नीलाभ













इस दौर में



हत्यारे और भी नफ़ीस होते जाते हैं
मारे जाने वाले और भी दयनीय



वह युग नहीं रहा जब बन्दी कहता था
वैसा ही सुलूक़ करो मेरे साथ
जैसा करता है राजा दूसरे राजा से



अब तो मारा जाने वाला
मनुष्य होने की भी दुहाई नहीं दे सकता
इसीलिए तो वह जा रहा है मारा



अनिश्चय के इस दौर में
सिर्फ़ बुराइयाँ भरोसे योग्य हैं
अच्छाइयाँ या तो अच्छाइयाँ नहीं रहीं
या फिर हो गयी हैं बाहर चलन से
खोटे सिक्कों की तरह



शैतान को अब अपने निष्ठावान पिट्ठुओं को
बुलाना नहीं पड़ता
मौजूद हैं मनुष्य ही अब
यह फ़र्ज़ निभाने को
पहले से बढ़ती हुई तादाद में





एक विफल आतंकवादी का आत्म-स्वीकार- 1



परधान मन्तरी जी,
बहुत दिनों से कोशिश कर रहा हूँ मैं
आतंकवादी बनने की
मगर नाकाम रहा हूँ।
(यह इक़बाले-जुर्म कर रहा हूँ
इस रिसाले के शुरू ही में
ताकि कोई परेशानी न हो आपको
और आपकी सुरक्षा-सेवाओं को)



कई बार कोशिश करने पर भी विफलता ही
जीवन की कथा रही
शायद वजह यह हो कि जिस तरह
आपने टेके घुटने उसी हुकूमत के सामने
जिसे अपने मुल्क से निकालने में
हज़ारों-हज़ार कुरबानियाँ दी थीं
मेरे पुरखों ने
उसने खींच ली ताक़त मेरे अन्दर से
क़ुरबान हो जाने की
या शायद मैं उम्र के उस दौर में हूँ
जब ज़िन्दगी और भी हसीन
और भी पुरलुत्फ़ लगती है
मौत और भी ख़ौफ़नाक



यह तो मामूली इन्सानी फ़ितरत है
दिखती है दूसरे जीवों में भी
मगर इतनी बेशर्मी से नहीं




एक विफल आतंकवादी का आत्म-स्वीकार- 2



हिन्दुस्तान के चमचा सरताज!
मैं एक अदना-सा चमचा
तुम्हारा इस्तक़बाल करता हूँ
गो सारी कोशिश मेरी
अपना वुजूद बदल कर
ख़ंजर में तब्दील हो जाने की है
जिसमें मैं रहता हूँ बारम्बार नाकाम



यह बारम्बार भी एक उम्दा लफ़्ज़ है
अपनी देसी ज़बान का
मेहरबानी करके उसे हिन्दी, उर्दू या हिन्दुस्तानी न कहें
तीन सिरों वाले अजदहे को पैदा करते हुए



हाँ, तो डियर पी.एम.
मैं हरचन्द कोशिश करके भी
ख़ंजर में, आर.डी.एक्स में, टी.एन.टी. में,
किसी जंगजू मरजीवड़े में, किसी लड़ंके में,
किसी युद्धलाट में
तब्दील नहीं हो पाया
ताहम कोशिश मेरी अव्वल से आख़िर तक
आतंकवादी बनने की थी
ताकि जी न सकूं इस सरज़मीं पर
इन्सान की तरह
तो कम-अज़-कम मर तो सकूं
इन्सान की मानिन्द
आपकी इस महान भारत भूमि पर





जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी



जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
वहाँ से बहुत कुछ ओझल है



ओझल है हत्यारों की माँद
ओझल है संसद के नीचे जमा होते
किसानों के ख़ून के तालाब
ओझल है देश के सबसे बड़े व्यापारी की टकसाल
ओझल हैं ख़बरें
और तस्वीरें
और शब्द
जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
वहाँ से ओझल हैं
सम्राट के आगे हाथ बाँधे खड़े फ़नकार
ओझल हैं उनके झुके हुए सिर,
सिले हुए होंठ,
मुँह पर ताले,
दिमाग़ के जाले



जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
वहाँ एक आदमी लटक रहा है
छत की धन्नी से बँधी रस्सी के फन्दे को गले में डाले
बिलख रहे हैं कुछ औरतें और बच्चे
भावहीन आँखों से ताक रहे हैं पड़ोसी
अब भी बाक़ी है
लेनदार बैंकों और सरकारी एजेन्सियों की धमकियों की धमक



जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
वहाँ दूर से सुनायी रही हैं
हाँका लगाने वालों की आवाज़ें
धीरे-धीरे नज़दीक आती हुईं
पिट रही है डुगडुगी, भौंक रहे हैं कुत्ते,
जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
भगदड़ मची हुई है आदिवासियों में,
कौंध रही हैं संगीनें वर्दियों में सजे हुए जल्लादों की
जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
चारों तरफ़ फैली हुई है रात
ख़ौफ़ की तरह --
चीख़ते-चिंघाड़ते निशाचरी दानव हैं
शिकारी कुत्तों की गश्त है
बिच्छुओं का पहरा है
कोबरा ताक लगाये बैठे हैं



जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ
वहाँ एक सुगबुगाहट है
आग का राग गुनगुना रहा है कोई
बन्दूक को साफ़ करते हुए,
जूते के तस्मे कसते हुए,
पीठ पर बाँधने से पहले
पिट्ठू में चीज़ें हिफ़ाज़त से रखते हुए
लम्बे सफ़र पर जाने से पहले
उस सब को देखते हुए
जो नहीं रह जाने वाला है ज्यों-का-त्यों
उसके लौटने तक या न लौटने तक
इसी के लिए तो वह जा रहा है
अनिश्चित भविष्य को भरे अपनी मैगज़ीन में
पूरे निश्चय के साथ



जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
जल उठा है एक आदिवासी का अलाव
अँधेरे के ख़िलाफ़
जहाँ मैं साँस ले रहा हूँ अभी
ऐसी ही उम्मीदों पर टिका हुआ है जीवन







क्यों खोयी पहचान साथी



पाया है धन मान साथी
अब तो तजो गुमान साथी
छोड़ो सब अभिमान
बड़े-बड़े हैं गले लगाते
जी भर कर गुन तेरे गाते
उज्ज्वल है दिनमान
फिर क्यों तेरे मन में भय है
कैसा यह दिल में संशय है
क्यों साँसत में जान साथी
सब सुख है तेरे जीवन में
कलुष भरा क्यों तेरे मन में
जग सारा हैरान साथी
जनता तुझ से आस लगाये
तू धन दौलत में भरमाये
कैसा यह अज्ञान साथी
हत्यारों में जा कर हरसे
अपनों पर तू नाहक बरसे
क्यों खोयी पहचान साथी







उड़ीक



मेरे दिल में अब भी उसकी उड़ीक बाक़ी है
जो मेरे कानों में कह गयी थी
मैं आऊँगी, ज़रुर आऊँगी
और काख़-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिलाऊँगी
एक कर दूँगी ये महल-माडि़याँ
दिन चमकीले हो जायेंगे
शीशे पर पड़ते सूरज के लिश्कारे की तरह
साफ़ पानी से भरे गिलास की तरह
रातें प्रेम में सराबोर होंगी
पसीना बहेगा
पर तेज़ाब की तरह चीरेगा नहीं आँखों को
नयी खिंची शराब की तरह मदहोश कर देने वाले दिन होंगे
नये ख़ून के दिन
नये ख़ून के दिनों की तरह





गीत



लाल लाल हो चला है, हो चला है आसमान
लपटों की लाली है, रात भले काली है, लाली है रक्त की
लायेगी नव विहान
रक्त बोले, लपट बोले, गाये
भीषण गान,



लाल लाल हो चला है, हो चला है आसमान
आओ साथी सुर मिलाओ,
बारुदी राग गाओ,
छेड़ो समर तान, साथी गाओ भीषण गान



लाख लाख कण्ठ से उठ रही है ये पुकार
मुक्ति चाई, जीवन चाई, चाई स्वाभिमान
लाल लाल हो चला है, हो चला है आसमान





यह ऐसा समय है



यह ऐसा समय है
जब बड़े-से-बड़े सच के बारे में
बड़े-से-बड़ा झूठ बोलना सम्भव है
सम्भव है अपने हक़ की माँग बुलन्द करने वालों को
देश और जनता से द्रोह करने वाले क़रार देना
सम्भव है
विदेशी लुटेरों के सामने घुटने टेकने वाले प्रधान को
सन्त और साधु बताना
यह ऐसा समय है
जब प्रेम करने वाले मारे जाते हैं
पशुओं से भी बदतर तरीके से
इज़्ज़त के नाम पर
जब बेटे की लाश को
सूखी आँखों से देखती हुई माँ
कहती है
ठीक हुआ यह इसके साथ





अन्तिम प्रहर



है वही अन्तिम प्रहर
सोयी हुई हैं हरकतें
इन खनखनाती बेडि़यों में लिपट कर



है वही अन्तिम प्रहर
है वही मेरे हृदय में एक चुप-सी
कान में आहट किसी की
थरथराती है
किसी भूले हुए की
मन्द स्मिति ख़ामोश स्मृति में



कौन था वह
जो अभी
अपनी कथा कह कर
हुआ रुख़सत
व्यथा थी वह
अभी तक
थरथराती है
समय की फाँक में ख़ामोश



ले रहे तारे विदा
नभ हो रहा काला
भोर से पहले
क्षितिज पर
काँपती है
एक झिलमिल आभ नीली
हो वहीं तुम
रात के अन्तिम प्रहर में
लिख रहे कुछ पंक्तियाँ
सिल पर समय की
टूटना है जिसे आख़िरकार
होते भोर





वहाँ



जहाँ से शुरु होती है
ज़िन्दगी की सरहद
अभी तक वहाँ
पहुँच नहीं पा रहे हैं शब्द
जहाँ कुंवारे कपास की तरह
कोरे सफ़ेद पन्नों पर
दर्ज कर रहे हैं
कवि
अपने सुख-दुख
वहाँ से बहुत दूर हैं
दण्डकारण्य में बिखरे
ख़ून के अक्षर
दूर बस्तर और दन्तेवाड़ा में
नौगढ़ और झारखण्ड में
लिखी जा रही है
एक और ही गाथा
रात की स्याही को
घोल कर
अपने आँसुओं में
आँसुओं की स्याही को
घोल कर बारुद में
लोहे से
दर्ज कर रहे हैं लोग
अपना अपना बयान
बुन रहे हैं
अपने संकल्प और सितम से
उस दुनिया के सपने
जहाँ शब्दों
और ज़िन्दगी की
सरहदें
एक-दूसरे में
घुल जायेंगी






संपर्क-


नीलाभ
219/9, भगत कालोनी
वेस्ट संत नगर
बुराड़ी, दिल्ली ११००८४

मोबाइल- 09910172903

फ़ोन - 011 27617625

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