महेश चन्द्र पुनेठा


पहली बार हमने एक नयी श्रृंखला प्रारम्भ की है जिसके अंतर्गत एक कवि की कवितायें दूसरे कवि की टिप्पणी के साथ प्रस्तुत की जा रही हैं. इसी क्रम में प्रस्तुत हैं महेश चन्द्र  पुनेठा की कवितायें शैलेय की टिप्पणी के साथ.

महेश चन्द्र पुनेठा लोक के बहुत गहरे कवि हैं। गौरतलब है कि उनके यहां लोक किसी सामान्य उद्वरण सामान्य मुहावरे की तरह नहीं बल्कि वह अपनी गहन संवेदना से सम्पृक्त व्यापक सरोकारों के आख्यान की तरह खुलता चला जाता है। पहाड़ के कवि होने के नाते यह बहुत सहज स्वाभाविक है कि अनगिनत घाटियों सी गहरी-गहरी पीड़ाएं और हरी-भरी अगाध ऊंचाइयों का उद्दाम आवेग उनकी कविताओं का प्राथमिक विषय है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि पुनेठा सुमित्रानंदन पन्त की तरह महज प्रकृति के सुकुमार कवि बन कर ठहर नहीं जाते । वे पहाड़ के कठोर जन-जीवन में भीतर तक पै करते हैं और वहां की विषम जमीनी सच्चाइयों को रचना के धरातल र ला कर पाठक से रूबरू कराते हैं।
 

यह सुखद आश्वस्ति है कि पुनेठा ने अपने पहले कविता संग्रह भय अतल में की हदों को तोड़ते हुए अपनी कविता में व्यंजनाओं की नई जमीन स्थापित की है। जहां भौगोलिक परिवेश के साथ -साथ सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक संघर्षशीलता भी बराबर दर्ज है। इसलिए उनकी कविताओं में लोक भाषा -बोली के शब्दों की बहुतायत के साथ-साथ लोकोक्तियों मुहावरों और किंवदंतियों का सजीव चित्रण मिलता है। लोकोन्मुखता मिलती है। उनके यहां पहाड़ के अतीव सौंदर्य के साथ ही वहां की अदम्य संघर्षशीलता की भी स्थापना है। इसीलिए उनकी प्रेम कविताएं भी पर्याप्त भिन्न छटाएं लिए हुए है। जीवन के प्रति गहन सम्पृक्ति के इस कवि को पढ़ना सचमुच पहाड़ से होते हुए पहाड़ी ही हो जाना है। कविता की कुछ ऊंचाई चढ़ लेना है।
-शैलेय
  
अकाल मृत्यु एक शिल्प की
 
गया था गॉव जब इस बार
पता चला 
नहीं रहा उमेद राम 
ऑखों में 
घूमने लगा उसका रूप 
उकड़ू बैठा 
एक हाथ में बसूला दूसरे में छीनी 
एक डेढ़ बेत का निंगाल 
धीरे धीरे प्रहार करता जिसमें 
फिर मुंह से लगा स्वर जॉचता 
एक छोटी सी चोट मारता और 
दत्तचित्त 
मीठे मीठे और मीठे सुर भरने में 
भर देना चाहता हो जैसे 
संसार भर का मोद 
अपने दुख दर्दों को भुला कर 
एक छोटी सी मुरली में। 
याद आने लगा 
उसका बेजोड़ हुनर 
सुर संधान कर देता जो 
निंगाल की एक निर्जीव पतली डंडी में गूंजती थी जो मेले मेले में 
मोष्टामानू से चौपखिया तक 
देवीधूरा से जौलजीवी तक 
नहीं छूटता था कोई भी कौतिक 
दिख नहीं जाता जहॉ वह 
बेचते हुए मुरली 
मेले से 
आठ दस रोज पहले से 
फुरसत नहीं होती थी उसे 
खाना खाने तक की भी 
रात दिन लगा रहता 
मुरली तैयार करने में

लोग बताते हैं

मृत्यु से बहुत पहले 
छोड़ दिया था उसने मुरली बनाना 
पकड़ ली थी हल की मूंठ  
हल वाला बन गया था पंडितों का 
करता भी क्या 
बहुत कम हो चली थी भीड़ भाड़ 
मेलों में 
हो चले शराबियों जुआरियों के अड्डे 
बहुत कम हो गयी थी 
बच्चों की रूचि मुरली में 
जापानी या चीनी 
फैंसी खिलौनों ने ले ली जगह उसकी ।

फिर भी 

फुरसत में होता जब कभी वह 
बना लेता एक दो मुरली 
बीते दिनों को याद करते हुए 
मृत्यु के बाद 
न जाने कहॉ फेंक दी लड़कों ने 
बॅट गये बसुला और छीनी 
लड़कों के बीच 
उसकी संपत्ति की तरह । 
एक उम्र खाये शिल्पी के साथ 
अकाल मृत्यु हो गयी एक शिल्प की ।


पहाड़ टूटना

नहीं....नहीं ....
मुझे इल्जाम न दो
मैं कहाँ टूटता हूँ आदमी पर
आदमी टूट रहा है मुझ पर ।

मेरे बाल
मेरी खाल
मेरी हड्डी
मेरी मज्जा
मेरी पेशियाँ
मेरी आँतें
क्या छोड़ा है उसने साबूत मेरा

मुझे कूटा   मुझे लूटा
मुझे छेड़ा   मुझे उधेड़ा
मुझे काटा  मुझे पीटा
मुझे तोड़ा  मुझे फोड़ा
मुझे सुखाया  मुझे डुबाया
क्या क्या न किया जा रहा मुझसे

मेरा रोना
मेरा कराहना
मेरा तड़फना
मेरा कलपना
मेरा चीखना
नहीं दिखाई देता कभी उसे

मैं कहाँ किसी पर टूटता हूँ

मैं तो खड़ा रहना चाहता हूँ अडिग
मैं जानता हूँ
उसी में मेरी आन है बान है शान है

मैं तो चुपचाप देखता रहता हूँ
जब तक रह पाता हूँ
खड़ा रहता हूँ
खोद दी जाती हैं जड़ें मेरी तो
टूटना मेरी नियति है।

मुझे नहीं मालूम
कौन मेरे नीचे आ कर दब गए
किसके उजड़ गए परिवार

किसकी करनी ,किसकी भरनी ।

दुःख अवश्य होता है कि
जिनको खेलाया-कुदाया अपनी गोद में
उनकी ही कब्र बन बैठा

मुझे मालूम है इनकी कोई लड़ाई नहीं मुझसे
न कोई प्रतिस्पर्धा
मुझसे अलग कहाँ हैं ये
इनकी जरूरतों को पहचानता हूँ मैं
ये भी जानते हैं मेरी आदतों को
मैंने जो दिया इन्हें
सहर्ष स्वीकारा इन्होंने
इनका खोदना गोड़ना , चलना-फिरना
हमेशा से प्रीतिकर ही लगता रहा है मुझे
इनकी कुदाल-कस्सी-फावड़ा
गैंठी-बेल्चा-संबल
मुझे गुदगुदाते हैं बहुत
इनके बिना तो मैं भी रहता हूँ
उदास-उदास सा
सदियों से साथ रहा है इनका और मेरा

पर जिसकी इच्छाएं नहीं होती तृप्त
भूख नहीं होती शांत
क्या-क्या न! बना डाला है उन्होंने
मुझे तोड़ने-फोड़ने-छेदने-काटने के लिए
जैसे यु़द्ध करने उतरे हों मुझसे
मुझे नहीं पता
उनके  अस्त्र-शस्त्र-विस्फोटकों के नाम
ये फनाकार-सूँड़ाकार-पंजाकार
राक्षसी मिथक को मात देने वाले
कितने विशालकाय
कितने मारक हैं ।
मुझे जीतने आये हैं वे
या
खुद को हारने
मैं कह नहीं सकता
मैं तो कह सकता हूँ सिर्फ इतना
मैं कहाँ टूटता हूँ आदमी पर.........।

उन्हें चिंता है

उन्हें चिंता है कि खत्म होती जा रही हैं लोकबोली-लोकसंस्कृति

चलाया है उन्होंने अभियान उसे बचाने का
आयोजित किए जा रहे हैं गोष्ठियाँ-सेमीनार
निकाली जा रही हैं पत्र-पत्रिकाएं
रचा जा रहा है लोकबोली में साहित्य
प्रोत्साहित किया जा रहा है अपनी बोली में बातचीत के लिए
देशी व्यंजनों/अनाजों/औजारों/बर्तनों/आभूषणों/वस्त्रों आदि से जुड़े
शामिल किया जा रहा है शब्दकोशों में उन्हें

जब तक शब्द शामिल हो रहे शब्दकोशों में
चीजें गायब हो जा रही हैं जीवन से
उन्हें चिंता है कि खत्म होती जा रहीं हैं लोक बोलियाँ ।


पहाड़ की खेती और माँ

लगी हूँ दिन.रात
लगी हूँ वर्षों से
जैसे गाड़.गधेरों में बहता पानी
जैसे इन पहाड़ियों और घाटियों के बीच चलती हवा
नहीं मिला पीठ सीधी करने का वक्त भी

बहुत हो गया अब
सिर भी पैरों को मिलने आया

होश भी नहीं संभाला था ठीक से
उससे भी पुराना है इस मिट्टी से नाता
अपने से अधिक इस मिट्टी को जानती हूँ
इसके रूप.रंग.गंध को
इसकी खुशी और उसके रुदन को
इसकी जरूरत को

रौखड़ भी कमता किया
दलदल में भी डूबी रही
चिलकोई घाम में तपी
चौमासी झड़ में भीगी
ओस.तुस्यार की नहीं की परवाह कभी
रक्त.हड्डी.मांस गलाया सभी
खाए.अधखाए घूमती रही जातरे की हथिनी सी
पानी कहाँ
आँसू.खून.पसीने से सींची
पूरा परिवार जुता रहा अपनी.अपनी तरह से
बच्चे नहीं कर पाए ठीक से पढ़ाई
बुति के दिनों तो कम ही हो पाता स्कूल जाना उनका
चाहे.अनचाहे
खेती.बाड़ी के काम ही उनके खेल बन गए
खीजते रहते थे बच्चे खूब
फिर भी लगे रहते मेरे साथ सभी

पर फसल
कभी अकाल ने सुखाई
कभी ओलों ने मारी
कभी जंगली जानवरों ने खाई
बीज भी मुश्किल से रख पाई
सब ठीक.ठाक भी रहा तो
आधे साल भी परिवार का पेट नहीं भर पाई

अब तो और भी खराब हाल हैं
बढ़ गया है जंगली जानवरों का आतंक
गुन.बानर तो भीतर तक ही घुस आते हैं
बीज उजड़ चुका है अपना
ब्लाक के भरोसे रहना ठैरा
बिन यूरिया के कुछ होता नहीं
हल.बैल अपने हाथ हुए नहीं

कभी सोचती हूँ बहुत हो गया अब
चली जाऊँ बड़े के साथ शहर
बहुत कहता है.माँ आ जा यहाँ
रूखी.सूखी जैसी भी है साथ मिल कर खाएंगे
दुःख.बीमार देखभाल  दवा.दारू भी हो जाएगी
खूब कर दिया है जिंदगी भर
अब थोड़ा आराम कर

फिर हूक.सी उठती है इक
क्या कहेगी यह मिट्टी
हारे.गाड़े काम सराया जिसने
कैसे छोड़ चली जाऊँगी उसे
बचपन से अब तक जिसके साथ रही
मेरे आँसू.खून.पसीने की गंध बसी
कैसे रहूँगी इस सबके बिना शहर

पुरखों की जमीन
बंजर अच्छी नहीं दिखती
हरे.भरे खेतों के बीच बंजर जमीन
मजाक उड़ाएंगे
भाई.बिरादरी के लोग भी

नहीं.नहीं
जमीन का बंजर रहना अपशगुन माना जाता है

और कुछ न सही
मन तो लगा रहता है इसके साथ
इधर.उधर चलना.फिरना हो जाता है
वहाँ तो अभी से घोलि जाऊँगी
क्या जिंदगी है पिजड़े में बंद पंछी की
पंख भी पूरे फड़फड़ा नहीं पाता ।

नहीं.नहीं मैं यहीं ठीक हूँ

दुःख की तासीर


पिछले दो-तीन दिन से
बेटा नहीं कर रहा सीधी मुँह बात

मुझे बहुत याद आ रहे हैं
अपने माता-पिता
और उनका दुःख

देखो ना! कितने साल लग गए मुझे
उस दुःख की तासीर समझने में।

भावी कर्णधार

उतरवाए जा रहे हैं जूते-मौजे
उलटवाई जा रही हैं खल्दियॉ-आस्तीनें
पेंट की कमर और मुहरियॉ
छात्राओं के अंतःवस्त्रों तक की
की जा रही है जॉच
हथेलियों ,बॉहों और पिंडलियों में
खोजा जा रहा है कि
कहीं लिखा न गया हो कोई
शब्द या वाक्य
कड़ी जॉच से गुजरने के बाद ही
प्रवेश दिया जा रहा है
परीक्षा कक्ष में

कक्ष निरीक्षकों की नजरें
टिकी हैं उन पर
जैसे एल.ओ.सी .पर
सैनिकों की नजरें दुश्मन पर ।

औचक
टूट पड़ते हैं उड़न दस्ते
एक बार फिर दोहराई जाती है
सघन जॉच की वही प्रक्रिया

बावजूद इसके
सेंध लगा ही लेते हैं वे
कक्ष निरीक्षकों की नजरों पर

एक्स-रे की तरह हो गई हैं उनकी आँखें
कान अतिरिक्त चौकन्ने
पिन गिरने की आवाज को भी सुन लेते हैं अभी वे
और देख लेते हैं धुँधले से धुँधले अक्षरों को भी
एक-एक शब्द और वाक्य की तलाश में
भटक रहे हैं उनके आँख-कान
जैसे बेघर घर की तलाश में ।

येन-केन प्रकारेण जोड़-जुगत कर
भर लेना चाहते हैं वे उत्तर पुस्तिकाएं

उनके मन में नहीं है कोई अपराध बोध

बल्कि इसको  अपने अक्लमंद होने के
प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते हैं व
सूख कर काठ हो गई है इनकी आत्माएँ
भावी कर्णधार हैं ये देश के।

प्रेम

1

उम्र ठहर जाएगी
त्वचा बनी रहेगी मुलायम
और इच्छाएं जवान
भर्राएगी नहीं आवाज
ऑखें खोएंगी नहीं अपनी चमक
धड़कनें अपनी होते हुए भी
नहीं रहेंगी अपनी
दुख-तकलीफों से घिरे हुए भी
दुखी न होंगे
निर्जन में भी
कभी न होंगे अकेले

गर यू ही चलती रही
दिल से दिल की जुगलबंदी ।


2

प्रवाह है जब तक
नदी नदी है ।
गति है जब तक
हवा हवा है ।
मुक्त है जब तक
प्रेम प्रेम है ।
बॅधते ही
नदी नदी नहीं
हवा हवा नहीं
और प्रेम प्रेम नहीं
उतरन मात्र रह जाते हैं इनकी ।


3

लगातार जारी है कोशिश
सदियों से, कल्पों से
तथाकथित नैतिकताओं के मंत्रों से
सुखाने की उसे
लगातार जारी है कोशिश
जाति ,धर्म और उम्र के बंधनों में
जकड़ने की उसे
लगातार जारी है कोशिश
सूली में चढ़ा कर
सर कलम कर
सरेआम नंगा घुमा कर
उसके पात्रों को
डराने -धमकाने की
पर प्रेम है कि
कठोर से कठोर दमन शिला के
नीचे से भी
प्रस्फुटित हो ही  पड़ता है
हरी-उचयभरी दूब की तरह

शैलेय हिन्दी के जाने-माने कवि हैं. इनके कविता संग्रह 'या' और 'तो' चर्चित रहे हैं. 
आजकल कुछ कहानियां और एक उपन्यास लिखने में व्यस्त हैं.
सम्प्रति इन दिनों उत्तराखंड के रुद्रपुर के एस बी एस कालेज में हिन्दी के प्राध्यापक हैं.   




टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर
    सभी रचनाएं एक से बढकर एक

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  2. bahut acchi kavitayiem hai. Punetha ji ko aur santosh ji ko badhayiyam, saath me shailey ji ko bhi.

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  3. महेश के कविताओं की तासीर कुछ ऐसी है जिसे आप बंधे-बंधाये मापदंडों से नहीं समझ सकते. जैसे पहाडी पगडंडियों पर ठीक नाक की सीध में नहीं चला जा सकता. रूकती मुड़ती हांफती आपको साथ लेकर चलती हैं. अब शैलेय को यह भी बताना चाहिए कि पहले संकलन की क्या सीमाए थी? चलते- चलते का बयान है शैलेय की ये टिप्पणी. -केशव तिवारी

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    1. mai^mahesh se toD_ee der pahale yahee kah rahaa thaa. bhaaeeyo TippaNee mahaz aupachaarikataa nahee hai.... khaas kar ke jab vah koi kavi kar rahaa ho .....

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  4. यह श्रृंखला स्वागत योग्य है. महेश हमारे समय के महत्वपूर्ण स्वर हैं. उनकी कविताएँ हाशिए के समाज का एक आदमकद वितान रचती हैं. उनकी बुनावट को लेकर मेरी अपनी असहमतियाँ हैं, लेकिन उनके कथ्य और उनकी प्रतिबद्धता को लेकर गहरा सम्मान.

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    1. sahamat. शिल्प को ले कर असहमतियाँ (बल्कि नापसन्दगी ) लाज़िमी है. लोग इधर इस बात को ज़ाहिर करने से बचते हैं . अपना स्वाद भी पाठक को ज़ाहिर करना चाहिए. तभी इंटरेक्शन पूरा और सार्थक होता है. बड़ी टिप्पणी , अशोक.

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  5. माटी की सोंधी खुशबू का अहसास करवाती पुनेठा की कवितायेँ
    -----------------------------------------------------------------
    एक कवि जो आलोचक भी हो उसकी कवितायों पर केवल पाठकीय प्रतिक्रिया ही व्यक्त की जा सकती है .महेश जी की कवितायों में स्थानीयता /आंचलिकता सम्पूर्णता में विद्यमान रहती है .वे अपने कलाकौशल से इसे सर्वव्यापक बना देते हैं .आज की कविता में से मानवीय अनुभूतियां कहीं दूर छिटकती जा रही हैं .शब्दों के असहनीय बोझ तले कविता बिलबिला रही है .कला की जादूगिरी में भाव कहीं गैरहाजिर हुए जा रहे हैं .ऐसे में महेश पुनेठा की कविता पढकर आश्वस्त हुआ जा सकता है .इनकी कवितायों में सरोकारों को लाठी से हांककर लाने की दरकार नहीं है .ये वास्तविकता के ठोस रूप से रूबरू होकर आपके समक्ष उपस्थित होती हैं .यही कवि का प्राप्य भी होता है .महेश पुनेठा से निवेदन है कि किसी भी सूरत में अपनी कविता से इस रंग को बेदखल न होने दें .आमीन .

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  6. बहुत गहरी कवितायेँ , बहुत दर्द है पहाड़ के टूटन में

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  7. महेश की कवितायेँ ऊबड़-खाबड़ हैं अपनी बुनावट में, पहाड़ की तरह अनगढ़, नैसर्गिक, सहज सुन्दर. विषय-वस्तु की विविधता पाठक की कल्पनाशीलता को कुरेदती है, उसे अपने साथ ऊँचे-नीचे, टेढ़े-मेढे रास्तों की सैर करती है, उसके अनुभव संसार को विस्तार देती है. सबसे अच्छा लगा कि कोई इन कविताओं में बड़बोलापन नहीं है, कुछ-कुछ 'बात बोलेगी, हम नहीं' जैसा. शैलेय की संक्षिप्त टिप्पणी भी महेश के बहाने कविता और पहाड़ के लोकजीवन की एक कविनुमा झलकी प्रस्तुत करती है. उम्मीद है, यह सिलसिला जारी रहेगा.

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  8. महेश पुनेठा लोक और जनपदीय चेतना के कवि हैं,उनकी कविताओं का कथ्य जहाँ उन्हें अपनी किस्म का अनूठा कवि बनाता है वही शब्दों और भावों को अपने लोक की माटी में शानकर पेश करने वाले वे विलक्षण शिल्पी भी है,अपने इर्द गिर्द के विषयों पर वो कह देना जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है ,उनके श्रेष्ठ शिल्पी होने का प्रमाण है,कविता के विषय पहाड़ के मगर बिना लोकभाषा के कविता हिंदी में ? खिन, सिंटोला, पहाड़ टूटना, आकाल मृत्यु एक शिल्प की,................... एक लम्बी श्रृंखला है, जो पहाड़ जानते है वो रीझते है ऐसे कथ्य और शिल्प संगम से उपजी कविताओ पर, अनुपम साहित्यिक योगदान, आपको सलाम

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  9. महेश की कवितायें अपने उद्गम को साफ़ साफ़ बताती चलती हैं | और यही कारण है कि वे जहाँ खड़े होते हैं , उसे भी साफ़ साफ़ देखा और समझा जा सकता है ...आज जब कविताओं में कहने से अधिक छिपाने पर ध्यान दिया जाता हो , यह साफगोई आश्वस्ति प्रदान करती है ....बधाई उन्हें ...

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  10. आप बहुत अच्छा लिखते हैं। नियमितरीप से आप ब्लॉग में अपनी रचनाएँ लगाते रहिए, हम पढ़ते रहेंगे!

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  11. पुनेठा जी जमीन से जुड़े हुए शब्द षिल्पी हैं , तभी तो उनकी कविताओं के माध्यम से पहाड़ी अंचल अपनी बात कहता है। जगदलपुर के पास ही कि एक पहाड़ी मुझे याद आ गई जिसकी जगह अब खुला मैदान ही बचा है, अब वह पहाड़ टूट कर किसी सड़क या मकान का हिस्सा बन चुका होगा। शैलेष जी की समीक्षा के साथ पुनेठा जी को पढ़ना अच्छा लगा बधाई

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  12. पुनेठा जी जमीन से जुड़े हुए शब्द षिल्पी हैं , तभी तो उनकी कविताओं के माध्यम से पहाड़ी अंचल अपनी बात कहता है। जगदलपुर के पास ही कि एक पहाड़ी मुझे याद आ गई जिसकी जगह अब खुला मैदान ही बचा है, अब वह पहाड़ टूट कर किसी सड़क या मकान का हिस्सा बन चुका होगा। शैलेष जी की समीक्षा के साथ पुनेठा जी को पढ़ना अच्छा लगा बधाई

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  13. अपनी समझ और बुनावट को लगातार चमकदार करते जा रहे युवा कवि का नाम है - महेश चन्द पुनेठा . अपने आत्मा में रचे -बसे गाँव , पहाड़ , अंचल , बस्ती , पुरवा , डाबर , नदी , कछार ,खेती -किसानी को जब पुनेठा जी कविता की सान पर चढ़ाते हैं , तो करुणा और प्रेम के रसायन में डूबी हुई पंक्तियाँ निकलती हैं , और वहीँ वे अपनी सम्पूर्णता में नजर आते हैं. तथ्य , वस्तु, रूप , घटना , मौन अस्तित्व के भीतर प्रवेश करने की दुर्लभ और श्रम-साध्य कला भी पुनेठा जी में निरंतर विकसित हो रही है , जो की उनके उपजाऊ मन और मौलिक सजगता का संकेत है . कभी विषय की सीधी वर्णनात्मकता और कभी चिर -परिचित अर्थ को विशेष अर्थ का दर्जा देने से चूक जाना इनके कवि की सीमाएं भी तय कर देता है . पुनेठा जी की कवितायेँ साहित्यकारों के लिए कम , आम पाठकों के लिए अधिक हैं , इसीलिए उनमें गवईं नदी के पानी जैसी निर्दोष तरलता दिखाई देती है . आज अपनी बौद्धिक कलात्मकता के मनमाने पन में कविता को पीस डालने के बजाय, जरूरी है की पाठकों की आत्मा को सहलाने , समझाने , हिम्मत देने और बल भरने वाली सहज मार्मिकता से लबरेज कविताओं का ताना -बाना रचा जाय . पुनेठा की कवितायेँ इसी लक्ष्य को पाने की सच्ची कोशिशें हैं . भरत प्रसाद

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  14. महेश भाई की कवितायेँ किसी परिचय की मोहताज़ नहीं ..........वे खुद अपना पता दे देती हैं ........और उस जमीन का भी जहाँ से वे अपनी लिए खाद-पानी लेती हैं ........उन्हें पढना मेरे लिए खुद को दरुस्त करना भी है.......वे समकालीन कविता के शोरगुल से दूर वह कविता रच रहे हैं जिसे आम पाठक पढ़ और समझ सकता है .......इन कवितायों में प्रेम कवितायेँ पाकर बहुत अच्छा लगा ....... यूँ देखें तो ये सभी कवितायेँ एक अर्थ में प्रेम कवितायेँ ही हैं ........ एक कवि के अपनी जमीन के प्रति प्रेम से तरबतर |

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  15. महेश भाई की कवितायेँ किसी परिचय की मोहताज़ नहीं ..........वे खुद अपना पता दे देती हैं ........और उस जमीन का भी जहाँ से वे अपनी लिए खाद-पानी लेती हैं ........उन्हें पढना मेरे लिए खुद को दरुस्त करना भी है.......वे समकालीन कविता के शोरगुल से दूर वह कविता रच रहे हैं जिसे आम पाठक पढ़ और समझ सकता है .......इन कवितायों में प्रेम कवितायेँ पाकर बहुत अच्छा लगा ....... यूँ देखें तो ये सभी कवितायेँ एक अर्थ में प्रेम कवितायेँ ही हैं ........ एक कवि के अपनी जमीन के प्रति प्रेम से तरबतर |

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  16. हिन्दी कविता का दायरा एक व्यापक हिन्दी भाषी भौगोलिक क्षेत्र के साथ ्बनता है। महेश की कविताएं उसके बीच अपने उस भूगोल का सच है जिसका जनमानस अपने प्राक्रतिक संसाधनों पर खुद के नियंत्रण की स्थितियों से वंचित किया गया है और किया जाता ज रहा है। वंचना के उस सच को रचनात्मक साहित्य का हिस्सा बनाने की कोशिश महेश की कविताओं में इतनी साफ है कि उनको दरकिनार कर भू-भा़ग विशेष के समाज की वास्तविकता को पूरी तरह से जाना समझा नहीं जा सकता।

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  17. आपकी हर कविता में पहाड़ की स्पष्ट झलक है..
    "पहाड़ की खेती और माँ" कविता पडकर ऐसा लगा जैसे ये मेरी ही "ईजा" की आवाज है..

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  18. सीधी सपाट बातें, जो दिखा सो लिखा , ...ज्यादा अर्थ खोजने नहीं पड़ते !दृष्टि स्पष्ट है और उद्देश्य साफ़ ! ऐसी हैं महेश जी की कविताएँ !

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  19. महेश चन्द्र पुनेठा एक ऐसे कवि हैं जिनके रोम-रोम में लोक बसा हुआ है। इनकी कविता के कथ्य ,शिल्प और भाषा में लोक के रंग गहरे तक पैठे हैं । इनकी कविताओं को पढ़ते या सुनते हुए लगता है जैसे हम उस लोक विशेष में पहुंच गए हों जहां लोक के संघर्ष ,दुख-दर्द , हर्ष-विषाद आदि सभी रंग उनकी कविताओं मे पूरी सहजता एवं सरसता के साथ चित्रित हैं। बधाई ।

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  20. नए उपजे यथार्थ की त्रासिदियों से जूझता पहाड़ का जनसाधारण प्रकृति के साथ घुल मिल अपने स्थानीयता के राग-रंग, वेश ,अपने दर्द में , विडम्बना में ....,जनवाद के इस 'कर्णधार' के भाव में ठोस यथार्थ की प्रस्तुति ..न किसी तरह का कोई मानसिक अलगाव और न ही किसी तरह का कोई रहस्यमय भटकाव...देखे समझे का अपने प्रवाह में सीधा -सादा प्रस्तुतीकरण .. अपने लक्ष्य को सही ठंग से भेदती कविताएँ

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  21. महेश जी कविता के शिल्प से असहमतियां भी सामने आयीं ,उबड़-खाबड़ भी होने की बात की गयी..लेकिन मैं क्या कहूँ इस सादगी से बात को कहा गया है कि अभिधा की मारकता सामने आ रही है... कवि जो कहना चाहता है वह तो सीधे हम पाठकों तक पहुँच ही जाता है ऊपर से यदि गहराई में उतरने में एक अपने संसार में लेकर चली जाती है..शिल्प की अकाल मृत्यु की गहरी पीड़ा ,या पहाड़ों का अपना दर्द..अथवा उनकी चिंता की पोल सभी कितनी सार्थक हैं!! फिर प्रेम पर अटूट विश्वास बड़ा बल देता है.. हाँ पहाड़ की खेती थोड़ी ज्यादा ही सरपट हो गयी...

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  22. 'भावी कर्णधार' भी जरुरी बात को सामने रखती हैं किन्तु शिल्प माँ की खेती की तरह ही..

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  23. महेश भाई की कविताएं सचमुच बहुत अच्छी हैं... हार्दिक बधाई....

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  24. लाजवाब कविताएं हैं। मैं तो उनकी कविताओं का प्रशंसक हूं। उन्‍हें पढ़कर मुझे बेहद रचनात्‍मक ऊर्जा मिलती है। इन कविताओं ने मुझे इतना प्रेरित किया है कि कई कविताओं के दरवाजे खुल गये हैं। शुक्रिया, आभार। शुभकामनाएं।

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  25. sundar kavitayein, pahad tootna sabse umda lagi, pareeksha kaksha ke aage ki talaashi wali bhi, chit purze ki talaashi, jo bahut samvedansheel dhang se ki jaani chahiye, aksar bahut hinsak, aur ugra roop leti hai, rozmarre ke jeevan ki, shikshit jeevan ki hinsa ki or dhyan dilane ke liye kavi ko dhanyawad

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  26. भावी कर्णधार समय से प्रश्न करती कविता है और वर्त्तमान समय की पूरी परीक्षा प्रणाली को कटघरे के दायरे में खड़ा करती है इस पर विचार किया जाना चाहिए

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