भरत प्रसाद के काव्य संग्रह 'एक पेड़ की आत्म कथा की समीक्षा : नित्यानन्द गायेन




कवि एवं आलोचक भरत प्रसाद का एक कविता संग्रह ‘एक पेड़ की आत्मकथा’ नाम से प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह की समीक्षा की है युवा कवि नित्यानन्द गायेन ने। आईए पढ़ते हैं यह समीक्षा-
   
‘पेड़ के बहाने, मनुष्य की आत्मकथा’

पिछले दिनों कवि भरत प्रसाद जी का काव्य संग्रह ‘एक पेड़ की आत्मकथा’ पढ़ने का सुअवसर मिला। संग्रह की भूमिका वरिष्ठ कवि भगवत रावत ने लिखी है। कवि के बारे में उन्होंने लिखा है –“सन २००० के बाद, यानी इक्कीसवीं सदी के साथ जो युवा कवि हिंदी में सामने आ रहें हैं , भरत प्रसाद उन सबमें कई अर्थों में अलग और विशिष्ट हैं। सबसे पहले तो यही कि वे गैर राजनीतिक ढुलमुल दृष्टि वाले नहीं बल्कि एक बेहद सशक्त राजनीतिक दृष्टि संपन्न ऐसे कवि हैं जिसका पक्ष –विपक्ष बिलकुल स्पष्ट है। समाज को देखने –समझने की उनकी गहरी संवेदनशीलता पूरी तरह सतर्क और ज्ञानात्मक है।”
रावत जी ने इस कवि के बारे में यहाँ जो कुछ लिखा है उसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं। यह बात हम भरत प्रसाद की कविताओं से गुजर कर आसानी से समझ सकते हैं। उदाहरणस्वरुप इन पंक्तियों को देखिये :

“वह कलम किस काम की
जो दूसरों के भावों को
सार्थक शब्द न दे सके ,
जो असफल हो जाय
जीवन से हार खाए हुए को
थोड़ी सी उम्मीद देने में ,..”

‘कलम’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ हमें कवि के पक्ष को समझने में सहायता करती हैं। संग्रह का शीर्षक ‘एक पेड़ की आत्मकथा’ मतलब जीवन संघर्ष की कहानी। जिस तरह एक वृक्ष अपने जीवन काल में तमाम आंधी–तूफान बाढ़ –सूखा सब कुछ झेलते हुए अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता है ठीक वैसा जैसा नागार्जुन का ‘बाबा बटेसरनाथ’ की कहानी है। पेड़ की आत्मकथा उन सब की आत्मकथा है जो आज भी पीड़ित और शोषित है। यह आत्मकथा हर संघर्षरत व्यक्ति की आत्मकथा है।

इस संग्रह की पहली कविता है – ‘प्रकृति की ओर’ छोटी सी कविता किन्तु गहरी।

“सुना है –
ममता के स्वभाववश
माता की छाती से
झर –झर दूध छलकता है
मैं तो अल्हड़ बचपन से
झुकी हुई सावंली घटनाओं में
धारासार दूध बरसता हुआ
देखता चला आ रहा हूँ |”


कवि भावविभोर हो कर खुद को प्रकृति से जोड़ता है और उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। 
अपनी मातृभूमि के प्रति हमारा प्रेम ही हमें अपनी जड़ों से जोड़कर रखती है। प्रत्येक नागरिक को अपने देश की धरती के प्रति ऋणी होना चाहिए। जो अपनी धरती से खुद को अलग कर लेने का प्रयास करता है और विश्व पूरे विश्व को समझने का प्रयास करता है वह सही नही हों सकता क्यों कि अपनी जड़ों से अलग कर हम दुनिया को कभी समझ ही नही सकते। क्यों कि मनुष्य पहले अपने परिवार फिर गांव –समाज से होकर ही बाकी दुनिया तक पहुँचता है। द्विविजेंद्र लाला राय ने –“लिखा धोनो –धान्यो पुष्पे भोरा आमादेर एई बोसुन्धोरा ..।” ठीक इसी तरह कवि भरत प्रसाद ने अपनी मातृभूमि को याद किया है –

“ओ मेरी विशाल और
महान मातृभूमि
मैं आज
तुम्हारी ममतामयी धूल और मिटटी को
साष्टांग प्रणाम करता हूँ
सदा हरी –भरी तुम्हारी गोद
प्रसन्न फूलों से पूर्ण
तुम्हारे पानी , फल और अन्न
हमें बहुत शक्ति देते हैं ” (वही,पृ.-२४ )
 

बहुत सही लिखा है कवि ने यहाँ हमारी धरती ही हमें शक्ति प्रदान करती हैं , अपनी धरती से बेदखल मनुष्य बहुत कमजोर हों जाता है। जिस तरह वृक्ष कभी धरती से अलग होकर जीवित नही रह सकता ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी धरती से अलग होकर बहुत कमजोर हो जाता है।

‘वह पुराना आदमी’ कविता में कवि ने आधुनिक मानवीय स्वाभाव पर कटाक्ष करते हुए उसे यहाँ बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है

–“उस रात के जब डूबने तक
हर कोई बस सो रहा था –
वह पुराना आदमी कब से
अचानक टूट करके –
बालकों सा रो रहा था
....
सुबह हुई सभी उठे
गए वहाँ खास लोग
रेडीमेड शब्दों में
करुणा की बारिश कर
खुद को कुछ कामों में व्यस्त कह ,
वापस घर –आकर
तीन –पांच धंधों में
जबरदस्त मस्त रहे”


यहाँ कवि ने मनुष्य के बदले हुए स्वाभाव को उजागर किया है। आज सहानुभूति के शब्द भी रेडीमेड हैं। ये शब्द दिल ने नही निकलते हैं। आज हमें अपने साथी मनुष्यों के प्रति /उसकी पीड़ा के प्रति कोई सहानुभूति नही रहीं, हमें मतलब है तो केवल अपने काम से।

(कवि: भरत प्रसाद)

जनकवि बाबा नागार्जुन के प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हुए कवि भरत प्रसाद ने कविता लिखी है –“बाबा नागार्जुन” –

‘बदलती हुई शताब्दी के,
ठीक –ठीक पहले ही
ढेरों जनता की
एक कलम टूट गयी’


एकदम सटीक बात लिखी हैं कवि ने हमारे /जनता के प्रिय कवि नागार्जुन के लिए। नागार्जुन वे कलम थे जो लाखों जनों का प्रतिनिधित्व करते थे | आज बाबा जैसे कवि को खोज पाना दुर्लभ हों गया है।

“पक्की निगाह से
परख लिया राजनीति
देख लिया सत्ता के
शक्तिमान साजिश को,
सधे चोर संसद के
बहुत अच्छे भाषण में
कुर्सी की बदबू थी;
वादे थे बड़े –बड़े
खाली और खतरनाक
हरे –भरे घावों से
भरी हुई जनता पर
महजब का नमक डाल
जन सेवा करते थे।” (वही, पृ .३०)


भरत जी ने अपनी उच्च शिक्षा दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से प्राप्त किया है। जे.एन. यू. आज भी पूरे देश मेंकम्युनिस्ट विचारधारा का गढ़ माना जाता है। कौन भूल सकता है गोरख पाण्डेय को?  यहीं से देश को कई बड़े वामपंथी नेता मिले। इसी तरह एक छात्र नेता हुए थे कामरेड चन्द्रशेखर। अपने साथियों के अलावे जेएनयू में सभी छात्रों में खासे लोकप्रिय थे। वे अपने मित्रों के प्रिय चंदू थे। थे तो वे एक छात्र नेता पर केन्द्रीय सत्ता को भी भय लगता था इनसे। और सत्ता को जिससे भय लगता है वह उसे अपने मार्ग से हटा देता है। यही हुआ था चंदू के साथ भी। जेएनयू छात्र संघ के भूतपूर्व अध्यक्ष की बिहार के सिवान जिले में एक रैली को संबोधित करते वक्त सिवान का गुंडा और लालू यादव का खास शाह्बुददीन के इशारे पर उनकी हत्या कर दी गई थी। जिसके बाद सरकार को जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा और कोई महीनों तक छात्रों ने दिल्ली में सरकार के विरोध में आन्दोलन किया , जेल भरे गए ....देश के इस वीर सपूत के शहादत ने आज़ादी के दशकों बाद भगत सिंह की याद ताज़ा कर दिया था। अपने इस साथी को याद करते हुए कवि ने एक कविता लिखी हैं – ‘तुम रहोगे चंद्रशेखर’ यह सही भी है ऐसे लोग कभी मरते नही, वे सदा जीवित रहतें हैं हमारे भीतर, हमारी स्मृतियों में।

“चंद्रशेखर –तुम जा नही सकते
क्यों कि तुम –तुम नही ‘सब’ बन गये हों।
सपने जो बनाये , क्या मिट गये सभी ?
नही चंदू नहीं
वो तो आत्मा में बस गये हैं
।” (वही, पृ .४१)

बिलकुल ऐसे साथी कभी मरते नही , वे सदा जीवित रहते हैं हमारे भीतर अपने विचारों से। और एक सच्चे साथी का यह फ़र्ज है कि हम उनकी विचारधारा को आगे तक ले जाएँ। यही काम भरत जी यहाँ करते हुए दीखते हैं। यही इस कवि की प्रतिबद्धता का प्रमाण भी है। इसके लिए मैं कवि के प्रति अपना आदर प्रकट करता हूँ। उन्हें लाल सलाम देता हूँ।

इस संग्रह की एक और बेहतरीन कविता है –‘बामियान के बुद्ध’ कुछ समय पहले तालिबान आतंकवादियों ने अफगानिस्तान के बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं को तोड़ –फोड़ दिया था।| विश्व समुदाय ने इस घटना की कड़ी निंदा की थी। बुद्ध जिन्होंने सदियों पहले विश्व शांति के लिए अपना सब कुछ त्याग कर वनवास अपना लिया था और अंगुलीमल जैसे क्रूर हत्यारा उनके प्रभाव में आकर एक महान संत बन गये थे। इस बुद्ध के विचारों के प्रभाव से सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन हुआ था। आज भय से उनकी प्रतिमाओं को खंडित करने में लगे हैं। इससे बुद्ध और भी प्रासंगिक हों जाते हैं कि केवल उनकी मूर्तियों की मौजूदगी से आतंकी खौफ़ में हैं । कवि ने इन अबूझ दहशतगर्दों के लिए लिखा है –

“वह मूर्ति नहीं, वह धर्म नही
वह अमर रहेगा, राज करेगा दिल में
जब तक मानव में
यह ह्रदय रहेगा।
अपनी सोचो, कहाँ खड़े हों?
नई शती या मध्यकाल में,
विश्व बढ़ रहा है आगे –आगे
तुम हो वैसे पीछे जाते
महजब की बंजर धरती पर,
कट्टरता के अंधकार में
जानबूझ कर ठोकर खाते ....(वही, पृ .४३)


‘पेड़ की आत्मकथा’ इस संग्रह में दरअसल मनुष्य की आत्मकथा निहित हैं। इस संग्रह में कवि ने आज के समय की विसंगतियों का चित्र उकेरा है। कवि भरत प्रसाद के इस संग्रह में डाकू से सांसद बनी फूलन देवी पर भी एक कविता हैं। जो हमारी राजनीतिक व्यवस्था और सामाजिक ढांचे पर एक सवाल खड़ा करती है। प्रकृति पर भी कुछ बेहतरीन रचनाएँ हैं जो महान कवि विललियम वोर्सवर्थ की याद ताज़ा कर देती हैं। कुछ कवितायेँ जो लंबी हैं उन्हें कम शब्दों में भी लिखी जा सकती थीं पर शायद कवि के पास शब्द और अनुभव अधिक रहें हों। इस संग्रह में ४९ कवितायेँ हैं कुल मिलाकर यह एक बेहतरीन संग्रह है इन कविताओं को पढ़कर पाठक न केवल कवि के मनोभावों को समझ पाएंगे बल्कि वे अपने समाज और उसकी विसंगतियों से भी रु –ब रु होंगे। किन्तु संग्रह का मूल्य कुछ अधिक ही गया रखा है। आम पाठक इसे खरीदने में हिचकिचाएंगे।


पुस्तक –एक पेड़ की आत्मकथा
लेखक –भरत प्रसाद
प्रकाशक –अनामिका प्रकाशन,

५२, तुलारामबाग ,इलाहाबाद
मूल्य -२७५/-रु



समीक्षक – नित्यानन्द गायेन
हैदराबाद , मो -०९०३०८९५११६

टिप्पणियाँ

  1. धन्यवाद नित्यानंद जी ! मैं इस संग्रह को पढ़ना चाहूँगा ... आभार !
    - कमल जीत चौधरी [ साम्बा , जम्मू ]

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