हिमांगी त्रिपाठी

हिमांगी त्रिपाठी

उत्तर  प्रदेश  के बुंदेलखंड अंचल  के सर्वाधिक्  पिछडे  जनपद 
चित्रकूट की हिमांगी ने अभी-अभी हिंदी से  एम ए किया है. साथ ही 
इन्होने  यू जी सी की नेट परीक्षा भी उत्तीर्ण की है. एक ऐसे रुढ़िवादी 
मानसिकता वाले जगह जहाँ लड़कियों को अपने मन से कुछ  भी सोचने -कहने-करने की आजादी नहीं है हिमांगी ने अपनी कविताओं के माध्यम  
से  कुछ कहने की हिमाकत की है. इनकी कविताओं में अभी
पर्याप्त अनगढ़पन है जैसाकि शुरू-शुरू में होना चाहिए. 'किसलय' के अंतर्गत हम ऐसे  रचनाकारों को प्रकाशित  करेंगे  जिन्होंने  रचना की दुनिया में पहला कदम रखा है. इसी क्रम में प्रस्तुत है हिमांगी की कविता 'मेरी जिन्दगी' जिसमें इस आंचलिक स्त्री जीवन की एक सोच, जिसमें वह तमाम जकड़बंदियों से घिरी है  दिखाई  पड़ेगी. जिन्दगी जो उसकी हो कर भी वास्तव में उसकी नहीं है. 
संपर्क- द्वारा श्री रजनी कान्त त्रिपाठी, थाने के सामने, बस स्टैंड, मऊ, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश २१०२०९


मेरी जिन्दगी        


इस जिन्दगी में
अब कोई किनारा नहीं रहा 
कोई अपना नहीं रहा .

जिन्दगी ने  कुछ ऐसे छला
कि जीने का आसरा ना रहा.

आखिर इस जिन्दगी में
कहाँ है मेरी जिन्दगी का नक्शा 
कहाँ है मेरे जीने की वजह 
कोई हो सके तो बतलाओ मुझे
क्या  है सूत्र जिन्दगी जीने का.

बीती अपनी ही जिन्दगी कुछ इस तरह
की खुद अपने को ही पता ना रहा
अपनों पर करती रही भरोसा हर पल
मगर अपनों ने ही बार बार मुझको छला.

जिन्दगी अब तुम पर भी कोई भरोसा ना रहा.


  

टिप्पणियाँ

  1. प्रिय हिमांगी त्रिपाठी,

    बहुत बहुत बधाई. आपकी किसलय कविता वास्तव में बहुत अच्छी है. आपने जिन्दगी की वास्तविकता को बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है.

    आशा करता हूँ कि आगे भी आप ऐसी रचनाये अवश्य प्रस्तुत करेंगी....
    शुभ कामनाएं... ---- राज शुक्ल

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  2. आपकी रचना के लिए बहुत बहुत बधाई। आप इसी तरह महकती रहें खिलखिाती रहे। और अपनी नई रचनाओं से हमें भी अवगत कराती रहें। परमात्मा आपको और अधिक ऊचाईयों तक पहुँचाये।
    इसी कांमना के साथ सुनील शर्मा मथुरा

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  3. उम्मीद है कि कविता के मार्फ़त यह नवोदित कवि अपने भीतर की घोर निराशा से बाहर आती रहेंगी। कविता भीतर के संशयों से मुक्ति का नाम भी है। यह जरूरी भी है कि एक रचनाकार को भीतर के उन संशयों से भी मुक्त होना जाना चाहिए जो उसे निराशा में ढकेलते हों। हां, लेकिन वहीं पर अटके रहने में रचनाकार का विकास नहीं। उम्मीद है हिमांगी लगातार विकास करते हुए उम्मीदों और उत्साह की रचनाओं तक भी आगे बढ़ेगीं और अपने लिखे से पाठकों को प्रेरित करेंगीं।

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  4. हिमांगी.....सर्वप्रथम कविता की दुनिया में आपका स्वागत है....आपकी यह आरंभिक रचना है , इसलिए एक खास किस्म का अनगढ़पन इसमें दिखाई दे रहा है और ऐसा होना भी चाहिए.....छोटा बच्चा पैदा होते ही दौड़ने लगे , यह संभव नहीं और न ही वांछनीय....महान साहित्यकारों की आरंभिक रचनाये इसी अनगढ़पन के लिए भी देखी समझी जाती है....इस हिसाब से मै आपकी कविता की प्रशंशा करता हूँ...लेकिन आपका अग्रज होने के नाते मेरी कुछ जिम्मेदारिया भी है जिन्हें मुझे आपसे शेयर करना चाहिए....आपका विषय हिंदी है और आपने नेट की परीक्षा भी उत्तीर्ण की है सो आपके पास साहित्य की समझ होनी ही चाहिए , ऐसा मै मानकर चलता हूँ.......आवश्यक यह है कि आप अपने समकालीन रचनाकारों को खूब पढ़े .....आप अपनी कविता में भी आशावादी रहे , जीवन इसी आशा से चलता है.......अभी आप पितृसत्तात्मक तरीके से अपनी दुनिया को देख रही है, आप अपनी गरिमा के साथ और अपने नजरिये से इस दुनिया को देखे....उसकी विद्रूपताओ पर प्रहार करे....विकल्प सुझाये...यही चीजे आपकी मददगार होंगी.....आशा करता हूँ..आपकी रचनाओ को अन्य मंचो पर भी शीघ्र ही देखने पढने का अवसर मिलेगा....आपका रचनात्मक सफ़र सार्थक और बेहतर हो , यही कामना है....

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  5. बहुत सुंदर कविता हिमांगी बधाई और शुभकामनाएं |भाई संतोष जी आपको भी हिमांगी से परिचय कराने के लिए बधाई

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  6. नाकारात्मक सोच के साथ शुरू हुई कविता को अंधकार से बाहर निकालिए हिमांगी जी । आपसे बहुत अपेक्षाएं हैं। नाकारात्मक सोच में भी आशा की नयी किरण दिखाई दे रही है। बेहतरीन कविता। बहुत बहुत बधाई । आरसी चौहान, टिहरी गढ़वाल ,उत्तराखण्ड।

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  7. very good himangi briliant poem, i think your poem send msg. negative think

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  8. aksar jindagi ke neerashajanak phaloon par log bat nahin karte, kavita nahin likhte, app ki kavita padh kar khud se swal karnain wale kee bangi milee, ye neerasha nahin, neerasha se neekalnain ka ek rasta bhi ho sakta hai, likhatee raheeye

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  9. Apno ne nhi khud aapne apne ko chhala hoga apnon par bharosa karke
    ek baar apne aap par bharosa kar ke dekhiye, phir koi aap ko chhal nhi payega

    Nazar badaliye nazaare badal jaayenge
    kavita ka shilp thik thak hai, par kathya prabhavshaali nhi hai
    aapki agli kavita ka intzaar rahega

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