मार्कण्डेय जी




मार्कण्डेय जी की ख्याति आमतौर पर एक कहानीकार की रही है लेकिन उनके कवि रूप से लोग कम ही परिचित हैं। ‘सपने तुम्हारे थे’ और ‘यह धरती तुम्हें देता हॅू’ जैसे काव्य संग्रह उनके कवि रूप के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। कविताओं की उनकी बेहतर समझ ‘कथा’ के सम्पादन में स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ती थी। उनकी द्वितीय पुण्य तिथि 18 मार्च के अवसर पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं उनकी ही एक पसन्दीदा कविता जिसे वे प्रायः सुनाया करते थे।








चोर को चोर कहना



चोर को चोर कब नहीं कहना चाहिए
कभी मैंने पूछा था चाचा से
तब वे चुप रह गए थे
कल एकाएक अपनी धॅसी ऑखें
मुलमुलाते हुए बोले-
चोर को उस समय चोर नहीं कहना चाहिए
जब वह उॅची मेंड़ पर खड़ा हो
और उसके हाथ में लाठी हो
जब वह भाग रहा हो और सामने
ठाकुर की बखरी की अॅधेरी कोली हो,
जब गॉव का मुखिया उसे
अपना मौसेरा भाई कहता हो
जब वह राजा का मित्र या साला हो
अथवा अफसर अदना या आला हो
या गॉव का नाई हो
जिससे तुम्हें छिलवानी हो खोपड़ी
बाप के शुद्धक में
अथवा उसे भी जिससे कहीं
दबती हो तुम्हारी नस
उस प्रोफेसर को तो कतई नहीं
जो तुम्हारा परीक्षक भी हो,
उस औरत को भूल कर नहीं
जो गुण्डों अथवा डाकुओं की रखैल हो,
तस्कर अथवा शराब के व्यापारी को तो
सपने में भी नहीं,
किसी थानेदार को चोर कहना
सिर पर है आफत का लेना,


बस समझ गया चाचा
अब बताइए कि
चोर को कब चोर कहना चाहिए
तो सुनो बेटा
इस दोपाये आदमी की
मोटा मोटी दो ही कोटियां हैं
अगर वह हीन है
तो उस चोर को वह उछल कर मारेगा चाटा
जो लाचार और बेचारा हो
और दुखों में बुरी तरह कल्हारा हो



लेकिन श्रेष्ठ जन चोर को चोर
हुॅकार कर तब कहते हैं
जब उस चोर का सरदार
देश का अलमबरदार हो
चाहें उसके हाथ में मोटा डण्डा हो
चाहें फॉसी का मोटा फन्दा


टिप्पणियाँ

  1. nishchay hi markandey ji ek achhe kathakar wa sampadak ke sath hi ek achhe kavi bhi the.yah jarur hai ki log unke kavi rup se kam parichit hain. dada ki dusari punyatithi par unki ek achhi kavita padhawane ke liye aapko bahut dhanyabad..

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  2. लगता है , अभी आज ही लिखी गयी है ..

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  3. मार्कण्डेय की कहानी के अलावा कविता का उपहार बहुत कम लोगों को पता है ऐसे में इस कविता का मूल्य उनकी रचनात्मक प्रतिभा को और भी आगे ले जाता है...अद्भुत कविता है...

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  4. जनपक्षधर कविता ...उनकी स्मृति को नमन

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  5. चोर के बहाने देश और समाज को खोज रही ,खोल रही कविता ।

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  6. वाह. कविता भी उतनी ही मारक
    मार्कण्डेय जी को हार्दिक श्रद्धांजलि....

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  7. वाह ! बहुत अच्छी कविता , सीख की तरह भी है कविता ,

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  8. देश की परिस्थितियां इस कविता में पूर्णतः अभिव्यक्ति होती है !

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