारियों में कुंदरू, डोंड़के, तुमा, लौकी, कुम्हड़ा, मेथी, पालक, लाल भाजी (साग), धनिया, मूली, भाँटा, हरी मिर्च, मीठे नीम की झाड़ी, गोभी, पताल, चिरपोटी टमाटर आदि फलते हैं, फले हैं। यानी विद्यालय परिसर में सब्जियों की पर्याप्त खेती होती है, लेकिन वहाँ कोई बाहरी मजदूर नहीं खटता। अतिरिक्त सब्जियाँ सोरदहिन दाई गाँव के हाट में बेच आती है, प्राप्त राशि विद्यालय की विकास-निधि में जमा होता है। इस निधि का उपयोग विद्यार्थियों के हित में होता है। गरीब विद्यार्थियों की वेशभूषा सिलवा दी जाती है, उनके लिए पुस्तकें, कापियाँ, स्लेट आदि खरीद दिया जाता है। लाचार अभिभावक का कोई लड़का बीमार पड़ता है तो इलाज कराने में उसकी यथासंभव मदद की जाती है। यह सब वर्णन पाठक को एक स्वप्न-सा लगता है। शिक्षक अब ऐसे समाज सेवी और त्यागी कहाँ मिलते हैं? यहाँ मुझे कथाकार रणेन्द्र का उपन्यास ‘‘ग्लोबल गाँव के देवता’’ का एक प्रसंग याद आता है। यह उपन्यास ‘‘ग्लोबल गाँव के देवता’’ का एक प्रसंग याद आता है। यह उपन्यास झारखंड के गाँवों की यथार्थवादी तस्वीर पेश करता है। भौंरापाट स्कूल का वर्णन रणेन्द्र इस प्रकार करते हैं- ‘भौंरापाट स्कूल सूअर का बखार नजर आता। आधी-अधूरी बिल्डिंग, जैसे-तैसे बना हास्टल, मुर्गीखानों जैसा शिक्षक-आवास। जहाँ साफ़-सफ़ाई होनी चाहिए वहीं सबसे ज़्यादा गन्दगी। .................. केवल मेस की खरीददारी के लिए मारामारी। असल कमाई वहीं थी। हेडमिस्ट्रेस मुझ पर ही झल्लातीं, ‘‘इन मकई के घट्टा खाने वालों को यहाँ भात-दाल मिल जाता है, वही बहुत है। आप अपने हिसाब से क्यों सोचते हैं? कौन इन्हें अपने घरों में खीर-पूड़ी भेंटाता है कि आप मेस-व्यवस्था में सुधार के लिए मरे जा रहे हैं। ‘‘(पृष्ठ-20)।’’ इस विद्यालय के हेड मिस्ट्रेस कौन हैं? मिंज मैडम! भौंरापाट स्कूल आदिम जाति परिवार की बच्चियों के लिए खोला गया था। किन्तु उसमें पढ़नेवाली असुर-विरिजिया बच्चियों की संख्या दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी। ज्यादातर बच्चियाँ हेडमिस्ट्रेस मिंज मैडम और अन्य दो शिक्षिकाओं के गाँव की और उनकी ही जाति, उरावँ-खडि़या, खेरवार परिवार की थीं.

    इस मामले में सेम्हरतरा प्राथमिक विद्यालय खुशनसीब है कि वहाँ गाँधीवादी निताई गुरु जैसा शिक्षक है कि स्कूल का दलित छात्र कुशाली जब बीमार पड़ जाता है तो वे उसका कुशल-क्षेम पूछने उसके घर जाते हैं, उसकी इलाज हेतु उसके पिता राजाराम को अपनी जेब से कुछ रूपये देते हैं, यह कहते हुए कि बाद में वे रूपये लौटा दें। स्कूल में विकास-निधि से गरीब छात्रों को इलाज हेतु पैसे देने का प्रावधान है, लेकिन पता नहीं निताई गुरु उस निधि का इस्तेमाल क्यों नहीं करते। सेम्हरतरा में डाकघर या बैंक जैसी संस्था भी तो नहीं दीखती! ते एक द्वंद्वहीन परिसर है सेम्हरतरा विद्यालय का। झारखंड और छत्तीसगढ़ के विकास की दिशा में फर्क स्पष्ट है। भौंरापाट स्कूल की हेडमिस्ट्रेस मिंज मैडम हैं, वहाँ सेम्हरतरा स्कूल के हेडमास्टर जोगी गुरु जी हैं। एकांत यह संकेत करते हैं कि जोगी गुरु जी ब्राह्मण हैं। वे वरिष्ठ एवं बुजुर्ग हैं। उनका मार्गदर्शन मिला करता है। वक्त पड़ने पर जोगी गुरु जी स्वयं काम में जुट जाते हैं। वे मींज मैडम नहीं हैं। इस काम में उनको आनन्द आता है। मूल समस्या काम में आनन्द लेने की है। काम तो श्रमिक करते हैं। श्रमिकों को काम में आनन्द आना चाहिए। एकांत श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता है-‘नागकेसर का देश यह’। सन् 2009 में प्रकाशन संस्थान से आयी है।

इस लंबी कविता के बारे में एकांत लिखते हैं-  ‘‘ये हमारे जीवन के दृश्य हैं और संसार के भी। ये दृश्य स्मृति के भी हैं और स्वप्न के भी....। इस दृश्य-यात्रा में निरन्तर वह साधारण आदमी है जो मूलभूत नागरिक अधिकारों और स्वाभिमान के साथ अपना जीवन जीना चाहता है। उसकी कथा में प्रेम और संघर्ष के चटख रंग हैं तो आँसू और पसीने का खारापन भी।’’ लेकिन ‘पानी भीतर फूल’ में कोई सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता कुसुमपानी, सेम्हरतरा, परसवानी, या हथबन्ध में नहीं दिखता जो मूलभूत नागरिक अधिकारों के लिए लड़ता हो।

    ‘नागकेसर का देश’ दरअसल छत्तीसगढ़ ही है। इस छत्तीसगढ़ का यथार्थ कविता में इस प्रकार है-

‘‘कभी देवारों की बस्ती में जाना
देखना पुरानी साडि़यों
और पुरानी चादरों से बने
उनके तम्बुओं को
एल्युमीनियम की डेकचियों में
जहाँ खदबदाता रहता है अन्न
तीन पत्थरों के चूल्हों पर
यही है इनका घर ‘


(पृष्ठ 10, नागकेसर का देश यह)।’’

कुछ और मर्मस्पर्शी पंक्तियों को देखें-

‘‘ये कैसे पहिये हैं
विकास के रथ में
कि जिनमें लगा है इनका रक्त?
ये कैसे फूल हैं
सभ्यता की नई भोर में
जो इनकी हड्डियों के
खाद से खिले हैं? 


(पृष्ठ 15, नागकेसर का देश यह)।’’

कुछ पंक्तियाँ और द्रष्टव्य हैं-

‘‘यह कौन गाँव है माँ?
यह कुसुमपानी है बेटा
मैं जब व्याह कर आयी थी
तब लालफूल फूलते थे इस गाँव में
तब ऐसा सघन
नहीं था
बबूल का वन 

(पृष्ठ 23, नागकेसर का देश यह)

    ते कुसुमपानी के वे वन खत्म हो गये जिनमें लालफूल खिलते थे। अब तो बबूल का सघन वन दिखता है, कुसुमपानी के इर्द-गिर्द। तो निताई गुरु ‘पानी भीतर फूल’ में जो दृश्य-यात्रा करते हैं, वे क्या उनकी स्मृतियों में की गई दृश्य-यात्राएँ हैं? एकांत की कवि-दृष्टि जितनी यथार्थवादी है, उनकी उपन्यास-दृष्टि उतनी ही स्वप्नजीवी। उपन्यास के नायक-नायिका निताई-श्यामली आर्थिक रूप से सम्पन्न है; कुसुमपानी का सुखीयार परिवार। बड़ा दुःख उनका निःसंतान होना है, शेष छोटे-छोटे दुःख हैं। दुःख दुःख जैसा नहीं है।

    निताई-श्यामली निःसंतानता के दुःख को पशु-पक्षियों के प्रेम में बदल देते हैं। उन्होंने तोता पाल रखा है। तोते का नाम मिट्ठू है। श्यामा गाय है। बत्तखें हैं और उनका प्यारा चितकबरा काला कुत्ता-झब्बू। उपन्यास में निताई श्यामली के जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों से जीवन की सामान्य कथा बुनी गई है। किसान-जीवन के छः महीने मेहनत और उत्पादन की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं- आषाढ़, सावन, भादो, कुआर (आश्विन), कार्तिक और अगहन। चार महीने में धान के पौधे तैयार हो जाते हैं। दो महीने में कटनी (लुवाई), दवनी, ओसवनी सम्पन्न हो जाती है। उपन्यास का कथा-काल छः महीने का है। उपन्यासकार एकांत श्रीवास्तव छत्तीसगढ़ के ग्राम्य-जीवन से सुपरिचित हैं। वहाँ की प्रकृति का अवलोकन वे अत्यंत आत्मीयता से करते हैं। इधर के उपन्यासों में प्रकृति का अवलोकन वे अत्यंत आत्मीयता से करते हैं। इधर के उपन्यासों में प्रकृति-चित्रण सिरे से गायब दिखता है। ‘पानी भीतर फूल’ में एकांत ने इसकी श्लाघनीय भरपाई की है। वे छत्तीसगढ़ की वन-संपदा के एक-एक वृक्ष और झाडि़यों-झुरमुटों से परिचित हैं। आइए नायक निताई गुरु के जीवन को देखें और साथ ही छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक-छटा को। निताई उपन्यास के आरंभ में झिपारी बनाते दीखते हैं। वे सरकारी विद्यालय के शिक्षक हैं, उनके पास खेती की पर्याप्त जमीन है। लेकिन गर्मीं की छुट्टियों का उपयोग घरेलू कार्यों में करते हैं। शिक्षक के घर की दीवारें मिट्टी की हैं। सामने आषाढ़ है। बारिश में मिट्टी की दीवार खन्हर जाती है। इसलिए निताई जल्दी-जल्दी झिपारी बना रहे हैं। कोई सहयोगी नहीं दीखता। आँगन में गुलमोहर खिला है। वहाँ बखरी में धनबोहार के उजले-पीले फूल खिले हैं। उन्हीं फूलों के बीच काला-कत्थई रंग का बनकुकरा उतरता है, जो निताई के भावुक मन को मोर के बच्चा के समान लगता है। आगे उपन्यास में झिपारी के निर्माण की प्रक्रिया और उपयोगिता समझाई गई है। यहाँ श्रम की प्रतिष्ठा दीखती है।

    निताई के आँगन में अमरुद का पेड़ है। वे मिट्ठू के लिए अमरुद के पेड़ से ताजा फल तोड़ते हैं। श्यामली फल को आँचल में लोकती है। मिट्ठू घर के सदस्य की तरह है एक दिन दोपहर में मिट्ठू निताई के साथ पिंजड़े से बाहर निकलकर खा रहा था। इसी बीच एक बिलार ने मिट्ठू पर हमला कर दिया। मिट्ठू भयातुर होकर अमरुद की डाली पर जा बैठा। फिर कहीं पत्तों में छिप गया। निताई बहुत परेशान हुए। मिट्ठू को खोजने जंगल में चले गये। बाद में मिट्ठू शाम के धुंधलके में स्वयं उतर आया। यह एक पालतू पक्षी के लिए निताई गुरु का दुःख था जो शीघ्र ही दूर हो गया।

    इसी तरह निताई गुरु की श्यामा गाय जंगल में काँदो बरदहिया की बरदी से भटक गयी। पता नहीं कैसे घने जंगल में चली गई या किसी डोंगरी (छोटी पहाड़ी) पर चढ़ गई। श्यामा को खोजने कोंदा भीतर जंगल में चला गया। अंदर घने जंगल में बाघ का भय था/श्यामा गाय अकस्मात् लौट आयी, पर कोंदा नहीं लौटा। कुसुमपानी में कोहराम मच जाता है। गाँव के कई लोग निताई गुरु के घर इकठ्ठा होते हैं। छत्तीसगढ़ के मानुष का जीवन कितना संकटापन्न है। कोंदा को खोजने तीन समूहों में लोग का जीवन कितना संकटापन्न है। कोंदा को खोजने तीन समूहों में लोग जंगल में जाते हैं। एक समूह का नेतृत्त्व निताई स्वयं करते हैं। छत्तीसगढ़ के विकट, कठिन और सर्पगंधा अंधेरों में समूह के उजाले में लोग आगे बढ़ते है। समूह और समाज का उजाला सबसे बड़ा था। बोटारी भूलन कांदा की चर्चा करता है, लेकिन निताई गुरु शिक्षक हैं, सुलझे हुए इंसान हैं, उनमें वैज्ञानिक चेतना है, वे कहते हैं कि भूलन कांदा जैसी कोई चीज नहीं होती। कोंदा अंततः जंगल में मिल जाता है। गाँव का दुःख खत्म होता है, मंगतिन रउताइन का पति कोंदा घर लौटता है। निताई गुरु की श्यामा गाय और उसका पहटिया घर लौटते हैं। उपन्यास में कोंदा बरदिहा की जातिगत परंपरागत पेशे का विस्तृत वर्णन है।

    उपन्यास में निताई-श्यामली की कई छोटी-छोटी यात्राओं का यात्रा-रिपोर्ताज है। निताई-श्यामली तीर्थयात्रा पर छत्तीसगढ़ से बाहर नहीं जाते, किसी ऐतिहासिक-धार्मिक स्थान का दौरा नहीं करते बल्कि छत्तीसगढ़ की सीमा में अपने को सीमित रखते हैं। उनकी आकांक्षाएं बहुत छोटी-छोटी हैं। वे कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं पालते। इन यात्रा-वृत्तांतो से छत्तीसगढ़ के जन-जीवन की झाँकियाँ, उनकी धार्मिक आस्थाएँ, लोकसांस्कृतिक परम्पराएँ पर्याप्त आलोकित होती हैं। शासन-प्रशासन छत्तीसगढ़ के विकास का विज्ञापनों द्वारा जो ढिंढ़ोंरा पीटता है, वह सर्व-समावेशी है या सिर्फ कागजी कलाबाजी? निताई-श्यामली को हथबन्ध के जय-बासंती परिवार से सालभर पूर्व ही बेटे की छठी में शामिल होने का निमंत्रण मिला है। वे किसी कारण हथबन्ध जा नहीं पाये। जय-बसंती ने पुनः पोस्टकार्ड लिखा, तब दोनों हथबन्ध के लिए प्रस्थान करते हैं। हथबन्ध कुसुमपानी से लगभग सौ किलोमीटर दूर है। इस यात्रा को किस कठिनाई से वे पूरा करते हैं, इसी से पता चल जाता है कि छत्तीसगढ़ में यातायात की स्थिति आजादी के आस-पास जैसी है।

    एकांत श्रीवास्तव कहते हैं कि हम जब बहती हुई नदी के बीच होते हैं तब हमारे भीतर भी एक सोता फूट कर बहने लगता है- कितने कलुष धुल कर बह जाते है; कितने पाप/....नदी जगत की धूल को बहा ले जाती है जिसकी एक परत हमारे अंतस में भी जम गई है। प्रकृति इस तरह हमें निर्मल करती है। निताई और श्यामली इसीलिए बार-बार प्रकृति के सानिध्य में जाते है; श्यामली और कुसुमपानी की अन्य स्त्रियाँ पूरा कार्तिक महीना एकदम फ़जर में नदी के जल में स्नान करती है, पाप धोती हैं, पुण्य लूटती हैं।

    बहरहाल, निताई-श्यामली जय-बासंती से मिलने हथबन्ध के लिए कुसुमपानी से एकदम सबेरे प्रस्थान कर जाते हैं। बस पकड़ने के लिए उन्हें सात कोस सायकिल से चलना पड़ता है। वे एक पहचान वाली पान की दुकान में सायकिल रख कर पोंड़ के लिए बस में सवार होते हैं। बस से लगभग तीस कोस की दूरी तय करते हैं। बस से उतर कर उन्हें पैदल चलना पड़ता है। लेकिन दुःख को सुख की तरह जीने का दर्शन है। अभाव में भाव महसूसना है, इसलिए लेखकीय टिप्पणी हैः बस की यात्रा के बाद पैदल चलना सुखद था; तकलीफदेह नहीं (पृष्ठ-93)। नई जगहों का देखना मन पर जादुई असर करता है। यात्रा के आरंभ में नदी पार करनी थी। यात्रा के अंत में भी पैरी नदी है। नदी में कई प्रकार की आवाजें थीं। प्रकृति के सौंदर्य को देखने की जिनके पास दृष्टि है उनके लिए सोने की चमक का कोई महत्त्व नहीं है। जिनकी कानों में अशर्फियों की खनक भरी हो, वे प्रकृति के सौंदर्य का आनंद नहीं ले सकते। हमारे संतों ने कहा है कि साईं इतना दीजिए, जामें कुटुंब समाय। अधिक धन क्या होगा? आधुनिक काल में कोई कह सकता है कि गालिब यह दिल बहलाने के लिए ख्याल अच्छा है। यह भी कि अंगूर नहीं खरीद पाये, तो कहें कि अंगूर खट्टे हैं। कवि निलय उपाध्याय, एकांत श्रीवास्तव के सम उम्र कवि हैं। बाजार से लड़ने का उनका नुस्खा इस प्रकार है-

‘‘वे बनाएँगे महँगे सामान
हम नहीं खरीदेंगे
वे तय करेंगे सदी का रास्ता
हम नहीं चलेंगे...........
दुनियाँ में -

विरोध के सारे हथियार जब चूक जायेंगे
फिर भी बचा रहेगा
हमारा असहयोग
हमारी आत्म-निर्भरता’’


कटौती (कविता-संग्रह), सबक
निलय उपाध्याय


    निताई-श्यामली हथबंध पहुँचते हैं जय-वासंती के घर। हथबंध और कुसुमपानी में कई समानताएं हैं, कई असमानताएं भी हैं। वैसे ही जय-निताई के कर्मक्षेत्र में कई समानताएँ हैं। उपन्यासकार एकांत श्रीवास्तव छत्तीसगढ़ के ग्रामवासियों के जीवन-संदर्भों की सामान्य घटनाओं के विस्तृत विवरण द्वारा जिंदगी के जद्दोजहद का विराट शब्द-चित्र उकेरते हैं। प्राथमिक विद्यालय और डाकघर सामान्यतः भारत के प्रत्येक पंचायत में उपलब्ध हैं। इन गुरुओं एवं डाकबाबुओं का ग्रामीण-क्षेत्रों में अँग्रेजों के जमाने से महत्त्वपूर्ण स्थान है। इधर बैंकिंग-प्रणाली अपने पाँव गाँव-देहात में पसार रही है। स्वास्थ्य उप-केन्द्र भी। पंचायतें स्थापित हो गई हैं। कानून-व्यवस्था की समस्याओं से निपटान के लिए पुलिस-स्टेशन की संख्या बढ़ी है। बहरहाल, ‘पानी भीतर फूल’ में कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं है, इसलिए उपन्यास में पुलिस वाले नहीं दिखते। ‘निताई के स्कूल की तरह जय के डाकघर का परिवेश भी बहुत हल्का-फुल्का और तनाव रहित था (है)। ‘‘जय का घर (भी) खपरैल वाला घर था (पृष्ठ-98)।-खता-पीता घर-न बहुत बड़ा न बहुत छोटा-लगभग निताई और श्यामली के घर की तरह।’’ जय-वासंती का घर किसी आदिवासी का घर नहीं है। जय का एक वर्षीय पुत्र-गोरा चिट्टा है। हथबन्ध छोटा-सा गाँव है (था) -कुसुमपानी की तरह/कुसुमपानी की मरही दाई की तरह हथबन्ध में फेकन दाई है। वह एक बूढ़ी राजपूत स्त्री है। गाँव के अपने मिट्टी के घर में अकेली रहती है। बेटा शहर में रिक्शा चलाता है। यह साधारण विवरण जैसा है, लेकिन एकांत श्रीवास्तव अनजाने नहीं लिखते कि फेकन दाई बूढ़ी राजपूत स्त्री थी। बेटा शहर में रिक्शा चलाता है। राजपूतों की स्थिति पहले वाली नही रही, उनका बेटा भी शहर में रिक्शा चलाता है और वे अपने गाँव में मिट्टी के घर में रहते हैं। लेकिन शासन-प्रशासन उनको स्वर्ण मानकर, उनपर कोई ध्यान नहीं देता। इन असहाय बूढि़यों बेवाओं को बेटे के मनीआर्डर का इंतजार रहता है और डाक बाबू जो भारत सरकार के कारिंदा हैं, नियमित वेतन भोगी, वे मित्र के साथ तालाब के तट पर बैठ कर डूबते सूर्य का सौंदर्य निहार रहे हैं।

    आदिवासी समाज के बारे में डॉ राम दयाल मुंडा की जानकारी गहरी थी। पत्रकार विनोद कुमार के साथ एक साक्षात्कार में डॉ मुंडा कहते हैं  ‘‘जंगल नाममात्र को रह गये हैं। मेहनत से तैयार खेती योग्य जमीन भी खनन और प्रदूषण से बर्बाद हो रही है। जो कुछ बचा है, उसे भी लूटने की तैयारी हो रही है...........जरूरत है सौ एकड़ की। मांगते हैं हजार एकड़। एच इ सी का काम दो हजार एकड़ में चल सकता था। अग्रिहण किया तेरह हजार एकड़। अब एच ई सी बंदी के कगार पर है। तो फालतू जमीन लौटा दो उनको, जिनसे जमीन ली। .......... सरकार चाहती है कि जमीन किसी तरह हथिया लें। वहाँ नया शहर बसाएंगे। विधायकों-सांसदों को को-आपरेटिव बनाने के लिए जमीन देंगे।

    इस तरह उजड़ने वाले आदिवासी कहाँ गये? साठ लाख झारखंडी असम में हैं। ...... जो इलाके उनके कठोर परिश्रम से आबाद हुए, उन इलाकों से भी उन्हें बार-बार खदेड़ा जाता है। ........ लगभग दस करोड़ की आदिवासी आबादी को छिन्न-भिन्न करके रखा/भील आबादी लगभग दो करोड़ है। पूर्वी गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र, पश्चिमी मध्यप्रदेश, दक्षिणी राजस्थान जहाँ मिलते हैं, वहीं इस आबादी का निवास है।............ ओडि़शा में एक जगह सैंतीस स्पंज आयर कारखाने खोले गये हैं। विरोध करो तो आदिवासी चोर है, बदमाश है, विकास-विरोधी है (जनसत्ता, रविवारी, 29 सिंतंबर, 2013, आदिवासियों को मिटाने की साजिश, प्रस्तुतिः विनोद कुमार)।’’

    डॉ. रामदयाल मुंडा फेकन दाई, मरही  दाई, सोरदहिन दाई, रामबाई जैसी उपेक्षित स्त्रियों का सवाल नहीं उठाते क्योंकि वे आदिवासी समाज की नहीं हैं।

    धान लूबाई के बाद खाली-खाली खेतों से सिला (धान की छुट्टी हुई बालियाँ) बीनने को एकांत श्रीवास्तव उपन्यास में जिस तरह महिमामंडित करते हैं। वह अद्भूत है। दरिद्रता को इस तरह रोमानी शब्दों में चित्रित करने से अगर दुःख सुख की तरह दिखे तो अच्छा है। देश में जहाँ धान की खेती होती है, वहाँ धन कटनी के बाद धान के बोझे दॅवनी के लिए खलिहान पहुँचा दिये जाते हैं। धान का बोझा बाँधने की प्रक्रिया में धान की कुछ बालियाँ टूट कर खेतों में गिर जाती हैं। खेत से बोझा उठ जाने के बाद गाँव की निहायत गरीब परिवार के बच्चे या बूढ़ी स्त्रियाँ धान की इन बालियों को खेतों से चुन लेती हैं। खाते-पीते घरों के बच्चे स्कूल जाते हैं, गरीब पर समर्थ स्त्रियाँ बोझा ढोने या अन्य कार्यों में व्यस्त रहती हैं। लेकिन यहाँ तो निताई गुरु की पत्नी श्यामली अपने अकेलेपन को भगाने के लिए, अपनी ऊब मिटाने के लिए मोंगरा, रामबाई, दुकलहिन, चमारिन, गैंदी, नोना, संतोषी, मुण्डी के साथ सिला (बाली) बीनने खेतों में चली जाती है। स्कूल से लौटकर निताई गुरु श्यामली को घर में नहीं पाते हैं। पता चलता है कि वह अन्य स्त्रियों के साथ खेतों में सिला बीनने गई थीं। निताई गुरु सही प्रश्न करते हैं-‘क्या जरूरत थी?’(पृष्ठ 139)। ‘दिन भर घर में मन ऊबता है। सबके साथ मन लगा रहता है। सो तो ठीक है। निताई की यह शालीनता है। घर में पालने-पोषने के लिए छोटे बच्चे भी तो नहीं हैं। बत्तखें तालाब में चरने गई हैं, श्यामा को पहटिया चराने जंगल की ओर ले गया है। झब्बू (कुत्ता) कहीं आराम कर रहा है। एकमात्र पिंजडे़ में बंद मिट्ठू से कितनी देर दिल बहलाया जा सकता है। दूकलहिन परित्यक्ता है। दैनिक मजूरी से पेट भरती है। संतोषी उसकी बेटी है। रामबाई विधवा है, दो बच्चों नोना और मंगलू की माँ है। आजीविका का कोई साधन नहीं उसके पास। मोंगरा, दुकलहिन, रामबाई निताई गुरु के खेत-खलिहान में मजूरी भी करती हैं। इन खेत मजूरों के साथ अभावग्रस्त लोगों के साथ खाते-पीते, खेती बाड़ी वाले, सरकारी शिक्षक की पत्नी श्यामली सिंला बीनने क्यों जायेगी? उपन्यासकार सिला-बीनने को इन शब्दों में महिमा-मंडित करते हैं- ‘‘सुबह बटकी भर बासी नूनचरा अचार के संग खाकर गाँव की लड़कियाँ सिला बीनने खेतों में आया करती थीं..........इतनी बालियाँ एकत्र हो जाती थीं कि आराम से एक किसान-परिवार एक जून के लिए हँडि़या भात पसा सकता था। यह लड़कियों की सहायक कमाई थी। निझाँव (खाली समय) में घर पर न बैठकर सिला बीनने का काम करती थीं- काम का काम और आनन्द का आनन्द।.....बस बीनने का श्रम था। अन्न तो मुफ्त में मिल जाता था। छूटी हुई बालियों पर खेत मालिक अपना अधिकार छोड़ देता था और वे सार्वजनिक हो जाती थीं- लोक हित में। यह निजी सम्पदा का जनहित में अधोषित हस्तांतरण था। इस तरह धरती का अन्न सबमें बँट जाता था-उनमें भी जिनके पास कोई खेत नहीं था और खेतिहर मजूर थे (पृष्ठ 136)।’’

    इस ग्रामीण कृषि-व्यवस्था पर आह भर सकते हैं। खुशी से यह भी कह सकते हैं -अहा! कैसी सुंदर हमारी कृषि-व्यवस्था है जिसमें गैंदी, नोना, संतोषी, मुण्डी जैसी छोटी-छोटी बच्चियाँ स्कूल जाने की उम्र में अपनी माताओं के साथ खेतों में सिला बीनने को विवश हैं। सुबह बटकी भर बासी नूनचरा अचार खाकर सिला बीनती हैं। लेकिन यहाँ दुःख दुःख जैसा नहीं है, सुख जैसा है। एक किसान परिवार के और क्या सपने हो सकते हैं-एक जून के लिए हँडि़या भर भात! सिला बीनना खाली समय का काम है। सिला बीनने में आनंद बहुत है! किनके खेतों में ये सिला बीन रही हैं पता नहीं चलता, पर खेत मालिक की उदारता का बखान है। गिरी हुई बालियों पर खेत मालिक अधिकार छोड़ देता था। खेत मालिक की उदारता का क्या कहना! गिरी हुई बालियों की निजी सम्पदा का जनहित में अघोषित हस्तान्तरण था। इस तरह धरती का अन्न सब में बँट जाये, तो अन्न के लिए मारा-मारी नहीं हो। कालाबाजारिये अन्न के बोरे छिपाये रखें अपने तहखानों में। लेखक पात्रों को संवाद करने का अवसर कम देते हैं, स्वयं लंबी-लंबी टिप्पणियाँ देते हैं।

    ‘पानी भीतर फूल’ कुसुमपानी के द्वंद्वहीन समाज का दस्तावेज है। किसी-किसी के दाम्पत्य जीवन में मतभेद और मनभेद दिखता है। पति-पत्नी के स्वभाव में अंतर दिखता है। ऐसा ही मतांतर सुखरू-धीवर और उसकी पत्नी कामती के बीच दिखता है। सुखरू धीवर साधु टाइप आदमी है, एक दिन चुप-चाप वह रामचरित मानस के गुटका के साथ गृह-त्याग देता है।

    दुकलहिन एक गरीब स्त्री है। उसका पति अन्य स्त्री को चूड़ी पहना कर घर बैठा लेता है। दुकलहिन अपनी नौ वर्षीय बच्ची संतोषी के साथ मायके कुसुमपानी आ जाती है। माँ चमारिन के साथ रहती है। दूसरे पुरुष उसे रखना-चाहते हैं, लेकिन पुरुषवर्चस्ववादी दाम्पत्य-जीवन को देखा है उसने। वह विवाह-संस्था में पुनः जाने से इंकार कर देती है।

    मोंगरा-बैशाखू के दाम्पत्य जीवन में तनाव नहीं है। बस एक दिन बैशाखू पीकर घर आता है और मोंगरा अड़ जाती है। गर्म चूल्हे में पानी डाल देती है।

    उपन्यास में दो प्रेम-प्रसंग उल्लेखनीय हैं। केवड़ा-भगोली का प्रेम और रामबाई-मोहन सतनामी का प्रेम। दोनों प्रेम-प्रसंग अंतर्जातीय हैं।
    केवड़ा सत्रह वर्षीय सम्पन्न वंशी पटेल की बेटी है। वह पिता के खेतों में दम भर मेहनत करती है। सब्जी उगाती है। टुकनी में सब्जी भर-कर गाँव-गाँव घूमकर सब्जी बेचती है। भगोली विघवा दुग्दी का जवान पुत्र है। जाति का साहू है। राजमिस्त्री का काम करता है। केवड़ा को वह चाहता है। दुग्दी केवड़ा की माँ रमौतिन के पास विवाह का प्रस्ताव ले जाती है। पर, दो बाधाएँ हैं-जाति और सम्पत्ति। केवड़ा सम्पन्न बाप की बेटी है, भगोली गरीब साहू (तेली) है। दैनिक मजूरी करता है। पटेल की बेटी की शादी तेली के घर कैसे होगी? एक रात केवड़ा सर्पदंश से मर जाती है। यही प्रारब्ध था। ईश्वर को यह शादी मंजूर नहीं थी।

    रामबाई-मोहन सतनामी का प्रेम-प्रसंग उपन्यास में अधिक रोचक है। नयी पीढ़ी के कथाकारों की तरह उपन्यासकार एकांत श्रीवास्तव रामबाई-मोहन सतनामी की प्रेम-कथा को देह-कथा में बदलने से रोकते हैं। बचपन का छुआ-छुई प्रेम में अंकुरित हो जाता है। मोहन रामबाई परसवानी प्राथमिक विद्यालय में एक साथ पढ़ते थे। मोहन बहुत बढि़या बाँसुरी बजाता है। गाँव में इसीलिए कृष्णलीला में वह कृष्ण का रोल करता है। कृष्णरूप में बाँसुरी बजाते हुए मोहन रामबाई को बहुत अच्छा लगता है। स्कूल में दोनों आपस में दौड़ा-दौड़ी करते हैं। इसी में एक दिन रामबाई की चोटी का रिबन मोहन के हाथ में आ जाता है। यही रिबन उन दोनों के प्रेम का आश्रय है। लेकिन यह तो बचपन का खेल था। रामबाई भूल गई। वह गाँव के सम्पन्न गौंठिया शंकर की बेटी है। मोहन सतनामी है यानी दलित। रामबाई का विवाह अन्य गाँव में चुन्नू से होता है। चून्नू का परिवार सम्पन्न है। पर भाईयों से मनभेद के बाद वह अपना गाँव छोड़कर कुसुमपानी रहने लगता है। चुन्नू मण्डी में हम्माल है। अच्छा पैसा कमाता है। बस, पीने की आदत है। एक दिन सीने में असह्य दर्द के बाद युवावस्था में उसकी मौत हो जाती है। रामबाई असहाय हो जाती है। दैनिक मजूरी कर जीवन यापन करती है। चुन्नू ने अपनी पैतृक सम्पत्ति से हिस्सा क्यों नहीं लिया या चुन्नू के बाद भी रामबाई ससुराल की सम्पत्ति में दावा पेश क्यों नहीं करती, इस प्रसंग में उपन्यास मौन है। हालाँकि, उस प्रसंग में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण परिवारों में पैतृक सम्पत्ति के बँटवारे से संबंधित द्वंद्व पर बहुत प्रकाश पड़ता। सामाजिक जीवन का चित्र उभरता, लेकिन यहाँ छत्तीसगढ़ का प्राकृतिक चित्रण प्राथमिक है।

    बहरहाल, मोहन अविवाहित रह जाता है। गाँव-गाँव घूम-घूम कर माँगता खाता है। ग्रामीणों को बाँसुरी सुनाता है। बच्चों को खाने के लिए मीठी चीज देता है। साधू नहीं है पर साधू जैसा लगता है। पागल नहीं है, पर पागल जैसा लगता है। कुसुमपानी के इर्द-गिर्द गाँवों में बड़ा लोकप्रिय है। चुन्नू जीवित था तो उसके घर भी आता था, उसकी मृत्यु के बाद रामबाई के घर नहीं आता। रामबाई पहचानती है कि यह मोहन है, परसवानी का, उसके मायके का। पर किसी को बताती नहीं।

    एक दिन मोहन सतनामी बीमार पड़ता है। रामबाई को बच्चों से संदेश मिलता है कि मोहन गंभीर रूप से बीमार है। वह मरही दाई के घर में आश्रय पाता है। रामबाई अपने सोने का गहना गाँव के बच्चन गौंठिन के घर गिरवी रखती है और प्राप्त राशि को निताई गुरु के मार्फत मोहन के इलाज के लिए भेजवा देती है।

    उपन्यास में मोहन सतनामी का अंतर्मन नहीं खुलता। रामबाई सामाजिक व्यवस्था पर संक्षिप्त टिप्पणी दर्ज करती है। प्रेम में मर्यादा का उल्लंघन कोई नहीं करता। रामबाई प्रारब्ध में विश्वास करती है। वह लोकोपवाद से डरती है। लेकिन यह प्रसंग भी अतीत की वस्तु बन चुकी है।

    ‘पानी भीतर फूल‘ उपन्यास का बीज-शब्द है-गाँधीवाद की नैतिक शिक्षा। छत्तीसगढ़-झारखंड़-ओडि़शा में जो हाहाकार है, जो कारपोरेट लूट है, देश में सर्वग्रासी भ्रष्टाचार है, उसका विकल्प गाँधीवाद है। शांति और सद्भाव बहुत बड़ी चीज है। धन से सुख नहीं खरीदा जा सकता है। उपयोग से नहीं, त्याग से सामाजिक शांति स्थापित हो सकती है। उपन्यास में भोग की तलाश नहीं है, धन की तलाश नहीं है, यौन-क्रांति की तलाश नहीं है, सच्चे प्रेम की तलाश है, सच्चे सौंदर्य की तलाश है, सच्ची शांति की तलाश है। इसलिए निताई गुरु तीसरी-चैथी कक्षा के बच्चों को पढ़ाते हैं-‘पैसा मेहनत और ईमानदारी से कमाया जाना चाहिए।... ऐसी कमाई ही नैतिक है- ‘पैसा मेहनत और ईमानदारी से कमाया जाना चाहिए।.... ऐसी कमाई ही नैतिक कमाई है।’ वे आगे पढ़ाते हैं-‘अमीरी और गरीबी के बीच का अंतर भाव और अभाव का अंतर है।’ (पृष्ठ-65)। ‘ है ’ और ‘नहीं है’ का खेल-जहाँ ‘है’ वहाँ ‘से’ थोड़ी सी पूँजी नहीं है’ के पास बाँट देनी चाहिए। इसी मार्ग पर चलकर मनुष्य और समाज के कल्याण के लिए गाँधी जी ने भी अनेक बातें हमें बताई हैं। वे कहते थे कि पूँजी को मनुष्य की मेहनत से पैदा होना चाहिए और एक जगह केन्द्रित न होकर विकेन्द्रित होना चाहिए। ............पैसे से पैसा बनाना किसी स्वस्थ और सभ्य समाज का आधार नहीं हो सकता। अनैतिक साधनों के सहारे ही कोई बहुत पैसे वाला हो सकता है।

    प्रश्न है कि आज जो अनैतिक पूँजी जमा हो गई है, उसे बाँटेगा कौन? महात्मा गाँधी का माला अपने वाले उनके विचारों के कितने अनुयायी रह गये हैं। बहरहाल, यह उपन्यास एक स्वप्न कथा है। अगर यह स्वप्न यथार्थ में बदल जाये तो हमारे समाज में कुसुमपानी गाँव की तरह आपस में सहयोग, सौहार्द, प्रेम और शांति होगी। ऊँच-नीच का भाव नहीं होगा। पशुओं, पक्षियों और प्रकृति से उतना ही लगाव होगा जितना निताई-श्यामली को है। निताई-श्यामली आम्रवन में कोयल के घर जा कर बैठते हैं। कोयल उन्हें अपना गाना सुनाती है।

    निताई-श्यामली सघन जंगलों के बीच चण्डीमोंगरी देवी की पहाड़ी पर पूजा करने जाते हैं। निताई गुरु कहते हैं कि परिवर्तन ही जीवन है। जिंदगी केवल जगह बदलने से नहीं बदलती। मन, विचार, कर्म और आचरण के बदलने से भी बदल जाती है। एकांत श्रीवास्तव छत्तीसगढ़ के समाज से ही परिचित नहीं हैं, बल्कि वे वहाँ के पहाड़ों पर उगे हर पेड़, पौधे, लता, झाड़ी के नाम से परिचित हैं। चण्डीडोंगरी पहाड़ की घाटी में सरई, शीशम, महुआ, कुसुम, परसा, चार करौंदे, बेल, दसमत, दूध, मोंगरा, कदम्ब, चिराग आदि के पेड़-पौधे और झाडि़याँ हैं। धान-चावल के प्रकारों से वे सुपरिचित हैं-विष्णुभोग, तुलसी भोग, दुबराज, जयफूल, नागकेसर, गुरमरिया, सफरी और सोना मासुरी।

    उपन्यास में लोकभाषा के शब्दों का प्रयोग प्रचुर हुआ है। इससे रचनाकार के लोकजीवन के बारे में ज्ञेयता का प्रमाण मिलता है। लोक से आये उन शब्दों की व्याख्या एकांत यथास्थान पिरो देते हैं या कोष्ठक में उसका मान्य शब्दार्थ दे देते हैं। जैसे-झिपारी, पैरा (पुआल), पटना (पटसन), कंडिल (लालटेन), उज्जर, अँजोर, चरोहन (चावल धोने से निकला पानी), पौलने (काटने), गोरसी, औंट, हँडि़या, नरदा, धनेरा, बरदी (रेवड़), पहटिया (चरवाहा) बखरी, कमचील, सुखीयार, अंगाकर रोटी, पताल, माड़ा, बड़ (बरगद) नूनचरा, बँबरी, (धनबोहार, जाँता, दरते, कउहा, डबरे, घटोल, झोल्ली, घुटी, कोठार, घमेला (तसला), तसमई, खीर, दिया-बाती, सिरज, टीका-टीक, गरती (पका हुआ), बतरस, भभक, कोस, कुइयाँ आदि जैसे शब्दों की भरमार है। इससे इसे एक आंचलिक उपन्यास की तरह पढ़ने का सुख मिलता है।

    एकांत श्रीवास्तव समर्थ कवि हैं। ‘पानी भीतर फूल’ की भाषा स्वाभाविक रूप से संगीतात्मक गद्य की है। दो चार पंक्तियाँ पेश हैं- ‘तट पर खड़े सुपाड़ी के पेड़ धीरे-धीरे पीछे छूट रहे थे। केवट ने घाट पर बँधी नाव खोल दी थी। हवा में पतवार की ‘छप............छप......’का संगीत गूँज रहा था। कुदरत ने प्रत्येक वस्तु को उसकी आवाज दी है जो दूसरी आवाजों से अलग है। हवा में सुपाड़ी के पेड़ों का डोलना अलग है और पीपल के पत्तों का बजना बिल्कुल अलग।.........मछेरे के जाल फेंकने की ध्वनि अलग है और एक उजली मछली के जल-सतह से ऊपर उछल कर वापस जल में जाने की ध्वनि अलग (पृष्ठ 92)।’’

    इसके अतिरिक्त प्रत्येक अध्याय को काव्यात्मक दार्शनिक पंक्तियों के शीर्षक से नवाजा गया है।

    वैश्विक पैमाने पर, मध्य एशिया में, अफ्रीका में, दक्षिण एशिया में और अंततः छत्तीसगढ़ में जो राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक आलोड़न है, हाहाकार है, उसमें ‘पानी भीतर फूल’ प्रेम और शांति के लिए अपील जैसा है। निताई गुरु स्कूल से लौटते हुए जलाशय के जल में  खोखमा का लाल फूल देखते हैं। उसे लेने के लिए जूते खोलकर जल में उतर जाते हैं। अंततः पता नहीं चलता कि वे बेहोश कब हो गये? खोखमा का लाल फूल उनके हाथ में था। 






सम्पर्क -
जीतेन्द्र कुमार
मदन जी का हाता, आरा (बिहार)
मो0-09931171611.

E-mail: jitendrakumarara46@gmail.com

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