राजेश जोशी





नाम में क्या धरा है





चेहरे याद रहते हैं
और आजकल लोगों के नाम मैं अक्सर भूल जाता हूँ



वह जो कुछ देर पहले ही मिला बहुत तपाक से
और बातें करता रहा देर तक
पच जाता है दिमाग पर उसका नाम याद नहीं आता
मन ही मन अपने को समझाता हूँ कि इसमें कुछ भी अजीब नहीं
दुनिया के लगभग सारे कवि भुलक्कड़ होते हैं



कवि का काम है सृष्टि की अनाम रह गयी चीजों को नाम देना
पहले ही रख दिये गये नामों को याद रखना मेरा काम नहीं
कवि तो कभी भी अपनी एक रहस्यमयी भाषा में
पेड़ों परिन्दों और मछलियों से
जब चाहे बतिया सकता है
वह हवा की दीवार पर दस्तक देकर पत्थरों से कह सकता है
कि दरवाजा खोलो और मुझे अंदर आने दो
वह मक्खी की उदासी को पढ़ सकता है
और लौट कर जाती हुई चीटिंयों की कतार से
उनके घर का रास्ता पूछ सकता है



लगभग तीस बरस बाद मेरे घर आया बचपन का एक दोस्त
दरवाजे पर खड़ा है और रट लगाये हुए है
कि पहले मेरा नाम बता तभी मैं आऊँगा घर के भीतर
मैं बताता हूँ उसे बचपन की दर्जनों बाते
कि हम स्कूल में साथ साथ पढ़ते
कि तूने गणित की कापी का पन्ना फाड़ कर हवाई जहाज बना दिया था
कि तेरी उस दिन बहुत पिटाई हुई थी
कितनी बातें याद आती हैं पर उसका नाम याद नहीं आता
मैं एक दार्शनिक जलेबी बना कर उसे बहलाने की कोशिश करता हूँ
कि नाम क्या है , एक चेहरे का अमूर्तन ही तो है
इस समय जब तू मेरे सामने है
तो मैं मूर्त चेहरे से उसके अमूर्तन को क्यों याद करूँ
जब तू यहाँ नहीं होगा मतलब मेरे सामने
और मुझे तेरी याद आयेगी
तब तेरे नाम से मैं तेरे चेहरे को याद करूँगा
वह मुस्कुराता है कहता है
तुम कवि हो न , बातें बनाना सीख गये हो !


अपने इस भुलक्कड़पन के कारण कितनी बार
मैं कहाँ कहाँ अपमानित होता हूँ
पर सोचता हूँ कि भूल जाना कितनी बड़ी नियामत है
इतने दुख इतने अपमान जो जीवन में सहने ही होते हैं सब को
याद रख कर कोई कैसे जी सकता है भला



हो सकता है मैं थोड़ा ज्यादा ही भुलक्कड़ हूँ
मैं एक अदना सा कवि हूँ
जो बड़े कवियों की आदत की आड़ में
छिपने कोशिश कर रहा हूँ



मुझे माफ करो
मुझे माफ करो
मुझे माफ करो
तुम्हारी शक़्लें मुझे याद रहीं और तुम्हारे नाम मैं भूल गया
मेरे प्यारे दोस्तो मुझे माफ करो
आदि काल से कवियों को माफ करता आया है यह समाज



दुनिया के एक महान कवि ने कभी कहा था
नाम में क्या धरा है ?







सिर छिपाने की जगह





न उन्होंने कुण्डी खड़काई न दरवाजे पर लगी घंटी बजाई
अचानक घर के अंदर तक चले आये वे लोग
उनके सिर और कपड़े कुछ भीगे हुए थे
मैं उनसे कुछ पूछ पाता इससे पहले ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया
कि शायद तुमने हमें पहचाना नहीं
हाँ....पहचानोगे भी कैसे
बहुत बरस हो गये मिले हुए
तुम्हारे चेहरे को , तुम्हारी उम्र ने काफी बदल दिया है
लेकिन हमें देखो हम तो आज भी बिल्कुल वैसे ही हैं
हमारे रंग ज़़रूर कुछ फीके पड़ गये हैं
लेकिन क्या तुम सचमुच इन रंगों को नहीं पहचान सकते
क्या तुम अपने बचपन के सारे रंगों को भूल चुके हो
भूल चुके हो अपने हाथों से खींची गयी सारी रेखाओं को
तुम्हारी स्मृति में क्या हम कहीं नहीं हैं ?
याद करो यह उन दिनों की बात है जब तुम स्कूल में पढ़ते थे
आठवीं क्लास में तुमने अपनी ड्राइंग कापी में एक तस्वीर बनायी थी
और उसमें तिरछी और तीखी बौछारों वाली बारिश थी
जिसमें कुछ लोग भीगते हुए भाग रहे थे
वह बारिश अचानक ही आगयी थी शायद तुम्हारे चित्र में
चित्र पूरा करने की हड़बड़ी में तुम सिर छिपाने की जगहेें बनाना भूल गये थे
हम तब से ही भीग रहे थे और तुम्हारा पता तलाश कर रहे थे



बड़े शहरों की बनावट अब लगभग ऐसी ही हो गयी है
जिनमें सड़कें हैं या दुकानें ही दुकानें हैं
लेकिन दूर दूर तक उनमें कहीं सिर छिपाने की जगह नहीं
शक करने की आदत इतनी बढ़ चुकी है कि तुम्हें भीगता हुआ देख कर भी
कोई अपने औसारे से सिर निकाल कर आवाज़ नहीं देता
कि आओ यहाँ सिर छिपा लो और बारिश रूकने का इंतज़ार कर लो
घने पेड़ भी दूर दूर तक नहीं कि कोई कुछ देर ही सही
उनके नीचे खड़े हो कर बचने का भरम पाल सके
इन शहरों के वास्तुशिल्पियों ने सोचा ही नहीं होगा कभी
कि कुछ पैदल चलते लोग भी इन रास्तों से गुजरेंगे
एक पल को भी उन्हें नहीं आया होगा खयाल
कि बरसात के अचानक आ जाने पर कहीं सिर भी छिपाना होगा उन्हें
सबको पता है कि बरसात कई बार अचानक ही आ जाती है
सबके साथ कभी न कभी हो चुका होता है ऐसा वाकिया
लेकिन इसके बाद भी हम हमेशा छाता लेकर तो नहीं निकलते
फिर अचानक उनमें से किसी ने पूछा
कि तुम्हारे चित्र में होती बारिश क्या कभी रूकती नहीं
तुम्हारे चित्र की बारिश में भीगते लोगों को तो
तुम्हारे ही चित्र में ढूंढनी होगी कहीं
अपने सिर छिपाने की जगह


उन्होंने कहा कि हम बहुत भीग चुके हैं जल्दी करो और बताओ
कि क्या तुमने ऐसा कोई चित्र बनाया है
जिसमें कहीं सिर छिपाने की जगह भी हो ?




हाथ और सिक्के



मेरे हाथ और मेरी जेब में रखे सिक्के
छिपने और ढूंढे जाने का खेल खेलते रहते रहे हैं ।



बरसों से इसी तरह मुसलसल जारी है यह खेल
कभी कभी किसी सिक्केे को मेरी उंगलियाँ ढूंढ लेती है
लेकिन जैसे ही उसे दबोच कर बाहर निकालता है मेरा हाथ
बाजार किसी दुष्ट लड़के की तरह अचानक आता है
और सिक्के को छीन कर भाग जाता है ।



फिर उसी खेल में लग जाते हैं मेरे हाथ
हाथ ढूंढते रहते हैं
और वो नहीं मिलते
कभी कभी जेब से बाहर निकल कर
वह कहीं और छिप जाते हैं
मैं चिल्ला कर कहता हूँ
यह खेल के नियम के विरूद्ध है !
सिक्के खिलखिलाते हैं चिढ़ाते हुए कहते हैं
खेल के नियम बनाना तुम्हारा काम नहीं
यह हमारा काम है , अपने खेल के नियम हम खुद बनाते हैं
खेलना हो तो खेलो वरना खेल से बाहर कर दिये जाओगे
हमेशा के लिये !






मेरी कविता का चाँद



गेलीलिओ ने जब चाँद के बारे में बोलना शुरू किया
तो मैं चाँद से नीचे गिर गया ।



मैं तो मजे मजे में चाँद पर टहल रहा था
कि मेरी कविता का चाँद वह चाँद नहीं
गेलीलिओ जिस पर अपनी दूरबीन से
ताकझांक करता रहता है



मैं चाँद से नीचे गिरा
तो मेरी आँख में रखा सपना गिरकर
शक्कर से बने खिलौने की तरह टूट गया
बादल मेरी नींद को लेकर चम्पत हो गये
जैसे वह भूत की लंगोटी हो
उड़ गये मेरी कविता के कागज़ जाने कहाँ कहाँँ
मेरे टाइपराइटर की की-बोर्ड के अक्षर
बिखर गये आकाशगंगा में ।



मैंने चिल्ला कर कहा गेलीलिओ से
तुम्हें अगर चाँद के बारे में बोलना है
तो तुम अपना खुद का चाँद ढूंढ लो
मेरी कविता के चाँद पर तुम्हारा उत्पात
नहीं चलेगा !






नसरगट्टे



कई बार तुमने उन बच्चों को देखा होगा
वो कभी स्कूल नहीं गए
गए भी तो दो चार दिन में ही भाग आए
कि उन स्कूलों में मास्टर बहुत मरखने थे
और उसके बाद किताबों में कभी उनका मन नहीं लगा



उनके पिताओं ने उन्हें चाय की गुमटियों , ढाबों
या हैसियतदारों के घरों में काम पर लगा दिया
वो समय से काम पर जाने के लिये पीटे गये
और छोटी मोटी गल्तियाँ करने पर उनके मालिकों ने उन्हें पीटा
वो हर कभी, हर जगह पीटे गये
वो जहाँ भी पीटे गये वहाँ से भाग खड़े हुए



अपनी छोटी मोटी ज़रूरतों के लिये उन्होंने
चोेरियाँ करना सीखा
पकड़ में आने पर लोगों द्वारा पीटे गये
और थानों में ले जाये गये
तो पुलिस वालों ने उनकी धुनाई की


वो इतने पिट चुके हैं कि रोना भूल गये है
उन्हें नसरगट्टा कहा जाता है
मार का जिस पर कोई असर नहीं होता
दुख जैसा कोई शब्द उनके पास नहीं
इस क्रूरता के बीच भी लेकिन कमाल की शरारतें
हमेशा उनके दिमागों से उपजती रहती हैं
कभी कभी जब ऊब एक थकी हुई दोपहर को
अपने आगोश में समेट लेती है
उनकी शरारतें उनके दिमागों से बाहर निकलती हैं
चाकूबाज किस्म के गुण्डे और क्रूर हो चुके पुलिस वाले भी
तब हँस हँस कर दोहरे हो जाते हैं
कम से कम उन पलों में कुछ देर को ही सही
सबसे क्रूर लोग भी मनुष्य की तरह नज़र आते हैं
बहुत धीमी ही सही लेकिन उस समय
चट्टानों के पीछे से पानी की आवाज़ आती है ।



इन बच्चों को इस तरह की शरारत करते तुमने
कई बार अपने आसपास के ढाबों या चाय की गुमटियों पर देखा होगा ।

टिप्पणियाँ

  1. राजेश जोशी की कवितायें मुझे हमेशा आकर्षित करती हैं.वे मन के छोटे छोटे मोती पहचानते हैं.. हज़ारों ऐसी संवेदनाएं जो हौले से छू जाती हैं ..कविताओं के ये विषय और इतनी सादगी,सरलता भरी कहन कि कविता पाठक से सीधा रिश्ता बना लेती है.हर बात अपनी ही लगती है.लगता है हाँ यही तो हमारे साथ भी हुआ था,हाँ , हमने भी यही सोचा था..
    राजेश जोशी को पढ़वाने का शुक्रिया संतोष जी...

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  2. Vandana Shukla लाज़वाब...|.''मैंने चिल्लाकर गेलीलियो से कहा /तुम्हें अगर चाँद के बारे में बोलना है/तो तुम अपना खुद का चाँद ढूढ लो/मेरी कविता के चाँद पर/तुम्हारा उत्पात नहीं चलेगा/''...ये सिर्फ राजेश जोशी लिख सकते हैं ...|बहुत बहुत धन्यवाद संतोष जी |

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  3. rajesh joshi ji ki kavithaon se hameesha ki tarah main urja grahan kartha hoon. Acchi kavithayeim hain, beshak .

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  4. rajesh joshi ji ki kavithaon se hameesha ki tarah main urja grahan kartha hoon. Acchi kavithayeim hain, beshak .

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