अंजू शर्मा




मैनेजमेंट के क्षेत्र में नौकरी को छोड़ कर परिवार और लेखन को वक़्त देने वाली अंजू कविताएँ और लेख लिखना पसंद करती हैं. इनकी रचनाएँ जनसंदेश टाईम्स, नयी दुनिया, यकीन, सरिता जैसी पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं. अंजू विभिन्न ई-पत्रिकाओं से भी जुडी हुई हैं. kharinews.com, नयी पुरानी हलचल, सृजनगाथा, नव्या आदि में कवितायें और लेख प्रकाशित हुए हैं. अभी हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर द्वारा प्रकाशित स्त्री विषयक काव्य संग्रह औरत हो कर भी सवाल करती है में भी इनकी कवितायें शामिल हैं. वर्तमान में अकादमी आफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर के कार्यक्रम डायलोग और लिखावट के आयोजन कैम्पस और कविता और कविता पाठ से बतौर कवि और रिपोर्टर रूप में भी जुडी हुई हैं.          


यह सुखद है कि आज कविता का जो वितान बन रहा है उसमें स्त्रियों का महत्वपूर्ण स्थान है. इन कवियित्रियों ने यह पहचान अपने दम पर बनायी है. अंजू शर्मा एक ऐसा ही नाम है जिन्होंने अपनी कविताओं में स्त्री अस्तित्व के प्रश्न को तलाशने की कोशिश की हैं. चूकि वे इस जीवन से खुद रू-ब-रू हैं अतः यह तलाश उनकी कविताओं में स्वाभाविक रूप से आया है. अंजू को यह भलीभांति मालूम है कि एक स्त्री आज जाग गयी है अब उसे रोक पाना संभव नहीं है. अब वह उन मिथकों की कैद से भी मुक्त हो जाना चाहती है जिसके नाम पर शताब्दियों से ले कर अब तक उसका शोषण किया जाता रहा है. अब वह अपनी पहचान की गाथा खुद अपने नए बिम्बों के साथ लिख रही है. ऐसे बिम्ब जो टटके तो हैं हीं, उनका धरातल भी पुख्ता है.     







तीलियाँ



रहना ही होता है हमें
अनचाहे भी कुछ लोगों के साथ,
जैसे माचिस की डिबिया में रहती हैं
तीलियाँ सटी हुई एक दूसरे के साथ,


प्रत्यक्षतः शांत
और गंभीर
एक दूसरे से चुराते नज़रें पर
देखते हुए हजारो-हज़ार आँखों से,
तलाश में बस एक रगड़ की
और बदल जाने को आतुर एक दावानल में,


भूल जाते हैं कि
तीलियों का धर्म होता है सुलगाना,
चूल्हा या किसी का घर,
खुद कहाँ जानती हैं तीलियाँ,
होती हैं स्वयं में एक सुसुप्त ज्वालामुखी
हरेक तीली,


कब मिलता है अधिकार उन्हें
चुनने का अपना भविष्य
कभी कोई तीली बदलती है पवित्र अग्नि में तो
कोई बदल जाती है लेडी मेकबेथ में.............


एक स्त्री आज जाग गयी है....



(१)


रात की कालिमा कुछ अधिक गहरी थी,
डूबी थी सारी दिशाएं आर्तनाद में,
चक्कर लगा रही थी सब उलटबांसियां,
चिंता में होने लगी थी
तानाशाहों की बैठकें,
बढ़ने लगा था व्यवस्था का रक्तचाप,
घोषित कर दिया जाना था कर्फ्यू,
एक स्त्री आज जाग गयी है.............


(२)


कोने में सर जोड़े खड़े थे
साम-दाम-दंड-भेद,
ऊँची उठने को आतुर थी हर दीवार
ज़र्द होते सूखे पत्तों सी कांपने लगी रूढ़ियाँ,
सुगबुगाहटें बदलने लगीं साजिशों में
क्योंकि वह सहेजना चाहती है थोडा सा प्रेम
खुद के लिए,
सीख रही है आटे में नमक जितनी खुदगर्जी,
कितना अनुचित है ना,
एक स्त्री आज जाग गयी है......




(३)


घूंघट से कलम तक के सफ़र पर निकली
चरित्र के सर्टिफिकेट को नकारती
पाप और पुण्य की
नयी परिभाषा की तलाश में
घूम आती है उस बंजारन की तरह
जिसे हर कबीला पराया लगता है,
तथाकथित अतिक्रमणों की भाषा सीखती वह
आजमा लेना चाहती है
सारे पराक्रम
एक स्त्री आज जाग गयी है.............




(४)


आंचल से लिपटे शिशु से लेकर
लैपटॉप तक को साधती औरत के संग,
जी उठती है कायनात
अपनी समस्त संभावनाओं के साथ,
बेड़ियों का आकर्षण,
बन्धनों का प्रलोभन
बदलते हुए मान्यताओं के घर्षण में
बहा ले जाता है अपनी धार में न जाने
कितनी ही शताब्दियाँ,
तब उभर आते हैं कितने ही नए मानचित्र
संसार के पटल पर,
एक स्त्री आज जाग गयी है.............




(५)


खुली आँखों से देखते हुए अतीत को
मुक्त कर देना चाहती है मिथकों की कैद से
सभी दिव्य व्यक्तित्वों को,
जो जबरन ही कैद कर लिए गए
सौपते हुए जाने कितनी ही अनामंत्रित
अग्निपरीक्षाएं,
हल्का हो जाना चाहती हैं छिटककर
वे सभी पाश
जो सदियों से लपेट कर रखे गए थे
उसके इर्द-गिर्द
अलंकरणों के मानिंद
एक स्त्री आज जाग गयी है...........



औरत और देवी



औरत....
ईश्वर की अनुपम कृति,
जन्मदात्री, सहोदरी, भार्या, पुत्री,
सुशोभित करती रहीं देवी का पद
जिन्हें सौप दिए गए
तमाम शक्तिशाली मंत्रालय,
और वे कुशलता से संभालती रही,
धन, शक्ति, विद्या, अन्न और सृजन,


मंदिरों में सुशोभित हैं वृहद् प्रस्तर प्रतिमाएं,
लदी हुई मालाओं और अलंकृत स्वर्णाभूषणों से,
जिनके पैरों में गिरे जाते हैं ज़माने के खुदा,
वही जिन्होंने घोषित किये नित नए कानून
और बनायीं रोज़ नयी आचार-सहितायें,


शिवालयों की सीढ़ी उतरते ही
घोषित कर दी जाती है
पापिनी नरक का द्वार,
हर पुरुष के पीछे खड़ी छाया
बन जाया करती है हर फसाद की जड़,


धारण करती है अनचाहे गर्भ की तरह
बोझ तमाम कुत्सित लालसाओं
और महत्वकांक्षाओं का,
बन जाती है स्वर्ग-दात्री गंगा,
सोख लिया करती हैं सारे पाप
स्याहीचूस की तरह


या ऐसी दीवार जिस पर लिख दिए जाते हैं
सारे कन्फेशन,
और हो जाते हैं स्वतंत्र
नैतिकता के मठाधीश
करने के लिए नए नए क्रियाकलाप,


या वह टिशु पेपर जिससे पौंछ कर अपनी
गंदगी स्वच्छ और पवित्र हो जाते हैं
समाज और दुनियादारी के ठेकेदार,


और यदि रास्ते की धूल चुभ जाती है
कंकड़ बन के आँखों में,
तो पाट दिए जाते हैं राजमार्ग,
नए नए कानून, आयोग और जांचें भी
खोजती रहती हैं उनके नामालूम नामोनिशान,
जानते हुए भी कि
पत्थर और प्रतिमा के बीच का
अंतर उतना ही है,
जितनी अलग है औरत एक देवी से......

टिप्पणियाँ

  1. पहले तो बहुत धन्यवाद इस संभावनाशील युवा कवियत्री की कुछ बेहद असरदार कवितायेँ पढवाने के लिए ...विशेष तौर पर 'तीलियां' शब्दों की संक्षिप्तता के बावजूद मन में कई व्यापक और बहुतेरे प्रश्न छोड़ जाती है ..बहुत सुन्दर ..मेरी शुभकामना अंजू जी को

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  2. Santosh Choubey- सुन्दर कवितायेँ ...पढवाने के लिए आभार

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  3. आपकी कविताओं में आया विकास उल्लेखनीय है ..यहां प्रस्तुत कविताओं में "तीलियां" कविता मुझे बहुत पसंद आई | इसमें कही बात बात तो महत्वपूर्ण है ही , इसको कहने का अंदाज भी उम्दा है ...बधाई आपको

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  4. बढ़िया कवितायें हैं शोषण के हथियारों को बखूबी पहचानती अंजू की कवितायें बहुत सी शर्मनाक सच्चाइयों की बखिया उधेड़ डालती हैं स्त्री के प्रति पितृ सत्तात्मक समाज द्वारा स्थापित चिरंतन सामाजिक विषमताओं को चिन्हित करती चलती है इन्हें पाठकों तक पहुचाने के लिए अंजू तो बधाई की हकदार हैं ही संतोष जी का भी बहुत बहुत आभार

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  5. aNJU SHARMA JI KO HARDIK BADHAI .....ITNI BHAVPURN RACHNA KE SRIJAN KE LIYE...........

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. दमदार कविताएं हैं…'तीलियां' तो बहुत ही सुन्दर कविता है… बधाई !

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  8. नारी के जागृति को उकेरती सुन्दर रचनायें तीलियाँ शानदार है।

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  9. सारी कवितायें एक से बढ़कर एक हैं .. स्त्री विषयों पर इनकी गज़ब की पकड़ हैं
    इनकी कवितायें मनोवैज्ञनिक विश्लेषण के साथ . समाधान और वर्तमान परिदृश्य की समस्याओं की भी बखूबी व्याख्या करती हैं ..
    और सबसे सुन्दर पक्ष ये हैं .. कही भी कविता कमजोर नहीं पड़ती ..
    सुन्दर और सशक्त कवितायों के लिए बधाई ..

    ( अहर्निशसागर)

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  10. कविताए अच्‍छी लगीं आपकी, संघर्ष की आपकी चेतना लगातार प्रखर होती जा रही है, यह देख आश्‍वस्‍त हुआ

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  11. सभी रचनाएं एक से बढ़कर एक ... बेहतरनी प्रस्‍तुति ।

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  12. Anju ki kavitaon main stree mukti ki aakanksha ka swar sambhawana jagata hai.wah stree ke bheetar ko hi nahi bahar or vartaman ko hi nahin ateet ko bhi vyakt karti hain. ....ek achhi kavitri ki poori sambhawanayen dikhayi deti hain.

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  13. 'तीलियाँ ' कविता की बात ही और है।
    एक से बढ़ कर बेहतरीन कविताएं।

    बधाई मैम!



    सादर

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  14. अंजू को कवि के रूप में लगातार विक्सित होते देखना अच्छा लग रहा है. अब वह अपनी कविताओं में अधिक स्पष्ट और अधिक काव्यात्मक होकर सामने आ रही हैं...उन्हें ढेरों शुभकामनाएं

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. मैं आप सभी की आभारी हूँ आपकी सराहना बहुत प्रेरित करती है.....लिखते हुए मैं कभी प्रतिक्रिया के बारे में नहीं सोचती पर ये भी सच है कि यही प्रतिक्रियाएं कुछ नया रचने के लिए जमीन भी तैयार करती हैं....आपके स्नेह एवं सुझाव का सदैव स्वागत है.......मैं संतोष चतुर्वेदी जी की आभारी हूँ उन्होंने इन्हें बहुत ही प्रभावशाली रूप में प्रकाशित कर लोगों तक पहुँचाया, साथ ही मैं उन स्नेहिल मित्रों को भी धन्यवाद देना चाहूंगी जिन्होंने इन्हें अपनी वाल पर जगह देकर मेरी बात और लोगों तक पहुँचने में मदद की.....सादर

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  17. anju di pahli kavita bahut zordar hai. khushi khosla

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  18. Dhananjay Singh- ‎'Teeliyan' kavita behad pasand aayi.

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  19. Vishnu Tiwari- अंजू जी कविताये खुद ही उनका परिचय करवादेती है !कविता पदने के बाद पाठक खुद ब खुद उनका परिचय तलाशने लगता है !यहाँ प्रकाशित हर कविता एक वजूद लिए हुए है !एक गंम्भीरता के साथ आपको पदने पर उत्शाहित करती है !बधाई उनको !!

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  20. Mridula Harshvardhan Naaz- sunder lekhan

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  21. Shiv Shambhu Sharma- तीलियां छोटी कविता होकर भी एक बडी बात संजोये बडी कविता है शुक्रिया ।

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  22. एक सटीक स्वर देती हुई कवितायेँ रचती हैं अंजू जी ....... ........देर तक असर करने वाली कवितायेँ .....बधाई !

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  23. teeliyan was the best.... radical n expressive...cngrats!!

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  24. तिथि दानी21 जून 2012 को 11:10 am

    सभी कविताएँ महत्वपूर्ण हैं लेकिन तीलियाँ छोटी कविता होने के बावजूद बड़ी बात कहती हुई विशेष रूप से आकर्षित करती है। बहुत बधाई अंजू आपको। संतोष जी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

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  25. सभी कवितायेँ अपने सम्प्रेषण में सशक्त हैं तीलियां कविता विशेषरूप से अपने समूचेपन में बेहद प्रभावित करती है...

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  26. ये चोर हैं इनकी चोरी पर एक लेख जल्द ही प्रकाशित किया जाएगा ,हम महिलाओं को इस्तेमाल कर रही हैं मोहतरमा

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  27. मुझे तो ये कवितायेँ किसी परिपक्व कवियित्री की कवितायेँ लगती हैं ! स्पष्ट,सुगढ़, और संतुलित भाषा में व्यक्त सामाजिक दायित्व की कवितायेँ बहुत अच्छी लगीं !

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  28. बेहतरीन, सशक्त कविताएँ ... "तीलियाँ" विशेषरूप से प्रभावशाली कविता ... बहुत बधाई .. !!

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  29. बेनामी जी ..बात करने की कुछ तो मर्यादा होती है , लगता है आप वह सब भूल गयी हैं | इस तरह से सार्वजनिक मंच पर किसी पर चोरी का आरोप लगाना निहायत ही अशोभनीय और निंदनीय है | हां.. यदि आप अपने तर्कों से बात करती , तो उस पर ध्यान दिया जाता | लेकिन आप जैसे लोग तर्कों की बात तो करते नहीं , बस किसी पर यूं ही कीचड़ उछाल देते हैं | और मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ , क्योंकि जब आपमें सामने आने का साहस ही नहीं है , फिर तो आपसे बात करना ही फिजूल है |

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  30. स्त्री जीवन और स्त्री मन की पीड़ा की सटीक , सुदर , सशक्त और नयी शैली में आडम्बर विहीन अभिव्यक्ति ......अंजू जी को बधाई ....और संतोष जी का धन्यवाद ...खुबसूरत कवितायेँ पाठकों तक पहुँचाने के लिए ......मीनाक्षी जिजीविषा

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