जितेन्द्र कुमार के काव्य-संग्रह ‘समय का चन्द्रमा’ के बारे में

जितेन्द्र कुमार का काव्य-संग्रह ‘समय का चन्द्रमा’ वर्ष 2009 में ही प्रकाशित हुआ था। लेकिन इस  महत्वपूर्ण संग्रह पर कोई बातचीत नहीं हो पायी थी।इस संग्रह  पर एक समीक्षा लिखी है हमारे कवि-आलोचक मित्र बलभद्र ने। तो आईए पढ़ते हैं यह समीक्षा  

बलभद्र
    
 जितेन्द्र कुमार का काव्य-संग्रह ‘समय का चन्द्रमा’ वर्ष 2009 में ही प्रकाशित हुआ था। यह संग्रह मुझे उसी वर्ष मिला था। कुछ कविताएँ मैंने उसी समय पढ़ ली थीं और अधिकांश तो पहले से पढ़ी अथवा सुनी हुई थीं। कविताएँ विचारपूर्ण हैं। कवि की प्रगतिशील दृष्टि संग्रह की कविताओं में देखी जा सकती है। जितेन्द्र जी की एक काव्य-पुस्तिका भी प्रकाशित है (रात भर रोई होगी धरती), इस संग्रह से पहले, और उस पुस्तिका की कविताएँ भी इस संग्रह में हैं। उस पुस्तिका की कविताओं पर मैं पहले लिख चुका हूँ, सो, इस संग्रह पर कुछ लिखने में विलम्ब हुआ और यह विलम्ब मेरी समझ से स्वाभाविक है। जितेन्द्र जी की कविताओं में जो दिखाई देता है उसे समझना बहुत जरूरी है। ये अपनी कविताओं में ‘जनसंहार’ का जिक्र करते हैं। ‘बाथे’, ‘बथानी टोला’ आता है, ‘मियाँपुर’ आता है। इन सबको समझे बगैर इनकी कविताओं के मर्म को वस्तुगत संदर्भों में नहीं समझा जा सकता है। ‘बथानी टोला’ बिहार के भोजपुर जिला का एक गाँव है। राज्य मशीनरी का संरक्षणप्राप्त सामंतों की निजी सेना ‘रणवीर सेना’ ने इस गाँव के गरीबों, दलितों व अल्पसंख्यक समुदाय के औरतों, बच्चों सहित अनेक लोगों की बेहद निर्ममतापूर्वक हत्या कर डाली थी। लालूराज में बिहार में अनेक जनसंहार हुए जिसमें सैकड़ों लोग मारे गये। जितेन्द्र जी की कविताएँ इन जनसंहारों की पीड़ा और उसके प्रतिवाद से जुड़ी हुई हैं। ‘मृदंग’ कविता में रातभर धरती इसी पीड़ा में रोती है और सूरज धरती के आँसुओं को पोंछता है। मुझे बार-बार महसूस होता है कि यह जो सूरज है, ऊपर-ऊपर देखने पर तो लगता है कि जो सुबह में उगता है पूरब की दिशा में वह सूरज है, पर वास्तव में वह कवि के भीतर जो एक सूरज बैठा है प्रतिबद्ध विचार का सूरज, वह सूरज है, जो बथानी टोला के दुख-दरद में दुखी है और आक्रोशित भी है, पर असंतुलित नहीं है। कविता की पूरी बुनावट देखने लायक है। प्रकृति के उपादानों और क्रिया-कलापों के वर्णन के साथ कविता नरसंहार से जुड़ जाती है और इसके जुड़ते ही कविता में गजब की तीव्रता आ जाती है, कविता नाद से जुड़ जाती है, संकल्प-नाद से, एक आवाहन की तरफ गतिशील हो उठती है और सत्ता और सामंतों को ललकारने की मुद्रा में आ खड़ी होती है।

    जितेन्द्र जी शासकवर्ग के राजनीतिक छल-छन्द को समझते हैं, उसके चिकने-चुपड़े मुहावरों को भी। वे उस जन-समाज को भी जानते-समझते हैं जो गरीब है, हाशिए पर है, अशिक्षित है। पर थका-हारा नहीं है। वह अपनी राजनीतिक पार्टी और दिशा की तलाश करता है और उसके कार्यक्रमों से अपने को जोड़ता है और राजधानी पटना की सड़कों पर अपनी माँगों को बुलन्द करते हुए राज्य- मशीनरी की जनविरोधी नीतियों को उजागर करता है। अपने को विशाल जनसमुदाय से जोड़ता है और खाकी वर्दी के आतंक को धत्ता बताता है। ‘मेरे गाँव की अँगूठा छाप औरतें’ कविता में देखा जा सकता है कि


‘खाकी वर्दी से नहीं डरती अब
हाथ में हँसिया लेकर
विधान सभा का घेराव करने
राजधानी चली जाती हैं।’ 

ये औरतें अपने पूरेपन में बिल्कुल आम औरतों की तरह हैं। ये ढिबरी जलाती हैं, चूल्हा-चौका करती हैं, रोपनी-सोहनी करती हैं, गीत गाती हैं और विधान सभा का घेराव भी करती हैं। एक साथ अनेक दायित्वों का निर्वाह करती हैं। कवि केवल विधान सभा का घेराव करते दिखलाता तो इन औरतों की विशेषताएँ समग्र रूप में नहीं आ पातीं। कविता का सबसे मजबूत अंश वह है जहाँ कवि उनके चूल्हे जलाने और उनके पाँवो की आहट पर गोशाला के बछड़े के बाँ-बाँ बोलने का वर्णन करता है -

‘चूल्हे के धुएँ से संकेत देती हैं दिन के शुरू होने का
‘आँगन में उनके थिरकते पाँव की पदचाप सुनकर
गोशाला में बछड़ा बोलता है -
बाँ! बाँ!! बाँ!!!’


    जितेन्द्र जी जिस जाति अथवा वर्ग से आते हैं, उसके अंतर्विरोधों, उसकी अकड़ की प्रवृत्ति, कामचोरी, ऐय्याशी, बदमाशी सबको भली-भाँति जानते हैं और बहुत नजदीक से उसकी तीखी निंदा करते हैं, अपने निकट के किसी पात्र के इर्द-गिर्द कविता का ताना-बाना बुनते हुए। सामंती संस्कृति की पतनशीलता को उनकी कई कविताएँ अलग-अलग ढंग से दर्शाती हैं।



    ये डाक विभाग की नौकरी में थे। कई जगहों पर इन्हें काम करना पड़ा है। ये अनेक जनसंगठनों से जुड़े रहे हैं। झारखण्ड में भी इन्हें रहने का मौका मिला है। इनकी कविता में जो ‘पलाश’ है वह झारखण्ड का पलाश है। नौकरी के आखिरी चरण में इन्हें आरा से पटना प्रतिदिन आना-जाना पड़ा है। इस आने-जाने में उन्हें बहुत कुछ देखने-सुनने को मिला है। अपनी कविताओं में वे इन सारे प्रसंगों और अनुभवों का बहुत रचनात्मक उपयोग करते हैं। इन प्रसंगों और अनुभवों को वे देश-दुनिया के प्रसंगों, बहसों-विमर्शों, स्थितियों से जोड़ते हुए एक नई और महत्वपूर्ण बात कहने की कोशिश करते हैं।


    ‘जमवट’, ‘हर्षातिरेक’, ‘सनहवा’, भिखारी’, ‘प्रेम के मोती’ कविताएँ मुझे काफी अच्छी लगी हैं। ‘मेरा प्रदेश’ कविता के बारे में पहले ही विस्तार में लिख चुका हूँ। यह कविता पूर्व प्रकाशित पुस्तिका में भी थी। ‘कविता लिखने का वक्त’ भी अच्छी कविता है। यह कविता लोक के जगने की प्रक्रिया के साथ खुद को जोड़ने की कविता है। ‘जमवट’ पुरानी ग्रामीण-संस्कृति के रचनात्मक पक्ष को उजागर करती कविता है। कुएँ की खुदाई के बाद जब उसकी दीवार जोड़ी जाती थी तब जामुन की लकड़ी को कुएँ का आकार देकर उसे बुनियाद में डाला जाता था और उस पर से ईंटों की जोड़ाई शुरू होती थी। इसकी पूरी एक सांस्कृतिक प्रक्रिया थी। उत्सव जैसा माहौल हो जाता था। औरतें गीत-गाती थीं। लकड़ी में हल्दी लगाई जाती थी। जितेन्द्र जी ने इस कविता के जरिए अतीत के उस सांस्कृतिक प्रसंग को प्रकट किया है और ‘जमवट’ के जरिए जो नई बात कही है कि गाँव के मेहनतकश लोग ही किसी देश की बुनियाद होते हैं। वे ही देश की नींव में जमवट की तरह होते हैं। जामुन की वह लकड़ी वर्षों तक पानी में डूबी होकर भी सड़ती नहीं थी। यह एक सांस्कृतिक रागबोध की कविता है।


    ‘हर्षातिरेक’ में एक नन्हीं-सी बच्ची है और उसकी प्यारी अदाएँ हैं। वह बच्ची कवि की बेटी की बेटी है। दराज की एक-एक चीजें वह निकाल बाहर करती है। कवि उसकी इस बाललीला पर फिदा है और अपने ‘नाना’ होने के गर्व का उद्घोष करता है। यह हर्ष, यह गर्व और यह उद्घोष किसको नहीं भायेगा?


    ‘सनहवा’ दरअसल एक बाग का नाम है, कवि के गाँव का एक बाग है जो अब नहीं है। वह कवि की स्मृतियों में उभरता है। बाग के साथ कवि का बचपन जुड़ा हुआ है। वह बाग इस वजह से याद आता है कि कवि ने आरा शहर के पकड़ी गाँव के बगल के एक बाग को देखा, उस बाग को देखते हुए उसे समझ में आया कि ‘सनहवा’ की तरह यह बाग भी अब समाप्त हो जायेगा। शहर का विस्तार इसे निगल जायेगा। बचपन की स्मृतियों ने इस कविता को मर्मस्पर्शी बनाया है।


    ‘प्रेम के मोती’ पढ़ते वक्त मन भीतर से भींग गया। एक वृद्ध-विधुर अपनी पत्नी से बिछड़ने के दुख के साथ है। वे दोनों पति-पत्नी बुढ़ापे में ‘चिड़िया के जोड़े की भाँति’ पास-पास बैठते थे। जाड़े में बोरसी की आग आमने-समने बैठ कर तापते थे। गाँव के निम्न-मध्यवर्गीय परिवेश का यह बिम्ब है। ‘भिखारी’ कविता गरीबी-लाचारी के बावजूद मनुष्योचित व्यवहार की माँग को रेखांकित करती है। अपमानपूर्वक दिये गये ठेकुए को एक भिखारी ठुकरा देता है। उसका यह ठुकराना अच्छा लगता है। ‘इराकी बालक’ कविता पढ़ते हुए फैज की एक कविता ‘मत रो बच्चे’ याद आती है। इस बच्चे के माँ-पिता एक आक्रमण में मारे जाते हैं। जितेन्द्र जी मार्क्सवादी विचारधारा के कवि-कहानीकार हैं। वैश्वीकरण, उदारीकरण, साम्राज्यवाद आदि के माने-मतलब  अच्छी तरह जानते हैं। अपनी अनेक कविताओं में वे वैश्वीकरण के निहितार्थों एवं उससे उत्पन्न होने वाले संकटों की तरफ संकेत करते हैं। एक ही साथ वे सामंती संस्कृति, साम्राज्यवादी पैंतरों एवं भारतीय शासक वर्ग के साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ रिश्तों को उजागर करते हैं।


    इनकी कविताएँ इनके गहन मानसिक उद्वेलनों, इनके राजनीतिक सरोकारों, आम आदमी के साथ इनके जुड़ावों, एक ऐक्टिविस्ट की सक्रियताओं की उपज हैं। भाषा एकदम सहज है। कविताओं को पढ़ते समय लगता है कि नितांत गद्य की तरह शुरू हुई कविताओं में बीच-बीच में लय, तुक आदि स्वतः मिलते जाते हैं, अपने एक सहज प्रवाह में। व्यंग्य के साथ-साथ करुणा और एक प्रतिवाद भी कविताओं में सहज प्रवाह में उभरता दिखता है। ‘पुरानी हवेली’ कविता में बहुत धीरे से हवेलियों के दिन लद जाने वाली बात उठाई गयी है। हवेलियों के अच्छे दिन किस तरह के थे, कैसे वे अच्छे दिन उत्सव से भरे होते थे और बुरे दिन किस तरह के हैं जो आ गये हैं- के वर्णन में कविता खूब सधी है। ‘हवेली’ पुरानी सामंती संस्कृति की प्रतीक है। कवि साफ शब्दों में कहता है -


‘बहुत खतरनाक हो गया है
पुरानी हवेली में रहना।’

    हमारे ‘समय का चन्द्रमा’ आज अनेक संकटों और सवालों से आच्छादित है। उसे पूर्णतः खिलने, स्वतंत्रतापूर्वक अपनी चाँदनी बिखेरने का अवसर ही नहीं मिलता। वह जीवन की स्वाभाविक गति से दूर है। किसान, मजदूर, छात्र, बालक, बूढ़े, औरतें, युवक, युवतियाँ, घर, खेती, फसलें, बाग-बगीचे - सब वर्तमान माहौल में थके, ऊबे, असुरक्षाबोध से भरे हुए हैं। थोड़ी-सी चहल-पहल जो है बची हुई, सो जीवन की अपनी एक स्थिति और गति के चलते है। यह अब कितनी देर बची रहेगी, कहना कठिन है। ‘समय का चन्द्रमा’ इन प्रश्नों, इन संदर्भों, इन स्थितियों के साथ-साथ इनको समझने और इनसे उबरने के प्रयत्नों को रेखांकित करती कविताओं का संग्रह है।


समीक्ष्य कविता संग्रह
 
समय का चन्द्रमा, जितेन्द्र कुमार, 
किताब पब्लिकेशन, हाजीपुर रोड, 
मुजफ्फरपुर-  842002, मूल्य- 125 रू0 मात्र।

सम्पर्क - 
असिस्टेन्ट प्रोफेसर - हिन्दी, 
गिरिडीह कॉलेज, गिरिडीह, 
झारखण्ड। 
मो0- 09801326311

टिप्पणियाँ

  1. पूरी पुस्तक को पढने हेतु बाध्य करती समीक्षा..बहुत सुन्दर !

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  2. अच्छी परिचयात्मक समीक्षा हेतु आभार !!

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