शम्भु यादव की कविताएँ



  
जन्मः 11 मार्च 1965 को जिला महेन्द्रगढ़ (हरियाणा) के गाँव बड़कौदा में
शिक्षाः दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर
प्रकाशनः एक कविता-संग्रह एक नया आख्यान’ प्रकाशित। पत्रिकाओं और ब्लॉग्स पर कविताएँ प्रकाशित। 

समावर्तन नामक पत्रिका अपने एक महत्वपूर्ण स्तम्भ ‘रेखांकित’ के लिए जानी जाती है। इसके अंतर्गत सम्पादक निरंजन श्रोत्रिय किसी चुनिन्दा नए कवि की कविताएँ अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ पत्रिका में प्रस्तुत करते हैं। ‘समावर्तन’ के मई 2015 अंक के रेखांकित कवि हैं शम्भू यादव। शम्भू यादव की कविताओं पर प्रस्तुत है निरंजन श्रोत्रिय की टिप्पणी। इस टिप्पणी के बाद आप शम्भू यादव की कविताएँ पढेंगे। 
  
यह कतई जरूरी नहीं कि कोई तल्ख विचार कविता में उसी तल्ख तेवर के साथ अभिव्यक्त हो। एक थिर या फिर मद्धम स्वर में भी उसे उतने ही प्रभावी तरीके से व्यक्त किया जा सकता है। इस बार के रेखांकित कवि शम्भु यादव की कविताएँ ऐसी ही हैं जो अपने समकाल से दो-चार तो होती ही हैं लेकिन बहुत आहिस्ते से। उसमें अनावश्यक बेचैनी या उद्विग्नता नहीं है। शम्भु अपने समय और समाज का बहुत ही तल्लीनता से प्रेक्षण करते हैं और उसकी व्याप्ति को अपने संयमित अंदाज में कविता में घटित करते हैं। हम अचानक ही अचम्भित हो जाते हैं कि यह आधार कार्ड है या हमारी अपनी मुखबिरी का कोई षड़यंत्री दस्तावेज! व्यवस्था की इस कर्कशता को शम्भु कभी विट’ तो कभी व्यथा के रूप में अभिव्यक्त करते हैं। कहना न होगा कि कविता होने की इस अंतर्यात्रा में कवि को बहुत-कुछ कांट-छांट देना होता है जो काव्यावेग की खरपतवार के रूप में उसके आसपास उग आता है। दक्षिण अफ्रीका में करंसी पर मंडेला के फोटो छपने की खबर कवि को उस पूरे अर्थ-तंत्र और राजनीतिक विभीषिका तक ले जाती है जहाँ फटेले’ या चेपी’ लगे चेहरों के पीछे तमाम विसंगतियां झांक रही हैं। अब इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि वह चेहरा नेल्सन का है या गाँधी का, वह मुल्क अफ्रीका है या अपना इंडिया’! जब हमारे नाम कोई कारोबार न हो और फिर भी हम गले-गले तक खनखनाते सिक्कों से ढँके हों तो निश्चय ही कवि की मंशा उस नीयत को ताड़ लेने की है जो मसीहा या अवतार के मेकअप में दर्शकों को छले जा रहा है। कवि का प्रतिरोध यहाँ इस कदर मुखर है कि इस छुपी नीयत को उजागर करने के एवज में उसे फंदा भी कबूल है। दरअसल ऐसी कविता अपनी जनता से एक सीधा संवाद भी होती है जिसका अंग और भुक्तभोगी खुद कवि भी होता है गोया चौपाल पर बैठ दोस्तों के साथ दुख-सुख गपियाया जा रहा हो। इस धुंधले-से राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अधिनायकवादी चरित्र’ जैसी कविता उस मुखौटे को नोचने की जद्दोजहद है जिसके पीछे नरसंहार और भावनाओं की तस्करी छुपी हुई है। कवि आगाह कर रहा है कि हिटलर कभी मुगेम्बो भी हो सकता है और कभी....। मूल प्रश्न उस शिनाख्त का है जो कभी शरीर पर गुदवाए टैटू या कपड़ों पर कढ़वाए गए नाम के पीछे है। शम्भु यादव की कविता दरअसल इसी शिनाख्त का आग्रह करती कविता है। कपड़े की पुरानी मिल’ जैसी कविता के जरिये वे एक लुटे-पिटे समय को बयां करते हैं जिसे अतीत के गर्भ में धकेलने की पूरी तैयारी है उस आडम्बर के साथ कि भले ही सब कुछ नष्ट हो जाए लाल चिमनी जरूर बच रहेगी। इस लाल चिमनी के भरम के पीछे छुपे समूचे कार्य-व्यापार को नष्ट कर देने की आंतरिक इच्छा ही कविता को वह ताकत देती है जिसके जरिये हम बदलाव का कोई भी स्वप्न देखते हैं।धूप का पत्ता’ जहाँ कवि की एकदम भिन्न नाजुक-सी इमेजरी है वहीं नाकामयाब’ आर्थिक विसंगति और बाजारवाद की खिलाफत में एक उठती हुई हूक। शम्भु यादव अपनी कविता में भाषा के साथ कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं करते। कवि के भीतर विचार के साथ जो सहज भाषा आती है (निश्चय ही वह कविता की भाषा है) उसे वे यथावत कविता में उतार देते हैं। शायद यही कारण हो कि उनके यहाँ भाषा कविता की सहचरी लगती है। अपने दुख-व्यथाओं को अपनी बोली में अपनों से बतियाने की तरह। इक्कीसवीं सदी के आरम्भ की पड़ताल में जब हमें यह लगे कि हम अपने ही घर में अपनों के ही द्वारा ठगे गए हैं तो यह प्रवंचना का चरम अहसास होता है। यहाँ स्कॉर्पियों’ की विशाल काया उस समूचे छल-तंत्र को उद्घाटित करती है जो गंगा-स्नान के जरिये तमाम प्रायोजित पापों से मुक्ति पाना चाहता है।  शम्भु यादव की कविता अपनी समकालीन दशा-दिशा की गहरी पड़ताल करती कविता है । वे सब कुछ साफ देखना चाहते हैं एक पारदर्शी शीशे से जिस पर रोगन का एक छींटा भी न हो। वे उस करामाती और आकर्षक सॉफ्टवेयर से दुनिया को बचा लेना चाहते हैं जो एक क्लिक’ से सब कुछ नष्ट कर सकता है।
निरंजन श्रोत्रिय 

शम्भु यादव की कविताएँ 

विशिष्ट पहचान पत्र

उसने मेरा नाम पता
लिंग और मेरे पैदा होने वाले दिन को
ई-रजिस्टर में फीड किया

वह बोला
कैमरे में सीधा देखो
आँखों को अधिक से अधिक चौड़ा होने दो
यह जरूरी है-
उसने हिदायत दी

आज्ञाकारी बोध में बंधता मैं

कम्प्यूटर स्क्रीन पर चस्पा मेरी पुतलियों की छवि
अजान-सी मुझे ही भेदती

छूट न पाए
अँगूठे और अंगुलियों की किसी भी लकीर की निशानदेही

मेरे ही अंग मेरे मुखबिर के रूप में दर्ज हुए

और बस अब एक कर्कश आवाज़ पड़ेगी
हवलदार इसे लॉकअप में डाल दो
शम्भु यादव हाजिर हो। 
            
मंडेला

यह तेरह फरवरी दो हजार बारह की खबर है
दक्षिणी अफ्रीका में बैंक नोटों पर अब मंडेला दिखेंगे’
आगे मैं कहता हूँ-
जैसे हमारे यहाँ गाँधी दिखते हैं

अब दक्षिणी अफ्रीका में भी
कुछ इस तरह से होगा

पाँच सौ वाला मंडेला देना भाई
सौ का मंडेला तोड़ दे

जिस घर में जितने ज्यादा मंडेला
उसकी उतनी बड़ी औकात

यह मंडेला फटेला है यार, दूसरा देना

चेपी लगा इस मंडेला पर
तभी चलेगा।

मेरा विलोम

अपने पैरों में नाइकी के जूते पहन
एल.जी. के शोरूम में विभिन्न आइटमों की वैरायटियों पर
ललचाई छलांग लगाता वह

मुगलई रेस्तरां में बैठा है
उसे मसालेदार मटन खाने का चस्का
वह दारू के आठ पैग पी जाने के बाद भी आउट नहीं होता
एसिडिटी और वमन की तो मजाल ही क्या

उसके नाम कोई कारोबार नहीं
फिर भी उसकी जेब रूपयों से लबालब

उसे अधिकतर पसंद हैं वे लोग, जो
ठेकेदार हैं, सट्टेबाज हैं, बिल्डर हैं
माफियाओं से भी यारी गांठना चाहता है
इन्हीं में से उभरे किसी नेता का साथ

उसे नफरत है इलाके में पटरी लगाने वालों से
बीच सड़क रिक्शा चलाने वालों से
उसका बस चले तो भिखमंगों के हाथ काट दे

उसे साहित्य पढ़ना या किसी को साहित्य पढ़ते देखना
दोनों से खीझ है

और अगर आप उसका सीना फाड़ कर
ग्लानि भरा कुछ रसायन या
अदना-सी एक कोशिका ही देखना चाहें भलाई की
और वह मिल जाए
तो जनाब,
उसकी सीना फाड़ने के इल्जाम में, आपकी जगह
मैं फांसी चढ़ने को तैयार हूँ। 

                          
अधिनायकवादी चरित्र

जरूरी नहीं कि वह
हेल हिटलर’ रूपी सलाम बजवाता ही दिखे
दिखे किसी सिनिकल मुद्रा में उसकी मूँछों की उद्दण्ड नोंक
या उसके जूतों की कर्कश ताल और आपका कांपता शरीर दिखे
उसके साम्राज्य में प्रत्यक्ष कोड़े बरस रहे हों
लहूलुहान शरीरों से रक्त की धारा
किसी कंसंट्रेशन कैम्प में नरसंहार

चाउसेस्कू या इदी अमीन का रूप धारण करने जोर आजमाइश
अधिनायकवादी चरित्र में सिर्फ ऐसा ही कुछ होता दिखे, क्या जरूरी है

हो सकता है किसी फिल्म में
सीधे-सादे अधिनायक वाले रूप में दिखने की बजाय
उसका गुरूडम भाव कथ्य के फिल्मांकन में रचा-बसा हो

आपके शरीर को अनजाने ही रोमांचित कर
अपनी मूँछ की उद्दण्डता को संतों की वाणी में छुपा ले

किसी भाषण में वाचन करता दिखे-
अपनी ही सत्ता के खिलाफ लिखी कविता का पाठ

आपको आश्चर्य तो होगा लेकिन यह भी हो सकता है
वह बंद बोतल में किसी ब्राण्डेड उत्पाद का लिक्विड बना
लुभाने की सुपरलेटिव डिग्री में आपकी चिरौरी कर रहा हो-
देखिए साहब! मैं आपके हलक में उतर जाने के लिए मरा जा रहा हूँ।’

और जब आप अपने किसी स्वप्न में
उस लिक्विड की तरावट महसूस करना चाह रहे हों
वह वहाँ आपका हलक ही अपने हाथ में लिए आ बैठे।

कपड़े की पुरानी मिल

सब चीजों को समतल किया जा चुका है
केवल अब चिमनी ही रह गई है बाकी
बगैर धुएँ की, अकेली, निर्जन
जमीन के बीचों-बीच लम्बी खिंची याद
आसमान को छूती-सी

अपने भरे-पूरे सौष्ठव में एक सुघड़ आख्यान
फैला था व्यापक कभी वहाँ
विभिन्न व्यंजनाओं में

धड़कती मशीनें मचलते कलपुर्जे
कपड़ों के सुथरे थान
खिलते रंगों की बहार
आवाजाही में व्यस्त मजदूर की सांसें
परेशानियों भरी आहों के बीच
रह-रह थकान को हरती मासूम-सी ठिठोलियाँ

बीड़ियों के कश, पान की पीकें
सुरती का छौंक और मुँह के अन्दर चरमराती खाल
चलो चाय हो जाय, यार

सब कुछ लुट गया उस कपड़ा मिल का
सन्नाटे का छंद रचती बस खाली जमीन है
लोग कहते हैं उसे, मरा हाथी सवा लाख का

नए अमीरों के लिए लक्जरी अपार्टमेंट्स बनेंगी
मिट्टी से बनी लाल चिमनी को
मिल की यादगारी, उसका स्मारक बनाकर छोड़ा जाएगा।

धूप का पत्ता

खिली हुई धूप का पत्ता था
ठीक मेरे सामने आ गिरा
कटी पतंग के मांजे से कट

डाल हुई जो घायल
दर्द सह गई चुपचाप

कटी पतंग को तो हवा में ही लूट
कोई ले भागा जैसे हो
मुकद्दर का सिकन्दर

मैंने उस पत्ते को हथेली पर
रखे रखा है--

खिली धूप में.........


नाकामयाब

वो खूब हँसे मुझ पर
फब्तियाँ भी कसी
और एक ने कह ही दिया आखिरकार
लगता है भईया
किसी गुजरे ज़माने से हो’

यह तब की बात है
जब मैं शॉपिंग प्लाज़ा में
अपनी पुरानी कमीज़ के छेद को
बंद कराने की इच्छा में
ढूँढ रहा था
एक अदद रफूगर।

 वे तीन जन

एक आया था पहाड़ पार कर के
दूसरा रेत के टीलों से आया था
तीसरे के यहाँ हरे-भरे मैदान
और बहुत-से तालाब
तालाबों में मछलियाँ

तीनों खड़े हैं मजूर मंडी में

एक सुरती खाता है
दूसरा फूँकता है बीड़ी
तीसरा नाक के पास नसवार ले
जोर से खींचता है सांस

आपस के सुख-दुख
एक का बच्चा पांचवी पास कर गया है
गाँव में प्राइमरी के बाद स्कूल नहीं
आगे की क्लास के लिए कोसों जाना होगा

दूसरे की बिटिया के बेटा हुआ है
बड़ा खर्चा आन पड़ा है

तीसरे की माँ के पेट में रसौली
दर्द मिटता ही नहीं

उनकी बातों में सूखे, बारिश और फसल का
अपने-अपने यहाँ के स्वाद और रंग का
जेठ की गर्मी और
पाले का जिक्र होता है

तीनों जब-जब अपने गाँव जाते हैं
वहीं रह जाना चाहते हैं

परन्तु काम न चला पाता है मनरेगा
वापस आ लगते हैं महानगर

रोज कोई न कोई दूकान
तब्दील होती हुई शो रूम में

सड़कें अघायी गाड़ियों की कतारों से

ये तीन जन तीन दिन से बगैर काम के
आज पिछले दिनों से भी कम दाम पर
बिकने को तैयार हैं।


साफगोई की आशा में

काहे जरूरत थी इतना कुछ बताने की
काहे किए इतने प्रपंची-शोध
कि शीशे के ताबूत में बंद शरीर के
मृत होने पर
निकलती है आत्मा

शीशा किरक जाता है-ताबूत का
प्रमाण है कि आत्मा होती है’

कह देते बस इतना भर
जैसे धूप पार कर जाती है
साफ-स्वच्छ शीशे में से
वैसे ही आत्मा आर-पार चमाचम

लेकिन साफ और स्वच्छ शीशा कहाँ?
यहाँ किसी पर धूल जमी है
तो किसी ने अपने पर
मढ़ रखी है काली फिल्म

और किसी पर रोगन के छींटे जो लगे हैं
उसे कौन छुड़ाए! 

गृहस्थ-मैं और तुम

मैं उठा तुम्हारे बालों को
खिड़की से बाहर करता
जो कंघा करते वक्त
झड़ गए थे घर के फर्श पर

देखो, दूध के उफान को
साधना सीख लिया है मैंने

तुम काम पर मुझसे पहले चली जाती हो
इस दिनचर्या के चलते
दोपहर वापस आओगी, थकी-हारी
सबसे पहले बेतरतीब चीजों को
ठिकानों पर लगा दोगी

किताबों को झाड़-पोंछ सहेजोगी
इधर-उधर छितराए पन्नों को उठाते बड़बड़ाओगी
मसलन- हाय राम, पैन भी खुला
नवाब साहब ने मुझे जर-गुलाम समझा है’

गुस्सा न होओ, देखो
मैं कोशिश कर रहा हूँ
बहुत मुश्किल काम है झूठे बर्तनों को मांजना
जिसे तुम करती आई हो वर्षों से
सहज ही।

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के आरम्भ में

मैंने धन की आबताब को वैभव न कहा
मैं ज्ञान और मानवता की पोटली खोल के बैठ गया

जिस ज्ञान से अर्जित न हो कोई दाम वह व्यर्थ है.... मेरे पिता ने कहा

मैं धकेल दिया गया अपने घर के पिछले द्वार से बाहर
घर का अगला द्वार धन-संपत्ति बनाता,
अपने में सज-संवर मग्न है......।

कटी फसल के बाद खड़े खोबड़ों पर भागता मैं
मेरे पैरों से रिस रहा है खून
मेरी जीभ तालू से चिपकी है
सूखे जोहड़ की पपड़ियों-से मेरे होठ

आसमान में बालू-आग
तेज अंधड़ आ बरपा है बीच दोपहर
खोया है आलोक

इस भीषण में चील ही है जो खिलखिला रही
प्रमद हवा की मुग्धा गोते लगाती घिन्नीदार
आकाश में चलायमान काले धब्बे
नए रक्त-संचार में शिकारी पंजे!

भयभीत है चिड़िया
चूहे की भगदड़ बिल की ओर

रह-रह बुदबुदाता मैं
खूनी पंजों से बचने की ताकीद बार-बार।

मेरे बिल्डर भाई की स्कार्पियो’ में बैठा मेरा पिता
जा रहा है हरिद्वार नहान
उपेक्षा से देखता मुझे लहूलुहान

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के आरम्भ में
दर्द में सिमटा मैं
दिल से सूजा।


इधर वाला दिन

इस दिन में रात है
और घुप अँधेरे में खोया है सब कुछ
एक लम्बी गाड़ी अपनी चौंधियाती लाईट में भाग रही है
चमकती काली सड़क के घुमावदार मोड़ों पर
और जितनी ज्यादा रफ्तार होती है उसकी
नेनो सैकण्ड की तेजी से बढ़ता जाता है स्कोर
स्क्रीन के दाएँ

कार टकराती है इधर-उधर
दूसरों को नष्ट करना
इस करामाती खेल के सॉफ्टवेयर का
सबसे उत्तेजक क्षण है

खुद पर खरोंच भी न आए
और अधिक से अधिक पॉइंट अर्जित हों

प्ले-स्टेशन के गेम-पैड पर अपने हाथ चलाता
खुशी से बल्ले-बल्ले है यह आदमी

एक नया खूबसूरत पक्षी
जिसे उसने देखा तक नहीं
उसके दिल की खिड़की पर
बैठा रहा दिन भर और
लौट गया।

माफ करना कामरेड

मुझे माफ करना कामरेड
वो जो मेरा सैलून वाला है ना
वह हबीब के बेटे जावेद द्वारा ट्रेण्ड है

उसने लुभाया मुझे
आओ! आपको मैं उम्दा सलीकेदार बना दूँ

उसके लुभाने की अदा पर मुग्ध मैं

उसने मेरे रूखे बालों को डव’ शैम्पू से धोया
बालों की सफेदी छुपाने के लिए गार्नियर बोल्ड’’
जिलेट की फोम वाली क्रीम, उल्टे ब्लेड शेव की

शहनाज’ के गोल्ड फेशियल से चुपड़ाया मेरा चेहरा
मुलायम हो सुनहरी दमकने लगे
आकर्षण का केन्द्र बनने को निखर आए मेरी आभा

आपकी मूँछ को कुछ तराश दूँ
ताकि दिखे रौबदार’

ऐसी कैंची चलाई उस बैरी ने
एक तरफ की मूँछ ही साफ कर दी
दूसरी तरफ की मूँछ मुंडवाने के लिए
मैं हूँ मजबूर।

सम्पर्कः
7364/ 5, गली नं. 1,
प्रेम नगर, शक्ति नगर के पास,
दिल्ली-7

मोबाइलः 099680 74515

ई-मेलः shambhuyadav65@gmail.com
 
 (इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की हैं.)                                                      

टिप्पणियाँ

  1. शम्भु यादव की कविताएँ शहरी छाड़न की कविताएँ हैं। शहर का वह भयानक तलछट जो पिछले 20-25 वर्षों में जमा हुआ है। पूँजीवाद अपने चुस्त-चिकने दायरे में इसे ढक तो सकता नहीं, फलतः लाख चमक-दमक के बावजूद हर जगह से खुला हुआ है। मीडिया द्वारा निर्मित मनोवैज्ञानिक अशिक्षा और आत्मबद्धता के बावजूद संवेदनशील आदमी को अपराधबोध से भरता ही है। पर शम्भु यादव की कविताएँ न तो इससे भागकर स्मृतियों में बसे लोक में शरण लेनेवाली कविताएँ हैं और न ही मानसिक शान्ति के लिए रामदेव और आशाराम की शरण में । वे इसे विश्लेषित करते हैं, इसके वर्गीय अन्तर्विरोध को समझते हैं, कविता के स्तर पर लड़ने के लिए सन्नद्ध दिखते हैं।
    शम्भु यादव की कविताएँ पढ़ते हुए मिलेगा कि वे एक नए तरह का वर्गीयबोध रच रहे हैं । यहाँ सर्वहारा शास्त्रीय मार्क्सवाद से अलग नवसर्वहारा है जिसमें मज़दूर, बेरोज़गार, किसान, स्त्री, प्रकृति और प्राइवेट सेक्टर में काम करनेवाला टाई-कोट वाला बहुत बड़ा वर्ग भी शामिल है। एक और बात, शायद मैं सही कह रहा हूँ कि शम्भु यादव के साथ पहली बार हिन्दी कविता हिरियाणा की पठारी ज़मीन से जुड़ती है । यह ख़ास बात है कि किसी कवि के साथ कोई भूगोल कविता से जुड़े । और जब ऐसा होता है तो कुछ दिक़्क़तें भी खड़ी होती हैं, मसलन भाषा और सम्प्रेषण की समस्या । पर शम्भु यादव के यहाँ यह समस्या उस तरह से नहीं है यानी शब्दों को समझने के लिए कोश खोलने की समस्या नहीं है । अगर आपको पता है, सामान्य-सी बात पता है कि किसी भी पठारी भाषा में ट, ठ, ड, ड़ जैसे खड़खड़ाहट वाले थोड़े कठोर वर्णों की प्रमुखता होती है तो हिन्दी से उसे जोड़ते-अलगाते एक नई ज़मीन से भी जुड़ेंगे।
    शम्भु यादव में एक विरल ख़ासियत है--अनुभव पर विश्वास और उसी पर कविता करने का आग्रह। अगर वे हिन्दी की परम्परा से परिचित हों, कुछ कविताएँ और आलोचना पढ़ें तो वे अपने को भाषा में और ठीक से सम्भव कर पाएँगे।

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  3. Aadarniy Shambhu ji ko padha hai. Kavitaon mein ekadh kmi ke sath ve achchhe kavi hain... Yahan Aadheesh Ji aur Nirnjan jee ki tippniyan unki kavitai ko rekhankit kr rahi hain...Mandela vaali kavita sbse kamjor kahunga...Kaarn ...yah halke star ki comedy mein badlti lgti hai...mandela fatela hai...chepi lga...vyvstha ya poonji ki chaal ya chehare ki nishaandehi yah kavita nhi kr paati...Khair, Bahut Bahut Badhai va Shubhkaamna unhe...Aabhaar Pahleebar!!
    - Kamal Jeet Choudhary ( J&K )

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    1. कमल जी, मंडेला वाली कविता पर आपसे बहुत कुछ मैं भी सहमत हूँ। पहले भी कहीं आपने यह कहा था ।

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  4. शम्भू यादव की कविता पुरानी दुनिया और नई दुनिया के असंतुलन के गहरे विषाद को रचती हैं .स्मृति और यथार्थ के बीच की भुरभुरी जमीन पर चलना किसी भी दौर के कवि के लिए अनिवार्य भी होता है और कठिन भी . इस प्रक्रिया में कुछ भाषा के संतुलन को निर्मित कर लेते हैं और उम्र भर उसी संतुलन को साधते रहते हैं. मुक्तिबोध के शब्दों में कंडीशन रिफ्लेक्स के शिकार , लेकिन उनमे विकास की संभावना चूक जाती है . शम्भू यादव भाषा के संतुलन को अर्जित करने के बजाय हर बार नये सिरे से जमीन कोड़ने पर जोड़ देते हैं. इस प्रयत्न में कई बार वे सफल होते हैं कई बार बिलकुल नहीं, लेकिन अगर इस प्रक्रिया को हम एक कवि के रचनात्मक कर्म का अनिवार्य हिस्सा माने तो शम्भू यादव की कविता की असफलताओं में भविष्य की महत्वपूर्ण कविताओं की संभावना बची रह जाती है

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