भास्कर चौधरी की कविताएँ

भास्कर चौधरी



अपने समय की विडम्बनाओं को उजागर करना और इस क्रम में खुद अपने को खड़ा करना आसान काम नहीं होता. कवि अपने हुनर के जरिए इस कठिन काम को आसान बनाता है. भास्कर चौधरी आज के दौर के सुपरिचित कवियों में से एक हैं.उनकी नजर उन क्षेत्रों की तरफ भी जाती है जिस तरफ आम तौर पर कवियों का ध्यान प्रायः नहीं जाता. इसी क्रम में भास्कर लिखते हैं -   कवि!/ ये कैसी अंधेरगर्दी है जो/ तुम वह सब कुछ करते हो/ अंधेरे में/ जो तुम उजाले में करने से डरते हो/ हाँ तुम उजाले में रह कर उजले लिबास में/ अंधेरे के बारे में कविता रचते हो/ और इस समय को/ अंधेरा समय कहते हो!! आज पहली बार पर प्रस्तुत है भास्कर चौधरी की कविताएँ.     

भास्कर चौधरी की कविताएँ  


मध्यमवर्गीय कवि 


मध्यमवर्गीय कवि कुकुरमुत्ते की तरह नहीं उगते घूरे में
उनका घूरे से कोई वास्ता होता है
मध्यमवर्गीय कवि तारों की तरह भी नहीं
जो टिमटिमाते हैं आकाश में  
मछुवारों के लिए दिक्सूचक का काम करते  हैं अंधेरी रातों में
मध्यमवर्गीय कवि के हाथ 
खुरदुरे नहीं मजूर के हाथों की तरह 
उसका मजूरी से कोई वास्ता होता है 
मध्यमवर्गीय कवि गर्म कड़ाही भी नहीं पकड़ सका कभी
नग्न हाथों से, पत्नी की तरह
मध्यमवर्गीय कवि को चाय के स्वाद का तो पता है पर
चाय में कितनी देर तक उबाल आता है इसका पता नहीं
मध्यमवर्गीय कवि को चीनी चाय और दूध की मात्राओं के बारे में भी कुछ पता नहीं मध्यमवर्गीय कवि फ़कीर भी नहीं
पर सपनों में फ़कीर देखना उसे पसंद है,
पसंद है फ़कीरी क़लाम सुनना मध्यमवर्गीय कवि को 
मौके के हिसाब से धोती कुर्ता पैंट शर्ट सूट जैकेट टी शर्ट और
सेट की हुई दाढ़ी या करीने से काढ़े बालों में वह खूब फबता है
मध्यमवर्गीय कवि को यह खूब पता होता है

मध्यमवर्गीय कवि हल्कि रौशनी में लिखता है
टेबल लैंप जला कर पीठ सीधी कर या
अधलेटे बिस्तर पर बगल में मसनद लगा कर 
हल्का-हल्का आँसू बहाते हुए या
मंद-मंद मुस्कुराते हुए कलम का निचला हिस्सा होंठो के बीच
गोल-गोल घुमाते हुए या
आहिस्ते-आहिस्ते सर सहलाते हुए
मध्यमवर्गीय कवि लिखता है  
मध्यमवर्गीय कवि चाय की प्याली का आखिरी घूंट पीता है फिर लिखता है
पास खड़ी पत्नी को अधमुंदी आँखों से निरखता है फिर लिखता है
मध्यमवर्गीय कवि सिगरेट के धुंए के छल्लों के साथ निगाहें ऊपर उठाता है
झुकाता है फिर लिखता है
पत्नी के घर पर नहीं रहने पर महंगी अंग्रेजी शराब की चार-: घूंट के बाद
जब सुरूर चढ़ता है तब मध्यमवर्गीय कवि का मूड बनता है फिर लिखता है 


जैसे मध्यमवर्गीय कवि कुत्ता अभिजात वर्गीय कुत्ते से दोस्ती का ख्वाहिशमंद होता है
मध्यमवर्गीय कवि भी ख्वाहिशमंद होता है अभिजात वर्गीय महफिलों का
जिसे वह आपनी छाती में दबाए रहता है
यहाँ तक कि उसके साथी मध्यमवर्गीय कवि को भी इसका पता
महफ़िलों के बाद ही चलता है... 

मध्यमवर्गीय कवि सपनों में देखता है
मार्क्स को लिखते हुए दास केपीटल और
अपने बच्चों के लिए जेनी को दिन-रात खटते हुए
वह देखता है पाश को हथकड़ी पहने हुए
निराला को  मुफलिसी में आटे का कनस्तर पलटते हुए
नाज़िम हिकमत को फांसी से पहले अपनी प्रियतमा को आखिरी खत लिखते हुए
वह सपनों में देखता है इन सारे लोगों को और
डर कर अचानक बिस्तर पर उठ बैठता है
उसका दिल ज़ोरों से धड़कता है
वह करवट बदल कर पास सोई पत्नी को बाहों में जकड़ लेता है
कुछ देर बाद पानी का घूंट भर दीवार घड़ी पर नज़र डालता है
मध्यमवर्गीय कवि हक़ीक़त के बारे में लिखता है...!!


इन दिनों


इन दिनों
कम दिखाई पड़ रहे हैं सांप
छछून्दर, नेवले और खरगोश
बिल्लियां भी गिनती की बची हैं
घरों में नज़र जाती हैं कभी कभार

आंगन से जा चुकी हैं कबका
गौरैयापंडुकी और मैना

इन दिनों
जब कांक्रीट के जंगल तेजी से बढ़ रहे हैं
और शहर का हो रहा है विस्तार
सुनाई पड़ने लगी हैं
जंगल के बाहर भी
जंगल में चल रही धांए धांए
दूर तक पक्की सड़कें भी थरथराने लगती हैं
गोलियों की गूंज और आर डी एक्स के धमाकों से
अखबारों के मुखपृष्ठ लाल दिखाई देते हैं

इन दिनों
मारे जा रहे हैं आदिवासी
कभी नक्सलियों के नाम पर
कभी पुलिस के लिए मुखबिरी के नाम पर
छीज रहें हैं धान के खेत
छत्तीसगढ़ का धान का कटोरा लगता है जैसे
रह गया है चम्मच के आकार का
गायब हो चुके हैं
बच्चों के खेल के मैदान
उनकी जगह खड़ी हैं
बहुमंजिली इमारतें हवाई हस्पताल शापिंग माल और स्टेडियम
जहां सिर्फ आई पी एल या
क्रिकेट के नामी गिरामी खिलाड़ी खेल सकते हैं
जो अकेले ही दसों धान के खेतों का पानी
एक दिन में पी जाते हैं

इन दिनों
जब देश तरक्की की राह पर है
तेजी से घट रहे हैं -
जंगल
आदिवासी और
धान के खेत!!



चूड़ियाँ


बाज़ार से बाहर निकाली जा रही हैं
काँच की चूड़ियाँ
चूड़ियाँ
लाल नीली हरी पीली
क्या चूड़ियों के आवृत्त से ऐसे ही
बाहर निकल रही हैं लड़कियाँ
या चूड़ियाँ बनाने वालों की तरह ही
फंसी हुई
आवृत्त के भीतर
बंद आँखों से देखती हुईं सपनें रंगीन
रंगीन जैसी
चूड़ियाँ!!

 
अंधेरे में कवि बनाम उजाले में कविता


कवि!
ये कैसी अंधेरगर्दी है जो
तुम वह सब कुछ करते हो
अंधेरे में
जो तुम उजाले में करने से डरते हो
हाँ तुम उजाले में रह कर उजले लिबास में
अंधेरे के बारे में कविता रचते हो
और इस समय को
अंधेरा समय कहते हो!!



मजदूर

कवि ने लिखा मजदूर के माथे पर
पसीने के फूल खिलते हैं

चित्रकार की कूंची ने बनाया मजदूर का
खुरदुरा हाथ
धरती सा खुरदुरा 
और हाथ की रेखाएं
जैसे जड़ हों वटवृक्ष के

मूर्तिकार ने गढ़ा 
मजदूर की मूर्ति
जिसमें सिर्फ धड़ था
मस्तिष्क वाला हिस्सा 
नहीं बनाया मूर्तिकार ने 
जानबूझ कर

सरकारों के लिए
मजदूर माह में पैंतीस किलो
चावल का कोटा है
एक किलो शक्कर
या चंद लीटर मिट्टी का तेल
बदले में एक अदद वोट
इकहत्तर वर्षों से

मजदूर की पत्नी के लिए
मजदूर एक प्रेमी
एक अच्छा पति
उसके बच्चों का बाप
जो गाहे-बगाहे दारू की बोतल के साथ‌-साथ
माथे की टिकुली या बिंदी लाना भूलता नहीं
जिसके हाथों की मार से चोट उसे लगती नहीं
जिसके मुंह से आती 
देशी दारू की बदबू
उसके लिए जंगल में महुआ पेड़ों से टपके
ताज़ा महुए की खुशबू हो जैसे
या 
एक बुरा मरद जिसकी मार का जवाब
वह भी देती लात-घूसों से
उसकी ज़ुबान पे गालियाँ होती जैसे
मोहब्बत के आग़ाज़ का उसका यही एक तरीका हो
मजदूर की पत्नी को स्त्री विमर्श का
कुछ भी तो पता नहीं फिर भी वह लड़ती-झगड़ती
गालियाँ बकती
दांतों से नाखूनों से मजदूर की छाती पर निशान बनाती ...

मजदूर के लिए मजदूर
एक अदद मशीन
ज़रूरतें जिसकी बेहद कम
जो ज़रूरी धरती के लिए
बेहद ज़रूरी
जैसे धरती के भीतर गहरी 
कभी दिखाई नहीं पड़ती धरती की धुरी...



बस में लड़की

बस में लड़की
खड़ी थी
बस में जितने लोग बैठे थे
उससे तिगुने खड़े थे
कुछ एक पैर पर खड़े थे
कहना मुश्क्लि था दाएँ या बाएँ
किस पैर पर
क्योंकि वे बार बार पैर बदल लेते थे
हाँ लड़की जहाँ खड़ी थी वहाँ दोनों पैरों के लिए जगह थी
वह दोनों पैरों पर खड़ी थी
लड़की दाएँ हाथ से बस की फर्श से छत के बीच खड़े
दुबले पतले खंबे को पकड़े थी
उसका बायाँ हाथ बस की छत पर लटके हुए
रबर के मोटे छल्ले से लटका था
लड़की की
उम्र कोई
पंद्रह
नहीं सोलह
या शायद सत्रह थी
लडकी से सट कर एक लड़का खड़ा था
उम्र में लड़की से जरा सा बड़ा था
होंठों के ऊपर हल्की हल्की मूछें थी
गाल उसके चिकने थे
नीचे ठोढ़ी पर एक तिल था
पीठ पर लटकी लैप टॉप वाली बैग थी
लड़के का दायाँ हाथ लड़की के दायें हाथ से सटा था
बस खुरदुरी सड़क पर हिचकोले खाती कभी तेज कभी धीमी दौड़ रही थी
लड़के की उंगलियाँ लड़की की उंगलियों को सहला रही थीं
दोनों के चेहरे पर तेज थी खून की रफ़तार
लड़का और लड़की मेरी और लोगों की नज़रों से बाख़बर
मशरूफ़ थे स्पर्श सुख और शायद प्यार में
मैंने देखा
आहिस्ते आहिस्ते
लोग जो पचास पचपन और साठ के करीब थे
लड़की को चारों ओर से घेरे जा रहे थे
लड़की के दायें और बायें हाथों के करीब और ऊपर
पचास पचपन और साठ के लोगों के दायें और बायें हाथ थे
लड़की के चेहरे पर खून डर कर जम चुका था
अब लड़का वहाँ -
लड़की के पास
नहीं था!!



तानाशाह

चूहे नहीं मारते
तानाशाह
पर
आदमी के मरने से उन्हें
गुरेज़ नहीं।
 
                

सम्पर्क

मोबाईल  : 9098400682

ई-मेल : bhaskar.pakhi009@gmail.com
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.) 
                                       

टिप्पणियाँ

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28.06.18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3015 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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