शेखर जोशी









हमारे पसंदीदा कहानीकार शेखर जोशी ‘कोसी का घटवार’, ‘दाज्यू, ‘बदबू’ जैसी कालजयी कहानियों के लिए जाने जाते हैं। इधर पिछले दिनों शेखर दा बीमार पड़े। पता चला मस्तिस्क में दो जगह ब्रेन हैमेरेज है। आपरेन के सिलसिले में अस्पताल में रहे।

जैसा कि शेखर दा ने बताया कि अस्पताल मे उनके बगल में अवध के एक मुस्लिम किसान भी थे। शेखर दा उनसे बात करने के लिए कोई सूत्र ढूढ रहे थे जो आखिर मिल ही गया। इस कविता में पहाड़ के एक किसान की अवध के किसान से दिलचस्प बतकही है जिसमें कहानी का आनन्द भी है। वैसे यह कविता ‘कथन’ पत्रिका के जनवरी-मार्च 2012 अंक में प्रकाशित हुई है, लेकिन शेखर दा से हुई बातचीत के आलोक में ‘पहली बार’ में इस कविता को साभार प्रस्तुत करने का मोह संवरण नहीं कर पाया। एक और महीन-सी बात जो किसी भी रचनाकार के लिए एक सबक हो सकती है। पहले इस कविता की पॉचवीं पंक्ति में शेखर दा ने ‘बेटी का विवाह’ लिखा था। लेकिन बाद में सम्पादक संज्ञा जी को फोन कर इसमें एक सुधार करवा कर उन्होंने इसे ‘बेटी का निकाह’ करा दिया, जिससे कि जिन्दगी भर यह घटना एक याददास्त के तौर पर तरोताजी बनी रहे। यह एक उदाहरण है कि किस तरह एक रचनाकार एक एक ब्द के लिए जद्दोजहद करता है और अपने को अपनी ही रचना में प्रतिस्थापित करता है।



आभार,  न्नप्रसवा!





वे मौन हैं
अपने ही दुख से दुखी
शायद असाध्य बता दिया हो किसी ने उनका रोग
शायद चिन्तित हों बच्चों के बेसहारा हो जाने की आशंका से
बेटी का निकाह, बेटों की पढाई
घर की मरम्मत, पड़ोसी का स्वभाव
कुछ भी हो सकता है चिन्ता का कारण।



संवाद तो होना चाहिए, मैंने सोचा
वार्ड में पास पास पड़े अपने बिस्तरों पर हम दोनों
कब तक झेलेंगे यह सन्नाटा
बोल बतिया कर अपना दुख तो बांट सकते हैं।



मैंने शुरू किया मौसम से:
‘गर्मी बहुत है इस साल, न जाने कब पानी बरसे?’
‘हॅू’  उन्होंने कहा
मैंने छेड़ा राजनीति का रागः
‘चुनाव से पहले खूब दल-बदल हो रहा है’
‘बेहया हैं’  उन्होंने टिप्पणी की, फिर मौन की चादर ओढ ली
‘मास्साब, खेती बाड़ी तो होगी गॉव में?’  मैंने तुरूप का पत्ता फेंका
‘हॉ थोड़ी बहुत है, खाने भर को हो जाता है’
वे कुछ खुले, जैसे मैंने किसी दुलरूआ का जिक्र कर दिया हो
‘अच्छा बताएँ, धान भी होता है इधर?’
'हॉ, हॉ वही तो सहारा है'
उनकी ऑखों में मैंने देखी रोपाई वाले खेतों की तरलता।
‘बेहन तो अब तैयार हो गया होगा?’
मैंने अपना किसानी गोत्र दर्शाया 
'हॉ, इत्ता-इत्ता हो चला है’ उन्होंने एक हथेली के उपर
दूसरी हथेली की छॉव कर बताया
जैसे किसी बढवार बच्चे के कद को नाप रहे हों।
मैंने उनकी ऑखों में वैसा ही वात्सल्य भाव देखा।



अब संवाद चल पड़ा था
जैसे खेतों में नहर का पानी फैल रहा हो।
वह अवध का किसान
मुझसे पहाड़ की फसलों की जानकारी ले रहा था।
उनके खेतों के लहराते
‘मसूरी’, ‘सरजू बावन’, ‘नरेन्द्र’, ‘भदई’
और जलमग्न धानों की बालियों की गन्ध
मुझ तक पहुँच  रही थी
और शायद पहाड़ के ‘अंजनी’, ‘जड़िया’ और ‘बासमती’ की खुशबू
उनके नासापुटों में पहुँच चुकी थी।



हम दोनों बतिया रहे थे
अपनी हारी बीमारी भूल कर
अपने दुख और अपनी चिन्ताएँ बिसरा कर।



आभार, हमारी अन्नप्रसवा धरती!
माध्यम बनी तुम
हमारे बीच पसरा मनहूस सन्नाटा टूटा।



सम्पर्कः 100, लूकर गंज, इलाहाबाद, उ0 प्र0



टिप्पणियाँ

  1. एक महान कथाकार द्वारा लिखी अद्भुत कविता |संतोष जी आपको बहुत -बहुत बधाई और शेखर जोशी जी को सादर प्रणाम

    उत्तर देंहटाएं
  2. sunder kavita!!!!!!!prastuti ke liye saadhuvaad!!!!!!!!agar aadmi ke beech dharm jaati kshetra aur bhasha ke bajae aise samvaad sutra bane to baat hi kya hai...SHIVACH.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत जीवंत रचना... कविता में कथा का आस्‍वाद भी जीवन के बियाबान का लोमहर्षक आख्‍यान-अनुभूतियां भी... आभार संतोषज जी...

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें