प्रतुल जोशी










पोनुंग पार्टी









अभी सो रही है पोनुंग पार्टी
बेख़बर, अलमस्त,
प्रातः की इस नव बेला में
जब सूरज अपनी ज़िम्मेदारी निभाता
उठ जाता है बहुत सबेरे
यहां देश के इस भू-भाग में
(जिसका नाम
सूर्य के ही एक पर्यायवाची के नाम पर
रख दिया था
किसी ने वर्षों पहले)
रात भर रही होंगी
नृत्य में मशगूल
वर्ष के यह चार दिन
आते हैं
इन सबके हिस्से
जब कोई नहीं कहता
कि उठो,
देखो सूरज चढ़ आया है
बस्ती के ऊपर
और तुम सब
सो रही हो अब तक
अलग-अलग बस्तियों(1) में
सक्रिय हो जाती है पोनुग पार्टी
अलग-अलग रंगों के गाले(2)
ढेर सारी मालाऐं
कमर में उगी(3)
हाथों में कोंगे(4)
किने नानी(5) को याद कर
मिरी(6) के बोलों पर
हाथों में हाथ डाले
शुरू कर देती हैं
सब मिल कर पोनुंग(7)
(घड़ी के पेंडुलम  सी
दांयें से बांयें
बांयें से दांयें हिलती
आगे बढ़ती)
दो लाइनें मिरी की
फिर उन्हीं लाइनों को दुहराती
रात भर
नृत्य करती है
पोनुंग पार्टी
क्या कहता है मिरी
क्या है
उसके अबूझ
बोलों का अर्थ
न जाने कितना समझती हैं
न जाने कितना बूझती हैं
बस नृत्य करती रहती हैं
रात भर
एक सी गति
एक सी लय
एक सा धैर्य
एक सा विचार
मालूम है सबको
आ पहुँचा है सोलुंग त्यौहार
नहीं है
किसी को ध्यान
बीत रहा
कौन सा प्रहर रात्रि का
और
शेष है कितना समय
प्रातः की बेला का
जीवन और दुनिया की
जटिलताओं से दूर
मस्त है
अपने गीतों में
बस्ती की पोनुंग पार्टी
अगले दिन होगा
दावतों का दौर
दिन भर
जायेंगी सब
बस्ती के घरों में
खाऐंगी मिथुन(8)
या फिर गावरी(9)
हो सकता है
मिल जाये मुर्ग़ा भी
यह तो तय हैं
होगा काला अपुंग(10)
शाम ढलते
फिर सक्रिय हो जायेगी
पोनुंग पार्टी
कुछ नये सदस्य जुड़ेंगे
कुछ करेंगे आज आराम
देश के मुख्य भू-भाग से दूर
यहां न सीता है, न राम
चार दिनों तक
नाच कर भी
नहीं थकेगी
पोनुंग पार्टी
नहीं जाना है
इनको दिल्ली
नहीं जाना है विदेश
यह तो
बस मस्त हैं अपने पासीघाट में
यिंगकियोंग में
या फिर आलोंग में
हां देख लेते हैं कभी-कभी
बस
ईटानगर या फिर
डिब्रूगढ़ तक
जाने का सपना भी








यह कविता अरूणाचल प्रदेश के ज़िलों ईस्ट सियांग, वेस्ट सियांग और अपर सियांग में निवास करने वाली आदी जनजाति के प्रमुख त्यौहार सोलुंग में होने वाले नृत्य पोनुंग पर आधारित है। पोनुंग में भाग लेने वाले सदस्यों की टीम को ‘‘पोनुंग पार्टी’’ कहा जाता है।



संकेत



1.  अरूणाचल में गांवों को ‘बस्ती’ से संबोधित किया जाता है।
2.  महिलाओं द्वारा साड़ी के स्थान पर पहने जाने वाला वस्त्र। यह लुंगी की तरह होता है और प्रायः    महिलायें इसे करघे पर स्वयं निर्मित करती है।
3.  करघनी
4.  अलमूनियम या पीतल के आभूषण जो कलाई के ऊपर पहने जाते हैं।
5.  सोलुंग पर्व की देवी
6.  पुजारी जो हाथों में चिमटा जैसे यंत्र को लेकर गीत के बोल प्रारम्भ करता है।
7.  महिलाओं द्वारा किया जाने वाला सामूहिक नृत्य।
8.  बैल और भैस के बीच का जानवर जिसकी अरूणाचल के विभिन्न पर्वो पर बलि दी जाती है।
9.  सुअर
10.  चावल से बनी देसी बीयर ।



मो0- 09452739500



टिप्पणियाँ

  1. मेरे विचार से पूर्वोत्तर के बारे में बताने का इससे अच्छा कोई और तरीका हो ही नहीं सकता!
    बहुत सटीक वर्णन किया है. लगे रहो.
    शुभकामनाएं.

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  2. सीधे सच्चे लोगों की ...सीधी सादी दुनिया....सरल सी ज़िंदगी !
    जिसमें कष्ट हैं...संघर्ष है....कड़ा परिश्रम है ......किन्तु उतनी ही जीवेष्णा भी है.....जीवन के प्रति आभार है...उत्साह है !
    छोटी छोटी खुशियाँ हैं ......उल्लास है....उछाह है !
    वो आनंदित हैं अपने सोलुंग त्यौहार में....
    रात भर नाचने में .....गाने में.....दावतों में....चार दिनों का ये महोत्सव ...और फिर वे जुट जायेंगे दिन रात की मशक्कत में....
    कोई बहुत बड़ा स्वप्न नहीं है उनकी आँखों में.....न दिल्ली जाना है..न विदेश...
    संतुष्ट हैं......जो है...जितना है...उतने भर में !
    सीधा सरल पर बहुत ही गहन सा...ये जीवन दर्शन ....सीखने योग्य !
    बहुत सुन्दर कविता ...बधाई !

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  3. good one sir...lookin forward for more (ur walking n experience wid D people n culture of D LAND OF RISISNG SUN)

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