महेश चंद्र पुनेठा




हिन्दी दिवस के अवसर पर हमारे कवि मित्र महेश चन्द्र पुनेठा ने यह विचारपूर्ण आलेख पहली बार के लिए लिखा है. महेश जी एक बेहतर शिक्षक भी हैं और शिक्षा के वास्तविक सरोकारों के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए 'शैक्षिक दखल' नाम से एक गंभीर और सुरुचिपूर्ण पत्रिका भी निकालते हैं.  महेश ने अपने इस आलेख में तर्कपूर्ण ढंग से यह बताया है कि शिक्षा का माध्यम तो परिवेश की भाषा ही होनी चाहिए. बिना इसके विद्यार्थी कुछ भी बेहतर तरीके से जान-समझ नहीं सकते. आज अंग्रेजियत का ज़माना जरूर है लेकिन इस अंग्रेजी को भी बच्चे तभी सीख सकेंगे जबकि उन्हें उनकी भाषा के माध्यम से इसे सिखाने की कोशिश की जाय. तकनीकी कारणों से कल हम यह आलेख पोस्ट कर पाने में सफल नहीं हुए. फिर भी यह ऐसा मुद्दा है जिस पर किसी भी समय विचार किया जा सकता है. तो आईये पढ़ते हैं महेश का यह जरूरी आलेख.  

       
शिक्षण का माध्यम परिवेश की भाषा ही होनी चाहिए


बाजारवाद के दबाब में आज अंग्रेजी को शिक्षण का माध्यम बनाने की एक हवा सी चल पड़ी है। कभी हिंदी का झंडा मजबूती से थामे रखने वाली शैक्षणिक संस्थाएं भी एक-एक कर इस हवा में बहती जा रही हैं। निजी विद्यालय तो बाजार की दौड़ में अपने आप को बनाए रखने के लिए अंग्रेजी माध्यम को अपनाने को मजबूर हैं ही लेकिन अब सरकारी स्कूल भी प्रयोग के नाम पर इस दिशा में आगे बढ़ चले हैं। अखबारों में आए दिनों इस आशय की खबरें पढ़ने को मिल रही हैं। शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों और शिक्षकों को लगता है कि सरकारी विद्यालयों की घटती छात्र संख्या का एक बड़ा कारण इनका अंग्रेजी माध्यम का न होना है। यदि यहाँ अंग्रेजी माध्यम शुरू किया जाय तो घटती छात्र संख्या को रोका जा सकता है। हो सकता है एक हद तक उनका यह अनुमान सही भी सिद्ध हो। अंग्रेजी के प्रति अतिशय मोहग्रस्त मध्यवर्ग इस कदम से कुछ आकर्षित हो कर इन विद्यालयों की ओर लौट आए। पर बड़ा सवाल यह नहीं है कि विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हो बल्कि उससे बड़ा सवाल है कि इससे बच्चों की सीखने की गति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? बच्चे विषयवस्तु को कितना समझ पाएंगे? अपने स्कूली जीवन को उसके बाहर के जीवन से कितना जोड़ पाएंगे? यदि ऐसा नहीं कर पाएंगे तो  क्या वह ज्ञान निर्माण की दिशा में आगे बढ़ पाएंगे? या फिर उनका मस्तिष्क सूचनाओं और जानकारियों का बैंक मात्र बन कर रह जाएगा? इन गम्भीर और जरूरी सवालों पर कहीं कोई विचार-विमर्श नहीं दिखाई देता है। सभी बाजार द्वारा प्रायोजित अंधी दौड़ में दौड़ते जा रहे हैं।अंग्रेजी का भूत इस कदर हावी हो गया है कि सीखने-सीखाने के बुनियादी सिद्धांतों को ही भूल गए हैं।


हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे देश में सरकारी स्कूलों में जाने वाले अधिकांश बच्चे ऐसे परिवेश से आते हैं जहाँ अंग्रेजी उनके लिए पूरी तरह एक विदेशी भाषा है। जिनकी अभिव्यक्ति का माध्यम स्थानीय बोली/भाषा है। संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाएं भी उनके लिए दूसरी भाषा है। जब बोली से दूसरी भाषा तक आना भी उनके लिए बहुत कठिन होता है। दूसरी भाषा में पढ़ा-लिखा भी वे बहुत कठिनाई से समझ पाते हैं (जबकि वह भाषा कहीं न कहीं उनके परिवेश में मौजूद होती है।) ऐेसे बच्चे जब अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाए जाएंगे, तब वह विद्यालय में अपने आपको कितना सहज महसूस करेंगे, उनका कक्षा में कितना मन लगेगा और विषयवस्तु को कितना समझ पाएंगे?  ये विचारणीय प्रश्न हैं। कहीं भाषा का यह वैरियर उन्हें स्कूल से ही दूर न कर दे। जिन बच्चों के लिए अपनी ही परिवेश की भाषा में विषयवस्तु को समझना कठिन होता है तो समझा जा सकता है कि यदि एक विदेशी भाषा को शिक्षण का माध्यम बनाया जाएगा तो उनकी समझ में कितना आएगा। कैसे वह प्राप्त जानकारी के आधार पर ज्ञान का निर्माण कर पाएंगे तथा नया रच पाएंगे? परिवेश से दूर की भाषा में बच्चा जानकारियों, तथ्यों, सूचनाओं को केवल रट सकता है और रटने से ज्ञान निर्माण संभव नहीं है और न ही रचनात्मकता। आज अंग्रेजी माध्यम से पढ़े बहुत सारे बच्चों को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। 



अंग्रेजी माध्यम से शिक्षण करने पर यह हो सकता है कि तोते की तरह बच्चे अंग्रेजी में कुछ अवश्य बोलने लग जाएंगे पर वह उसे अपनी अभिव्यक्ति का सहज माध्यम नहीं बना पाएंगे। ऐसा होने पर उनकी चिंतन प्रक्रिया बाधित होगी। यह प्रमाणित तथ्य है कि मनुष्य हमेशा उसी भाषा में चिंतन करता है जो शिशु विकास की प्रारम्भिक अवस्था में सार्वधिक सुनता है। जिसको उसके परिवार और पास-पड़ोस में बोला जाता है। जिसे उसने अपने बड़ों से अनौपचारिक तौर से सीखा है। अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम होने पर ऐसे बच्चे जो फर्स्ट जनरेशन लर्नर हैं, सीधे शिक्षा की धारा से बाहर हो जाएंगे। वे साक्षर हो सकते हैं शिक्षित नहीं। उन्हें वस्तुओं के अंग्रेजी में लिखे विज्ञापन पढ़ने भले आ जाएं लेकिन उनकी सही पहचान नहीं होगी। कुछ बच्चों को अवश्य इसका लाभ हो सकता है लेकिन बड़ी संख्या इसका खामियाजा भुगतेगी। उनके लिए पढ़ाई पहाड़ बन जाएगी। उन्हें कुछ भी समझ नहीं आएगा। पढ़ाई-लिखाई ऊब पैदा करेगी। ऐसे में सोचा जा सकता है कि सीखने की प्रक्रिया और गति कितनी आगे बढ़ पाएगी। यह हो सकता है कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाया जाय तो बच्चा एक लंबे अंतराल बाद अंग्रेजी भाषा तो सीख जाएगा परंतु विषयवस्तु पर उसकी पकड़ उतनी गहरी नहीं हो पाएगी जितनी अपने परिवेश की भाषा के माध्यम से पढ़ने में। जो समय तथा श्रम बच्चे को विषयवस्तु की गहराई में उतरने में लगना चाहिए वह भाषा सीखने में लग जाएगा। 



     आपने अनुभव किया होगा कि जब आप कभी-कभार पढ़ाते हुए बच्चों की बोली में उनसे बतियाने लगते हो या उनके घर-गाँव में बोले जाने वाले शब्दों का उच्चारण करते हो तो बच्चों के चेहरे एक अजीब सी आभा से चमक उठते हैं। उनके होंठों में मुस्कान बिखर जाती है। ऐसा लगता है जैसे वे हमारे एकदम करीब आ गए हैं। कक्षा में चुप्पा-चुप्पा रहने वाले बच्चे भी अपनी चुप्पी तोड़ बतियाने लगते हैं। उन्हें शिक्षक अपने ही बीच का लगने लगता है। विषयवस्तु को वे बहुत जल्दी भी समझ जाते हैं। इससे पता चलता है कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में भाषा की क्या भूमिका है? पर आज अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का आलम यह है कि वहाँ बच्चों के लिए अपनी परिवेश या मातृभाषा में बात करना तक प्रतिबंधित है। ऐसा करने पर उन्हें  दंडित किया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि जब बच्चे के पास अपनी आवश्यकताओं या भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए अंग्रेजी शब्द नहीं होते हैं तो वह चुप-चुप रहने लगता है। या बहुत कम शब्दों में अपनी बात कहता है। उसकी अभिव्यक्ति क्षमता बाधित होने लगती है। किसी भी भाषा का समुचित विकास नहीं हो पाता है। भाषा के विकास के लिए यह जरूरी माना जाता है कि बच्चे को सुनने-बोलने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। जैसा कि हम मातृभाषा सीखने के संदर्भ में भी देखते हैं कि परिवार में बच्चे को भाषा सुनने और बोलने के पर्याप्त अवसर दिये जाते हैं। उससे अधिक से अधिक बात की जाती है। उसे कुछ न कुछ (टूटा-फूटा या आधा-अधूरा ही सही) बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस तरह वह धीरे-धीरे भाषा सहजता से सीख लेता है। जब बच्चे को उसकी परिवेश की भाषा में बोलने से रोका जाता है तो इससे कहीं न कहीं उसकी चिंतन प्रक्रिया बाधित होती है जिसके बिना भाषा का विकास संभव नहीं है। ऐसे बच्चे अपने भावी जीवन में दब्बू और संकोची होते हैं। इसलिए जरूरी है कि शिक्षण का माघ्यम बच्चे की परिवेश की ही भाषा होनी चाहिए। कम से कम प्रारम्भिक शिक्षा तो उसके परिवेश की भाषा में ही होनी चाहिए। ऐसा कहने के पीछे यहाँ कोई राजनीतिक या सांस्कृतिक कारण नहीं है बल्कि विशुद्ध शैक्षिक कारण है। यह आजमाया हुआ सत्य है कि बच्चे की सीखने की गति अपने परिवेश की भाषा में ही सबसे अधिक होती है क्योंकि ऐसे में बच्चे का पूरा ध्यान विषयवस्तु पर होता है। उसे भाषा से नहीं जूझना पड़ता है। बच्चा सुनने और बोलने की भाषायी दक्षता अपने परिवेश से ग्रहण कर चुका होता है। यह भाषा किताबी ज्ञान को वास्तविक जीवन से जोड़ने में भी मददगार होती है। यदि किताबों की भाषा वह नहीं है जो बच्चे के घर व पास-पड़ोस में बोली जाती है तो बच्चे के स्कूली जीवन और बाहरी जीवन के बीच एक रिक्तता बनी रहेगी। बच्चा अपने आसपास के अनुभवों को अपनी कक्षा-कक्ष तक नहीं ले जा पाएगा। न किताबी ज्ञान से उसका संबंध जोड़ पाएगा। उसे हमेशा यह लगता रहेगा कि स्कूली जीवन और घरेलू जीवन एक दूसरे से अलग हैं। जबकि शिक्षा को जीवन से जोड़ने और रूचिकर बनाने के लिए जरूरी है कि इस अंतराल को समाप्त किया जाय। परिवेश से दूर की भाषा शिक्षण का माध्यम होने पर उसका प्रभाव बच्चे के बौद्धिक व संज्ञानात्मक विकास पर पड़ता है। इसको नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह माना जाता है कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में सबसे अधिक सहायता परिवेशीय भाषा से ही मिलती है। उसमें सोचने और महसूस करने की क्षमता का विकास जल्दी होता है। चिंतनात्मक और सृजनात्मक योग्यता अधिक विकसित होती है। बच्चे का भाषा पर अधिक अधिकार होता है। भाषा पर अधिकार होने का सीधा मतलब है ज्ञान के अन्य अनुशासनों में आसानी से प्रवेश कर पाना। पढ़ने में अधिक आनंद आना। सामान्यतः यह देखने में आता है जिस बच्चे का भाषा पर अधिकार होता है वह अन्य विषयों को भी जल्दी सीख-समझ जाता है। उसके लिए अवधारणाओं को समझना सरल होता है। फलस्वरूप उसके सीखने की गति अच्छी होती है। इतना ही नहीं ऐसा बच्चा अन्य भाषाओं को भी सरलता से सीख पाता है। गैर-परिवेशीय भाषाओं में इसके विपरीत होता है। परिवेश की भाषा के पक्ष में एक सकारात्मक पहलू यह है कि जब बच्चा स्कूल जाना प्रारम्भ करता है उस समय उसके पास अपने आसपास के वातावरण तथा प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन से अपने लिए जरूरी शब्दों का एक छोटा-मोटा भंडार होता है जिनका वह आवश्यकतानुसार प्रयोग करता है। स्कूल उसके इन शब्दों को आधार बना कर उसके शब्द भंडार में उत्तरोत्तर वृद्धि करता है। बच्चों में संवेगों, मानवीय मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण व चारित्रिक गुणों का विकास भी परिवेशीय भाषा में बातचीत से अधिक संभव है।



  अंग्रेजी को शिक्षण का माध्यम बनाने से अधिक आवश्यक यह है कि अंग्रेजी भाषा के शिक्षण को बेहतर और वैज्ञानिक बनाया जाय। समय चक्र में उसे अधिक समय दिया जाय। अंग्रेजी को परिवेशीय भाषा में न पढ़ाकर अंग्रेजी कक्षा का वातावरण ऐसा बनाया जाय जिससे बच्चा आसानी से उस भाषा को सीख सके। दूसरी या तीसरी भाषा सीखने का जो खौफ बच्चे के भीतर होता है वह समाप्त हो सके। इसके लिए हमारे पास अंग्रेजी सीखने का एक मॉडल होना चाहिए। उसे यांत्रिक तरीके से नहीं सिखाया जाना चाहिए। यह कैसी बिडंबना है कि तथाकथित अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों में अंग्रेजी भी हिंदी माध्यम से पढ़ायी जाती है। हिंदी माध्यम के स्कूलों की बात ही क्या कहें। अंग्रेजी में प्रवीणता हासिल करने के लिए शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी करना कतई जरूरी नहीं है।  



  अंत में एक बात और, आज अंग्रेजी को सफलता की भाषा माना जाता है। समाज के हर तबके के मन में यह बात गहरे तक पैठी है। बाजार द्वारा इस भ्रम को हवा देने का काम किया जा रहा है। अंग्रेजी माध्यम शिक्षा का व्यापार करने का बहाना बन गई है। पर ऐसा नहीं है, सफलता के सूत्र भाषा में नहीं बौद्धिक क्षमता में छुपे होते हैं और यह किसी भाषा की मुहताज नहीं होती है। आज यह भी सुनने में आता है कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़े युवाओं के पास रोजगार के अवसर अधिक हैं। यह आंशिक रूप से सत्य हो सकता है पर जब सभी बच्चे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ कर निकलने लगेंगे तब भी क्या यही स्थिति होगी?


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टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही उपयोगी बातें लिखीं हैं महेश जी ने इस आलेख में | हमें जापान , चीन फ़्रांस और कोरिया जैसे देशों से सीखने की जरूरत है | आज पूंजीवाद हमारी शिक्षा व्यवस्था पर जरूरत से ज्यादा हावी है वहीं अभिभावकों में भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने की लालसा बढती गई हैं | चाहे बच्चा इस भाषा में कठिनाई महसूस करता हो उसे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने के लिए विवश किया जाता है | आज अंग्रेजी को पूरी तरह से आजीविका की भाषा के रूप में स्थापित किया जा चूका है हमारे देश में वहीं बहुभाषीय देश होने और देश के भीतर भाषाई संघर्ष ने भी अंग्रेजी के लिए मार्ग आसान बना दिया था | जो लोग हिंदी या क्षेत्रिय भाषा के जानकर या अध्यापक हैं वे भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ा रहे हैं या पढाना चाहते हैं | अपने बच्चों से यह पूछे बिना की क्या वे इस भाषा में कोई परेशानी महसूस करते हैं या नही ? इस आलेख में जिन पहलुओं का जिक्र आपने किया है उन पर यदि अमल किया जाये तो कुछ बदलाव आ सकता है | आज बाजारवाद /पूंजीवाद का दबाव जरुर है पर आज़ादी के बाद से ही हिंदी और क्षेत्रिय भाषाओँ के विकास के लिए राजनैतिक स्तर पर ईमानदारी से कोई प्रयास नही किया गया है | यह भी एक हकीकत है | इन्ही शब्दों के साथ आपको बधाई एंव आभार के साथ
    आपका -
    नित्यानंद गायेन
    सादर

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  2. दुनिया और समाज उसकी अर्थ-नीति से चला करते हैं । जब से नव-उदारवादी अर्थ-व्यवस्था लागू हुई , तभी से देश की अपने भाषा -शिक्षण व्यवस्था की यह दशा हुई है । इससे पहले मिश्रित अर्थ-व्यवस्था के दिनों में ऐसा नहीं था । हिंदी माध्यम के स्कूलों में पढ़कर लोग अंगरेजी भी सीख लेते थे । लेकिन जब से वैश्वीकरण की आंधी आई तभी से कैरियरिस्ट मध्य वर्ग इस दिशा की तरफ मुड गया । निजीकरण ने इसको फायदे का सौदा बना दिया । बेरोजगारी की मार ने उनको सस्ते अध्यापक उपलब्ध करा दिए । राष्ट्र-राज्य की भावना में बदलाव आया । इस सबके बावजूद इस समस्या को उठाते रहना जरूरी है । महेश जी ने बहुत सुचिंतित तरीके से अपनी बात कही है जिसमें उनके अपने अनुभव प्रत्यक्ष हुए हैं ।

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  3. विचारोत्तेजक लेख ...बधाई महेश भाई को |

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  4. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [16.09.2013]
    चर्चामंच 1370 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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  5. Vijendra Kriti Oar

    MHESH NE BAATEN TO THEEK KHIN HAEN . PER SWAL HE KI ANGREJI BHASHA KA SAMRAJY KAB TAK DHOTE RHANGE . KIYA ANGREJ KA VRCHSAW KHTM KRNE KO KIYA PHIR SE HMNE MUKTISANGRAM LDNA HOGA. CHOT IS VYVSTHA PR HO JO ANGREJI KO MATR BHASHA BNYE DE RHI HAE

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  6. Sharma Ramakant

    bahut sateek aur saarthak aalekh hai , badhaee !

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  7. असल में महेश भाई आपके इस आलेख में विचार के बहुत से बिंदु हैं। कुछ से असहमति है तो कुछ से सहमति। वास्‍तव में आपने जो सवाल उठाया है, वह अंग्रेजी और परिवेश की भाषा का नहीं है। वह हिन्‍दी और परिवेश की भाषा का है। तो पहले आपको इससे जूझना होगा। अंग्रेजी उसकी अगली कड़ी है। जब तक आप बच्‍चे की स्‍थानीय भाषा को स्‍केल में जगह नहीं देंगे तब तक न हिन्‍दी का विकास होगा, न अन्‍य किसी भाषा का। दूसरी बात यह कि यह बहस लगातार जारी है। पर आपका लेख बहुत सी काल्‍पनिक बातों पर यानी कि यह हो जाएगा पर आधारित है। अच्‍छा होगा कि इस बारे में अगर आप अपने आसपास के किसी क्षेत्र विशेष का व्‍यवस्थित अध्‍ययन करें और फिर प्राप्‍त तथ्‍यों के आधार पर अपनी बात कहें।

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  8. मेरी पूर्व टिप्‍पणी में स्‍केल को कृपया स्‍कूल पढ़ें।

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