बुधवार, 31 जुलाई 2013

सुनीता




इतने दिनों बाद भी प्रेमचंद क्यों प्रासंगिक बने हुए हैं कुछ इसी की तहकीकात में युवा कवियित्री सुनीता ने यह संस्मरण कभी ऐसे ही लिखा था। आज प्रेमचंद जयंती के अवसर पर प्रस्तुत है यह संस्मरण।  

विमाता,विमाता ही क्यों...?

जिस क्षण बचपन के अँगनाई में पहला कदम बढ़ाया था। उस दम माँ का सीना गर्व से प्रफुल्लित हो उठा था। कोमल हाथों ने जब पहली बार उनको महसूस करके एक मजबूत काम-धंधे से कठोर किन्तु इरादों से अटल अँगुलियों का स्पर्श किया था। उस पल दिल के देश-दुनिया में खुशी की नयी किरण फुट पड़ी थी। आँखों में उम्मीद के ढेरों बादल उमड़ पड़े थे.अपने पैईयां-पैईयां चलने की हड़बडाहट में बार-बार गिरते रहे। लेकिन माँ की खूबसूरत,हिरनी सी निगाहें मेरी हर एक हरकत पर लगी रहीं।

आज औचक ‘प्रेमचंद’ को याद करते हुए, मेरे यादों के बादल बरस रहे हैं। विमाता की दर्दनाक कडुवाहटें कनक की तरह आँखों के सामने चमक बिखेर रहीं हैं। सोचती हूँ ! वास्तव में दूसरी माँ-माँ नहीं बन पाती हैं तो खुद से उलझ जाती हूँ। भावनायें अपने गति से चलती हैं। दिल धौकनी से धड़कने लगते हैं.उत्तर का कोई सिरा हाथ नहीं लगता है।

‘निर्मला’ की निरीहता रह-रह के दिमाग में कौंध जाते हैं।चाह कर भी वह एक कुशल माँ के पदवी को न पा सकी। पति के ताने और पड़ोस के झूठे लांछनों ने उसे उबरने ही नहीं दिया। घुटन के मारे सांसे थम गयीं पर सोच की दुनिया कभी नहीं बदली। ‘निर्मला’ के निर्मल प्यार से सराबोर गंगाराम और मंसाराम का जीवन तजने की सम्मोहिनी अदा स्मृतियों के जंगल में दहाड़ रहे हैं।

सृजन का विशाल आकाश आगोश में समाये हुए। गाँव, घर-परिवार,कुनबा,पड़ोस,यार-दोस्त सब समय-समय पर बिछुड़ते चले गए। आज परछाइयों में एक-एक दृश्य उभर रहे हैं.झुर्रियों से बेहाल चेहरे पर आज चिंता की दूसरी लकीर खींचे चले जा रहे हैं। समय अपने रफ़्तार से एक-एक सरकता जा रहा है। जवानी निरंतर एक नए दहलीज पर तेजी से दस्तक देती रही है।






यौवन के आने से पहले ही लड़कपन में ही साहित्य ने छू लिया था। बुढ़ापे में लाठी टेकने तक बरक़रार रहे। यह बिरले सौभाग्य की बात है। बतकही के बेख़ौफ़ दिन ढलते-ढलते जीवन को ढुलका ही ले जायेंगे। इससे कोई नहीं बच पाया है.31 जुलाई 1880 के हिंडोले में झूलते ललना के पालना को मृत्यु रूपी हवा के तेज झोंके साहित्य मर्मज्ञ मुंशी जी को भी 8 अक्तूबर 1936 में अपने साथ उड़ा ले गए। सम्पूर्ण साहित्य और समाज को मणिकर्णिका घाट के घुटनों में घुलते हुए देखने को विवश किया।

जब-जब उनके कृतियों के साथ शब्दों ने अटखेलियाँ की एक नए इमारत की नींव पड़ी। मुझे आज भी याद आता है जब पहली बार मेरे हाथ 'ईदगाह' लगी थी। उसी दिन से मन में दद्दू के प्रति स्नेह के तारे चमक उठे थे। वह बैरा (चंदौली के पास छोटे से आदिवासियों का गाँव) के बीहड़ जंगलों में डील-डामर खेतों में बोये गए फसलों की रखवाली किया करते थे.लिट्टी-चोखा से जीवन गुजारते हुए दुनिया से गुजर गए।

‘ईदगाह’ की चिमटा जागेश्वरनाथ से खरीदने की प्रेणना जो मिली थी। कहानी के मर्मस्पर्शी बुनावट ने पहली सीख के साथ जीवन को एक नयी दुनिया से रु-ब-रु करवाया था। जिसकी कसक आज भी बरक़रार है। दिलचस्प यह है कि इतने उम्र बीतने के बाद भी उस सख्श के सृजन की ताप अब तपाये, सताए और दुरदुराये गए 'होरी' के ‘मरजादी’ हुमक के साथ मौजूद है।

'गोबर' के गठुआते माहौल से युवाओं के जोश,जूनून और झल्लाहट की झलक आस-पास रोज़-ब-रोज़ नजरों से टकरा जाते हैं। विद्रोह की ज्वाला ‘मरजाद’ के आँगन में आ कर ठिठक जाती हैं। इसी ठहराव से जन्म-मरण की कुलबुलाती यादें बेचैन कर देती हैं। भूख की पीड़ा नीरवता के घनघोर वादियों में व्याकुल हो विचरने लगतीं हैं।

 जहाँ से यातना का सागर हिलोरे लेने लगता है। अतीत के यथार्थ से टकराते ही सब कुछ गर्म तवे पर एक बूंद के मानिंद जीवन की सारी आकांक्षाएं, अपेक्षाएं, उम्मीदें और सपने छन्न हो जाते हैं। "मेहनत करके अनाज पैदा करो और रूपये मिलें,वह दूसरों को दे दो"...जिनके "घर में अनाज नहीं है, देह पर कपड़े नहीं हैं,गाँठ में पैसे नहीं है।"

मालती-मेहता के ज्ञान बघारते दर्शन आज हर किसी के जुबान पर चढ़ा हुआ है। अपने बदले हुए स्वरूप में भद्दगी के बियावान में भटक रहे हैं।

'सोजे वतन' के जलती प्रतियों के साथ मजबूत होते इरादे का परिणाम रहा की 'मंगलसूत्र' की पूरी गांठे नहीं लग पायीं थीं। निर्मम मृत्यु ने धर दबोचा था। लेकिन जीवटता की अनंत गाथाएं इतिहास में दर्ज हो चुकी थीं।

पहचान की पहली यात्रा की शुरुआत धनपत राय श्रीवास्तव नाम से हुई। वह धीरे-धीरे 'नबाबराय' के ठोस भूमि पर 'कहानियों के पिरामिड' के साथ ही 'उपन्यास सम्राट' बन बैठे। यथार्थवादी परम्परा की नींव डालने वाले अपने मित्र 'मुंशी दयानारायण निगम' के सुझाव पर अमल करते हुए झट 'मुंशी प्रेमचन्द' नाम से उर्दू पत्रिका 'ज़माना' में लिखने लगे जो जीवनपर्यंत चला।

साहित्य समाज के संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता, सुधी संपादक और तमाम भाषाओँ के जानकार मुंशी जी जागरूक इंसान थे। बनारस के पांडेयपुर चौराहे से सीधे की ओर 'लमही' आज भी लम्बी-लम्बी सांसें ले रहा है। बुद्ध के उपदेशों की सोंधी सुगंध सारनाथ से सीधे आ रही है।

अतीत के यादों के मौजूद साये में यथावत, सृजक की अनुगूँज ध्वनि, निगाहों से दिल तक जाती है। लेकिन आज वहाँ आवाजों के घेरे का कहीं अता-पता नहीं है। माँ आनंदी देवी के पुत,पिता अजायबराय के आँखों के पुतली के अमर पात्र चौराहे पर दस्तक देते मुसाफिरों को दिशा दिखाते मनमोहित कर जाते हैं। सम्मोहन के साहित्य एक नए सृजन को उकसाते हैं। यहीं से मधुर सुर बज उठते हैं। जहाँ से एक नए कहानी, उपन्यास, कविता,एकांकी और नाटक के पात्र कानों में हौले से कुछ सुनगुन कर जाते हैं।

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के पहले कहानी के छपने की जद्दोजहद 'सरस्वती'(1900,काशी,फिर इलाहाबाद, महावीर प्रसाद द्विवेदी(1903),मासिक) की ओर मुड़कर देखने को बार-बार विवश करते हैं। ‘सरस्वती’ के दिसम्बर अंक में सन 1915 में 'सौत' की आहट से पाठकीय परिवारों में खदबदाहट हुई थी.जिसकी उन्मुक्त यादें जेहन में जब्त हैं।

सर्जना के आखिरी दौर में सन 1936 में अंतिम कहानी 'कफ़न' की शैय्या पर लेटी हुई मिली। आज जाने-अनजाने में कई माएं,बहने,बेटियां और बुजुर्ग की लाशें सड़क, चौराहे, चौबारे या दूर कहीं, किसी मोड़ पर अपने शिनाख्त और सफ़ेद चादर के इन्तजार में ठंढे पड़े हुए हैं। मुर्दा घरों में जलती लाशों में खुद को खोजते फिर रहे हैं। अपने काँधे पर अपने ही जनाजे को ले कर चलने की रश्म चकाचौध में दिखाई देते ही रहते हैं।

भारतीय साहित्य में विमर्शों की वास्तविक शुरुआत प्रेमचंद की रचनाओं में मुखर हुई थीं। नारी के अंतर्मन की कुलबुलाहट, झल्लाहट और यातना से विरोध की पहली फुहार फड़के थे.जातीयता के दंश से दर्द की उठतीं लहरें इनके रचनाओं से जुबान तक चढ़े थे।

वीरेंद्र यादव जी अपने पुस्तक 'उपन्यास और वर्चश्व की सत्ता' में एक स्थान पर लिखते हैं कि "जब उत्तर आधुनिक कुतर्क के चलते कुछ लोगों को 'प्रेमचंद के गाँव अचानक झूठे लगने लगते' हो और जब आस्वादपरक आलोचकों को प्रेमचंद की परम्परा के समानान्तर साहित्य की कई परम्पराएँ दिखाई देने लगती हों। वर्तमान समाज व् साहित्य के दलित व् नारी-विमर्श सरीखे ज्वलंत मुददों की निशानदेही भी यदि 'गोदान' के माध्यम से की जा सकती हो तो यह पुनर्पाठ और भी प्रासंगिक हो जाता है.जानना यह भी दिलचस्प है कि इतिहास और राष्ट्रीय विमर्श से बेदखल अतीत के जिन निम्नवर्गीय प्रसंगों को इतिहास की  'सबाल्टर्न' धारा ने इस दौर में सहेजने व् रेखांकित करने का कार्य किया है।"

उपरोक्त विवेचनात्मक विश्लेषण से एक बात पुख्ता हो जाती है कि प्रेमचंद कितने बड़े दूरदर्शी इंसान थे। महलों से झोपड़ों तक के दर्द को बखूबी पहचान है। सिर्फ पहचाना ही नहीं बल्कि उस दिशा संकेत के तमाम राहे छोड़ गए। जिसे समझने-समझाने,चिंतन-मनन और मंथन की विशेष आवश्यकता है। प्रेमचंद जी  कहते हैं- “मैं उपन्यास को मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्व है....सब आदमियों के चरित्रों में भी बहुत कुछ समानता होते हुए भी कुछ भिन्नताएँ होतीं हैं। यही चरित्र सम्बन्धी समानता और भिन्नता-अभिनत्व के भिनत्व और विभिनत्व में अभिनत्व दिखना उपन्यास का मूल कर्तव्य है।” इसी के आस-पास समाज भी ठहरता है। मानवीय मंचन का केन्द्र व्यक्ति खुद है.उसकी अपनी सीमा और सामर्थ्य का ही देन सामाजिक,राजनीतिक,आर्थिक और भौगोलिक परिष्कार निर्भर करते हैं।  

प्रेमचंद के अपने विचार में "साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं,बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।" कमोवेश यह बात बिल्कुल सत्य है.साहित्य समाज का आईना है। जिसके तेज निगाहों से कोई भी नहीं बच पाता है। पाप,पुण्य की लेखा-जोखा रखने वाले भी अपने काली करतूतों को गेरुवा वस्त्र में नहीं छिपा पाते हैं।
सन 1921 ई में महात्मा गाँधी जी के नक्से क़दमों पर चलते हुए सरकारी नौकरी छोड़ दी। कुछ महीने तक 'मर्यादा' (1909 प्रयाग,कृष्णकान्त मालवीय,मासिक) पत्रिका का संपादन किया। लगभग छः माह तक 'माधुरी' (1922 लखनऊ,दुलारेलाल भार्गव,मासिक) में अपनी सेवाएं दी। मन को तसल्ली नहीं मिली। मन के किसी कोने में बैठे साहित्य का बड़ा भण्डार उन्हें बार-बार कुछ और करने के लिए विचलित करता रहा। इसी आत्ममंथन का परिमाण 1930 में बनारस से 'हंस' (मासिक,सहयोगी संपादक शिवदान सिंह चौहान, अमृतराय) के उदय के साथ उदित सूरज की पीली किन्तु तेज प्रकाश से साहित्य संसार में एक नए युग की शुरुआत होते हुए देखा गया। जो आज भी अपने मूल रूप से भटकते हुए समय के साथ कदम मिला कर राजेंद्र यादव के संरक्षण में सुखद रहा है।

समाज और साहित्य के प्रति लगाव की गहन पीड़ा अभी भी शांत न हुई थी.1932 में 'जागरण' के रूप में एक साप्ताहिक पत्रिका निकाली। 1936 के 'अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ' की अध्यक्षता के साथ एक नए पड़ाव की ओर इशारा किया।
अपने जीवन के रंगमंचीय अनुभव को सन 1915 से कहानी के रूप में ढाल कर इस विधा संसार में कदम रखा। लगभग तीन सौ कहानियां लिखीं। नौ ग्रहों की भांति नौ संग्रहों में संकलित रचनाएँ ‘सप्त सरोज’, नवनिधी, प्रेमपूर्णिमा, प्रेम-पचीसी, प्रेम-प्रतिमा, प्रेम द्वादशी, समरयात्रा, मानसरोवर -8 भागों में विभक्त है। जिसमें मानव जीवन के सारे रंग मौजूद हैं। अपने कथा के बुनावट में झुग्गी-झोपड़ियों से लगायत ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं को केन्द्र में रखा। कहीं पर यथार्थ की कटु सच्चाई दिखते हैं,कहीं पर हकीकत के साथ भावना के सागर हिचकोले खाते, उमड़-घुमड़ आते हैं। कहीं-कहीं पर कटाक्ष के बादल मंडराते हैं,कहीं पर व्यंग की त्रिवेणी प्रवाहित होती दिख पड़तीं हैं।

मनः संवेदना पर गहरी छाप छोड़ती कहानियां स्मरण में छाई हुई हैं। बचपन की ‘गिल्ली-डंडा’ की बातें हाकी, क्रिकेट, फुटबाल और बैडमिंटन के जमाने में जीवंत हैं। एक घटना के साथ दर्द का रिश्ता जोड़ बैठी हैं।
खेती, किसानी और अन्न की कहानी प्रागैतिहासिक काल से ही पशुओं-पंक्षियों से जुड़े हुए हैं। ‘दो बैलों की कथा’ की दरकार आज भी सत्य रूप में कायम है।

युगों-युगों से सरपरस्ती की भावनाएं ‘बड़े भाई साहब’ के बरगदी छाँव के साथ अपनी मौजूदगी बनाये हुए है।

हलकू के हलक से बहार निकलते अनाज के दाने आज भी कईयों के हलक में अटके पड़े हैं। जाड़े से ठिठुरते हुए ‘पूस की रात’ गुजारते हुए आस्मां की ओर लगीं उम्मीद की निगाहें कुछ कह रहीं हैं।

जातीयता के भेदभावी ठसक से ‘ठाकुर का कुआ’ ठेठ अंदाज़ में अपनी ठसक बनाये हुए है। ‘सदगति’ की संगीत रह-रह कर सुनाई देती ही रहतीं हैं।‘बूढी काकी’ की अनुभवी और ठोस बातें कानों को कड़वी लगने लगीं हैं। तरुण ताल की ‘तावान’ अब तड़प उठीं हैं। तल्ख़ यादों के पट पछुआ बहा रहे हैं। मन के किसी कोने में कलकलहट मचाएं हुए हैं। ‘विध्वंश’ की विकट स्थितियां और संकट संसार सृजन पर भारी पड़ रही हैं। सम्पूर्ण दुनिया इसके खौफनाक साये में जिन्दा है।

‘दूध का दाम’ दिनों दिन आसमान को चूम रहा है। एक-एक बूंदें कीमती होती जा रही हैं.पानी की मिलावट बदस्तूर जारी है। विकास, अनुसंधान और समाधान के तमाम सुविधाओं के बावजूद सर्पदंश से अधिक अमानवीयता के क्रूर हाथों से जिंदगियां तबाह हो रही हैं। ‘मंत्र’ के तंत्रीय चक्र चल रहे हैं। आधुनिक भगवानों की जमात सड़कों पर पूँजी के लिए नारे लगाते फिर रहे हैं। जीवन की सांसें उखड़ती ही जा रही हैं। गोल्फ खेलने वाले अपने ही दुनिया में बदमस्त हैं। ‘पंच परमेश्वर’ की अचूक तीरें अब दूसरा रुख कर चुकी हैं। खाप पंचायतों के रूप में खुनी-खंजर में तब्दील हो गयीं हैं। 'शतरंज' की मनोरंजक विसातें धीरे-धीरे विशाल, विकराल, व्यवसाय और विकल्प का स्थान ग्रहण कर चुकी हैं।

प्रेमचंद जी शुद्ध रूप में उर्दू के व्यक्ति, लेखक और चिन्तक थे। इनकी अधिकांश रचनाएं पहले उर्दू में लिखी हुई हैं तत्पश्चात हिंदी में अनूदित कर प्रकाशित हुई। 'असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रह्श्य' नाम से उर्दू के एक साप्ताहिक "आवाज-ए- खल्क" में 8 अक्तूबर 1903 से लेकर 1 फरवरी 1905 तक लगातार धारावाहिक के रूप में छपता रहा। 'हमखुर्मा  व् हमसबाब' एक बेहतरीन उपन्यास है जो कि  1907 में 'प्रेमा' नाम से हिंदी में प्रकाशित किया गया।  'बजारे-हुस्न का हिंदी रुपान्तरण 'सेवासदन' के नाम से हुआ। कहा जाता है कि सन 1918 के साथ ही उपन्यास के दुनिया में इनकी पहली पदचाप सुनाई दी थी। यह एक महत्वपूर्ण कृति है। इसमें नारी जीवन के मर्म को बेहद गम्भीर तरीके से व्यक्त किया गया है।  एक सामान्य नारी के वेश्या बनाने के दर्द,पीड़ा, कसक, चुभन, यातना, शर्म, हया और हरकत की दास्ताँ मौजूद है।

रामविलास शर्मा लिखते हैं-"सेवासदन’ में व्यक्त मुख्य समस्या भारतीय नारी की पराधीनता है।" मुझे लगता है यह केवल किसी देश विशेष की परतंत्रता नहीं है, बल्कि आधी आबादी के साथ जो कुछ होता है या हो रहा है उसकी एक बारीक छुवन है जो युगों-युगों से नहीं बदला है।

आज भी एक बच्ची के पिता को उतनी ही गहरी चिंता रहती है, जो कभी निर्मला के पिता को थी। पढ़े-लिखे की जमता भले ही हो लेकिन दकियानुसी सोच की दुनिया आज भी आडम्बरी  उल्कापिंड के इर्दगिर्द ही मंडरा रही है।
पशुओं के जंगल में एक बार व्यक्ति सुरक्षित निकल सकता है लेकिन इंसानी भीड़ भरे जंगल से साबुत बचे रहना कठिन ही नहीं नामुमकिन हैं। इसके ताज़े उदाहरण धनबाद के साहिबा, कश्मीर के पहलगाम और गौहाटी के घटनाक्रम के तौर पर देखें तो कुछ गलत नहीं है…. .

प्रेमचन्द ! प्रेमचन्द ही रहेंगे भले दुनिया में कई दुनिया बस जाए तो क्या...

यादों को टटोलते हुए...सादर नमन !


सुनीता कवियित्री हैं। आजकल दिल्ली के हंसराज कॉलेज में हिन्दी का प्राध्यापन कर रही हैं।  



सम्पर्क-
मोबाईल- 09953535262





मंगलवार, 30 जुलाई 2013

नीलम शंकर




जन्म- उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में, 
शिक्षा- बी. एस-सी,  एक कहानी संग्रह- 'सरकती रेत'
कुछ कविताएँ और सामाजिक सरोकार से गहरे तौर पर जुड़ाव और उसी में सक्रियता। 
 


'बुधना बाया बुद्धिदेव' कहानी ग्रामीण परिवेश के उन बदलाओं की तरफ हमारा ध्यान आकृष्ट करती है, जो दलित वर्ग की जागरूकता के चलते संभव हो सका है. दलित बुधना इसी जमीन पर खडा हो कर अपने गाँव के उस जमींदार को चुनौती देता है जिसके यहाँ उसकी माँ काम कर के जीवन-यापन करती थी। कहानी के माध्यम से नीलम शंकर जमीदारों की विकृत मानसिकता का भी खुलासा करती है। तो आईए पढ़ते हैं नीलम शंकर की यह कहानी। 

 

बुधना वाया बुद्धिदेव

ट्रेन की रफ़्तार और उसके मन की रफ़्तार बीच-बीच में एक हो जाती थी। जैसे ह़ी दोनों में से किसी की  भी रफ़्तार आगे–पीछे होती तड से उसकी उंगली मोबाईल के बटन पर जा दबती, दूसरा गाना सुनने के लिए। वह कानों में लीड लगाये, जिसका दूसरा सिरा उसके पतले से गुलाबी सफ़ेद मोबाईल में खुंसा हुआ था
पहले वह दिल्ली से कानपुर तक किसी ट्रेन से आया था, रात में। रात में भी थी गाड़िया लेकिन उसने सुबह-२ ह़ी पंजाब मेल चुनी अपने गाँव के लिए। उसी में बैठा कभी सपने बुनता-गुनता। कभी वर्षों पीछे जा कर गाँव की बदनुमा जिन्दगी से मुंह कसैला कर लेता पंजाब मेल के जनरल बोगी में  भीड़ के क्या कहने। लोगों से खचाखच भरी हुयी थी जितने लोग सीट पर बैठे थे, खड़े उससे कम नहीं थे | वह खिड़की के पास सिंगिल सीट पर बैठा, गानो को सुनता हुआ तेजी से गुजरते हुए पेड़ों, खेतों, गढ़ही नुमा तालाबों व बिजली के बड़े-बड़े टावर नुमा खम्बों को निहारता–सोचता बैठा हुआ था बीच -२ में एक निगाह डिब्बे के मुसाफिरों पर भी डाल लेता जो जरा सी भी टेक लगाने को बेताब दिख रहे, लोगों की निगाहे टोह रही लगातार शायद कोई रहम ह़ी कर दें क्या कीजियेगा जनरल डिब्बों का मंजर होता ह़ी कुछ ऐसा है बगल में बड़ी देर से खड़े एक मुसाफिर पर उसने निगाह डाली पता नहीं क्या सोचा अपना खड़ा हो गया उसे बैठाल दिया

            कद काठी, वेष भूषा उसने किसी फ़िल्मी टपोरी टाइप विलेन की बना रखी थी कलाई से ले कर मछलियों तक उसने किस्म –किस्म के गोदना गोदवा रखा था आज की भाषा में कहें तो टैटू बनवा रखा था जो उसके स्लीव लेस गोल गला नुमा काली टी शर्ट से अपने आप दिखाई दे रहा था गले में स्टील की दो या तीन मोटी-मोटी चैन उनमें बड़ा सा लटकता लाकेट कलाइयों में मोटे-मोटे किसी पीली धातु के कड़े लेकिन किसी भी कलाई में घड़ी नहीं थी मरे मोबाईल ने पारंपरिक घड़ी का बाजार ढीला कर दिया है बीच–बीच में मोबाईल से ही समय देखता और फुसफुसाहट के अंदाज में अभी इतना देर है अपने घर पहुँचने में समय को वह कभी स्पष्ट नहीं बोलता था |

            उमस भरी गर्मी में सभी बेहाल, डिब्बे में भीड़ की स्थिति यह, किनारे की तरफ जो उपर केवल सामान रखने की पतली पट्टीदार सीट मुश्किल से एक फुट की भी नहीं होती और आकर में बड़े क्या नवजात शिशु को भी नहीं बैठाला जा सकता गोलाई लिए होती है सीट डिब्बे की छत से ज्यादा से ज्यादा सवा फुट होगी लेकिन उसमें भी पतली कद काठी के लोग किसी तरह लेटे हुए थे उसी में किसी कि पानी की बोतल का ढक्कन पानी पीने के बाद शायद ठीक से बंद नहीं कर पाया होगा

पानी उस टपोरीनुमा लड़के की गर्दन से होता हुआ उसकी काली स्लीवलेस टी शर्ट में घुस गया ऐसा लगा कि वह अब अपनी बाडी-शाडी का प्रदर्शन करते हुए रौब दिखायेगा पर वैसा कुछ भी नहीं हुआ खड़ा हुआ टी शर्ट उतारी हलके से झटका फिर पहन लिया| उतनी ही देर में दिखाई पड़ गया कि उसकी बे-बाल की चौड़ी छाती में ढेरों टैटू गुदे हुए थे पीठ और कमर पर अजीब जूनून था उसे इतने परमानेंट टैटू बनवाने का कोई फूल-पत्ती नहीं किस्म-किस्म के कीड़ों के औ तिकोने दिल को भेदता तीर, और नहीं तो डरावने-डरावने से आकार वाले चित्र

            एक सहयात्री ने टोक ही दिया ‘यार इतने गोदना! पिरान नाही का तोहे

 ‘उधर का इतना दरद था इधर का दरद तो कुछ भी नहीं लगा’ कुछ-कुछ लापरवाही भरा जवाब था उसका वह क्यों दिखाये अपनी संजीदगी किसी भी अजनबी के आगे उधर का दरद में वह दोनों जगह का कम से कम शब्दों में बयान कर गया था

 गावों में भूमिहीन वह भी अवर्ण किसानो के दुःख – दरद अनगिनत होते हैं वह किस –किस को बयान करें और किससे कहे और क्यों कहे? कोई निदान करे तब ना कहे या फिर अपनी हंसी उड्वाये वह बुद्धू, बुधना से बुद्धिदेव हो गया था कारण वही पुराना कि वह बुधवार को पैदा हुआ था वह पांच वर्ष बाद अपने गाँव लौट रहा था उसका गाँव निछान ठाकुरों का गाँव बाकी किस्म-किस्म के  अवर्णों की टोलियाँ ज्यादातर की दक्खिन दिशा में ही बसावट थी कुछ अपने मालिकों की दया किरपा  से या यूँ कहिये वह अपनी जरुरत अनुसार एक दो कोठरी की जगह दूसरी दिशाओं में दे दिए ताकि टैम-कुटैम उनको गोहरा सकें

            फिलवक्त उसका एक ही लक्ष्य अपनी  माँ को ठाकुर –ठाकुरदीन से मुक्त करवा के अपने साथ दिल्ली ले जाना ऐसा नहीं था कि ठाकुर साब ने उसकी माँ को कैद कर रखा हो या रखैल जैसा कुछ हो लेकिन उसकी माँ से वह वैसा काम करवाते जो उसे हरगिज नहीं पसंद था बात काम की नहीं थी थी उनकी नियत की? बात उस समय की हैं जब उसके पिता बचना को परीक्षण में फोते में कैसर निकला था डाक्टर ने साफ कहा था कोई पुरानी चोट है जो धीरे-धीरे  कैंसर में बदल गयी गाँवो में तो जिसका खेत जोते बोवे वही उसका मालिक वह गये ‘बाबू साब हमका दवाई बरे ढेर पैसा चाही’ ‘काय्य्बे कौन बेमारी डाक्टर बताइस की ढेर पैसा लगी’

            बचना ने डाक्टर का परचा ठाकुरदीन के आगे खिसका दिया था अंग्रेजी लिखावट वाले पर्चे में वह देखकर क्या समझे कितना समझे यह तो ठाकुरदीन ही जाने पर नामी डाक्टर का नाम पढ़ कर जो समझे वह ‘काय्य् बे ओतना मंहगा डाक्टर के लगे जायके  कवन जरुरत रही’? एक फटकार  और धिक्कार दोनों थी उसमें ‘बाबू जवन बीमारी भय बा ओकर एलाज वोंहीं होई’ बात उसने जितनी सहजता से कही पर अंदर से वह उतना सहज था, नहीं डाक्टर ने तो स्पष्ट ठेठ हिन्दी में उसे समझा दिया था

‘कितना चाहिए आखिर? कभी –कभी ठाकुर-ठाकुरदीन पता नहीं रौब के लिए या दिखने के लिये दिहाती से खडी हिन्दी बोलने लगते पुर्वान्चल में जमींदारी लगभग ख़तम हो गयी परन्तु सभ्यता को अभी भी कुछ मजबूत किसान बचाए हुए हैं जैसे ठाकुर-ठाकुरदीन हिसाब किताब नफा नुकसान का गणित लगाया, चार दिन तक फिर उसे पैसा के लिये हामी भर दिए

            उन चार दिनों में बचना बचना-बो के मन में ऊब-चूभ लगी रही बडकउ और दादा अलग हैरान पर कोई किसी से अपनी परेशानी नहीं बाँट रहा क्या कहे और करे एक दूसरे से लाचार चारो लोग आसरा ठाकुर-ठाकुरदीन इस समय वही उनके भगवान तारणहार आखिर उन्होंने उसका छै कूला खेत के बदले पैसा दे दिया था उसकी मजबूरी ने उसे भूमिहीन कर दिया था जो उनकी ताकत में था उन्होंने वही किया जितना पैसा, वैसा इलाज, और उतने ही दिन की जिन्दगी बचना को नसीब हुयी बच रही बुधना की माँ, बुधना, एक ठो दादा (बड़का बाबू) और बुधना का बड़ा भाई बडकउ यह सारे लोग ठाकुरदीन के यहाँ किसी ना किसी काम में लगे हुए थे बस खाना खर्चा किसी तरह चल रहा बुधना की माँ रोज नियम से ठाकुरदीन, बहू के बुकुआ पीसी सरसों का उबटन लगाती उनको हैण्ड पम्प  के नीचे बैठाल कर लगातार चलते हुए नहलाती जबतक की उनको ठंडक का एहसास ना होने लगे उनका ही साज श्रृंगार सेवाटहल में लगी रहती जो कुछ वक्त बचता उसमें अपने घर का काम करती थी बुधना तब किशोरावस्था को पहुँच रहा था वह भी उन्ही के यहाँ बेगारी पर था भोर होने से लेकर सैय्या पर जाने तक बुधना की माँ कद-काठी से ठीक-ठाक साधारण नयन नक्श एक खासियत कि वह बड़े सलीके से और साफ सुथरी रहती थी उबटन  लगाने, ठकुराईन को नहलाने, संवारने के बाद तुरंत जाती रेह से अपना लूगा-लत्ता रोज साफ करती थी



            कुछ मर्द केवल घर के बाहर की ही कमान संभाल रखते हैं घर के अंदर का मलिकाना मेहरारू के हाथ में होता है परन्तु ठाकुर-ठाकुरदीन कुछ-कुछ मेहरा टाइप के बाहर-भीतर  हर जगह दखल दिये रहतेऐसों की मेहरिया चाह कर के भी पति की बेजा भावनाओं- इच्छाओं का विरोध नहीं कर पाती मेहरारू ठाकुरदीन साहस तो दिखाती पर ठाकुरदीन की पैंतरेबाजी के आगे ज्यादा देर टिक नहीं पाती थी ऐसी लाचार विधवा स्त्री पर मालिक की निगाह न पड़ती हो, यह कैसे संभव हो सकता था लेकिन ठकुराईन ही उसे अपने आप में इतना लपेटे रहती कि ठाकुरदीन अपने लिए दिमाग दौडाते लेकिन स्पेस नहीं पा रहे थे वह लक्ष्य के लिये  दिमागी मशक्कत करता रहे आखिर कैसे न मिलता

उनके भी देह में आये दिन पिरान की शिकायत रहने लगी। आये दिन ठकुराईन से लड़ियाते हुए दर्ज भी कराते खिसिया के एक दिन ठकुराईन ने कह ही दिया, ‘तुहू लगवावा करा बुकुआ तेल हमरे हिसकन’ बिना हील-हुज्जत के झोली में हीर–मोती आ गिरी औरत मरद की निगाह ना पहचाने यह हो भी कैसे सकता है समझ तो वह बहुत दिनों से रही थी कसमसाते, हल्की नाराजगी दिखाते हुए, अपने बिगड़े समय को पहचानते हुए, दबे मन से हामीं भरी भरी क्या उससे भरवाई गयी थी

‘जब तू हमरे लगावत हउ तो उनहू के तो चाही की लगा दा मरद हएन मजबूत रहिही तो तोहरेन सबके बरे न करीहिंगा’ मन ही मन बुदबुदाई बुधना की माँ ‘करिहैं कि हमार सरबस छीन लिहेन,अब जवन कुछ बचा अहै उहो के फ़िराक मा हएन पढाई नाही बा हमरे लगे का समझदरियो घुसुर गै बा’

बुधना की माँ रच-रच के सरसों पीसती ठकुराईन की शरम हया को प्यार से ‘काय्य्य मलकिन  हमरे से का लजावत हऊ जऊन तोहरे तवन हमरे’ शरीर के हर अंग में बुकुआ लगती गोरी, चिट्टी, मांसल देह, रपटीली चमड़ी की ठकुराईन बुधना की माँ को एक अलग किस्म का आनंद धीरे –धीरे आने लगा था आखिर वो भी एक औरत थी उसके पास भी जज्बात और उसकी जरूरते थीं जब वह उनके अति संवेदनशील अंगों पर धीरे-धीरे प्यार से लगाती-मीसती, उसे और उन्हें भी न अखरता न अचरज होता घनिष्टता का पैमाना यहाँ तक पहुंच गया कि कभी-कभी आपस में एक दूसरे के अंगो से खेल-खिलवाड़ भी कर लेती उस घड़ी मालकिन–मजूरनी का भेद मिट जाता था कोठरी के बाहर मालकिन अपने ढब में आ जाती लेकिन मया का एक कोना उनके हिरदय में जगह पा चुका था हर दिन अगले दिन का इंतजार रहता था दोनों जनी को एक तरह से आपसी ठिठोली–संतुष्टी वाला बहनापा कोठरी के अंदर अपनी जगह बना चुका था

            अमूमन पति पत्नी के रिश्तों में एक कठोर होता हैं तो एक कोमल-निर्मल शायद यह प्रक्रिया स्वत: बन जाती है ठाकुरदीन की पत्नी भक्ति परायण अति मानवीय और सरल ह्रदय वाली बुधना की माँ की हर परेशानी की राजदार-रहमदार वह भी ठकुराईन के प्रति उतनी ही समर्पित

अगले दिन से ठाकुरदीन के भी बुकुआ लगना शुरू हो गया था वह एक शहराती कट चडढी पहने नंगे बदन लगवाते नंग-धडंग, हट्टा-कट्टा, अध् नंगा शरीर भूखी आंखे, अघाई आखों, प्रेमिल आखों में फर्क होता है जो आसानी से पहचानी जा सकती हैं बुधना की माँ ने महसूस किया था ठाकुरदीन की आँखें भयभीत कर देने वाली थी हर दो मिनट में अपना पल्लू ठीक करती उंगली के सहारे अपने डर को वह इसी तरीके से कम कर रही थी उसे शुरुवाती दिनों में एक स्वाभाविक सा डर  शील–शरम, संकोच होता वह भी जल्दी से निबटाने के चक्कर में रहती ठकुराईन से बचा खुचा बुकुआ ही बस चटनी के माफिक लगाती ताकि देर तक शरीर पर रगड़ना न पड़े हल्का सा कडू तेल तन में चटा के मात्र पद्रह मिनट में फारिग हो लेती ठाकुरदीन बेहयाई से टोंकता क्या, भद्दी जबान के साथ

‘ई का$$$ रे हम जमत नही बाटी का ........निबटाबे के फेर में रहे ले..........मालकिन का तो तू दु-दु, तीन-तीन घंटा घिसत हऊ, हा-हा, ही-ही ठठ्ठा चलत रहत हय कोठरी मा बुधना की माँ स्तब्ध और सन्नाटे में आ गयी फिर पैतरा बदल.....’ तोर घरवा अनाजे से भर देब तनी एहर देख ....’ वह कंहा ठाकुरदीन के डायलागों पर कान देती थी उसकी लापरवाह निगाहों से खिसियाता ठाकुरदीन 

‘का रे ई भैंस जइसन शरीर-जांगर केकरे बरे बचावत हऐ तैं, ऊ नेरबसिया बरे का.......हमरेंन से कलियान होई मालकिन न कुछ का पइहै फटा पुराना लूगा तक रह जइबू ............ वह चुप तो चुप एक चुप हजार चुप ठकुराईन तो अपनी कोठरी में लगवाती थी लेकिन ठाकुरदीन ने ओसारा चुना था, वहीं तख्त पर लेटते और लगवाते आते-जाते लोगों को अपनी ठकुरई का अहसास भी करवाते उनके शरीर का पिरान पता नहीं गया कि नहीं लेकिन बुधना जब भी देखता उसके तन में ऐठन शुरू हो जाती वह चीखता ‘माई चल घरे ......चल, का खाना न बनावे क ह ........बता न बनइबे कि न .......न त हम जाई पानी पी के ओलर रही’

            वह हर दिन दो तरह के डर से भर उठती एक ठाकुरदीन का दूसरा बेटा का जो रोज ब रोज धमकिया जाता उसके स्त्रीत्व और ममत्व को ऐसी जली-कटी बातें सुन कर बुधना की माँ फटाफट समेटना शुरू कर देती ऐसा ही कुछ–कुछ रोज ब रोज होता था ठाकुरदीन जैसे ही बुधना को देखते किसी न किसी काम में लपेट देते पर बुधना इतना न समझ भी न था वह जाता तो लेकिन ठाकुरदीन के बहाने से माँ को फटकारता चला जाता ठाकुरदीन की ठकुराई सर पर आ गयी कई दिन का गुस्सा समेटे-समेटे एक दिन बाहर निकल ही पड़ा अपने ही घर के अलाने –फलाने को लगा दिया उसके पीछे छै सात ठो झापड़ घूंसा लात रसीद करवा दिया बिला वजह



वह जमाना लद गया जब मजूर या मजूरों के बच्चे इसे अपनी नियति मान रो-धो के पुनः, ‘हो मालिक, जी साहेब करा करते थे बुधना कई दिनों तक माथा पच्ची करता रहा अपमान की आग में झुलसता रहा माई का दो ठो लच्छा चुरा भाग गया दिल्ली अपनी हाल खबर माँ को देता रहा पीसीओ से ठाकुरदीन के चोंगा वाले वाले फोन पर गाँव नहीं आया तो नहीं ही आया बस एक ही धुन कमाऊंगा शरीर दुरुस्त करूँगा तब जाकर ठाकुरदीन के सामने ताव से खड़ा होऊंगा

बुधना के भागने को बुधना की माँ क्या आसानी से पचा पाई थी? उसे वह दिन अच्छी तरह याद आ रहा था जब ठाकुर-ठाकुरदीन ने जरा सी गलती पर अपने कइयों कोरा वाले कुत्तों में से एक कुत्ते को लुहकार दिया था बचना पर उसने बस एक पंजा ही तो मार दिया था कूदकर जो दुर्भाग्य से उसके फोते पर लगा था पतली धोती चीर उठी थी, हल्का सा नाख़ून भर लग पाया था लेकिन धुस्स चोट लग गयी थी एक चींख के साथ वहीं बैठ गया था वह चोटिल जगह फूली तो फिर कभी पिचकी नहीं बल्कि आकर में बढ़ता ही गया था | चलता तो लगता अलग से कुछ सामने बंधा हुआ है बैठता तो लगता सामने छोटी-मोटी गठरी रखी हुयी हैं चाल में असहजता रहती थी सच पूंछो तो वह गलती कोई गलती न थी उसने उनके किसी रिश्तेदार को पैलगी न कह कर हाथ जोड़ नमस्ते कहा था बस फिर क्या ‘स्स्साले मेहरी के टाग के सीका के एतनी हिम्मत’ठाकुर-ठाकुरदीन चबाते हुए चीखे थे पूरी-पूरी पर निर्भरता जो न करवाए, सहवाए और डरवाए

            कई ठो काम करने के बाद उसने वही काम चुना जहाँ से दो पैसा मिले और शरीर भी बने वह एक जिम में हेल्पर का काम करने लगा नवधनाढ्यों को देखने समझने में तीन वर्ष गुजार दिए उनकी किस्म-किस्म की एक्सरसाइज देखता उपकरण देखता उनसे जानकारियाँ लेता जिम आने वाले जो ज़रा सरल स्वभाव् के होते उसे सही सलाह देते वह उनकी बिन मांगी मदद करता ठंडा पानी लिए खड़ा रहता, उनको वक्त –वक्त पर पसीना पोंछने को टावेल देता आदि-आदि जिसको जैसी जरुरत वैसी उसकी सेवा करता बदले में शरीर बनाने की सारी जानकारियां इकठ्ठा कर रहा होता थोड़े –मोड़े टिप्स के रूप में कुछ अतिरिक्त कमाई भी हो जाती जिसे देखो वही बुद्धिदेव-बुद्धिदेव करता वह भी सुबह ५ से लेकर १० बजे तक फिरिंगी की तरह कभी किसी के पास खड़ा मिलता कभी के पास कस्टमर खुश तो मालिक दोगुना खुश उन्ही किन्ही खुशी के क्षणों में मालिक ने एक सलाह दे डाली ‘तू भी अपना शरीर बना ले मिलिट्री में सिपाही तो हो ही जायेगा’ बुधना आश्चर्य मिश्रित खुशी  के साथ ‘सचच्चे मालिक’ ‘तो क्या झूठ बोल रहा और वह भी तुझसे’ उसके दिमाग में एक और सपने ने जन्म ले लिया था और अपनी मुफीद उम्र का इंतजार करने लगा जब तक उम्र हुयी तब तक बुधना जिम मालिक का चहेता बन चुका था अब काम से बचे वक्त में अपना शरीर बनाने में जुट गया था शरीर कैसे आकर्षक लगे और दिखे तो, कैसे खतरनाक दिखे वह सब भी उसने कर लिया था तभी तो शरीर पर किस्म-किस्म के गोदना बनवा लिये थे उसे हर टैटू में असहनीय दरद होता लोग कहते है कि दिल-दिमाग के दर्द को शरीर का दरद कम करता हैं जैसे विष-विष को काटता है वैसे ही दर्द भी है जितनी बार वह गोदना गोद्वाता उतनी बार उसके आत्मविश्वास की एक परत चढ़ उठती ठाकुरदीन से सामना करने की

पक्की सडक से उतर कच्ची पगडंडी से घर तक ढेरों लोग मिले पर उसे किसी ने भी न पहचाना  न ही उसने किसी को पैलगी ही की वजह कोई घमंड–गुरुर नहीं, वही कि पहले माँ देखे फिर ठाकुरदीन मोबाईल और उसका इयर फोन लपेट-लपाट के जींस के पाकेट में डाल लिया था बाहर ओसारे से ही  ‘माई –माई रे .......’ माँ आवाज कैसे न पहचानती बाहर अचरज से बुधना को देखती रही फिर लगी लिपट के सिसक-सिसक के रोने जाहिर था कि वह खुशी के आंसू रहे होंगे दोपहर से पहले ही पहुंचा था खमटीयाव का वक्त जा चुका था पानी गुड चबैना ले, वह सीधे ठाकुरदीन के दरवाजे गया दूर से ही ‘मालिक पैलगी’ उस पैलगी में उसके अपने कुछ बन जाने का या कुछ हो जाने का एहसास था ठाकुरदीन की आंखे डर मिश्रित आश्चर्य से फ़ैल गयी तब तक वह उसकी वेशभूषा को जाँच परख रहे काली गोल गले की टाईट फिट टी शर्ट और फेडेड जींस बाकी शरीर पर कड़े, छल्ले, मुनरी, संकरी तो थी ही सीने का स्पष्ट उभार पेट पिचका हुआ मछलियाँ रह-रह के हिलती–डुलती हुयी एक डर का एहसास देती हुयी सी कुछ देर बाद ठाकुरदीन अपनी चेतना अवस्था में लौटे और ‘खुश रहा,खुश रहा’ मुंह से निकालना ही पड़ा

‘का$$$ रेय्य्य बुधना दील्ली में का करत रहे एतना दिन’ उनका सेफ्लाना साफ दिख रहा था, जिसमें वह मौका-ऐ सिद्धहस्त थे  
‘हेफ्फर का काम ......
का $$$$$$?
हेफ्फर .............
            उनकी समझ में आया कि नहीं यह तो वही जाने लेकिन बुधना का उच्चारण वही रहा जो उसने अपनी तरह से सीखा था ठाकुरदीन मन ही मन में सोंच रहे कुछ अच्छा काम पा गया है तभी इसकी कमाई इसके शरीर पर दिख रही
‘कय  दिन बरे आए हए’ ? वह क्यूँ बताए और किसलिए बताए
‘माई के लियाय  जाऊंगा
‘आ काहे...............जरा हिचकते–हुए से ठाकुरदीन
‘का कौनो उनके परशानी बा’?
‘परशानी हमको है जी’| दांत चबाते हुए बोला था
‘हम बचना नहीं हैं बुधना हैं माई क कोखी क अजीवन करजवार हई कउनो पांच मिनट मां सेन्हुर नहीं फेरें हैं कि डरा जाए।'

‘आपन पैसा लो पचास हजार ......’ पचास हजार जिसको उसने हिकारत और गर्व के साथ कहा था पांच सौ की एक गड्डी निकाल पाकेट से उनकी तख़्त की सफ़ेद चादर  पर धमक के साथ रख दिया था
‘ माई मेरे साथ जायेगी .........दादा ,बड़का  भईया के जवन मर्जी होए
‘बहुत जल्दी मलिटरी में होने वाला हूँ बस मेडीकल बाकी है
समझया.............ठाकुरदीन’ ठाकुरदीन का न हर्फ़ बड़ी देर तक हवा में गूंजता रहा
            इतना कह कर वहाँ से चल दिया था पहली बार किसी परजा ने ठाकुरदीन के मुंह पर  उनके नाम से उनको संबोधित किया था
            ठाकुरदीन गड्डी समेट सकुचाए भी, डरे तो हैं ही अब शायद वह बुधना की माँ पर हक़ न जता पाएंगे


संपर्क- 
नीलम शंकर
सी-12 ,एच.आई.जी.- गोविंदपुर कालोनी

इलाहाबाद-211004

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