युवा कवि केशव तिवारी से महेश चन्द्र पुनेठा की बातचीत





लोक और जनपदीय कविता के प्रमुख हस्ताक्षर केशव तिवारी से अभी हाल ही के दिनों में एक बातचीत की युवा कवि महेश चन्द्र पुनेठा ने। इस बातचीत के प्रसंग में कई महत्वपूर्ण बातें उभर कर सामने आयीं हैं। इन्हें जानने के लिए आइये पढ़ते हैं यह बातचीत।

युवा कवि केशव तिवारी मेरे उन गिने-चुने मित्रों में से हैं जिनसे लगभग हर रोज ही दूरभाष से बात हो जाती है। यह सिलसिला लगभग पिछले छः-सात सालों से जारी है। अब तो यह स्थिति है कि जिस दिन उनका फोन नहीं आता है, मन आशंकाग्रस्त होने लगता है। इस दौरान मुझे उनकी कविता की रचना-प्रक्रिया को जानने-समझने का मौका तो मिला ही साथ ही उनके कवि और कवि मन को बारीकी से पढ़ने का अवसर भी मिला। मैंने उनको दूसरों की छोटी-छोटी खुशियों में खुश होते हुए और दुःखों में गहरे अवसाद में जाते हुए तथा एक अच्छी कविता पढ़ने पर भावविभोर और खराब कविता पर खिन्न होते हुए देखा है। यह कहते हुए मुझे कोई संकोच नहीं है कि वे कविता लिखते ही नहीं जीते भी हैं। मुझे उनका जीवन के हर पक्ष और अपने से जुड़े लोगों के बारे में स्पष्ट और बेवाक राय रखना बहुत पसंद है।

केशव तिवारी युवा कवियों में मेरे सबसे अधिक प्रिय कवि हैं। उनके यहाँ मुझे वह सब कुछ मिलता है जो मेरे दृष्टि से एक अच्छी कविता के लिए जरूरी है। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए पता चलता है कि कविता की तमाम शर्तों को पूरा करते हुए भी कैसे कविता सहज संप्रेषणीय हो सकती है। कैसे नारा हुए बिना कविता विचार की वाहक बन सकती है । कैसे स्थानीय हो कर भी कविता वैश्विक अपील करती है। लोकधर्मी होते हुए भी कविता को कैसे भावुकता से बचाया जा सकता है और कैसे अपने जन-जनपद और प्रकृति से जुड़े रहकर पूरे धरती से प्यार किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात तमाम भय और प्रलोभनों के बीच खुद को एक प्रतिबद्ध कवि के रूप में कैसे खड़ा रखा जा सकता है। यह कहते हुए मुझे कोई झिझक नहीं है कि कविता के नाम पर अबूझ कविता लिखने वाले हमारे समय के ’कठिन कविता के प्रेतों’ और लोक के नाम पर कोरी-लिजलिजी भावुकता की कविता लिखने वालों को उनसे सीखना चाहिए। केशव तिवारी में मुझे त्रिलोचन जैसी सरलता केदार बाबू  जैसी कलात्मकता और नागार्जुन जैसी प्रखरता दिखाई देती है। उनकी कविता का सहज,भावपूर्ण एवं विविध आयामी स्वरूप मध्यवर्गीय रचना भूमि का अतिक्रमण करता है। वे अपनी देशज जमीन पर खड़े मनुष्यता की खोज में संलग्न रहते हैं। उनकी कविताएं यथार्थ का चित्रण ही  नहीं करती बल्कि उसको बदलने के लिए रास्ता भी सुझाती हैं। लोकधर्मी कविता  की अपील कितनी व्यापक होती है  इनकी कविताओं में देखा जा सकता है।

  हाशिए में पड़े लोगों के दुःख-दर्दों के प्रति केशव तिवारी के भीतर जो बेचैनी और तड़फ दिखाई देती है वह आज विरल है। बद-से-बदतर हालातों में भी काठ-पाथर न होना ही उनकी ताकत है। एक इंसान के रूप में उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि जिसके साथ खड़े हुए फिर उसके लिए जमाने से लड़े इसी के चलते वे बहुत सारे लोगों के आँखों में खटकते और सीने में गड़ते रहे हैं। पर उनको इसकी परवाह नहीं। वे ’दिल्ली’ के दर्प को कभी नहीं कबूलते है। वे प्रेम करना जानते हैं तो घृणा करना भी। वे उन तमाम ताकतों से घृणा करते हैं जो मानवता के खिलाफ हैं। वे इस धरती पर सिर्फ प्रेम करने के लिए आए हैं। उनकी प्रेम की उदात्तता ही कही जाएगी कि प्रेम करने के लिए आने के बावजूद भी घृणा करने को मजबूर हैं उन लोगों से जो प्रेम के खिलाफ षड्यंत्र करते हैं। ऐसा वही कर सकता है जो मानवता से सच्चा प्रेम करता हो। केशव की कविताओं में आम आदमी का दुःख रह-रहकर फूट पड़ता हैं। वे आम आदमी से इतने एकात्म हैं कि उनकी फटी हथेलियों और सख्त चेहरों से झरते हुए नमक तक को भी देख लेते हैं। खुरदुरी हथेलियों में उन्हें जीवन का सच्चा सौंदर्य दिखाई देता है। वे खुरदुरी हथेलियों वालों को भी उसके सौंदर्य का अहसास कराते हैं।

   उनके लिए ’नामालूम और छोटे’ की अहमियत किसी ज्ञात और बड़े से कम नहीं। इनके हिस्से में किसी तरह की कोई कटौती उन्हें स्वीकार नहीं है। ’अपने कोने के एक हिस्से में बहुत उजला और बाकी के हिस्सों में बहुत धुँधला’ उन्हें मान्य नहीं। ’कुछ हो ना हो’ सभी के लिए ’एक घर तो होना ही चाहिए’। उन्हें एक अफगानी, एक कश्मीरी,एक पहाड़ी या राजस्थानी का दुःख भी उतना ही सालता है जितना किसी बाँदावासी का। वह इस धरती की सुंदरता अपने समय को ललकारते लोगों में देखते हैं। उनका अपनी जमीन से ’आशिक और मासूक का रिश्ता’ है। इसी के चलते तो उनके लिए ’आसान नहीं विदा कहना’।  इससे पता चलता है कि वे अपनी जमीन से कितना प्रेम करते हैं। लोगों की खुशी में ही कवि की खुशी और उनकी बेचैनी में कवि की बेचैनी है।

  यह कवि ’दलिद्र ’ को भी जानता है और दलिद्र के कारणों को भी। और यह भी जानता है कि जिस दिन श्रम करने वाले लोग भी उन कारणों को जान जाएंगे उस दिन उलके ’जीने की सूरत भी बदल जाएगी’। वे भली-भाँति जानते हैं कि ’ दुःखों की नदी स्मृतियों की नाव के सहारे पार ’ नहीं की जा सकती है। एक कवि का यह जानना उसकी वैज्ञानिक दृष्टि का द्योतक है। यही है जो उसे कोरी भावुकता से बचा ले जाता है। 

  कवि ऐसी कविता लिखना चाहता है जो कठिन दिनों में भरोसेमंद मित्र की तरह साथ बनी रहे। वे उस आदमी की तलाश करते हैं जिससे मिल धीरज धरे मन, जो रोशनी का अहसास लिए हो  जिस पर भरोसा किया जा सके तथा खुद जिसका विश्वास बना जाय। उनकी कविता में यह बात हमें मिलती भी है। उनकी कविता हारे-गाढ़े हमारे साथ बनी रहती है। वे कोलाहल भरी भीड़ में खुद को भी खोजते हैं- अपनी खनकदार आवाज और मन-पसंद रंग को तथा सूखती संवेदना में खोई हुई सौंदर्य दृष्टि को। उनकी दृष्टि में यह खोज किसी संघर्ष से कम नहीं है। यह वास्तविकता भी है।

  केशव अतीत के अजायबघर को वर्तमान की छत पर खड़े होकर देखने वाले कवि हैं। अतीत के मोह में खो जाने वाले नहीं। उन पर ’नास्टेल्जिक’ होने का आरोप मुझे हास्यास्पद प्रतीत होता है। नई सुबह के आगमन के  प्रति वे आश्वस्त हैं। उनको गहरा अहसास है कि -आज नहीं तो कल-कटेगी ही दुःख भरी रातें, हटाए ही जाएंगे पहाड़।

   हमारे समय में बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव को लेकर केशव परेशान रहते हैं। जो उनकी कविताओं में अनेक स्थानों पर व्यक्त हुआ है। बाजार का दबाब वे अपने गर्दन और जेब दोनों में महसूस करते हैं।  प्रेम का वस्तु में तब्दील होते जाना उनको बहुत कचोटता है। इस बाजारवादी समय में प्रेम दिल के नहीं जेब के हवाले हो गया है। जो खरीदा-बेचा जा रहा है। केशव प्रेम को व्यापार बनाए जाने के विरोध में हैं। वे बाजार का नहीं बाजारवाद का विरोध करते हैं। वे कहते हैं ’तब भी था बाजार’ पर ऐसा नहीं,जो मनुष्य को लूटने के लिए हो। जिसमें बाजार में खड़ा हर आदमी हानि-लाभ का हिसाब लगाने में ही जुटा रहता हो । मनुष्य अपनी जरूरत के लिए बाजार में जाता था न कि बाजार जरूरत पैदा कर आदमी के घर में घुसता था। दूसरे शब्दों में, बाजार आदमी के लिए था न कि आदमी बाजार के लिए। जरूरतें कृत्रिम नहीं थी। वस्तु बेची जाती थी मूल्य नहीं। चकाचौंध पैदा कर ग्राहक को भरमाया नहीं जाता था। उसकी आँखों में झूठे सपने नहीं बोये जाते थे। केशव बाजार के इस चरित्र को पूरी काव्यात्मकता के साथ अपनी कविता में उद्घाटित करते हैं। उनके कहन का अपना निराला अंदाज है । जैसे उन्हें यदि बाजारवाद के खिलाफ कुछ कहना है तो भारी-भरकम शब्दों की बमबारी नहीं करते बल्कि ’गहरू गड़रिया’ जैसे पात्रों को उसके बरक्स खड़ा कर देते हैं। अतंर्विरोध खुद-ब-खुद सामने आ जाते हैं।

  बाजारवादी समय में लोक के व्यवहार में आ रहे बदलाव पर भी उनकी पैनी नजर रहती है। लोक को झूठ-मूठ का महिमामंडित करना उन्हें नहीं भाता है। जहाँ भी लोक के भीतर कोई छल-छद्म-धूर्ततता या ईष्र्या-घृणा-बैर या फिर अंधविश्वास-रूढि़वादिता  जैसी कमजोरियाँ नजर आती है उन्हें भी रेखांकित करने से नहीं चूकते हैं। ये सब रेखांकित करने के पीछे उनका उद्देश्य लोक को उसकी कमजोरी का अहसास करा उससे बाहर निकलने के लिए प्रेरित करना रहता है। ताकि वह अपने मुक्ति-संघर्ष को मजबूती से आगे बढ़ा सके। यह लोक को देखने की उनकी द्वंद्वात्मक दृष्टि है।

  केशव की कविताओं में अपने नीड़ से बहुत दूर चले आने की पीड़ा भी व्यक्त हुई है। इस बात की कसक भी है कि जिस नृशंस दुनिया के खिलाफ कभी खड़े हुए थे वह दुनिया आज भी उतनी ही नृशंस है। बहुत अधिक बदलाव नहीं आया उसमें।

कवि केशव तिवारी की विशिष्टता है कि वे अपनी कायरता तक को नहीं छुपाना चाहते हैं। उनके भीतर सच सुनने का साहस  है। कवि को कैरियर की खोह में फँसकर तरह-तरह के समझौते करने और घिसट-घिसट कर निभाने का अफसोस है। कवि अपने पुरखों, अपनी जमीन, अपने जन  के प्रति कृतज्ञता से भरा है। इसलिए कहा जा सकता है इस कवि की काव्ययात्रा बहुत लंबी और कालजयी होगी।

वैसे तो केशव जी से जीवन-समाज और साहित्य पर रोज कुछ न कुछ बातें होती रहती है पर यहाँ ’जनपथ ’ के बहाने कुछ विधिवत और विस्तार से बातचीत हुई। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत -





प्र01. केशव जी, सर्वप्रथम अपने जीवन और लेखन के बारे में कुछ बताइये आपके लेखन की शुरूआत किस विधा से हुई?

उ0.  महेश जी मेरा जन्म प्रतापगढ (अवध) के एक गांव जोखू के पुरवा मातुल में हुआ। और उसके निकट ही 15 किमी0 पर मेरे पिता का गांव है मेरा बचपन दोनो ही जगहो पर बीता मेरा अपनी नानी से अदभुत  लगाव था। वो एक ऐसी महिला थी कोई गरीब गुरबा सीधा उनके पास मदद को आ सकता था। और वो उसकी हर संभव मदद करती। मै ज्यादातर घर में कार्यरत मजदूरो के साथ ही घूमता उनके कंधे पर सवार खेत खलिहान जाता और मेढ पर बैठ उनको काम करते देखता। चैता, कजरी, विरहा, फगुवा, आल्हा, का संस्कार मुझे इन्ही से मिला। लिखना पढना बहुत बार हिंदी की शौकिया गजल से हुआ। मै हिंदी का आदमी तो था नही वाणिज्य से स्नातक और व्यसायिक प्रबंधन की पढाई की थी। प्रशासनिक सेवाओं में इम्तिहान मे हिंदी साहित्य लिया फिर इधर ही आ गया शुरूआती दौर में बांदा के श्री कृष्ण मुरारी पहारिया जिनसे मेरी कुछ मुद्दो को लेकर गहरी असहमति थी। पर वे एक बहुत समर्थ माक्र्सवादी आलोचक और गीतकार रहे पहल पत्रिका में भी उनके लेख मैने पढे थे। उन्होने मुझे वास्तव मे मांजा बाद में केदार नाथ अग्रवाल के संपर्क में आया। निरंतर उनके संपर्क में 20 वर्ष रहा । डा0 जीवन सिंह का मेरे ऊपर गहरा असर पड़ा उनकी पुस्तक ’कविता और कवि कर्म’ मेरी सबसे प्रिय किताबों में एक है। बचपन में अवधी के कवि जुमई खां आजाद उनकी प्रसिद्ध कविता ’कथरी तो गुहाई गुन ऊ जाने जे करै गुजारा कथरी मां’ अभी तक याद है। अवधी के ही अद्या प्रसाद उन्मत्त और बुंदेली के महाकवि ईश्वरी का मुझ पर गहरा प्रभाव रहा। बाद में डा0 राम विलास शर्मा, डा0 शिव कुमार मिश्र, डा0 विष्णु चन्द्र शर्मा, विजेन्द्र और सुधीर विद्यार्थी जी के लेखन कर्म से बहुत प्रभावित हुआ। त्रिलोचन, केदार, नागार्जुन, मुक्तिबोध, मानबहादुर सिंह,विजेन्द्र, कुमार विकल, ज्ञानेन्द्रपति, अरूण कमल, राजेश जोशी की कविता से भी गहरा जुडा़व रहा है। अजय तिवारी की किताब ’समकालीन कविता और कुलीनतावाद’ ने भी मुझे चीजों को समझने की एक दृष्टि दी। विदेशी कवियों में सेन्डोर पिटोफी (हंगरी) मेरा दागिस्तान (रसूलहमजातो) मारीना स्वेतायोवा और चेयनेसिविकसी का ’व्हाट इस टू बी डन’, क्रिस्टोफर काडवेल की ’विभ्रम और यर्थाथ’ और मारिस कार्नफोर्थ की किताब जो मुझे केदार नाथ अग्रवाल से मिली ने मेरे कवि को एक मजबूत आधार दिया। हाल में विजय कुमार की किताब ’खिड़की के पास कवि’ में यहूदा यामीखाई, महमूद दरवेस, यानिद रिदकोष की कविताओं से भी गंभीरता से जुड़ने का अवसर मिला। शैली मेरा सर्वकालिक प्रिय विदेशी कवि है।

प्र02- युवा कविता में आपको लोकधर्मी काव्य परंपरा का एक सशक्त वाहक माना जाता है। आपकी कविताओें में लोक ही टकहराहटे पूरे टंकार के साथ आती है। उसका गहरा प्रतिरोध दिखायी देता है पर इधर लोक को लेकर तमाम भ्रम फैलाये जा रहे हैं। लोकधर्मी कविता को जीवन के  संघर्षो से भागे लोगो की शरण स्थली कहा जा रहा है। कुछ कवि आलोचक लोक को बडे संकुचित अर्थ मरण में लेते है। उनके लिये लोक का मतलब दूरस्थ गांवो में रहने वालो के मेले खेले नाच गान तीज त्योहार वनस्पति बोली बानी मात्र रह गया है। इन सब को रचना में ले आना उन्हे लोकधर्मी होना है। लोक के नाम पर वे उसकी कमजोरियां अंधविश्वासों को भी महामंडित करने लग जाते है। इस प्रवृत्ति पर आपका क्या कहना है?

उ0-  देखिये इस पर काफी बात हो चुकी है । मैं भी अपना मत कई बार रख चुका हूं। प्रथम तो इस शरणस्थली शब्द से ही मैं कोई सहमति नही रखता। मेरा कहना है जब हम किसानी संस्कार से आयेगे तो वहां का मेला ठेला भी आयेगा, लोक गीत भी आयेंगे, उल्लास और शोक सब आयेगे। बिना पूरे जीवन की कविता कैसे होगी। और एक सच्चा लोकधर्मी कवि लोक में फैली तमाम गलत बातों का पहला विरोधी होगा। ये आम आदमी का जीवन संघर्ष, उसके दुख, उसकी पीड़ा, ये सब लोक के साथ नत्थी है। इसके बिना लोक की कविता पर बात नहीं हो सकती। जो लोक के 1857 से 1942 तक के संघर्ष के इतिहास से आंख मूंद लेते हैं, वही ये सब कहते है। लोक संघर्ष की जमीन है। शरणस्थली नहीं।


प्र03-  क्या आपको नहीं लगता है कि आज की आलोचना कुछ शहरों और महानगरों के मध्य वर्गीय मानसिकता वाले कवि लेखकों तक केन्द्रित हो कर रह गयी है। लोक और जनपदों की घोर उपेक्षा हो रही है। जब कि साहित्य की पूरी परंपरा में केन्द्र में हमेशा लोक ही रहा है। उसके पीछे आप क्या कारण मानते है?

उ0 - यह सब एक सधा और खास मानसिकता के तहत किया जा रहा प्रयास है। इसका एक ही जवाब है जब तक लोक अपने भीतर से आलोचक नहीं पैदा करेगा, ये सब होता रहेगा। इन आलोचकों के सहारे लोक की सही व्याख्या नहीं हो सकती है। अच्छा ये है कि नये आलोचकों की एक पीढ़ी आ चुकी है और यह काम आगे बढ़ा है।


प्र04-  ऐसी स्थिति में आप को कविता के लोकधर्मी प्रतिमानों को स्थापित करने की आवश्यकता नहीं महसूस होती है।

उ0-  देखिये ये काम तो आलोचना को करना है प्रतिमान तो आलोचक ही तय करेगा फिर बात वहीं उसकी नियत और ईमानदारी पर आकर टिक गयी। देखने में ये भी आया है कि इन्ही प्रतिमानों को गढने में वरिष्ठ आलोचकों ने क्या खेल खेला है।

प्र05-  हिंदी साहित्य में आज वरिष्ठ पीढ़ी के बहुत कम रचनाकार ऐसे होंगे जो मौजूदा आलोचना की स्थिति से संतुष्ट हों, जिससे भी पूछो वह आलोचना कर्म पर पक्षपात का आरोप लगाता है। आप इस स्थिति के लिये आलोचकों को जिम्मेदार मानते है। या यह रचनाकारों का स्वयं को जरूरत से ज्यादा आंकना है। या फिर वास्तव में हिंदी आलोचना गुटबंदी, चकबंदी, हदबंदी और व्यक्तिगत आग्रहो, पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है?
 
उ0-  मेरा मानना है कि हिंदी आलोचना ने केदार, नागार्जुन, त्रिलोचन के बाद एक बंदरकूद लगाते हुये बीच के कुछ महत्वपूर्ण रचनाकारों को छूते सीधे 80 की कविता में आकर दम साधा।  जिससे बहुत से महत्वपूर्ण कवि बिना पर्याप्त चर्चा के ही रह गये आज का रचनाकार तुरंत प्रसिद्धि चाहता है। उपेक्षा जो पहली शर्त है उसको एक क्षण भी झेलने को बर्दाश्त नहीं। वह केवल श्रीमुखों से अपना नाम सुनकर संतुष्ट है। और वो भी नाम गिनाकर जिम्मेदारी निभा रहे है। दोनो प्रसन्न है रचनाकार का आलोचना का मुखापेक्षी होना ही सब गुण गोबर किये हुये है। और एक खराब कविता एक खराब आलोचना को ही जन्म देगी। धैर्य रखिये सब छट रहा है और छट जायेगा। ऐसे लोग पहचान भी लिये गये है।

प्र0 6-  कुछ रचनाकार ’अनुभूतियों के प्रति ईमानदारी’ के नाम पर साहित्य में मध्यवर्गीय व्यक्ति मानस के अकेलेपन, छटपटाहट, ऊब, उदासी, विक्षोभ तथा अनास्था को ही आर्कषक शैली में प्रस्तुत करते है। यह बात सही है लेकिन ऐसा करने वाले रचनाकारों का कहना रहता है कि जब आज के दौर का सामाजिक यर्थाथ यही है समाज मे चारो ओर यही व्याप्त है तो फिर इससे परहेज क्यों। साहित्यकार तो वही दिखाता है जो समाज मे घटित हो रहा है। इसमें गलत ही क्या है फिर सच्चे आधुनिक बोध और श्रेष्ठ कला के नाम पर बडे-बडे आलोचक भी ऐसी कृतियों और रचनाकरों को श्रेष्ठ घोषित कर रहे है इस पर आपकी टिप्पणी क्या है?

उ0 - संवेदना हर तरफ से आयेगी, लोक से भी मध्य वर्ग से भी। बस प्रश्न यह है कुछ संवेदना का जनता के एक बडे़ हिस्से से क्या सरोकार है। आप उदासी ऊब को गाते बजाते है या उसके प्रतिरोध में खडे होते है ये आपका निर्णय है। क्या जिंदगी के तजुर्बे असली है या ओढे हुये अगर कविता में प्रतिरोध का स्वर नहीं है तो आप जो चाहे लिखे स्वतन्त्र हैं। उसे कविता माने या और कुछ, जन के किसी काम की नहीं।

प्र07-    केशव जी क्या आपको नही लगता कि साहित्य के नाम पर मध्य वर्गीय संत्रास, कुंठा, निराशा, एकाकीपन और ऊब को प्रस्तुत करने के लिये रचनाकारों की अपेक्षा महानगरीय और सेठाश्रयी पत्र पत्रिकाओं के संपादक तथा आधुनिकतावादी आलोचक अधिक जिम्मेदार है। जो ऐसी रचनाओं को प्रकाशित एवं प्रोत्साहित करते है।

उ0-  महेश जी आपने जो कहा वह भी जीवन सच है। पर बात यह है कि आप उसमें ही फंसकर अगर रस लेने लगते है तो फिर बात बिगडती है उसके लिये आप मुक्तबोधीय रास्ता नहीं अपनाते तब प्रश्न खडा होगा और सेठाश्रयी पत्रिकाओं और उसके हजार पन्द्रह सौ शब्दों वाले आलोचकों का एक अच्छा खासा वर्ग है। उनकी महिमा अनंत है।



प्र0 8-  प्रगतिशील आलोचना पर आरोप है कि श्रेष्ठ सृजनात्मक प्रतिभा तथा महत्तर कृंतित्व के वावजूद नागार्जुन ,त्रिलोचन, तथा केदार और मुक्तिबोध अपनी पूरी अहमियत के साथ नहीं पहचाने गये जब कि उनकी तुलना मे कमजोर और हल्की प्रतिभा के प्रतिगामी दृष्टि वाले रचनाकार एक संगठित आलोचनात्मक प्रयास के तहत श्रेष्ठ और प्रथम श्रेणी के सृजकों के रूप में प्रकाशित विज्ञापित प्रतिष्ठित हुये और आज भी उसी प्रचार के तहत कमोवेश अपनी पताका फहराते हुये देखे जा सकते है उसके पीछे आप क्या कारण  देखते हैं?

उ0 - इस तरह की आलोचना की पोल खुल चुकी है। केदार, नागार्जुन, त्रिलोचन लौट-लौट इनके सर पर सवार हो जाते हैं। ये कवि जन स्वीकृति पा चुके है। इन्हे ये क्या डिगा पायेंगे। देखिये इसको बांदा या पिथौरागढ से नही समझा जा सकता है साहित्य के केन्द्रो में कितने वीभत्स ढंग से ये हो रहा है। आप अंदाजा नहीं लगा सकते । नकली कविता चेलों की पाठ्यक्रमों तक पहुंचायी जा रही  है। पुरस्कार दिलाया जा रहा है। मै कहता हूं जनपदों से आ रही रचनाशीलता को इनको ललकारना होगा। इन मठों को जबानी नहीं चढ के ढहाना होगा। तब ही कुछ हो पायेगा वरना ये आपको भी जूठन दिखाकर शांत कर देंगे। इन केन्द्रों में इनकी परिधि के बाहर पनप रही सच्ची कविता को भी इन्होंने दरकिनार कर रखा है।

प्र. 9- कुछ रचनाकारो का मानना है कि साहित्य सृजन जैसे एकांत कर्म के लिये किसी मंच किसी समूह किसी वैचारिक प्रतिबद्धता की कोई जरूरत नहीं है इससे रचनाकार की मौलिकता प्रभावित होती है?

उ0  - गलत अवधारणा असली कविता जीवन रण से निकल कर ही आती है और आयेगी विचार उसकी पृष्ठभूमि में रहेगा ही इस दुनिया के बदलने का कोई तो वैचारिक आधार होगा।

प्र.10- हमारे समय के महत्वपूर्ण लोकोन्मुखी कवि विजेन्द्र अक्सर कहा करते हैं कि आचरण और सृजन में द्वैत्य लेखक और सृजन दोनों को अविश्वसनीय और कमजोर बनाता है जब कि कुछ लोगों का कहना है कि आचरण और लेखन दो अलग अलग चीजें हैं। लेखक का आचरण नहीं उसका लेखन देखना चाहिये। वे ऐसे बहुत से नाम गिनाते हैं जिनका आचरण खराब हो जाने के बावजूद उनका लेखन उम्दा दर्जे का रहा। आप आचरण और साहित्य के बीच क्या कोई सीधा सम्बंध देखते है?

उ0  - देखिये मेरा मानना है कि क्रियेटिव राइटिंग और इंटेलीजेंस से की गयी राइटिंग का फर्क है। आचरणहीन इंटेलीजेंस से लिख सकता है पर क्रियेट नहीं कर सकता। मै विजेन्द्र जी से शत प्रतिशत सहमत हूं। छोटा मनुष्य कभी भी बड़ा कार्य नही कर सकता है। हां वह केवल उसका भ्रम फैला सकता है। जन में आज भी एक मापदंड है वो पहले आपको एक अच्छा मनुष्य मानेगा फिर वह आपका झंडा-डंडा साहित्य देखेगा। लोग गलत व्याख्या कर सार्टकट ढूंढ ही लेते है।

प्र011- एक रचनाकार को परंपरा के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखना चाहिये ? एक रचनाकार के लिये अपनी परंपरा या क्लैसिक्स की जानकारी क्यों आवश्यक है? क्या आपको नहीं लगता कि परंपरा या क्लैसिक्स हमारी मौलिकता या नवीनता को प्रभावित करते हैं?

उ0-  परंपरा कोई जड़ वस्तु नहीं है। किसी देश का क्लासिक उसकी संभ्यता के विकास का इतिहास होता है। जिसको समझे बगैर उसकी आत्मा को नहीं पहचाना जा सकता है। न ही महत्वपूर्ण कविता हो सकती है। अपनी जमीन और परंपरा से कट कर कोई बताये कोई महान रचना हुयी हो। परंपरा की अपनी जकड़नें भी है उसको त्यागना होगा। परंपरा को लेकर भावुक नहीं द्वंदात्मक होना पडेगा।


प्र012-    आज कवितायें खूब लिखी जा रही है, हर दूसरा लिखने वाला कवि है लेकिन अधिकांश कविताएं भावगत, शिल्पगत, एकरसता की शिकार हैं। यदि कविता से उसके रचनाकार का नाम हटा दिया जाये तो यह बता पाना मुश्किल होगा कि ये कवितायें एक ही व्यक्ति के द्वारा लिखी गयी है या अलग अलग के द्वारा। इसके पीछे क्या कारण देखते है?

उ0-  इसके पीछे मूल कारण जीवनानुभवों की कमी है। इस वजह से कविता ’काकवाद’ का शिकार हुयी है। यह सब बडे-बडे कवि भी कर रहे है। 80 के बाद लोक के नाम पर तमाम कमजोर कवितायें भी खूब लिखी गयी, उन्हे खूब प्रचारित भी किया गया पर इसके वरक्स केदार, नागार्जुन, त्रिलोचन की परंपरा भी लगातार सक्रिय रही। वह आवाज भले ही इस घटाटोप में कुछ दब गयी हो पर रूकी नहीं। यही हमारी सबसे बडी ताकत है।

प्र013-  लोगों का मानना है कि छंदहीनता के चलते कविता खराब गद्य लगने लगी है। आज गद्य और कविता में कोई अंतर ही नहीं रह गया है। छंद के बंधनों से मुक्त होने के बाद से कविता गद्य के एक दम नजदीक चली गयी है। कभी-कभी कविता के वाह्य स्वरूप को देखकर कहना कठिन हो जाता है कि यह कविता है या कोई गद्यांश उसमें गद्यात्यमकता और सपाटबयानी का आग्रह बढ़ा है। सम्प्रेक्षण क्षमता का ह्रास हुआ है। फलस्वरूप उसकी पाठक संख्या घटी है यह कहा जाता है कि छंद के बंधन से मुक्त होना इसका प्रमुख कारण है। क्या आपको भी लगता है कि आज कविता को छंद की ओर लौटना चाहिये?

उ0-  मै कविता की लय को ही सबसे बडी ताकत मानता हूं। छंद के संस्कार ही लय को बचायंेगे। छंद न जानना मै अपनी कमी के रूप में स्वीकारता हूं।इसके प्रति मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं है। रस का भी नकार नयी कविता में हुआ है। रस अगर उस तरह नहीं आ सकता तो उसकी पूर्ति भाव पक्ष से करना पडे़गा।

प्र014- हिंदी के अनेक कवि और पाठक अपनी बातचीत के दौरान बताते हैं कि अक्सर हिंदी कविताओं को पढते हुये उनका मन उदास हो आता है। एक हीनता बोध उन्हें घेर लेता है। ऐसे क्षण कभी-कभी ही आते हैं जबकि कविताओं को पढ़ते हुये गहरा पाठकीय संतोष होता है। क्या कभी आपके साथ भी ऐसा होता है या हुआ?

उ0 - दूसरो की कमी से मैं क्यों हीनताबोध में आऊँ, मैं ऐसों को पढ़ता ही नहीं। जो मूल्यवान है उसे सिरहाने रखता हूं। नये, पुराने, क्लैसिक्स, देशी, विदेशी का कोई भेद कविता में नही रखता।

प्र015- आज एक ओर कविता इतनी सरल-सपाट हो गयी उसे किस कोण से कविता कहा जाये समझ में नही आता दूसरी ओर सांकेतिक व्यंजना और अर्थ की ध्वनियात्मकता के नाम पर कविता इतनी दुर्बोध और अगम हो गयी है कि सामान्य पाठक तो छोडिये दूसरे कवि आलोचक और प्रबुद्ध पाठकों की भी समझ में नही आ रही है। इस स्थिति के लिये कवि जिम्मेदार नही है क्या? आपके विचार से अच्छी कविता कैसी होनी चाहिये ?

उ0 - अच्छा प्रश्न है देखिये कविता तो कविताई के शर्त पर ही होगी लेकिन कवि से हर वक्त यह मांग कि वह इतना सरल लिखे की पाठक को समझ आये शायद उसके लिये ज्यादती होगी। पाठक जो कविता को  सुनना-समझना चाहता है उसे उसके लिये अपने को भी कुछ तैयार करना पडे़गा। जैसा कि ज्ञान की दूसरी श्रेणियों के लिये करता है। हां, जानबूझकर जटिल ज्ञान झाड़ने वालों को यह पता होना चाहिये कि उन्हें उनके खास लोग भी नहीं पढ़ते हैं। अगर पाठक को यह पता लग जाये कि जटिलता के पीछे खोजने पर कुछ मिलेगा तो वह यह भी करता है। इसका उदाहरण मुक्तिबोध की कविता है।

प्र016- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते है कविता में अर्थग्रहण नहीं बिम्ब ग्रहण  होता है।इस दृष्टि से आज की कविता के बारे में क्या कहेंगे जिसमें कि बिम्ब लगभग गायब होते जा रहे है?

उ0 -  शुक्ल जी से सहमत हूं जो कवि कविता में बड़ा बिम्ब नहीं रच सकता वह बडी कविता नहीं कर सकता और हां चमत्कार के लिये बिम्बों के पक्ष में मै नही हूं।

प्र017- आज की अधिकांश रचनायें जनता के दुख-दर्द जीवन के उतार चढाव, शोषण उत्पीड़न का तो गहराई से चित्रण कर रही है किंतु उससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बता रही है । क्या आपको नहीं लगता कि एक जनवादी रचनाकार के लिये केवल जनता के जीवन और संघर्षो का चित्रण करना ही पर्याप्त है या जीवन संघर्ष से मुक्ति का रास्ता भी सुझाना जरूरी है?

उ0 - देखिये महेश जी कविता की एक अपनी सीमा है और जो प्रश्न ही खड़ा कर सकती है। रास्ता तो पाठक को ही बनाना होगा अपने विवेक से, हां अगर कवि के दिमाग में मुक्ति का कोई रास्ता है तो वह किसी खंड काव्य या महाकाव्य में ही संभव है। और कविता से वही बदलेगा जो बदल सकता है और जो बदलना चाहता है। पत्थर तो नहीं ही बदल सकता है। एक कविता आपको थोडा और आदमी और अपने आसपास के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाती है। इसके बाद फिर राजनीति पक्षधरता ही आपके चरित्र का निर्धारण करती है कि आपकी रूचि जनता की राजनीति में है या पार्टियों की राजनीति में। मुझे लगता है कि एक कवि की वही राजनीति होनी चाहिये जो जनता की राजनीति।



प्र018- पिछले दिनों ’तद्भव’ में प्रकाशित दो बूढ़े साहित्यकारों नामवर सिंह और राजेन्द्र यादव ने आपसी बातचीत में स्वीकारा कि अब भविष्य का सपना या विकल्प जैसी कोई चीज नहीं रह गयी है। दूसरे शब्दों में कहे तो दुनिया विकल्पहीन हो गयी है। क्या आपको भी ऐसा महसूस होता है?

उ0  -इन दोनो महानुभावों  जिनका आपने नाम लिया है ये अपना काम कर चुके है। मै यह भी जानता हूं कि ये इसे स्वीकारेंगे भी नहीं। चर्चा में रहने के लिये कुछ न कुछ  कहते रहेंगे। ये सब चलता है। गंभीरता से लेने वाली बात नहीं नये लोग जो इनके नाम से आतंकित हैं जरूर भ्रमित होते है।

प्र. 19- हिंदी कविता के परिदृश्य को आप किस रूप में देखते है? इससे अपनी पूर्ववर्ती कविता से कथ्य और शिल्प के स्तर पर किसी तरह के परिवर्तन दृष्टिगोचर होते है?

उ0 - समकालीन कविता ने विकास किया अपनी नई जमीन तोड़ी कथ्य और शिल्प के स्तर पर साहसिक प्रयोग किया है। आज का कवि उतनी बंदिशें नहीं स्वीकार करता है जो जरूरी भी है। नई बात कहने के लिये हिंदी की युवा कविता विश्व की किसी भी भाषा की युवा कविता के सामने रखी जा सकती है। संवेदना, शिल्प, विचार किसी स्तर पर, मेरा पक्का मानना है।

प्र020- कुछ कवि कविता में जरूरत से ज्यादा कला लाने का प्रयास कर रहे है उनका जोर कथ्य की अपेक्षा शिल्प पर है जिससे कविता अमूर्त का ठसपन और दुर्बोधता की शिकार होती जा रही है। अपने समय के समाज और उसमें संघर्षशील मनुष्य के यर्थाथ की कलात्मक अभिव्यक्ति करने वाली कविता एक अच्छी कविता मानी जाती है पर क्या कलात्मक कविता का मतलब ऐसी कविता लिखना है जो समझ में न आये जैसा आज की कलात्मकता के नाम पर यही देखने में आ रहा है इसको आप कविता के भविष्य की दृष्टि से किस प्रकार देखते है।

उ0- कला पक्ष कविता का अनिवार्य अंग है। कला को विचार का संवाहक होना पडे़गा कला में चमत्कार पैदा करने वाले मध्यकाल के बिहारी से सीख ले सकते हैं।  बिहारी के यहां तो कुछ मिल भी सकता है पर इनके यहां तो कुछ भी नहीं।

प्र021-  आर्थिक उदारीकरण के साथ साथ किस तरह मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ है।  उपभोक्तावाद  हावी होता जा रहा  है। मनुष्य पर वस्तु का वर्चस्व स्थापित हो  चुका है। धन की प्राप्ति ही जीवन का परम लक्ष्य बन गया है।  जीवन का कोई क्षेत्र भी बाजारवाद से अछूता नहीं रहा है। ऐसे मे साहित्य की क्या भूमिका देखते है ,क्या लेखन द्वारा समाज का बदलाव संभव  है?

उ0 - नहीं, लेखन द्वारा समाज नहीं बदला जा सकता है। यह काम राजनीति का है लेखक तमाम राजनैतिक आंदोलनों को आगे बढ़ा सकता है। उनके आधार को पुख्ता कर सकता है। बस  इतना ही  उसका रोल है। समाज तो राजनीति से ही  बदलेगा।  मनुष्य पर हर समय इस तरह के  दबाव रहे है। अब दबाव का स्वरूप बदल गया है। दुश्मन एक दोस्त की तरह उसके कंधे पर हाथ रख उसे अपने घेरे में ले रहा है। और उसे ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा है कि यह दोस्त है या दुश्मन यही पर साहित्य की भूमिका सबसे बड़ी होती है कि वह असली शत्रुओं की पहचान कराये और अपने पाठकों को सतर्क करे। हां यह काम समकालीन कविता और कहानी में लगातार हो भी रहा है।

प्र023- आप को केदार बाबू के नजदीक रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व ने आपको  किस तरह से प्रभावित किया?

उ0  -केदार जी से मैंने मार्क्सवाद की दीक्षा ग्रहण  की और विचार और कविता के अन्र्तसम्बंधो को जाना बाकी साहित्य अकादमी के एक कार्यक्रम में संस्मरण में काफी विस्तार से कहा है जो हेतु भरद्वाज  की पत्रिका अक्सर में छपा है और रामजी ने अपने ब्लाग ’सिताबदियारा’ में भी दिया था।

प्र0 24 -केशव जी अंत में कुछ  ऐसी रचनाओं के नाम जानना चाहूंगा जिन्होने आपको बहुत विचलित एवं उद्वेलित किया हो और लम्बे  समय तक आपके मन मस्तिष्क में गूंजती रही है।

उ0-    हां, सरोज स्मृति और मायी का गाया जाने वाला एक लोकगीत जो सीता वनवास के बाद लक्ष्मण से स्त्रियां प्रश्न करती है ‘पग पग घुंईया भारी लखन कहां छोड आयो जनक दुलारी’ ये कविता और ये लोकगीत मुझे जब भी याद आते है मै असहज हो  उठता हूं।

संपर्क-
महेश चंद्र पुनेठा
रा0इ0का0 देवलथल, पिथौरागढ़
उत्तराखंड।
मोबाईल - 9411707470
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स वरिष्ठ कवि विजेंद्र जी की हैं।) 

टिप्पणियाँ

  1. एक बेहतरीन और सार्थक साक्षात्कार . दोनों कवि समकालीन कविता के महत्वपूर्ण हताक्षर हैं और मेरे प्रिय भी .इस बातचीत को प्रस्तुत करने के लिए 'पहलीबार' का आभार .
    -नित्यानन्द

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  2. sakhsatkar bahut achchha laga. samay ke sath sIdha samvad karata huaa

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  3. अच्छी चर्चा
    ''कविता की अपनी एक सीमा है और जो प्रश्न ही खड़ा कर सकती है ''
    ''एक कविता आपको थोडा और आदमी और अपने आस -पास के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनती है ''
    -केशव तिवारी
    कई प्रश्नों के जबाब मिल गए महेश पुनेठा जी का आभार

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  4. samkaleen kavita per baatcheet sarthak he. vijendra ji ki painting amurt ho kar bhe bahut kutch kheti he.Manisha jain

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  5. .....आदरणीय .केशव जी से कई बार मुलाक़ात हुई ,पर कविता और कविकर्म पर कभी बातें नहीं हो पायी ! इस साक्षात्कार में मेरे बहुत से प्रश्न और उनके उत्तर शामिल हैं ! पुनेठा जी को धन्यवाद !

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  6. बेहतरीन संवादों से युक्त एक आत्मीय साक्षात्कार !!! बहुत बहुत आभार !
    - कमल जीत चौधरी [ जे० & के० ]

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