सुबोध शुक्ल

पल-पल का हिसाब लेती कविता


(भगवत रावत का कविता सन्दर्भ)




एक पुरानी ग्रीक कहानी याद आ रही है। एक देवपुत्र था-प्रॉमिथियम, धरती पर रहने वाली एक सुन्दरी से प्रेम कर बैठा। परमेश्वर ने सजा सुनायी कि लड़की को छोडो या दण्ड भोगो। प्रॉमिथियस एक निर्दोष प्रेमी की तरह दण्ड को तत्पर हो गया। सजा दी गयी। एक गिद्ध प्रॉमिथियस के कलेजे को फाड़-फाड़ कर निकालेगा, उसे खायेगा, उड़ जायेगा और देवता होने के कारण यानी की अमर होने के कारण रातों-रात एक नया कलेजा पैदा हो जायेगा और पुनः गिद्ध को आ कर उसे नष्ट करना होगा। यह क्रम अहर्निश चलता रहेगा। हर धर्मशास्त्र के लोक मिथक, अपने किस्म के अदृष्ट माया लोक, अपरिभाषित नीति मानकों, अप्रतिहत अस्वीकृत दांवों और अन्तर्विसंगतियों से जूझते नायकों के श्वेत पत्र की तरह हैं। मैं जन-विश्वासों तथा लोक -आस्थाओं के समानान्तर जीवन-संसार को एक लिहाज से स्वीकारणीय पाता हूँ। कथाओं का निर्माण एक समूची संस्कृति का अपनी ‘उपस्थिति’ से अपने ‘अस्तित्व’ में संक्रमण है। प्रत्येक युग अपने समय के संभावित तर्क के साथ-साथ अपनी प्रस्तावित कल्पना का भी साक्षी होता है। यह अवश्य विचारणीय है कि युगीन अन्तर्दशाओं के प्रभाव और सामर्थ्य को तय करने में भूमिका कल्पना की रही या तर्क की। मेरा यहाँ भी मानना है कि एक सजग युग चेतना, एक सबल प्रश्नवाचक दृष्टि उत्वसधर्मी अनुभवगत अनुशीलन के गठजोड़ से ही तैयार होती है। इकलौते या इकहरे मापदण्ड, समय और समाज के अन्तर्विवेक को, उसकी जातीय पक्षधरताओं एवं वर्गीय चुनौतियों के स्तर पर अलगाने के काम करते हैं। इस कहानी के सिरे कहीं नहीं जुड़ते या कहें कि यह कहानी इसीलिए अधिक निर्मम है क्योंकि इसके सुनिश्चित साध्य तक नहीं हैं। याकि आधुनिकतावादी सन्दर्भों में प्रत्येक आत्मीयता एवं भवोन्मेष के सहभागी तत्त्व का ऐसा ही परिणाम होना सुनिश्चित है। यह कहानी हमें एक साथ कई दिशाओं में घूम जाने को बाध्य कर जाती है-आततायी त्रासदी के समकालिक जीवन मूल्यों की ओर, आघातों के साथ अकेले छोड़ देने वाली हीन भावना की ओर, सभ्यता के झूठें मूल्यों को मानवीय अस्मिता के युगीन संशय की ओर अथवा यथार्थ की बुनियादी जीवेषणा को एक प्रगतिशील सार्वजनिकता के काव्यशास्त्र की ओर। एक रचनाधर्मी आँख हमेशा एक प्रयोगशील मन की पैदाइश होती है। उसके लिए निषेध और उपेक्षा के मायने मात्र अराजक बचकानेपन के तत्त्व होते हैं। हमारे स्वप्न हमारी ही चेतना के दृश्य प्रबन्ध है। उन्हें भौतिकता के सन्दर्भों में स्वीकार भले ही न किया जा सके किन्तु देशकालगत जीवन के वस्तुनिष्ठ बोध के लिए वह हमेशा उत्तेजक की भांति काम करते हैं। आज के दौर में ‘भगवत रावत’ एक ऐसे ही कवि हैं जो जीवन की अन्तर्संगति में सभ्यताओं और इतिहास को स्वायत्त करते हैं। यह मुठभेड़ कविता की भीतरी परम्परा से तो है ही साथ ही साथ उस आयातित और आरोपित प्रतिक्रियात्मक संस्कृति से भी है जो कविता के बुनियादी परिप्रेक्ष्य को देखने समझने की दृष्टि बाधित कर रही है।



भगवत रावत प्रायः एक लोक आवेग की गहरी सम्पृक्ति के साथ सामने आते हैं। उनकी लोक की समझ न तो किसी शास्त्रीय ब्यौरे के परिवृत्त से बनती है न ही किसी शासकीय वातावरण की कार्यालयीय आत्मपरकता से। यह एक नितान्त सरल, समस्थानिक और प्रकृतिस्थ प्रश्नाकुलता के आरोह-अवरोह से बनती संवरती है। ये परिमाप चूँकि सांसारिकता और समकालीनता के सामान्यीकृत, किंचित सुविधापूर्ण एवं सर्वस्वीकृत अवधारणाओं से अलग एक उदग्रता, ताप, बेचैनी और अनौपचारिक नाटकीयता की कीमत दे कर पाया गया है अतः इसमें लोकधर्मिता का वह अधूरापन या कहें कि कच्चापन सर्वत्र देखा जा सकता है जिसे अभाव मान कर अन्य कवि उसे भरने का प्रयास कर उसकी केन्द्रीय सौन्दर्यधर्मिता से अलग कर देते हैं। अपनी कविता में लोक को न तो वे सभ्य बनाते हैं न ही सैद्धान्तिक। लोक से गहरी सम्पृक्ति के बिन्दु भगवत रावत के इसी भावानुशासन में है। कविता के सरोकार अन्ततः जीवन के सरोकार हैं और जीवन के व्यापक अर्थ उसकी मनुष्यता के होने के। इसीलिए भगवत रावत की कविता जीवन को लोक के सन्दर्भ में जिम्मेदार मानती हैं। यही जिम्मेदारी आगे चल कर उस स्वप्न और आकांक्षा के विपर्यस्त ही सही, सांस्कृतिक सौभाग्य में रूपान्तरित हो जाती है। जहाँ कविता की भाषा, मनुष्य की भाषा का अनुवाद नहीं वरन् अनुभव प्रतीत होने लगती है। एक स्वीकार को समर्पित और लोक यथार्थ से संलग्न कवि की समझ उन धारणाओं से भी बनती है जो उसके अपने युग विवेक की संसारधर्मिता को लाँघ कर एक ऐसी संवेदनधर्मी भूमि को खोजे जो संसार में अपने वर्तमान के होने की शर्त के साथ-साथ उसके चेतनागत जुड़ावों के सन्दर्भों को भी पकड़ सके। एक ऐसे समय में जहाँ सामाजिक सरोकार, और जीवन यथार्थ जैसे शब्द, कविता के संसार को दिलचस्प तरीके से बोझिल कर रहे हैं और भाषा में मूल्यों के पराभव के प्रश्न, भावुकता के ठोस और विचलन से भरे रोमान को गढ़ रहें हैं वहाँ भगवत रावत की कविताएँ वर्तमान जीवन बोध का अपनी सामाजिक चेतना के बेहद साधारण एवं सामान्य पहलुओं के स्तर पर संवाद का प्रयास है। असल में इन कविताओं में लोकचेतना के पक्षधर अनुभवबोध की सामाजिक व्याप्ति एवं परम्परा से प्राप्त रचनात्मक वस्तुबोध के विश्वास के बीच जो उत्सुकता और अपनापन है वही इसे वर्तमान और प्रासंगिकता के सन्दर्भ में आवश्यक एवं निर्णायक बनाता है। रावत की कविताओं का विकास देखने पर लगता है कि वे अपनी रिक्तता में बेहद गहरी हो जाती हैं। कहने का आशय यह है कि वे तब सबसे अधिक मारक, निर्मम और क्रुद्ध दिखती हैं जब संस्कृति और सभ्यता के चेहरे उन्हें आमने सामने साफ और सफेद दिखायी देने लगते हैं। युगों की अन्तर्धारा में झाँकती और लोक चेतना की दरारों को भरने का प्रयास करने के पहले उन्हें और वस्तुपरक स्पृहा से स्पष्ट करती प्रतीति है। यह सत्तागत प्रतिरोध के विलसिले में व्यवस्था को आईने के तौर पर भविष्य के सामने एक दुविधा की तरह खड़ा करती उनकी कविताएँ मात्र किसी उल्लास, मुक्ति या स्वतन्त्रता का घोषणा पत्र नहीं हैं, वे उन सभी हाशिये पर खड़े अपारदर्शी राजनीतिक चेतना के गढ़े गये सामाजिक चिन्तन के यूटोपिया का प्रतिरोध भी है जिनका अस्तित्व केन्द्रीय मौजूदा स्थापत्य में निषिद्ध एवं वर्जित माना जाता रहा है।


रावत जी के कवि कर्म का प्रारम्भ हिन्दी में उस दौर से दिखा है जब आधुनिकता के भद्र लोक और समकालीनता के सांस्कृतिक भाव बोध का बोलबाला रहा है। कविता के धरातल और कंगूरे दोनों ही 70 के दशक से जहाँ परिवेश को संक्रमणशील भावावेशों के रचनात्मक ऐन्द्रिक बोध से जोड़ते वहीं दूसरी ओर अवसाद एवं निराशा के रोमैण्टिक ठण्डेपन के असफल जीवन संवेगों से। मेरा मानना है कि समसामयिकता विचार के स्तर पर जितना प्रौढ़ और सबल बोध है, भावना के स्तर पर उतना ही निष्प्राण और अस्पष्ट। भगवत रावत के सिलसिले में इस अवधारणा को अनेकायामी स्तर पर समझा जा सकता है। उनकी एक कविता है ‘बैलगाड़ी’। युग सन्दभों के व्यापक संवेदन को एकरैखिक चेतना देने का प्रयास करती कविता। हिन्दी कविता में साधे गये बेहद कठिन और दुष्कर काव्य तकनीकों का परिचय देती कविता। वह तकनीक है एक खास किस्म की संज्ञाप्रधान वस्तुपरक इकाई का युगों के अन्तर्गत विशेषण होते जीवन-प्रसंगों से वार्तालाप और यकायक एक इकाई का समकालीन प्रतिमानों में एक सांस्कृतिक विवेक की तरह लोकेट कर जाना। ऐसी कविताओं पर उतरने से पहले युगबोध के प्रति साहसिक जागरुकता और विरोधाभासी अनुभवों के आपसी तनावों की सही समझ एवं शिनाख्त आवश्यक है-एक दिन अपनी ही चमक-दमक की / रफ्तार में परेशान सारे के सारे वाहनों के लिए / पृथ्वी पर जगह नहीं रह जायेगी / तब न जाने क्यों लगता है मुझे / अपनी स्वाभाविक गति से चलती हुई / पूरी विनम्रता से सभ्यता के सारे पाप ढोती हुई / कहीं न कहीं / एक बैलगाड़ी जरूर नजर आयेगी। (बैलगाड़ी) ऐसी कविताओं पर विचार करते हुए कविताओं से जुड़े पूर्व निश्चित मानचित्र तथा काव्यशास्त्र के चालू स्थापत्य काम नहीं देंगे। इस कविता के जीवन और मनोजगत का स्पेस तथाकथित कविताशील और प्रगतिकामी बाजारीकरण के विरोध में खड़े सामाजिक पाठ का आख्यान रचता है। एक विसंवादी समय में जहाँ वस्तुबोध को परखने के यन्त्र त्रासद आत्मनिर्वासन से ग्रस्त हैं और जहाँ यथार्थबोध की उपस्थिति एक वैचारिक मुद्रा बन कर रह जाने में अपने को सर्जन का सहधर्मी मानती हो, रावत जी की ऐसी कविताएँ एक अन्तर्द्वन्द्व से भरे विक्षोभ और असहमति के ईमानदार जीवन कर्म से जूझती हैं। ये कविताएँ एक समूचे कालबोध के त्रास और विचार जगत के अकेलेपन से लोहा लेने वाली कविताएँ हैं। बौखलाहट और प्रश्न को व्यवस्था के स्वेच्छावादी तत्काल से जोड़ने वाली कविताएँ। वर्तमान जीवन मूल्यों में पसरा अन्धकार और उसके यन्त्रणा से भरे भविष्य के साये यह स्पष्ट संकेत करते चले हैं कि कवि की संवेदना का संसार, आधिपत्य और आतंक के सत्ताभिमुख उपमानों से मुक्त या कहें सम्प्रभू संसार है।


अपने समय के सामाजिक विवेक और राजनीतिक हताशा को रावत अपनी काव्यभाषा के बुनियादी अनुभवबोध में तलाशते हैं। यह एक किस्म के अरक्षित और सामूहिक परम्पराबोध का सामंजस्य एवं स्मृतिधर्मी सन्दर्भों का दाय है। संस्कृतिगर्भी और इतिहास में संसार के सन्देवन को महसूस करने वाले कवि की एक खासियत तो यह है कि वह जितना मुखर अपने निजी व्यक्तिगत सरोकारों में होता है उतना ही ऊर्जान्वित वह समूह की अश्व्यिक्ति के लिए भी रहता है। अपने जीवनानुभवों के साथ उसमें व्यापक और विस्तृत जीवनधाराओं के स्वर भी अनुनादित रहते हैं। ऐसी समूह-संस्कृति का निर्माण ही अन्ततः कविता के जीवन को उसके आत्मीय स्वभाव में विश्वसनीय भी बनाता है, साथ ही साथ यथार्थ के सहज धर्म को सामाजिक रुप से ग्रहणीय बनाने की योग्यता भी देती है।


रावत बहुआयामी अर्थो में नॉस्टैल्जिया के कवि हैं। यहाँ इस शब्द का प्रयोग किसी जुमले की तरह करने का अभिप्रेत नहीं है। असल में ‘नॉस्टैलजिया’ हर उस कवि को आन्तरिक एकात्मक का बोध कराने वाला सूत्र है जो पुरातन विमर्शो को अपनी समग्र काव्य तकनीक में अवधारणाओं के रैखिक या चक्रीय वर्तमान में बुनने का प्रयास करता है। इसके दो खतरे हैं-पहला, कविता की वैचारिक भित्ति का कमजोर पड़ जाना और उसका स्थान एक भावुक सहानुभूति द्वारा ले लेना तथा दूसरा, इतिहास के भूले बिसरे को वर्तमान के प्रसंग में स्मृति का अप्रत्याशित बिम्ब दे देना है। यह कविता की प्रतिध्वनि को रोमांचित और आसक्ति से विभोर तो कर देता है किन्तु उसके नैसर्गिक विन्यास को बहुविध वर्गीय अस्मिताओं और अनुभवों के आकस्मिक प्रयोगों से विच्छिन्न कर देता है। किन्तु यही स्मृति कविता के अपने अन्दरूनी संविधान में रावत जी के यहाँ शक्ति की तरह है। ‘लौटना’ भगवत रावत की ऐसी कविताओं में से एक है जहाँ इतिहास की प्रतिहिंसा और आक्रामक महत्त्वाकांक्षा का दृश्य, भाषा के उस मूल रूपक से जुड़ा हुआ है जिसे धर्म-उन्मादी चेतना की विशेष नियति ने अपनी जकड में ले रखा है। इस कविता की रचनाधर्मिता का साहस, भाषा के उस निश्चित सामर्थ्य से टकराने का है जो अर्थ के या सम्प्रेषण की अराजक व्याप्तियाँ नहीं गढ़ता। वह अपने चिर-परिचित अभिप्रेत को पहचानता और बूझता है जो अनिर्णय या अनमनेपन के कुहासे से दो-चार होता रहता है-दिन भर की उड़ान के बाद / घोसलों की तरफ लौटती चिड़ियाँ / सुहानी लगती हैं।


एक सामान्य संज्ञावादी शब्द चित्र। जहाँ भाषा का टोन किसी गहरे आधुनिक सन्दर्भ को झिंझोड़ने के लिए जैसे अपनी भूमिका तैयार कर रहा हो। यहीं से रावत जी की उस जनसांस्कृतिक चिन्ता का ठेठ राजनीतिक उदासीनीकरण प्रारम्भ होता है जिसका स्पष्ट प्रतिकार झूठे मिथ्या आडम्बरों के छद्म विचार और पाखण्डी एकान्तिकता की निर्जन एवं भितरघाती संभावनाएं कर रही हैं-लेकिन जब / धर्म की तरफ लौटते हैं लोग / इतिहास की तरफ लौटते हैं लोग / तो वे ही / धर्म और इतिहास के / हत्यारे बन जाते हैं।


भगवत रावत अनेक अन्तर्द्वन्द्वों एवं कई विरोधाभासों के अन्तर्निहित क्षमताओं की धारणा के जरिये, उनकी वास्तविकता को संभव करते हुए जैसे अपने समूचे काल बोध को उसके केन्द्रीय संकट से परिचित कराते हैं। चूँकि वे व्यक्तिवाची शिल्प पर भरोसा करते हैं इसलिए किसी भी प्रकार की साम्प्रदायिक अमूर्तता, या आत्ममुग्ध सम्मोहन से बच कर निकल आने की कला उन्हें बखूबी आती है। अवधारणाओं और प्रतीकों की अन्तर्वस्तु के रूपान्तरण की एलिगरी में गये बगैर, वे इतिहास और रहस्य के विश्वस्त अनमनेपन को प्रतिपल परिवर्तित यथार्थ बोध के नित नवीन जातीय संरचना से जोड़ने का प्रयास करते रहते हैं। भाषा के साफ सुथरेपन के साथ ही उनकी रचना प्रतिक्रिया का एक बुनियादी नियम भी है और वह है वैचारिक ऋजुता। समकाल का तर्क और लोकसम्मत जीवन प्रकृतियों के सजग दृष्टिकोण, कविता में उनकी मौजूदगी किसी अधीर या हक्के-बक्के बुजुर्ग की तरह नहीं कराते । व्यक्ति, सत्ता और सृष्टि के प्रयोग उनकी काव्य प्रक्रिया में परस्पर अन्तर्मुक्त होते चलते हैं या कहें कि ये तीनों तत्त्व जिस भांति कविता की भीतरी और बाहरी क्रियाओं को संयत करते हैं ऐसा प्रतीत होता है कि कविता की प्रत्येक परत एक सघन एकालाप और सामूहिक विरासत की स्मृति को पुनर्जीवित करने में लगी है। 80 के दशक की पहचान और प्रतिष्ठा के दौर में भगवत रावत साधारण जीवन को समग्र बोलचाल के आयामों में परिवर्तित करने वाले कवि के रुप में जाने गये या कहें अलगाये जाने लगे। उनकी आगे की कविता जीवन की रचनात्मक चुनौती के रुप में रचना की भाषा को अर्थवत्ता देने वाला रहा है। साथ ही उनके कलागत अनुभव अपनी काव्य-प्रकृति के उन समृद्ध आत्मविश्वासों का निर्माण करते हैं जहाँ कविता का परिवेश अपनी तमाम कृतज्ञ निष्ठाओं और समर्पित आस्थाओं के बावजूद मनःस्थिति की बेचैनी, जीवेषणा और आपाधापी में अपनी भावभूमि का मोक्ष खोजता है-जब मैं स्कूल में पढ़ता था, उन दिनों / अखबार में छपी, बाढ़ग्रस्त इलाके का मुआयना करती / किसी हेलीकॉप्टर की तस्वीर से पता चलता था / अब इधर सुविधा हुई है / अब हम घरों में कुर्सी पर बैठे-बैठे डूबते गाँवों के /जीते जागते दृश्य देख कर जान जाते हैं / कि बरसात आ गयी है / हम हर साल इसी तरह बरसात के आने का इंतजार करते हैं (अपने देश में) शैली इसे ‘डिवीजनल ट्रांसफर’ कहता था। स्थगित आग्रहों और गुणात्मक व्यवस्थाओं के अनेक ऐसे सूत्रों का निर्माण जो जीवन के मामूली से लगते ब्यौरे से ले कर रचना विधान की प्रतिनिधि सत्ता तक अपनी आवाजाही रखें और भूलने-पहचानने के बीच की सीमा में प्रामाणिक अर्थबोध और प्रासंगिक सांकेतिकता के समीकरण बाँधे । यह अत्यन्त दुष्कर और असम्भव सा कवि-कर्म है। इसके लिए आवश्यक है कि कैसे कवि अपनी व्यक्तिगत पक्षधरता को सामान्य मानव-सम्बन्धों की संवेदनाओं एवं प्रक्रियाओं के अर्थ में अनूदित करता है। इससे कवि की नीति संवेदनाओं, चिन्तन प्रक्रिया और उसी के द्वारा की जा रही समाजगत विचार अनुभूति में फाँक पड़ जाने के खतरे हैं। इसलिये वह यह मान कर नहीं चलता कि उसकी रचना से कोई समानान्तर बोध या तात्कालिक क्रान्ति संभव नहीं। असल में प्रत्येक रचनाकार का एक नैसर्गिक स्वरचित सौन्दर्यबोध होता है जो कि उसके रागात्मक दायित्वबोध एवं मानवीय पारस्परिकता के ऐतिहासिक अन्तर्द्वन्द्वों के परिणामस्वरूप काव्यानुभूति के मुहावरों और संघर्ष के सामाजिक अनुमानों को आधुनिक विकल्पों के आधार पर विसर्जित करता रहता है। यह प्रक्रिया प्रतिरोध के सशक्त पर्यावरण को काव्यभाषा के स्तर पर एकजुट करने का प्रयास करती है।


खालीपन का स्पर्श और क्लेश का अनूठापन रावत जी की कविताओं में एक नयी अर्थ आभा का प्रस्तुतीकरण है। आम जन मानस के सांकेतिक सौन्दर्य और उनके लोकचेतस् आत्मिक बिम्ब का पाठ रचती कविता तक पहुँचने की जो सीधी और स्पष्ट गतिविधि है उसका मूल है वह अहसास जो नारे की तरह प्रचारित किये जा रहे निरर्थकता बोध और जुलूस की तरह प्रदर्शन करते आचरणहीनता के बीच से रास्ता बनाती जनतान्त्रिक जीवनावश्यकताओं के एक नये चेहरे को परिभाषित करती है। पहले कहा जा चुका है कि रावत जी का काव्यबोध कविता के दायरे में एक समूह की सहृदयता का निर्माण करता है, भीड़ के सिनिसिज्म का नहीं। वह सही मायने में वस्तुगत संयम को कवितागत सादगी से परिचित कराते हैं जिसके कारण तनाव की एक अकृत्रिम अवस्था उनकी कविता के सामाजिक बिम्बों को गढ़ती जाती है। वह तनाव खौलता हुआ, अवसादग्रस्त, असंगत न हो कर समकालीन उपभोक्तावाद के अन्तर्विरोधों, सत्ता अभिकेन्द्रित राजनीति की अनिवार्य हो चुकी आचारहीनता को एक अन्तरंग संवाद के स्तर पर खोलती है-इतनी थक चुकी है वह / प्यार उसके बस का नही रहा / पैंतीस बरस के / उसके शरीर की तरह / जो पैंतीस बरस-सा नही रहा (थक चुकी है वह) कविता में जीवन के प्रतिनिधि उदाहरण को तलाशती उनकी काव्य-प्रक्रिया समकालिक होने के बावजूद, अपनी उपलब्ध, निर्मित एवं परिचित समानान्तरता के खिलाफ हो जाती है। और साथ ही इस तरह अपने अधीनस्थ याकि पडोसी सरोकारों में कुछ इस भांति प्रवेश कर जाती हैं कि अतिरंजित आशंकाओं और नाटकीय जल्दबाजियों के अन्तर्विरोधी यथार्थबोध, जीवनापेक्षा वस्तु सन्दभों में प्रतिरोध के मानस का उम्मीद से भरा खाका खींच सकें।


रावत जी की कविताओं के काव्यमर्म को समझने पर यह आसानी से टटोला जा सकता है कि घटनाओं या देशकाल के आकस्मिक बयान से, जीवन के विश्वस्त प्रतिरोधों और संयत दृष्टिकोणों को उनकी अतिमुखर सहज प्रतिहिंसा से कैसे बचाया जा सकता है। कविता के सर्जनात्मक वस्तुपक्ष को तलाशती रावत जी की कविता, अक्सर जीवन के अनपेक्षित सन्दभों को समकालीनता की दैनन्दित परम्परा में तलाशती है-चिड़ियों को पता नहीं कि वे / कितनी तेजी से प्रवेश कर रही हैं। / कविताओं में... / उन्हें नहीं पता था / कि कविताओं तक आते-आते / वे चिड़ियाँ नहीं रह जाती / वे नही जानतीं कि उनके भरोसे / कितना कुछ हो पा रहा है / और उनके रहते हुए / कितना कुछ ठहरा हुआ है। (चिड़ियों को पता नहीं) ये अनपेक्षित सन्दर्भ संस्कृति की प्रतिक्रियात्मक शक्तियों के ठुकाराये हुए वे संघर्ष के अवसाद हैं जिनकी मौजूदगी कविता की प्रतिकृत संवेदना को मानवीय निष्ठा में अधिक से अधिक सहिष्णु बना देती है। यहीं पर यह भी अनायास ही दिख जाता है कि किस तरह भगवत रावत कविता के अपने सुनिश्चित समाज को प्रायोजित गतिशीलताओं और रोगातुर सहानुभूतियों से बचा कर ले जा सकने में सक्षम हो जाती हैं। इसलिए उनकी रचनाएँ आत्मकेन्द्रित सुख और आक्रामक विसंगतियों के आत्ममुग्ध ब्यौरों से मुक्त है। रावत जी की कविता के ऐंद्रिक लक्ष्य भी वे सामान्य सी लगती नाटकीय पक्षधरताएँ हैं जो अलग-अलग समय पर अलग-अलग परिणाम के सांस्कृतिक प्रसंगों को समाज के आत्मकेन्द्रित रिश्तों की निरंकुशता से विस्थापित करती रहती हैं। इस किस्म के रैखिक खतरे उन जैसे कवियों को उठाते ही रहने होंगे क्योंकि मानवीय निस्सहायता की उत्तरदायी शोषक ख्वाहिशों के प्रतिपक्ष की सृष्टि अपने युग निष्कर्षो को व्यापक सोद्देश्यता देने वाला रचनाकार ही कर सकता है।


निस्सन्देह रावत जी आक्रोश, तनाव और अव्यवस्था को युगजीवन की नयी भाषा और यथार्थ के केन्द्रीय शिल्प में ढालने में सफल रहे हैं। समय की संलग्न यथार्थमयता और परिदृश्य के आत्मान्वेषित (भले ही विसृन्खलित) संयोजन, उनकी अनुभवजन्य आत्मीयता तथा अन्तःसंघर्ष से पैदा होने वाले जीवन के भाव साम्य, कविता के निर्माण में उन रचनात्मक इरादों को सहन करते चलते हैं जो सार्वजनिक संवेदनशीलताओं की मौलिक निजता का बृहत्तर मानवीय आयाम गढ़ते हैं। आदमी को उसके भीतर के अमानवीय अन्तरंग से सामना कराती भगवत रावत की कविता के संघर्ष, अभिव्यक्ति के किसी सुविधाभोगी चमकीलेपन का नतीजा नहीं है और न ही मेरा यह मानना है कि वह किसी नुकीली भावनिष्ठ तबीयत की आर्द्र निष्पत्तियाँ हैं। वरन् व्यक्ति और समाज के पारस्परिक आत्मालोचन की आत्मीय हिस्सेदारी रचती कविताएँ हैं वे-आँखों में फैले / आसमान की तरह / वह फैला था / आकर्षक / अनन्त / मैं उसमें कूद पड़ा / खूबसूरत चुनौती के उत्तर-सा / पर वह जादुई पानी की तरह / सिमटने लगा / देखते –देखते / दिखने लगी तन की मिट्टी / दरकते –दरकते / वह मुर्दा चेहरों में / तब्दील हो गयी / उन चेहरों में एक चेहरा मेरा था। (समुद्र के बारे में) ये आत्मीय हिस्सेदारी, तज्जन्य मानवीय इच्छा शक्ति और अनुभवों के वैचारिक तनाव की सद्इच्छा का परिणाम है। यह जरुरी भी है। कविता को संस्कृति कर्म बनाने की चेष्टा कभी-कभी उसे सामूहिक वर्गीय आवाहन के तादात्म्य से विलग कर उसे मात्र गाथा किंवदन्तियों के सूचना संसार में भटकने के लिए छोड़ देती हैं। कवि को आगामी किसी अप्रत्याशित भय के अन्देशे नहीं हैं वह वर्तमान के ही सामाजिक दायरों में भविष्य के समाजशास्त्र को मूर्त करते हैं। वैसे यह समकाल का एक खास चिरपरिचित मुहावरा है कि वर्तमान के शब्द से आज की कविता आगामी अर्थो के संकेत चुनती है। कविता में प्रयोगों के दायरे भाषा और भाव के आपसी उलझे हुए और दुरूह रिश्तों को आलोचनात्मक पारदर्शिता से अलग एक रचनाधर्मी पारदर्शिता देने की ओर सक्रिय होती है। अभिव्यक्ति के स्तर पर निरन्तर झूलती सम्वेदनशीलता और समकालीन औचित्यों के दिशाहीन संलाप भगवत रावत की कविता समस्या से जुड़े प्रमुख विचारणीय बिन्दु हैं। सार्वजनिक सोद्देश्यता के व्यंग्य, वैचारिक छद्म का विद्रूप और दरकती हुई संरचनात्मक लय के प्रगटीकरण में उनकी भाषा गोलाई में गहराई पाती जाती है। उद्वेलन और आत्म संशोधन की प्रक्रिया में बदलाव की चिन्ताओं का जीवन के संवेगों से साहचर्य स्थापित कर लेना ही इस कविता का साध्य है। मानव के आहत मूल्य और लोक जीवन के ऐन्द्रिक तनाव रावत जी की कविताओं को नये सिरे से देखने को बाध्य करने वाले तत्त्व हैं। अनुभव का जीवनगत अर्थविस्तार और आकांक्षाओं के प्रस्तावित सौन्दर्यबोध में मनुष्य की उपस्थिति का संकल्प उनकी रचनाधर्मिता में जीवन यथार्थ के एक जैविक विकास का नेतृत्व करता है।


असल में हर कवि का अपना एक जीवन बिम्ब होता है जिसे वह अपने व्यक्तिगत विश्वासों के स्मृति बिम्बों से आलोकित रखने का प्रयास करता है। इन दोनों बिम्ब प्रतीकों का परिवेश और मनोविज्ञान, पर्याप्त संकेतगर्भी और यथार्थ के आदिम आग्रही मायनों से जुडा होता है। भावनात्मक वैचारिक असंगतियों, वैयक्तिक वस्तुपरक भटकावों तथा सामाजिक द्वन्द्वात्मकता को किसी दिलचस्प विट से फुसलाती प्रतीति के विरुद्ध रावत की कविता, उन्हीं जीवन एवं स्मृति बिम्बों के आपसी प्रभावगत मूल्यबोधों के सहयोग संवेदनों से विकसित होती है और सुरक्षित भी रहती है।


संकेत में ऊपर यह कहा जा चुका है कि सामाजिक स्तर पर सम्बोधित वक्तव्य हो या व्यक्तिगत स्तर पर, दोनों में भावबिम्बों का व्यापार अत्यन्त प्रभावशाली रूप में कार्य करता है। परिवेश के संकटों को सम्बंधित करती और साथ ही उन संकटों में ऐहिक रुप से शामिल भगवत रावत की कविता अपने उच्चारण में स्वप्न और फैन्टसी का इस्तेमाल बेहद सन्दर्भ सूचक स्थितियों में करती है। नये कवियों में स्वप्न, चिन्तन प्रतीकों के कंट्रास्ट को आवेग देने के लिए प्रयुक्त हुआ है। बहुतायत में मुक्तिबोध और यत्र-तत्र अधिकांश समकालीन कवियों में राजनैतिक सामाजिक व्यंजकता को और गहरा करने में इस शैली का अपना योगदान रहा है। इसी तरह से फैन्टेसी निजी और सामूहिक संवेदना के वस्तुपरक अनुभव बिम्बों का संप्रेषण है। रावत जी के लिए ये दोनों आधुनिक काव्य प्रक्रिया के उपकरण, सांस्कृतिकता के सामयिक आग्रहों और सामाजिक यथार्थवादी मांसलता (या कहे मूर्तता) को काव्यानुभव के अर्जित संस्कारों के सन्दर्भ में देखने का माध्यम भर रहे हैं। उनकी व्याप्ति उनकी कविता में किसी भी तरह से भाषिक शिल्प या उपमानों के भंगिमा निर्माण में नहीं हुई है। और रावत अपनी समूहबद्ध स्वायत्तता में इतने शक्तिशाली है कि उनकी कविता को अधिक से अधिक सन्तुलित एवं द्वन्द्वात्म अन्विति के रूप में साधा जा सकता है।


एक रचना परम्परा की पड़ताल रचनाकार की पहचान को ही व्यक्त करती है। समकालीन कविता प्रसंगों में ‘प्रकृति’, विचार और कला के सन्तुलन को जीवन सहयोग और परिस्थितिगत सम्बद्धता के अनुकूलन में देखने का तत्त्व है। रावत जी के लिये प्रकृति कविता की रचनात्मक सम्भावनाओं में देश-काल की समृद्ध चेतना है। मानवी असमंजस और अहसासों की द्वन्द्वात्मक पुनर्रचना में प्रकृति एक वर्गीय चरित्र की भूमिका अपनाती दिखती है। अनुभव विस्तार के गलत सही अतिक्रमण रावत जी की प्रकृति में जीवन यथार्थ के निराश और जल्दबाज परिणामों का अनुसन्धान करते हैं। जीवन की सक्रियता की आड़ में किसी अराजक संकेत को रचनात्मक संकल्पों की अनुशासन की भाषा दे देने के विरुद्ध भगवत रावत की कविता में प्रकृति, विचार चेतना के प्रस्थान बिन्दु को तलाशती है। इसलिए भौतिक अन्तःसंघर्षो की समझ और आवश्यक नतीजे तक पहुँचने के लिए प्रश्नाकांक्षा तथा विडम्बना के सूत्र यहाँ रुकते नहीं। प्रायोजित युक्तियों और किराये के भाव व्यापारों से दूर भगवत रावत नसीहतों के नहीं नतीजों के कवि हैं। जैसा कि नामवर जी कहते हैं कि हर बड़ा कवि अपने समय के सौन्दर्यबोध को बदलता है। साथ ही साथ वह अपने चुने गये संसार की सम्वादधर्मिता भी बदलता है या कहें कि एक समूची युग चेतना को नये सिरे से रिहेबिलिटेट (पुनर्वासित) करता है। हर सजग कवि सभ्यताओं के अन्दरुनी विवेक को खंगालता हैं और परम्परा के ध्रुवींकरण को जीवन के सौन्दर्यबोध में तोड़ता है। रावत हमारे समय के जरूरी कवि है। जरूरी कई आयामों में (भले ही कई मायनों में नहीं)। भाषिक बड़बोलेपन और डरावनी चीख पुकार के बेतरतीब उद्वेलनों के बीच रावत जैसे कवि की उपस्थिति एक प्रौढ़ प्रत्याशा की उपस्थिति है। जीवन के आडम्बर से दूर मेहनतकश अनुभवों की बारीकियों के साथ।







(युवा आलोचक सुबोध शुक्ला ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शोध किया है और आजकल गंभीर आलोचनात्मक लेखन में व्यस्त हैं.)   


टिप्पणियाँ

  1. सारगर्भित लेख ....धन्यवाद सुबोध जी

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  2. भागवत रावत जी की रचनाधर्मिता और काव्य बोध की गहन पड़ताल करता सारगर्भित लेख |''रावत जी का काव्यबोध कविता के दायरे में एक समूह की सह्रदयता का निर्माण करता है भीड़ के सिनिसिज्म का नहीं ''बिलकुल सटीक वाक्य |स्वयं भगवत जी के शब्दों में ''मै कविता को एक अनिवार्य सांस्कृतिक संवाद मानता हूँ जो किसी के चाहने पर भी कभी खत्म नहीं होगा |इस संवाद में मै अपनी भूमिका एक उत्तरदायी नागरिक से ना कम ना ज्यादा मानता हूँ |और यह भी कि यदि मै इस भूमिका का निर्वाह अपनी समस्त रचनात्मक शक्ति और ईमानदारी से नहीं करता रहूँगा ,तो आने वाले समय में कोई बड़ा लेखक या कवि भी पैदा नहीं होगा |''''कविता अपने लिए''जैसे एक सीमित संकीर्ण परिवेश (माहौल)में रावत जी उन गिने चुने रचनाकारों में रहे जिनकी सोच और चिंतन का दायरा व्यक्तिपरक ,समाज परक से आगे मनुष्यगत प्रसंगों -भावों को स्पर्श करता है| उनका काव्यबोध , रचनाधर्मिता के वास्तविक उद्देश्य को पूर्ण कर एक उत्तरदायी नागरिक होने के कर्तव्य का निर्वहन करता है.|....बहुत अच्छा लेख ...धन्यवाद सुबोध जी

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  3. अनहद में इस लेख को पढ़ा था ..आज "पहली बार" ब्लाग पर इसे दुबारा पढ़ने का अवसर मिला ...इस बीच भगवत जी इस दुनिया से विदा भी हो गए | क्या कहा जाए उनके बारे में ? बस यही कि उनका जीवन उनकी कविता से अलग नहीं था , और जैसा उन्होंने लिखा वैसा ही जिया भी | यह सादगी और सरलता, जो उनकी कविताओं में थी , वही उनके जीवन का हिस्सा भी बनी , और इसी के सहारे उन्होंने अपने जीवन को इतना ऊँचा भी उठाया | उनकी स्मृति को नमन और आत्मीय लेख के लिए सुबोध जी का आभार |

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  4. कवि भगवत रावत के कविता की अन्‍त:प्रकृति और उसके दूरगामी प्रभाव को समझने की दृष्टि से सुबोध शुक्‍ल का यह विवेचन एक नया आलोचनात्‍मक अनुभव देता है। मैं सुबोध की आलोचना-भाषा और उनकी विवेचन-पद्धति से गुजरते हए विस्मित रह जाता हूं कि वे कितनी संश्लिष्‍टता से अपनी अवधारणाओं और बहुआयामी आशयों को कलात्‍मकता के साथ बुनते हैं और उसमें एक लय पैदा करने का प्रयत्‍न करते हैं। हालांकि इसमें अर्थ-ग्रहण के खतरे भी कम नहीं हैं, वे अपने पाठक से अच्‍छी खासी साहित्यि‍क और सांस्‍कृतिक तैयारी की अपेक्षा करते हैं, उनका हर वाक्‍य इतना सुचिन्ति‍त और संदर्भबहुल होता है कि उसके निहितार्थ को समझने में अच्‍छी खासी मशक्‍कत करनी पड़ सकती है, लेकिन निश्‍चय ही इससे हिन्‍दी आलोचना समृद्ध होती है और यह अपने आप में एक उपलब्धि है। सुबोधजी को इस बेहतरीन विवेचन के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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  5. आलोचना के गद्य को पद्य के बराबर बैठा देने वाला आलेख.रामस्वरूप चतुर्वेदी जी जिसे 'आलोचकथा' कहें.विन्यासक्रमिकता को जैसे कविता तोड़ती है वैसे ही सुबोध का गद्य.रोमन यकोब्सन ने कभी 'metanimical prose'का स्वप्न देखा था.पढ़ने में वैसा ही आनंद.आलोच-भाषा की कतिपय शिकायतें सुबोध के साथ दूर हो जाती हैं.अब आप भगवत जी जैसे 'ज्यों मुख मुकुर मुकुर निज पानी' कवि की झिलमिल शब्द-अर्थ छवियों को पा सकते हैं;बिना विचारधारात्मक जुमलों के.
    मेरा प्रस्ताव है कि सुबोध के इधर के कुछ लेखों के आधार पर हिंदी साहित्य और आलोचना की प्रकृति पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है.शुरुवात गद्य के उस देशी चरित्र को केन्द्र में रखकर हो सकती है जो सुबोध के लेखन में से बहुत वर्षों बाद उभर कर आ रही है.हिंदी का यह जातीय गद्य है जो अब तक गायब रहा,दबाया गया,उपेक्षित रहा.

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  6. सार्थक व सटीक प्रस्‍तु‍ति।

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  7. आलोच-गद्य को पद्य के बराबर खड़ा कर देने वाला आलेख.जिसे रामस्वरूप जी कहें 'आलोच-कथा'.रोमन यकोब्सन ने कभी metanimical prose का स्वप्न देखा था.अन्यत्र तो नहीं,पर युवा सुबोध में वही प्रौढ़ता.आश्चर्य है कि गद्य की विन्यास्क्रमिकता को आलोचना में भी भंग किया जा सकता है,ठीक कविता और कुछ कुछ कथा की तरह,
    सुबोध के इधर के कुछ लेखन को देखकर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि यह हिंदी गद्य के जातीय छंद की वापसी है.बीच में इसे कभी अनजाने तो कभी जान-बूझकर दबाया,कुचला,उपेक्षित किया गया.
    बिना विचारधारात्मक जुमलेबाजी के भगवत जी की कविता का ऐसा पठन दुर्लभ है.सुबोध के लेखन को केन्द्र में रख मैं हिंदी आलोचना और साहित्य की प्रकृति पर पुनर्विचार की प्रस्तावना रखता हूँ.

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  8. बहुत अर्थपूर्ण पाठ है, भगवत रावत की कविता का. सुबोध शुक्ल आलोचक के रूप में अपने भविष्य के प्रति बेहद आश्वस्त करते हैं. बधाई, भरपूर.

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  9. भगवत रावत की कविता पर यह एक अच्छा लेख है।
    युवा आलोचक सुबोध शुक्ल इधर लगातार अपने आलोचनात्मक लेखन से
    ध्यान खींच रहे हैं। यह एक शुभसंकेत है। बधाई।

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    1. सारगर्भित लेख. सुबोध आलोचक के रूप में आश्वस्त करते हैं. उनकी आलोचक दृष्टि बहुत नाप-तौल कर समग्र चिंतन को सामने रखती है. बधाई सुबोध.

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  10. भागवत रावत जी की रचनाधर्मिता और काव्य बोध की गहन पड़ताल करता सारगर्भित लेख |''रावत जी का काव्यबोध कविता के दायरे में एक समूह की सह्रदयता का निर्माण करता है भीड़ के सिनिसिज्म का नहीं ''बिलकुल सटीक वाक्य |स्वयं भगवत जी के शब्दों में ''मै कविता को एक अनिवार्य सांस्कृतिक संवाद मानता हूँ जो किसी के चाहने पर भी कभी खत्म नहीं होगा |इस संवाद में मै अपनी भूमिका एक उत्तरदायी नागरिक से ना कम ना ज्यादा मानता हूँ |और यह भी कि यदि मै इस भूमिका का निर्वाह अपनी समस्त रचनात्मक शक्ति और ईमानदारी से नहीं करता रहूँगा ,तो आने वाले समय में कोई बड़ा लेखक या कवि भी पैदा नहीं होगा |''''कविता अपने लिए''जैसे एक सीमित संकीर्ण परिवेश (माहौल)में रावत जी उन गिने चुने रचनाकारों में रहे जिनकी सोच और चिंतन का दायरा व्यक्तिपरक ,समाज परक से आगे मनुष्यगत प्रसंगों -भावों को स्पर्श करता है| उनका काव्यबोध , रचनाधर्मिता के वास्तविक उद्देश्य को पूर्ण कर एक उत्तरदायी नागरिक होने के कर्तव्य का निर्वहन करता है.|....बहुत अच्छा लेख ...धन्यवाद सुबोध जी......... वंदना शुक्ला

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  11. आलोचना के क्षेत्र में सुबोध शुक्ला तेजी से उबरता हुआ नाम हैं, हमें उनसे बहुत उम्मीदें हैं ..भगवत रावत की कविताओं की सम्यक पड़ताल करता उनका यह लेख निश्चित रूप से अथक श्रम, लगन और गहरे शोध का परिचायक है ..उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ .....वंदना शर्मा

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  12. सर , मै इस बात को लेकर गौरान्वित महसूस करता हूँ की मैंने अपनी जिंदगी के कुछ साल आपके सान्निध्य में गुजरा है..जिस मानसिक धरातल को छुआ था मलयज के रामचंद्र शुक्ल को पढ़कर ..वही पंहुचा आज आपका लेख पढ़कर..मिथ में बदलता आदमी ..पल पल का हिसाब लेती कविता ..आभारी हूँ आपका.. ऐसा लेख पढ़ने का अवसर देने के लिए

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  13. सुबोध ने अपने आलोचना कर्म से इधर ध्यान खींचा है. उनके पास आलोचना की अपनी समझ है और भाषा की एक नई चमक. भविष्य के लिए उन पर भरोसा होता है. यह लेख गहराई में जाकर भगवत जी के रचनाकर्म को टटोलता है.

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  14. सुबोध की भाषा और शिल्प मुझे विस्मित करता है और मैं उनके लिखे को हमेशा एक से अधिक बार पढ़ती हूँ.. भगवत रावत जी ने सरलता को साधा था और यह काफी दुष्कर कार्य है..उनकी कवितायेँ लोक की कवितायेँ हैं .. और कोई भी अनपढ़ व्यक्ति भी उनकी कविताओं को समझ सकता है .. एक बार कविता पढने के बाद मन पर छप जाती है.. उनकी परम्परा के कवि इधर देखने पढने को नही मिलते.. सुबोध जी को मैं हार्दिक बधाई और धन्यवाद देती हूँ कि उन्होंने भगवत रावत जी पर ये लेख लिखा .. संतोष जी पहली बार के निरंतर साहित्य कर्म के प्रति समृद्ध होने की अनंत शुभकामनाये..

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  15. बहुत ही सार्थक समीक्षात्मक लेख , भगवत जी के लेखन-कर्म के सभी पहलुओं की पड़ताल करते हुए उनके लेखन की सभी बारीकियों को आपने सामने रख दिया , बधाई सुबोध भाई........

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  16. Creative.
    Beware! the so called critics of (Hindi)literature.
    Thanks to Santosh ji and my good wishes to Subodh.

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  17. सुबोध को पढते हुए हमेशा लगता है कि आलोचना एक नयी भाषा और दृष्टि के लिए बेचैन है . इस लिहाज़ से सर्वेश सिंह की प्रस्तावना महत्वपूर्ण है . तथापि हिंदी का एक आम पाठक आलोचना से उम्मीद करता है कि वह कविता से उस की आत्मीय और अचूक पहचान बनाने में मदगार हो . आखिर बैलगाड़ी जैसी कविता में परिचित ग्राम -नास्टेल्जिया से अलग नया कवितापन क्या है . चिड़ियों वाली कविता पर टीप देखिये तो लगता है व्याख्या की भाषा कविता की तुलना में ज्यदा दुर्गम हो गयी है .

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  18. आशुतोष जी , नास्टेल्जिया मात्र अतीतधर्मिता का रमणीक छायावाद नहीं है या न ही आधुनिकता की चिढ से पैदा कोई ऊब जो पलायन पैदा करे. मैं नास्टेल्जिया को एक समूची जीवन-व्यवस्था में इतिहास और वर्तमान-बोध का विवेकपूर्ण सामजस्य मानता हूँ.

    मेरे देखे एक सफल कविता अपनी व्याख्या स्वयम होती है. आलोचना उसे वैचारिक-संवेगों की युगीन अंतर्वस्तु से जोड़ने का काम करती है, दृष्टिकोणों का विकल्प देती है.जिसे इलियट ने ' critical performativity' कहा है. वह निरी व्याख्या की विधा मात्र ही नहीं है- टीका सूचकांकों की तरह........

    भाषा के प्रति मेरा अपना आग्रह है.कह सकते हैं एक हद तक दुराग्रह

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  19. आशुतोष जी , नास्टेल्जिया मात्र अतीतधर्मिता का रमणीक छायावाद नहीं है या न ही आधुनिकता की चिढ से पैदा कोई ऊब जो पलायन पैदा करे. मैं नास्टेल्जिया को एक समूची जीवन-व्यवस्था में इतिहास और वर्तमान-बोध का विवेकपूर्ण सामजस्य मानता हूँ.

    मेरे देखे एक सफल कविता अपनी व्याख्या स्वयम होती है. आलोचना उसे वैचारिक-संवेगों की युगीन अंतर्वस्तु से जोड़ने का काम करती है, दृष्टिकोणों का विकल्प देती है.जिसे इलियट ने ' critical performativity' कहा है. वह निरी व्याख्या की विधा मात्र ही नहीं है- टीका सूचकांकों की तरह........

    भाषा के प्रति मेरा अपना आग्रह है.कह सकते हैं एक हद तक दुराग्रह

    ....................सुबोध शुक्ल

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  20. आशुतोष जी , नास्टेल्जिया मात्र अतीतधर्मिता का रमणीक छायावाद नहीं है या न ही आधुनिकता की चिढ से पैदा कोई ऊब जो पलायन पैदा करे. मैं नास्टेल्जिया को एक समूची जीवन-व्यवस्था में इतिहास और वर्तमान-बोध का विवेकपूर्ण सामजस्य मानता हूँ.

    मेरे देखे एक सफल कविता अपनी व्याख्या स्वयम होती है. आलोचना उसे वैचारिक-संवेगों की युगीन अंतर्वस्तु से जोड़ने का काम करती है, दृष्टिकोणों का विकल्प देती है.जिसे इलियट ने ' critical performativity' कहा है. वह निरी व्याख्या की विधा मात्र ही नहीं है- टीका सूचकांकों की तरह........

    भाषा के प्रति मेरा अपना आग्रह है.कह सकते हैं एक हद तक दुराग्रह

    ......................... सुबोध शुक्ल

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  21. बधाई सुबोध जी को..सुन्दर सारगर्भित लेख !

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  22. bahut achcha aalekh. badhai subodh aur pahli baar ko shubh kamnayen.

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  23. मुझे तो भाषा कहीं से अवरोध नहीं लगी. आलोचना की शर्त यह नहीं कि वह कविता से आसान हो. शर्त यह है कि वह कविता तक पहुँचने की प्रविधि बताये, रास्ते खोले. सुबोध ने जिस आत्मीयता और गहन दृष्टि सम्पन्नता से भगवत जी का अनुशीलन किया है, वह मुझ जैसे पाठक के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है. बधाई भी, धन्यवाद भी,

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