विजेंद्र



 (चित्र: पॉल रॉब्सन)

पॅाल रॉब्सन अमरीकी अश्वेत विश्वविख्यात गायक। पूरे विश्व में अश्वेतों की मुक्ति के लिये संघर्ष करने वाले अद्वितीय योद्धा संगीतकार। ‘हियर आई स्टैण्ड’ उनकी प्रसिद्ध कृति है जिसमें उनके जीवन के अनेक पक्ष तथा अश्वेतों के बारे में विचारधारात्मक  गंभीर विचार विमर्श है। अश्वेतों की मुक्ति के लिये संघर्ष करने वाले वह एक मिथकीय प्रतीक पुरुष भी बन चुके हैं। अश्वेतों का मुक्तिसघर्ष भारत के करोड़ों दलितों-आदिवासियों के संघर्ष से जुड़ा है। यह एक वैश्विक लक्षण है जो विभिन्न रुपों में  अलग अलग देशों में अलग अलग तरह अभिव्यक्त होता रहा है। इस मुक्तिसंग्राम का सम्बंध प्रत्यक्ष- परोक्ष विश्व सर्वहारा के संघर्ष से भी जुड़ा है। भारतीय मुक्तिसंग्राम की अधूरी छूटी क्रांति को अग्रसर करने की प्रेरणा इसमें निहित है। इन्हीं पॉल रॉब्सन पर 'पॉल रॉब्सन' शीर्षक से हमारे वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी ने अभी हाल ही में एक लम्बी कविता लिखी है जो पहली बार के पाठकों के लिए हम विशेष तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं।
                     
पॉल रॉब्सन                       

बीसवीं सदी के
अश्वेत योद्धा गायक
तुझे  करता हूँ याद
इक्कीसवी सदी की उफनती लहरों में
ओ योद्धा गायक
कवियों की तमस भेदक किरण
अश्वेतों के कंठ का मुक्ति राग
पूरी दुनिया में उमड़ते
मुक्ति-संग्राम की लौ
फूटता सुर्ख कल्ला उजास
पृथ्वी के गर्भ में खौलता लावा
कहाँ हो तुम
एक बार फिर आओ दुनिया में
अश्वेत जागते हैं
उन्हें जागने दो
उन्हे शत्रुओं के विरुद्ध खड़ा होने दो
कौन है
तुम्हारा वारिस आज इस दुनिया में
पूछते हैं तुम्हारे गूँजते स्वर
उगते अंतरिक्ष से
अश्वेत आज भी  पीडि़त हैं
तुम्हारे गान की ज्वाला
आज भी डराती है उत्पीड़कों को
जो हैं शत्रु जन के
काव्य के, कला के, शांति के
सौंदर्य और प्रेम के
वे एक दिन होंगे विस्मृत दुनिया से
तुमने झेले हैं श्वेत सत्ता के हमले
उनके कुचक्रों को
खूनी उन्माद के बीच
तोड़ा है तुमने
ललकारा था हर बार
श्वेत दमनकारियों को
शोषकों और नस्लभेदियों को
‘हियर आइ स्टैण्ड’(1) की चुनौतियाँ
सत्ता की चूलें हिलाती  रहीं
तुमने रखा मस्तक ऊँचा अपनी जाति का
श्वेत जालसाज़ों को
किया था बेनकाब 
उनके दुष्चक्रों को करते रहे विफल
कभी नहीं स्वीकारी पराजय
न दिखाय दैन्य न पलायन
हिलाई थी तुमने नीवें
ह्वाइट हाउस की
क्यों साथ दें नीग्रो उनका
जो करते हैं उनसे नफरत
समझते हैं उन्हें दास
पशुओं से बदतर
आँख में
सुअर का बाल
एक दिन उत्पीड़को को जाना होगा
साम्राज्य को त्याग कर
जाना ही होगा
ओ मेरे प्रिय अश्वेत गायक
तुम्हारें स्वरों को दबाया गया
तुम्हारी आवाज़ को रौदा गया
तुम्हें अपनी बात कहने से रोका गया
लोकतंत्र में
तुम्हारे स्वर  कुचलने को
सत्ता के प्रचार तंत्र एक हुये
तुम्हारे विरुद्ध कुचक्र चलते रहे
तुम्हारे नाद  में
अनहद पलता रहा
तुम्हारे गहन स्वरों में
बोलता है अश्वेत जाति का भैरव गान
आरोह अवरोह में अग्निज पताकायें
सुना है मैं ने
भीगे अफ्रीकी वनो को
बूँद बूँद निचुडते,
देखा है खेतों को पकते
मेंह में धान रोपते
किसानों को सिर से पौंछते पसीना
जो बीज बोये थे तुमने
वे अंकुरित हुये हैं
पौधों में खिलने लगे हैं फूल
वृक्षों में आने को हैं फल
विश्व शांति सम्मेलन में कहे गये तुम्हारे शब्द
आज भी बने हैं चुनौती श्वेतों को
जो उठ खड़े होते हैं
कठोर अत्याचार के विरुद्ध
वे अपराधी कैसे हुये
आत्म रक्षा में
आज विश्व की पूरी जनता खड़ी होती है
तुम्हें अश्वेतों को देने होगे
बराबर के अधिकार
करनी होगी उनकी रक्षा
मुक्त करना होगा उन्हें
क्रूर दासता से


ओ रॉब्सन -
तुमने  अमरीकी नस्लवादियों की
उड़ाई थी धज्जियाँ
तुम्हारे साहसी कथन पर
जब्त किया था
तम्हारा पार पत्र
क्यों दबाते हैं
वे हमारे गान को
हमारे स्वर को
हमारे इरादों को
हमारे स्वप्नों को
क्यों, क्यों, क्यों
कुचलते हैं घास के पोयों की तरह
हमें नहीं देखने देते दुनिया
नये उजाले में
नहीं सोचने देते हमें
अपने भविष्य के बारे में
सीमांतों से बाहर नहीं बोने देते बीज
हमें अपनी धरती में
क्यों, आखिर क्यों
उजाड़ते हैं बस्तियाँ उनकी
जो सदियों से हैं तबाह
क्रूर दमन से
दिखते हैं नये ज्योति स्तंभ
अँधेरे में भी
उन्हें अपने साम्राज्य के ढहने का डर है
उनके असर से
एशिया और अफ्रीका के मुक्त होने का भय है
एक खुला विश्व - क्षितिज
दिखता है सुदूर अँधेरे के गर्भ में
पौ फटने को है
क्रूर - दमनकारी समझें 
अश्वेत शक्ति का सूर्येादय
देखो लैटिन अमरीका में
जनता का जागरण
श्वेतों की क्रूर संप्रभुता का
एक दिन अंत होना ही है
ओ रॉब्सन
तुम्हारी अकाट्य दलीलों से
श्वेत भयभीत थे
मुठ्ठी भर धन कुबेर
पूरी दुनिया को दबाते हैं पाँवों तले
पूरा विश्व देखता है भौचक
साम्राज्य का तम्बू हिलता है
उसमें छेद होने लगे हैं
दरारे पड़ने लगी है
पलस्तर झड़ने को हुआ
जुल्म ढहाने वाले
अपने विनाश की ओर बढ़ रहे हैं
ओ रॉब्सन
पूरे विश्व में उठे अश्वेत ज्वार की
तुम हो दहाड़ती पहली लहर
जो टकाराती है
व्हाइट हाउस की दीवारों से
श्वेतों के काँपते हृदय
अश्वेत ज्वार पूरी दुनिया में
उठने को है
वही है सार तुम्हारे गान  का
मुक्ति का मुक्त छंद
संघर्ष की अबाधित लय
तुम्हारे हृदय का एक हिस्सा
नस्ली सोच वाले दैत्य
मगरमच्छी खुले जबडे  हैं
युद्ध में जलते देश
साम्राज्य की नीति का
भयावह चेहरा है
बाज़ार की चमकती चमड़ी
उसका अंगरक्षक
पूरा कैरेबियन नीग्रो जगत
मुक्ति के लिये
पृथ्वी में धधकता मैग्मा 


तुम्हारी अमर कृति, ‘हीयर आइ स्टैण्ड’ को
श्वेतों ने समझा अपनी मौत की घंटी
उस अग्नि को बुझाने के लिये
उनके पास आज भी
दमकलें नहीं हैं शेष
ओ क्रूर रंगवादियो
तुमने गान के विरुद्ध
उकसाई है हिंसा
तुम मेरे सोच का बहिष्कार करो, तो करो
उसे मार नहीं सकते
ऐसा वटवृक्ष
जिसकी जड़ें फैलीं हैं पूरे विश्व में
उसे कोई साम्राज्य
नहीं उखाड़ पायेगा
ओ रॉब्सन ....
तुमने उठी लपटों के बीच
संगीत समारोहों में
लाखों अश्वेतों की धड़कनों को
सुना है, जाना है, गाया है
उनकी अनुगूँज बसी है लहरों में
उन्हें गहरी नींद से जगाया है
उन्हें एक जुट होने को
शक्ति दी है गान की
संगीत समारोहों में
श्वेतों ने हिंसा भड़काई
तुम्हारे विरुद्ध
जब शत्रु के पाँव काँपते हैं
तो वह हिंसा जगाता है
पत्थर फेंके गये तुम्हारे गान पर
गाड़ियों के शीशे तोड़े गये
फिर भी तुम्हारा कण्ठ अक्षत था
तुम जीवंत थे
नस्लवादी  पस्त हिम्मत दिखे
अश्वेत जनता तुम्हारे साथ थी


तुम्हारे स्वरों में
लाखों अश्वेतों की शक्ति का ओज
उमड़ता रहा
तुम हर क्षण चुनौतियाँ देते रहे
तुम्हारे समारोहों में असंख्य लोग
रस लेते रहे
उन्हें सत्ता भद्दी गालियों से
अलंकृत करती रही
मुक्ति के लिये उठा ज्वार
सागर गरजता रहा
उत्ताल तरंगे
हृदयहीन चट्टानों से
टकराती रहीं
बीज फूटते रहे
फलों में रस गाढ़ा होता रहा
बूँदें पत्तियों को भिगोती रहीं
तुम्हारा गान समारोह सफल रहा
यह बोलने की आज़ादी का
जश्न था खौफनाक
रॉब्सन ..., ओ विश्व कवियों के जोति पुंज
तुम्हारे गान का समर्थन था
मुक्ति की चेंटी आँच को
कोई बुझा नहीं सका
श्रोताओं को
करना पड़ा सामना हिंसा का
सत्ता अराजक बनी रही
नस्ली उन्माद भड़काती रही
यह क्रूर दमन का
कलंकित  मुख था
साम्राज्यवादी लोकतंत्र का
जन विरोधी छल था
कमज़ोर हृदय अश्वेत
सत्ता का साथ देते रहे
इस उठी आँधी के विरुद्ध
रॉब्सन को मौहरा बनाया गया
तुम्हारा विरेाध ही
सत्ता की रक्षा का विकल्प बना
श्वेत सत्ताधीश
इसे सुखोन्माद कहते रहे
ओ रॉब्सन
अश्वेतों के वन, नदियाँ, झरने, पहाड़,चट्टानें
तुम्हारे स्वरों को साधे हैं
घनघोर वर्षा, झुलसाने वाली तपिश
हड्डियाँ गलाने वाली शीत
इन सबसे कठोर उत्पीड़न
अश्वेतों को सहने पड़े है
ओ रॉब्सन
भारत के अश्वेत
तुम्हारे साथ हैं
मैं भी तो अश्वेत हूँ
दोआबा की मिट्टी से बना
काली नस्ल का धरती पुत्र
तुम एक बार फिर आओ
देखने इस बदलती दुनिया को
तुम्हारी धरती ने
भयावह नरसंहार देखे हैं
उदति नक्षत्र की तरह जोतिमय
युवा कवि क्रिस्टोफर का
अपनी धरती की मुक्ति को 
किया गया  बलिदान
जनता की रगों में
आज भी जिन्दा है
श्वेत सत्ता मुक्तिकामी कवियों -
गायगों, चिंतकों को
नृशंस मारती रही है
तुम्हें याद है
तुम्हारे पिता
श्वेतों के दास थे
तुम्हारे लोगों ने भी
अमरीका को बनाने में
जाने दी हैं
तुमने ललकारा था क्रूर सत्ता को
अपने ही देश में लड़ते रहने को
अपना हिस्सा पाने को
तुम आजीवन अश्वेतों की मुक्ति के लिये
गाते रहे प्रचण्ड राग
समुद्र उफनता रहा
आरोह अवरोहों से
लहरें चट्टानों पर
सिर पटकती रहीं
सूर्य आकाश में दमकता रहा
चंद्र कलायें बदलती रही
ऋतुओं के पंख झरते रहे
इक्कीसवी सदी में
आज मैं तुम्हें बुलाता हूँ
ओ योद्धा गायक
ओ कवियों के जोति पुंज
ओ पॉल रॉब्सन।
                              
जुलाई, 2013,
जयपुर


1- पॅाल रॉब्सन की विश्वविख्यात वैचारिक गद्य कृति।

 

संपर्क -
सी-133 , वैशालीनगर, 
जयपुर (राज) 203021
फोन- 09928242515
                                  

टिप्पणियाँ

  1. जब पूरा विश्व आज वैश्वीकरण के नाम पर साम्राज्यवादी अर्थ एवं सैनिक तंत्र की त्रासदी भोग रहा है तब प्रसिद्ध अमरीकी अश्वेत गायक पॉल रॉब्सन के मुक्ति संघर्ष में की गयी हिस्सेदारी को यद् दिलाते हुए एक प्रेरक कविता । जैसे कविता की एक पंक्ति पूरे सार तत्व को व्यक्त कर देती है और अपनी अभिव्यक्ति में उससे अपना हिन्दुस्तानी स्वर मिला देती है -----" -तुम्हारे नाद में /अनहद पल रहा है । "यहाँ प्रतीकों का अर्थ-विपर्यय होकर वर्तमान के यथार्थ को रचने वाला बन गया है । एक बोधक एवं उत्साहवर्धक कविता । बधाई ।

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  2. विजेन्द्रजी की पॉल रोब्सन पर एक उत्कृष्ट कविता। पॉल रोब्सन के पूरे जीवन, संघर्ष व दुनिया के तमाम मेहनतकश जिन्होंने इसे खूबसूरत बनाया----- प्रेम भाईचारा, सौहाद्र व एकजुटता के सन्देश को एकसूत्र में पिरोती कविता.
    हमारे लिए एक प्रेरक और ज़रूरी कविता।

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  3. बेहद काम की कविता. आज के समय के वैश्विक संकटों और सरोकारों को स्वर देने वाली कविता.

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  4. मुझे माफ़ करें ,विजेंद्र जी की और तमाम कविताओं के सन्दर्भ में देखने पर यह कविता मुझे उथली लगी । कविता कम जीवनी ज़्यादा है !कई बार वाक्य भी अंग्रेजी के लगते हैं । कहीं-कहीं शब्दों का चुनाव और प्रकृति-जीवन से जुड़े बिम्ब प्रभावित करते हैं पर जहाँ किसी सु-भाषित का उपयोग है वह उसे भी ले डूबता है जैसे -न दैन्यम न पलायनम ...विचार कभी मरते नहीं ...|सादर

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  5. आपके ब्लॉग को ब्लॉग संकलक ब्लॉग - चिठ्ठा में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    नई चिठ्ठी : "ब्लॉग-चिठ्ठा" की नई कोशिश : "हिंदी चिठ्ठाकार" और "तकनिकी कोना"।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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  6. यह दुनिया में चल रहे तमाम मुक्ति-संघर्षों को ताकत प्रदान करने वाली कविता है. यहाँ पॉल रोब्सन एक गायक मात्र नहीं मुक्ति संघर्ष का प्रतीक बन जाता है और यह कविता किसी व्यक्ति पर केन्द्रित कविता न रहकर शोषण -उत्पीडन -दमन के खिलाफ लड़ रहे दुनियाभर के योद्धाओं की कविता हो जाती है .यह कविता जन के शत्रुओं को चेताती है कि एक दिन उनको जाना ही होगा वह चाहे भारत के हों यह अमेरिका के . उनका दमन चक्र अधिक दिनों तक नहीं चल सकता है . कविता साम्राज्यवादी लोकतंत्र के जनविरोधी छल को भी उघाडती है और उन लोगों के चरित्र को भी जो इस सत्ता का पक्ष लेते हुए पॉल रोब्सन जैसे मुक्ति योद्धाओं के खिलाफ माहौल बनाते हैं . एक ऐसे दौर में जब विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में माओवाद के नाम पर संस्कृतिकर्मियों और आन्दोलनकारियों का दमन हो रहा है यह कविता उन सबकी संघर्ष गाथा प्रतीत होती है . शासक चाहे कहीं का भी हो और किसी रंग का ,अपनी सत्ता के खिलाफ उठने वाली आवाज को एक ही तरीके से कुचलता है पर यह भी सत्य है कि मुक्ति की चेंटी आंच को कोई बुझा नहीं सकता . कवि क्रूर सत्ता के खिलाफ लड़ रहे लोगों के पक्ष में बिलकुल सही प्रश्न पूछता है -जो उठ खड़े होते हैं /कठोर अत्याचार के विरुद्ध /वे अपराधी कैसे हुए . क्या हमारी लोकतान्त्रिक सरकार के पास इसका कोई जबाब है ?यह कविता उनसे जबाब मांगती है जो अन्याय-अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को जेल के सलाखों के पीछे डाल रही है या फर्जी एनकाउंटर में मार गिरा रही है .

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  7. बेहद आत्मीय कविता | हिंदी में पाल राब्सन पर शायद पहली कविता है | किसी और कवि ने इससे पहले इन पर कोई कविता लिखी हो इसकी जानकारी नही है मुझे |

    -नित्यानंद गायेन

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  8. जब शत्रु के पांव कांपते हैं तो वह हिंसा जगाता है
    मुठ्ठी भर कुबेर, पूरी दुनिया को दबाते हैं पांवो तले...जैसी बहुत ही मारक पंक्तिया छ्दम मनुष्यता की कलई खोल जाती है

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  9. बहुत बढ़िया कविता है आपकी !
    वो लोग जिन्होंने इस दुनिया को सुन्दर बनाया है यह कविता उन सबकी कहानी है!
    बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है आपकी लेखनी !

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  10. मुक्ति संघर्ष की जमीन तैयार करती है यह कविता . हरियश राय

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  11. पॉल रोब्सन को पहली बार जाना है ! प्रेरक कविता है जो संघर्ष को ताक़त देती है ! बहुत बढ़िया चित्रों के साथ !

    शाहनाज़ इमरानी

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