नीलेश रघुवंशी के उपन्यास 'शहर से दस किलोमीटर' की अरुण जी द्वारा की गई समीक्षा
आज के समय में शहर हर व्यक्ति को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। इसकी तमाम वजहें होती हैं। हालांकि शहर का तिलिस्म वहां रहने के बाद धीरे धीरे टूटता चला जाता है। शहर का आक्रामक विस्तार आस पास के गांवों कस्बों को तो निगलता ही है साथ ही वह प्राकृतिक परिवेश को भी निगलते हुए आगे बढ़ता जाता है। शहर में सुविधाएं भले ही हों, लेकिन मनुष्य सामाजिकता से कट कर एकाकी हो जाता है। आस पास के दुख दर्द से किसी का कुछ भी लेना देना नहीं होता। नीलेश रघुवंशी अपने उपन्यास 'शहर से दस किलोमीटर' में भोपाल शहर के आस-पास के लोगों के बदलते जीवन और उनकी जद्दोजहद को रेखांकित करता है। लंदन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रोफेसर फ्रेंसेस्का ऑर्सीन अपने एक इंटरव्यू में नीलेश के इस उपन्यास को हिन्दी के पॉच कालजई उपन्यासों में शुमार करती हैं। इस उपन्यास की एक समीक्षा की है अरुण जी ने। अरुण जी अपने यात्रा वृत्तान्त के लिए जाने जाते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं नीलेश रघुवंशी के उपन्यास 'शहर से दस किलोमीटर' की अरुण जी द्वारा की गई समीक्षा 'दस किलोमीटर में एक नहीं, अनेक कहानियां'। 'दस किलोमीटर...