प्रचण्ड प्रवीर का आलेख 'वर्णोच्चार तथा छन्द : प्रातिशाख्योँ के आलोक मेँ'
किसी भी भाषा के लिए उसकी वर्तनी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। प्रचण्ड प्रवीर लिखते हैँ 'प्राचीन भारतीय परम्परा मेँ समस्त ज्ञान को वैदिक संहिता और उनके उपजीव्य ग्रन्थोँ मेँ निबद्ध किया गया है। वेद के छह अङ्गोँ मेँ पहले दो, शिक्षा और व्याकरण के द्वारा वर्णोँ के उच्चारण और पदोँ की साधुता का ज्ञान हो जाना प्रतिपाद्य है। वैदिक मन्त्रोँ और पदोँ के अर्थ-ज्ञान के लिये 'निरुक्त' तीसरा अङ्ग गिना जाता है। अधिकांश मन्त्र पादबद्ध और छन्द विशेष से युक्त हैँ अतः उनके लिये चौथे अङ्ग 'छन्द' का विधान है। वैदिक कर्मोँ के अङ्गदर्श आदि कालोँ के ज्ञान के लिये 'ज्योतिष' पाँचवा अङ्ग है। वैदिक अनुष्ठान के क्रमोँ के ज्ञान के लिये कल्पसूत्र आदि वेद के छठे और अन्तिम अङ्ग 'कल्प' मेँ आते हैँ।' लिखने या बोलने में बरती जाने वाली अशुद्धियां दिक्कततलब होती हैँ। फ़िराक़ गोरखपुरी कहा करते थे कि अशुद्धियां खाने में कंकड़ के समान होती हैं जो खाने का सारा स्वाद बिगाड़ देती हैँ। न्यूज चैनल्स और पत्र पत्रिकाओं की बात तो छोड़िए किताबों में भी तमाम अशुद्धियां सहज ही देखी जा सकती हैँ। बचपन...