महेश चन्द्र पुनेठा

  


महेश का जन्म 10 मार्च 1971 को उत्तराखंड  के पिथौडागढ  जिले  के लम्पाटा नामक गाँव में हुआ. 
राजनीति शास्त्र में परास्नातक  करने के पश्चात  इनका  राजकीय इंटर कालेज में  प्रवक्ता पद(एल टी ग्रेड) पर चयन हो गया.अभी हाल ही में इनका पहला कविता संग्रह 'भय अतल में' प्रकाशित हुआ है जो काफी चर्चा में रहा है. संपर्क- जोशी भवन, निकट लीड बैंक,  पिथौडागढ, उत्तराखंड.  


 मोबाइल- 09411707470.  


युवा कवियों में महेश अपने कथ्य और शिल्पगत प्रयोग के लिए जाने जाते हैं. महेश जीवन में घटने वाला   कोई दृष्टान्त बिलकुल अपने आस-पास से  उठाते हैं और बिलकुल सहज-सरल भाषा में उसे कविता में ढाल देते हैं. यह कवि  मित्र से अगर अपनी  शिकायत नहीं सुनता तो बेचैन हो जाता है कि  उससे कहाँ-कौन-सी  गलती हो गयी. दरअसल यह लोक का अपना चलन है जो महेश में लगातार प्रवहित होता रहता है. वह लोक जो अपनी ही  लय और गति से आगे बढ़ता है. 
प्रस्तुत हैं महेश की बिलकुल ताजी कविताए जिसमे उनकी बानगी दिखाई पड़ेगी. 'पहली बार' पर आगे भी आप उनकी कविताये पढ़ते रहेंगे.  

पार्क

बच्चे निकल आये हैं
घरों से उछलते-कूदते
चीखते-चिल्लाते
तरह-तरह की आवाजें निकालते
शुरू हो गए हैं खेल उनके 

देखते-देखते पार्क बदल-सा गया 
मेरे  गाँव के विशाल टुनी के पेड़ में  
हर  शाम भर जाता     है जो
पक्षियों की चीं-चीं  चूँ-चूँ से
बोलने लगता है अलग-अलग स्वरों में
मुझे याद आने लगा
टुनी का झूमना-मचलना-खिलखिलाना-गाना-नाचना 

पर क्या हो गया यह 
देखते- देखते
कहाँ उड़ गए सारे बच्चे 
बिजली आ गयी.....ई.....ई.... के सामूहिक स्वर के साथ 

बहुत देर तक गूंजते रहे ये स्वर 
उड़ते पदचापों के स्वर के साथ 

पार्क उदास आँखों से टुकुर-टुकुर देखता रह गया 
वहां बैठे वृध    युगलों को 
जाड़ो के  नासपाती पेड़-सा 

हिमालय का एक दृश्य

सूर्योदय की
ललाई किरणों में नहाई पर्वत  चोटियाँ
लग  रही  हैं ऐसी  
जैसे  पहली बार छूआ हो 
किसी प्रेमी ने 
अपनी कमसिन प्रेमिका को 
अँगुलियों के पोरों से 
और उसके गालों में छा गयी हो लाली!  

बाजार-समय  

बहुत सारी हैं चमकीली चीजें
इस बाजार समय  में  
खींचती  हैं जो अपनी ओर
पूरी ताकत से

मगर कितनी हैं 
जो बांधती हों कुछ  देर भी.  

तुम्हारी शिकायत

जब  नहीं करते  हो तुम 
कोई शिकायत मुझसे
मन  बेचैन हो जाता है मेरा 
लगने लगता  है डर 
टटोलने  लगता हूँ खुद को
कि कहाँ गलती हो गयी मुझसे

प्रतीक्षा

जड़  नहीं
मृत नहीं
ठूंठ नहीं ये
निराशा की कोई बात नहीं
जड़ों के पत्रविहीन वृक्ष हैं ये
वसन्ती हवा की प्रतीक्षा भर  है इन्हें
फिर देखो
किस उत्साह से लद-फद जाते हैं ये

देखते ही देखते
बदल जाएगा जंगल सारा

किताबों के बीच पडा  फूल

सूख चुकी हो भले  
इसके भीतर की नमी 
कड़कड़ी  हो चुकी हों  
इसकी पत्तियां 
उड़   चुकी हो भले  
इसमें बसी खुशबू  
फीका  पड  चुका  हो 
भले  इसका रंग 
पर  इतने   वर्षों   बाद अभी भी
बचा हुआ है इसमें
बहुत कुछ
बहुत कुछ ऐसा    
  
खोना नहीं चाहते हम जिसे कभी






  



टिप्पणियाँ

  1. sir aap vastav me nagarjun ki prmpra ke kvi hain.

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह ! एक कामन बात है हर कविता में..और वो है..."आशा की आशा "! बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  3. 'Tumhaari Shikaaayat', 'Bazaar Samay', 'PRATEEKSHAA', 'Himalaya ka ek drishya'-----ye chaaron kavitaaein chhoti hain, par prabhaav mein badi hain. Badhaai. Tvarit tippani.

    उत्तर देंहटाएं
  4. महेश पुनेठा की कविताएँ हमारे समय-समाज का विशिष्ट दस्तावेज़ हैं. उनकी अप्रतिहत जनपक्षधरता और मानवता के लिए उनका उत्कट प्रेम उनकी कविताओं से साफ़ झाँकता है. इस उत्कृष्ट चयन के लिए मेरी बधाई लें.

    उत्तर देंहटाएं
  5. महेश मेरे प्रिय कवी है, संकेत का एक अंक तो मैंने महेश के नाम किया था.. उनकी कविताओं में उनका परिवेश बोलता है...बेशक अपने परिवेश के बेहतर प्रवक्ता है...उनकी सच्ची संवेदना पाठको से सीधे संवाद करती हैं...मेरी शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  6. bahut sundar kavitain hain. apni pasand ki us khas kavita ko yahn dubara se rakhna chahunga :
    जड़ नहीं
    मृत नहीं
    ठूंठ नहीं ये
    निराशा की कोई बात नहीं
    जड़ों के पत्रविहीन वृक्ष हैं ये
    वसन्ती हवा की प्रतीक्षा भर है इन्हें
    फिर देखो
    किस उत्साह से लद-फद जाते हैं ये

    देखते ही देखते
    बदल जाएगा जंगल सारा

    उत्तर देंहटाएं
  7. महेश जी क्‍या खूब कहा है आपने … पार्क उदास आँखों से टुकुर-टुकुर देखता रह गया ।बहुत ही खूबसूरती से मनोभावों को आपने उकेरा है । बहुत सुंदर । सारगर्भित और सहज रचना के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. चिरपरिचित-सी सादगी किंतु नन्‍हीं आंखें मीचती-हिलती कोमल फुनगी जैसी ताजगी... यही है महेश पुनेठा की इन कविताओं की विशिष्‍टता। विशाल-तने हिमालय को दरअसल महेश ही इतने ललौहें प्रेम-पगे अंदाज़ में देख सकते हैं... कवि को बधाई और प्रभावशाली प्रस्‍तुति के लिए 'पहली बार' का आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  9. Mahesh ji, chunki mujhe sahitya kee koi parakh nahi hai par meri shaj budhi ko appki kaveetaye behad acchi legi iss bat kee dou vejehen hai
    1 appki lekhni main manveye anatr main gahtit ho rahe falak ko awaj milti jan padti hai jaise "Partiksha" aur" Kitabon ke bich pede phool" main

    2 Dusra badlav kee iss andhi main jo accha aur sukhad tha aur kho gaya hai ko le kar peeda.... mujeh bhi lagata hai kee bachpan ajj ya kanreet ke janglon main kaid hai ya phir abhav aur tiraskar kee vedna jehl raha hai aur dono hee iss badli duniya kee den hain...... appki kaveeta 'park' kuch aissa hee abhas deti hai mujeh naspati ke ped main bhavna ka ahrohan behad accha laga

    उत्तर देंहटाएं
  10. महेश जी , हमसे वरिष्ठ एवम आदरणीय हैं . मैं निरंतर उनसे सीखने का प्रयास कर रहा हूं .
    इन कविताओं के लिए बहुत - बहुत आभार . और क्या कहना या लिखना चाहिए अभी नही मालूम/सही शब्दों की तलाश है.

    उत्तर देंहटाएं
  11. महेश भाई की जो सबसे अच्छी बात लगती है वह उनकी अभिव्यक्ति की इमानदारी है... न बड़बोलापन है न अतिशय छलावा। उनकी कविताएं धीमें-धीमें दिल पर असर करती हैं और हमें अपने चरेट में ले लेती हैं... सभी कविताएं अच्छी हैं... किताब के बीच पड़े फूल पर तो दिल आ गया... अग्रज कवि को ढेर सारी बधाईयां....

    उत्तर देंहटाएं
  12. महेश जी कविताये पसंद आयी....इन कविताओ में प्रेम भी है और हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति को लगातार कम करता हुआ बाज़ार भी... महेश जी इस धुँधले समय में भी इन दोनों चीजो को साफ़ साफ़ देख लेते है... एक हकीकत जो आजकल की कविता में खुलकर सामने आयी है, वह है दूर -दराज के लोक से आये कवियों की संवेदनात्मक उपस्थिति...महानगरीय अवसाद से ग्रसित होती जा रही समकालीन कविता को महेश जी जैसे लोक से आने वाले कवियों ने एक तरह से उबारा है..."महेश जी" और "पहली बार" को बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  13. अति सुन्दर पोस्ट और ब्लागिंग बधाई भाई संतोष जी

    उत्तर देंहटाएं
  14. kavitaaon mein jameenee sach inakee sabse badi taakat hai.jeevan kee bheenee bheenee khushboo inase chhan chhan kar man ko rassikt karatee hai

    उत्तर देंहटाएं
  15. पुनेठा जी आपने कविताओ के माध्यम से वर्तमान में बदलते परिवेश व सामाजिक ताने-बाने के प्रति एक सजग व्यक्ति की चिंताओं को व्यक्त तो किया ही है, साथ ही एक अच्छे समय की प्रतीक्षा निश्चय ही स्वागतयोग्य है !!

    उत्तर देंहटाएं
  16. छोटी छोटी ये कवितायें पठनीय हैं. मुझे अच्छी लगी. कवि मन से कवि है इसका प्रमाण इन कविताओं में है.

    उत्तर देंहटाएं
  17. behatareen kavitayein.mahesh ji ki kavitayein bazarwadi samay mein badalte samajik paridrashya ki aur sanket karti hein

    उत्तर देंहटाएं
  18. महेश पुनेठा जी की कविताओं में लोक की उजास के साथ - साथ उत्कट जिजीविषा के भी दर्शन होते हैं देहाती महक को ओजार की तरह इस्तेमाल करना उनकी विशेषता हैं ... उन्हें बधाई


    देखते-देखते पार्क बदल-सा गया
    मेरे गाँव के विशाल टुनी के पेड़ में
    हर शाम भर जाता है जो
    पक्षियों की चीं-चीं चूँ-चूँ से
    बोलने लगता है अलग-अलग स्वरों में
    मुझे याद आने लगा
    टुनी का झूमना-मचलना-खिलखिलाना-गाना-नाचना

    पर क्या हो गया यह
    देखते- देखते
    कहाँ उड़ गए सारे बच्चे
    बिजली आ गयी.....ई.....ई.... के सामूहिक स्वर के साथ

    उत्तर देंहटाएं
  19. महेश पुनेठा जी की कविताओं में लोक की उजास के साथ - साथ उत्कट जिजीविषा के भी दर्शन होते हैं
    देहाती महक को ओजार की तरह इस्तेमाल करना उनकी विशेषता हैं .....उन्हें बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  20. sahaj saral,sugrahya kavitaye aisi hi honi chahiye jo aanand k sath dil me yu hi chhap jay. sachmuch hamare dour k nagarjun he.

    उत्तर देंहटाएं
  21. बतकही शैली ...इर्द-गिर्द जो गर्द जमा है ....गुबार निकल नहीं पाता....उस पर पुनेठा जी की लेखनी ....घटती घटनाओं में बढ़ती संवेदनहीनता के नैराश्य में प्राकृतिक आशानुराग ....भोर की किरन-जैसा

    उत्तर देंहटाएं
  22. बहुत सुंदर.....पहली बार पढ़ा आपको। अच्‍छा लगा। बहुत सरलता से कह जाते हैं आप अपनी बातें....बि‍ना शब्‍दों के आडंबर में पड़े। बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  23. कुछ भी हो महेश जी अपने परिवेश को पूरी निष्ठां और ईमानदारी से जीते हैं | जीवन-व्यवहार की तरह काव्य-सृजन में भी ईमानदारी के फूल वैसे ही खिलते हैं , जैसे पुनेठा जी की कवितओं में |पढ़कर ऐसा लगा जैसे गुलाब के पौधों में फूल खिल गए हों |

    उत्तर देंहटाएं
  24. mujhe joo sabse dil ko chune waali kavita lagee woh hey "Park":--aajkal ke samay mey toh park tukur tukur hee dekh raha hey bachoo ko aajkal ke maata pita ne-- I-Pad,Video games thama diye hain abb toh bachoo ke sharirik vikas ki jagah aankho par chashmoo ne le lee hey....india mey toh hoga bhi park mey jaane kaa lekin yahan toh mey dekhti hee nahii hoon kisi koo bhi..bas jahan 2 yaa 3 saal ke hue bache unke pass iphone hey khelne ke liye yaa I-Pad..
    aapki kavitaayein sahaj aur vaastvik jiwan se prerit hain mujhe bahut anand aa raha hey padne mey..deepti chamoli

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें