बलभद्र


दूसरी किश्त

बलभद्र

लेवा



... ... बाकी अब त बतिये कुल्हि बदलत जात रहल बा. पुरान साड़ी आ दू-अढाई सै रुपिया ले के शहर-बाजार में, लेवा त ना, बाकिर लेवे अइसन चीज सिये के कारोबार शुरू बा. बस एह में फोम रहेला पतराह, एकदम बिच में. सीआई, फराई, काट-डिज़ाइन एकदम लेवा अस. अब त नयो-नयो कपड़ा के बनि रहल बा. बड़े-बड़े सेठ लोग बेच-बनवा रहल बा. गाँव आ गरीब के कला अपना के पइसा पिट रहल बा लोग, अ आपन साज-समाज कुल्हि गाँव में भेजि रहल बा लोग. अब सुतरी आ बाधी के खटिया उडसल जा रहल बा. बैल उड़सलें, गाय उड़सली, नाद उडसल, हर, जूआठि, हेंगा उडसल, खरिहान गइल, अइसही एक दिन लेउवो चली जाई. जे अभि ले एकरा के डासत- उड़ासत बा, मने बिछावत-बटोरत बा, ओह किसान-मजूरा के सरकार आ सरकारी लोग उदबास लगावे पर तुलल बा. ई लोगवे उड़स जाई त लेउवो उडस जाई. लेवा बनेला सूती लूगा-धोती से नीमन- नीमन. आ सूती गरीब-गुरबा लोग के बेवत से बहरी के चीज हो गइल बा. आ अमीर लोग खातिर इ लेवा बा ना. अमीर लोग बहुते चिंता में बा हमनी खातिर.... हमनी के ह़ाथ के कउशलवे ऊ लोग कीन लेता, छीन लेता.
         ई लेवा कतना काम के बा. कायदा से हमरा तब बूझाइल जब अपना लइका- फइका के ले के बाहर रहे के परल. ऊ शुरू के दिन. चाचा माने बाबू के रिटायर भइला के बाद, लइकन के पढावे खातिर बिहिया से शुरू भइल बाहर रहे के सिलसिला. तोसक त रहे बाकिर काम भर से कम. आ जवन रहलो रहे तवन पातर-पातर. एतना पातर कि जाड़ा में काम ना चलि पाइत. त माई कइलस का कि कुछ लेवा भेज देहलस. चउकी आ पलंग पर जवन तोसक रहे ओकरा तरे ए एगो भा दू गो लेवा बिछ गइल. अब तोसक तोसक लेखा लागे लागल. केकरा बले त लेवा के. खलिहा जवन रहे चउकी तौनू पर बिछ गइल. तोसक के ऊपर बेड-शीट. बेड शीट से तोपाइल मोटाई के राज के जानि पावे? एह मोटाई के तह में बाड़े स लेवा. एह मोटाई के देखि के कुछ लोग भरम खा गइल. बाबू के कमाई से हउवे ई मोटाई लोग समझे. असली राज त इ कि ई बाबू के कमाई तरे माई के मेंहनत, कला आ दुलार के मोटाई रहे. अउर केहू इ राज जाने चाहे ना जाने बाकिर सुरेश कांटक आ प्रकाश उदय एह राज के जरूर जानेलन. बिहिया से आरा होत एह लेवा, आ चाचा के तोसक संगे हमनी के आ गइलीं जा बनारस. ई लेवा आजो बा बिछल. बनारस से गिरिडीह आ गइल इ लेवा आ चाचा के तोसक. पीठ तर बाड़े स इ दूनो. हमारा सांस तर, कविता तर, बात- विचार तर, सुई डोरा के हर टोप में बाटे ममता. ई बोलाई लेवेला, सुताई लेवेला, ठोक-ठाक के. ई हमार आचार-विचार ह. एगो आधार ह. विवेक एगो, चीजन के समझे के.
ई हमार सकेती ह, फैलाव ह, एकरा पासे बाटे अनगिनत सपना. पुश्तैनी आग. हमार बीतल काल्हु आ कांपत -कुलाचत आजु.
        सात रंग के सात डोरा से सियाइल ह इ लेवा. ई सातो रंग बाजार के ना ह. माई के मन के रंग ह. ओकरा इन्द्रधनुषी कल्पना के रंग ह. आ माई त एगो- एक अकेल होली न. कतने बाड़ी कतने लोग के. ई हर काल में बाड़ी. एगो में कतने बाड़ी. इनका हाथ में अउर कतने चीजन के साथ सुईयो डोरा रहेला. सुई चलत जाले आगे-आगे, सपना जुडल जाला पीछे-पीछे. संजोग बनत जाला. धोती बाबा के, लूगा ईया के,लुंगी भइया के. बन गइल लेवा.
        एक दिन मन में एगो विचार आइल कि कि देखीं कवन हवे सबसे पुरान लेवा. बस ओही दिन से हम मिलावे लगलीं. कवन बा अइसन जवन बाबा के धोती से बनल बा. बाकिर उ आजु ले हमारा ना लउकल. बाबा के मुवला कतने साल भइल. ऊ लेवा का धइले होई.  माई के बिआह के बेर के रजाई बा अब ले, फाटले होखे त का. ब़ाकिर बा.  त का ऊ लेउवा ना होई?  जरुर होई.  हो सकेला कि ओकरा के फाटत देख के माई साट देले होखे कवनो साटन. आ ओ के चलते ऊ चिन्हाते ना होई. हम ओह लेवा पर एक बार फेनु लोटल चाहत बानी. अपना लइका-लइकिन के, माई के, भवहि के, बहिन-बहनोंई के, मेहरारू के सब के ओह पर उठावल-बइठावल-सूतावल चाहत बानी. ऊ लेवा आशिरवाद ह. जनमतुआ के जइसे सबसे पुरनिया के चादर भा गमछा में लपेटल जाला, ओहि तरे हम सबके लपेटल चाहत बानी. जरुर होई ऊ लेवा आ ओपर लइका-फइका लोढीयात होईहें.
          सुई के छेद में डोरा डाल पावे में आँख अब नइखे देत पहिले अस साथ. अगल-बगल जे बइठल बा, बोलत बतियावत, ओकरा देने बढ़ा देहली सुई आ धागा. आ चारो खूँट घूम-घूम, टोप पर टोप दनादन. एगो लेवा में लूगा के एक तह.. दू तह, तीन तह.. कतने तह. काया तबो खनहना. दूपहरिये में बइठली सिये अपना जाने खाली समय में. खाली समय के अइसन रचना सात पुहुत से चलल चलि आवत बा. ओरियानी तर बोलेला पंडुक आ सुई एने बढ़त जाले बढ़त जाले. जीवन के छंद रचत जाले.  मान मनुहार के, प्रेम के, दुलार के.  बूझउवल एगो बुझीं त- 'हती चुकी गंगा मइया हतवत पोंछ, भागल जाली गंगा मइया धर लइका पोंछ.'


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कवि एवं आलोचक बलभद्र झारखंड के गिरिडीह कालेज में हिंदी के असिसटेंट प्रोफ़ेसर हैं.

टिप्पणियाँ

  1. ई त एकदम आपन बात भइल....लेवे प सुती के लेवा के अइसन नीमन बात पढ़े के मिलल हा...रउवा के बहुत बधाई बलभद्र जी....लेवा से जोड़ी के देखल जाऊ ता हमनी के संस्कृति भी मरही के कगार प लागत बिया...दुःख के ई बात बा की ओके हमनिए का मुआवातो बानी जा.....मजा आ गइल एके पढ़ी के... ....

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