शुक्रवार, 3 मार्च 2017

उमाशंकर सिंह परमार का आलेख ‘मार्क्सवादी आलोचना के गैर अकादमिक योद्धा : नीलकान्त जी’



नीलकान्त जी
नीलकान्त जी का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी नीलकान्त जी की रचनाधर्मिता का लोहा प्रायः सभी मानते हैं। आज भी जब वे किसी विषय पर बोलने के लिए खड़े होते हैं तो लोग बड़ी उत्सुकता से उनके व्याख्यान को इसलिए भी सुनते हैं क्योंकि वे हमेशा कोई न कोई नयी प्रतिस्थापना ले कर सामने आते हैं। नीलकान्त जी हरफनमौला व्यक्तित्व के स्वामी हैं। एक उम्दा सम्पादक, एक जबरदस्त कहानीकार, एक बेहतरीन उपन्यासकार, एक सुलझे हुए सौन्दर्यशास्त्री, एक जाने माने दर्शनशास्त्री के दर्शन इस असाधारण व्यक्तित्व में अनायास ही हो जाते हैं। उम्र के 75 वसंत देख चुके नीलकान्त जी शोरोगुल से दूर आज भी लेखन के मोर्चे पर निरन्तर सक्रिय हैं। हाल ही में उन्हें मानबहादुर लहक सम्मान 2017 देने की घोषणा की गयी है। सम्मान की बधाई देते हुए पहली बार पर आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं उमाशंकर सिंह परमार द्वारा लिखा गया यह आलेख ‘मार्क्सवादी आलोचना के गैर अकादमिक योद्धा : नीलकान्त जी’
                                                             
                
मार्क्सवादी आलोचना के गैर अकादमिक योद्धा : नीलकान्त जी
                                                            

उमाशंकर सिंह परमार


हिन्दी साहित्य में जब से केन्द्रीयकरण प्रारम्भ हुआ तब से गैर साहित्यिक कार्यों से पोषित राजनीति भी आरम्भ हो गयी है। यह समझ विकसित की गयी कि कविता और आलोचना के केन्द्र बड़े विश्वविद्यालय हैं और  वहाँ के प्रोफेसरों-शिक्षकों को हिन्दी साहित्य का मौलवी और महंत मान लिया गया। एकाध को छोड दिया जाए तो इन अकादमिक आलोचकों ने साहित्य को कुछ भी नया नहीं दिया और आलोचना को उद्धरणों से आपूरित कर मात्र क्लास नोट्स तक सीमित कर दिया। आलोचना का  इन विश्वविद्यालयों की चौखट में कैद होना, हिन्दी कविता, कहानी और आलोचना की सर्जनात्मकता जनपक्षधरता रचनात्मकता के लिए घोर संकट की तरह था। यही कारण है कि आज आलोचना आज अपने मूल्यों से भटक कर कोई भी प्रतिमान नहीं बना रही। मात्र अपने चन्द लोगों चुनिन्दा प्रकाशकों की प्रकाशित किताबों की परिचर्चा तक सीमित हो कर साहित्य की अन्दरूनी राजनीति का पर्याय हो गयी है। नीलकान्त साहित्य की इस कुप्रवृत्ति के विरुद्ध हमेशा खड़े रहे। यही कारण है बड़ा कद और महत्वपूर्ण रचनात्मक योगदान होने के बावजूद भी हिन्दी में अचर्चित और प्रायः उपेक्षा के शिकार रहे। नीलकान्त के रचना-कर्म से सभी परिचित हैं। सभी उन्हें पढते और समझते  हैं। यही नहीं प्रतिबद्धता और विद्वता और अध्ययन में सभी उनका लोहा मानते हैं लेकिन विश्वविद्यालयी नामवरी प्रतिमान मैनैजर पांडेय जैसे पुरानी लीक में अपने ब्रान्ड की मुहर लगाने वाले आलोचकों का सीधा प्रतिरोध और  कलावाद, रहस्यवाद, वितंडवाद, चमत्कारवाद, अवैचारिकता का विरोध उनकी चर्चा परिचर्चा होने से रोकता रहा। नीलकान्त प्रख्यात कथाकार मार्कण्डेय के छोटे भाई हैं। बड़े भ्राता की तरह एक जनपक्षधर कथाकार हैं। नामवर सिंह राम विलास शर्मा की तरह उन्होंने अपने रचना-कर्म का आरम्भ कविता से किया था लेकिन पाश्चात्य दर्शन भारतीय दर्शन काव्य-शास्त्र के गहन अध्ययन ने इन्हें आलोचना की ओर मोड़ दिया।

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद के बराई गाँव में 22 मार्च 1942 को जन्मे नीलकान्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम. ए. किया चूँकि वह अकादमिक आलोचना अकादमिक राजनीति से हमेशा दूर रहे इसलिए उनकी आलोचना का स्वर और अन्दाज बिल्कुल मौलिक रहा। छायावादी आलोचना प्रतिमानों, रूपवाद, कलावाद का विरोध करती उनकी आलोचनात्मक कृतियाँ जनवादी मूल्यों की जबरदस्त संस्थापना करती हैं। जनवादी आलोचना के मूल्य हैं - इतिहास बोध, युग सन्दर्भ और विचारधारा इन तीनो प्रतिमानों को उन्होंने अपनी आलोचना का आधार बनाया। दर्शनशास्त्र का अध्येता होने के कारण तर्क, वाद और संवाद पर उनकी गज़ब की पकड़ रही। यहाँ तक कि तर्क के मामले में और भाषा के तल्ख़  लहजे के कारण नीलकान्त जी रामविलास शर्मा की बराबरी करते हैं शायद यही कारण रहा कि नामवर सिंह रामविलास शर्मा के तर्कों का प्रतियुत्तर तो खोज लेते थे मगर नीलकान्त द्वारा उठाए गये सवालों का जवाब वह कभी नहीं दे पाए। नीलकान्त का इतिहास बोध उनकी सम्पादित कृतिइतिहास लेखन की समस्याएं और जाति वर्ग और इतिहास  में देखा जा सकता है। इतिहास को उन्होंने अनिवार्य नैसर्गिक द्वन्द के नजरिए से परखा है जिसमे तर्क तथ्य दोनों का सामूहिक समन्वय है। यही अभिमत मुझे लोहिया की ह्वील आफ हिस्ट्री’ में दिखा।

  
जाति और वर्ग के सवाल आज अकादमिक आयोजनों में सुनने के लिए मिल जाते हैं मगर इस विषय पर नीलकान्त ने बहुत पहले बड़ा काम कर दिया है। जाति भारतीय समाज का वास्तविक सच है और वर्ग हमारे समाज का वैचारिक यथार्थ है। दोनों को ले कर वाम-लेखन में काफी अन्तर्विरोध रहे। नामवर सिंह जैसे आलोचक इन विषयों से दूर रहे मगर नीलकान्त ने दोनों अवधारणाओं को ऐतिहासिक सन्दर्भों में परखते हुए एक विलक्षण तार्किकता की स्थापना की। और इसी क्रम में जातिगत सवालों और वर्गीय सवालों पर नये सिरे विचार किया। यह काम इतिहास और समाजशास्त्र दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। राहुल सांस्कृत्यायन से प्रभावित होने के कारण इन्होंने राहुल के अवदानों परराहुल शब्द और कर्मका भी सम्पादन किया। हिन्दी कलम’ नीलकान्त द्वारा संपादित बेहद जरूरी पत्रिका थी जो  अनियतकालीन थी। पाँच छः अंकों के बाद आर्थिक तंगी के कारण इसे बन्द करना पड़ा। इस पत्रिका का एक अंक मेरे पास है जिसमे वाम दृष्टि से ज्वलन्त मुद्दों पर बात की गयी है।

नीलकान्त के रचना-कर्म का सबसे बड़ा उदाहरण इनका कथा साहित्य है। अपनी कहानियों और उपन्यासों में पूर्णतया जमीनी लोक के कथाकार हैं। ‘बँधुवा रामदास’ तो अपने समय की चर्चित कृतियों में शुमार है जिसकी तुलना कालजयी उपन्यासों मसलन ‘गोदान’, बूँद और समुद्र’, झूठा सच’,तमस’,रागदरबारी’, आखिरी कलाम’  जैसी कृतियों से की जाती है। इस उपन्यास में बँधुवा मजदूर को नायक बना कर समाज के कुरूपतम अभिजात्य सच पूँजीवादी सामन्तवाद की गहराईयों तक जा कर उसके चरित्र का रहस्योदघाटन किया गया है। इस उपन्यास के अतिरिक्त नीलकान्त जी ‘एक बीघा खेत’ और ‘बाढ पुराण’ जैसे अन्य उपन्यासों के रचनाकार भी हैं। उपन्यास की तरह कहानियों में भी नीलकान्त का पक्ष लोकधर्मिता ही रही है कथानक के घात प्रतिघातों, रोचकता, चरित्र व परिवेश को अपनी सहज-सरल किस्सागोई में बाँध कर प्रस्तुत करना और पाठक के अवचेतन में विचारधारा का स्पष्ट अक्स अंकित कर देना नीलकान्त जी की अपनी शैली है जो इनके समकालीनों से थोड़ा हटा कर इन्हें अलग खड़ा करती है। महापात्र’, अमलतास के फूल’, अज़गर और बूढा बढई’, मटखन्ना’ जैसी बेहतरीन कहानियों के लेखक नीलकान्त की पहचान और ख्याति आलोचक के रूप में अधिक रही है।

(चित्र में बाएँ से दाएँ - संतोष चतुर्वेदी, रवीन्द्र प्रताप सिंह, नीलकान्त जी, डॉ. स्वस्ति सिंह और डॉ. सस्या ठाकुर) 

इनका आलोचक व्यक्तित्व  इतिहासकार कथाकार के व्यक्तित्व पर प्रभावी रहा। आलोचक नीलकान्त विरोध और प्रतिरोध के सजग आलोचक रहे। वे कलावाद और रहस्यवाद के विकट शत्रु हैं। हालाँकि आचार्य शुक्ल भी रहस्यवाद के आलोचक थे लेकिन नीलकान्त आचार्य शुक्ल से आंशिक असहमति रखते हैं शुक्ल जी की विचारधारा में छिपे आदर्शीकरण के मूल तन्तुओं की उन्होंने अपनी किताबरामचन्द्र शुक्लमें आलोचना की है और लोकधर्मिता लोक-मंगल का वैचारिक और यथार्थ पक्ष सब के सामने रखा है। नीलकान्त के समकालीन आलोचकों में कोई भी उनकी प्रतिभा का नहीं रहा। नामवर सिंह का नाम उनकी समकक्षता में लिया जा सकता है मगर नामवर सिंह में विचारधारा मात्र ओढी हुई थी जबकि उनका वास्तविक रूप कलावादी था जिसके कारण नीलकान्त उनके विरोधी रहे। नामवर सिंह के काव्य प्रतिमानों का उनकी स्थापनाओं का जितना तार्किक विरोध नीलकान्त ने किया शायद हिन्दी में रामविलास शर्मा के अलावा कोई नहीं कर सका है। नामवर सिंह के अन्तर्विरोधों अन्य स्थापनाओं के खंडन के मामलों में नीलकान्त रामविलास शर्मा  का भी अतिक्रमण कर जाते हैं। नामवर सिंह के प्रतिमानों का खंडन करते हुए उन्होंने अपने आलेख में बड़े विनोद के लिखा थाकविता के नये प्रतिमान के सभी अध्यायों को पढने के लिए अतिरिक्त धैर्य की जरूरत है और बार-बार पढे जाने के बाद मस्तिष्क में क्या कुछ बचता है इसका आकलन करने परकुछ भी नहींकहना पडता है(लहक; जुलाई 2015) क्योंकियह सरसरी तौर पर आयातित पाश्चात्य दार्शनिक चिन्तन की देन है (वही) यह कृति सरसरी इसलिए है कि तीन सप्ताह के भीतर भारत भूषण के कहने पर लिखी गयीऔर अपने उद्धरणों तथ्यों से नीलकान्त ने इस कृति में अन्तर्ग्रथित कलावाद को बडी बेरहमी से उघाड कर रख दिया है इसी तरह नामवर सिंह की दूसरी स्थापना निर्मल वर्मा की कहानी परिन्दे’ पर भी गम्भीर सवाल खड़ा करते हैं निर्मल वर्मा के लेखन उनकी वैचारिकता पर सवाल उठाते हुए वह नामवर सिह को सोफिस्टवादी सिद्ध कर देते हैं और किआलोचक ने परिन्दे कहानी में सत्य-असत्य, अस्तित्व-अनस्तित्व, ज्ञेय-अज्ञेय सार्थक-निरर्थक, मौन-अकेलापन आदि का सारा चूरन फाँक डाला है लेकिन व्याख्याएं आलोचक और लेखक द्वय ने विदेशी मालगोदाम से ही आयात किया है। प्रतिभा तो है मगर अनुकरण की है मौलिकता की नहीं है। ( लहक, अप्रैल 2015) परिन्दे’ कहानी के कथन भाषा के सन्देशों का दार्शनिक विश्लेषण करते हुए वाम यथार्थवादी नजरिए की जोरदार स्थापना करते हैं और इसी आधार पर परिन्दे’ कहानी को मौलिक प्रथम नयी कहानी मानने पर सवाल खड़ा करते हैं। चूँकि नीलकान्त कलावाद के विरोधी हैं काव्य मे कला रूपवाद का हस्तक्षेप उन्हे स्वीकार्य नहीं है। (यह उनकी अपनी निजी पक्षधरता है और यही पक्षधरता लगभग सभी लोकधर्मी आलोचकों की रही है) इसीलिए वे नामवर सिंह की लगभग सभी स्थापनाओं का खंडन करने के लिए बाध्य थे। उन्होंने यह खंडन किया भी है। मुक्तिबोध की तीन कविताएँ’ नामक कृति में उन्होंने नामवर सिंह द्वारा प्रदत्त  खोज जैसी जुमले की भी आलोचना की है और मुक्तिबोध का अब तक का सबसे बेहतर तार्किक पाठ प्रस्तुत किया है।

नीलकांत जी और जनसत्ता साहित्य वार्षिकी के सम्पादक शैलेन्द्र शांत जी

नीलकान्त जी का सबसे बड़ा काम सौन्दर्य शास्त्र पर रहा है। नीलकान्त भारतीय काव्य-शास्त्र व पाश्चात्य काव्य-शास्त्र दोनों के अध्येता रहे। उन्होंने यूनानी काव्य-शास्त्र से ले कर समकालीन पाश्चात्य विचारकों की दृष्टि बोध की विशिष्टताओं सीमाओं का रेखांकन किया है।सौन्दर्यशास्त्र की पाश्चात्य परम्परानामक पुस्तकरामचन्द्र शुक्लनामक किताब की तरह पाठकों और विद्यार्थियों के वीच लोकप्रिय रही है। यह किताब पाश्चात्य दार्शनिक अवधारणाओं सौन्दर्यवादी दृष्टियों का सहज सुज्ञेय भाषा मे रोचक अध्ययन है। अपेक्षाकृत कठिन समझी जाने वाली अवधारणाओं को सामान्य तरीके से समझाने वाली यह कृति  उनकी रचनात्मकता का सबसे सुन्दर प्रतिफलन है। इस पुस्तक में नीलकान्त डायलैक्टिक मैटेरियलिज्म’ पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं। सौन्दर्य की अभिजात्य परम्परा की तीखी आलोचना करते हुए श्रम यथार्थ बोध को अधिक प्रमाणित करते हैं। सौन्दर्य-शास्त्र सम्बन्धी विवेचना करते वक्त नीलकान्त विरोधी विचारधाराओं पर भी अपना गौर फरमाते हैं और जहाँ भी अमूर्तता, रहस्य, अयथार्थ, अतिकल्पना निरपेक्षता की बात आती है, वह आलोचना करने से नहीं हिचकते हैं। इसलिए यदि इस किताब को दर्शन या विचारधारा की पुस्तक कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कलावाद और कलात्मक प्रयोगों से जीवन को पृथक नहीं किया जा सकता है न ही कला के अस्तित्व से कोई इंकार कर सकता है। सौन्दर्य व्यक्ति की अनुभूति का विषय है जो देश काल पर निर्भर करता है। मगर हमारे यहाँ और पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में अधिकांश विचारक सौन्दर्य को वस्तु का विषय नहीं मानते बल्कि वह इसे आध्यात्मिक स्वरुप दे देते हैं जिसे भुक्त करना भी आम-जन के बस की बात नहीं है। नीलकान्त ने इस अवधारणा का खंडन किया है। उनके मतानुसार सौन्दर्यबोध दैवीय या अदृश्य प्रक्रिया नहीं है बल्कि जीवन और जगत की वास्तविक सच्चाई है। सौन्दर्य की अवास्तविक अलौकिक सत्ता में विश्वास कर के हम वास्तविक जगत के सौन्दर्य से हाथ धो लेगें इसलिए अमर सौन्दर्य की कल्पना महज भ्रम है। वाम सौन्दर्य-शास्त्र की मीमांसा करते हुए वे किताब के अन्त में अपनी स्थापना देते हुए लिखते हैं कि सौन्दर्य किसी वस्तु की तरह अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता बल्कि सुन्दर वस्तु और मन के संयोग से सौन्दर्य की उत्पत्ति होती है। नीलकान्त का यह अभिमत कलावादियों निरपेक्षवादियों के खिलाफ मुकम्मल जवाब है।

पचहत्तर साल की उम्र पूरी कर चुके नीलकान्त जी अभी भी निरन्तर रचनारत हैं। सक्रियता, आत्मीयता, फक्कडपन में अभी तक युवा हैं। इस व्यक्ति की प्रतिबद्धता और वैचारिकता तार्किकता पर कोई सन्देह नहीं और आलोचना को जिस तरह अकादमिक भूत से विमुक्त कर मौलिकता की छाप छोडी है शायद इनके समकालीन किसी भी आलोचक ने नहीं किया है। वर्ष 2017 का मान बहादुर सिंह लहक सम्माननीलकान्त जी को प्रदत्त करने की घोषणा की गयी है। लहक का यह कार्य प्रंशसनीय है। लहक की की पुरस्कार चयन कमेटी में वरिष्ठ कवि सुधीर सक्सेना, सुशील कुमार, भरत प्रसाद, उमा शंकर सिंह परमार, लहक संपादक निर्भय देवयांस मान बहादुर सिंह के छोटे भाई शिवेन्द्र सिंह हैं। नीलकान्त जी को यह सम्मान 26 मार्च  2017 को कोलकाता में प्रदान किया जाएगा।

('दुनिया इन दिनों' से साभार.) 

उमाशंकर सिंह परमार



सम्पर्क -

मोबाईल - 09838610776

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